जीवन-परिचय ऐसा हो जिससे औरों को प्रेरणा मिले
सीखने समझने करने की अभिनव नूतन धारणा खिले
जीवन पढ़ते ही भीतर की बुझती बाती झिलमिला उठे
भावों मे ज्वार विचारों में संकल्प - पुष्प खिलखिला उठें
ऐसा कुछ हो तो फिर चाहे तुम लिखो या कि मैं स्वयं लिखूँ ॥ ४ ॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 12 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६८७ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६९
हम अपने विचार, आचरण और कर्म को राष्ट्रहित तथा समाजकल्याण के लिए समर्पित करते हुए अपने चरित्र, ज्ञान, कर्तव्यबोध और सेवा-भाव का विकास करते चलें
भारत की संस्कृति का एक प्रमुख वैशिष्ट्य परिवार-भाव है। यहाँ केवल रक्त-सम्बन्धों से बने छोटे परिवार को ही परिवार नहीं माना जाता, बल्कि व्यापक दृष्टि से सम्पूर्ण समाज और समस्त मानवता को एक ही परिवार के रूप में देखा जाता है।इस आर्ष चिन्तन में व्यक्ति अपने सुख-दुःख को केवल अपने तक सीमित नहीं रखता, बल्कि दूसरों के सुख-दुःख को भी अपना ही समझता है।
इसी उदात्त भावना के कारण हमारे यहाँ “वसुधैव कुटुम्बकम्” का आदर्श स्थापित हुआ है
हमने पूरी वसुधा को ही अपना कुटुम्ब परिवार कहा
दुनिया ने जिसको ठुकराया आगे बढ़ उसका हाथ गहा
हम जीव मात्र को सदा दया का द्वार दिखाते आए
परहित में अपना तन मन धन घर-बार लुटाते आए हैं
अपने जैसा सबको माना जो कुछ दुनिया में दृश्यमान ॥ १ ॥
भारत महान् भारत महान्....
इस भाव में किसी प्रकार का भेदभाव, संकीर्णता या परायापन नहीं रहता। सभी मनुष्य, सभी जीव और समस्त सृष्टि एक ही परमात्मा की सन्तान समझे जाते हैं। यही भावना व्यक्ति को स्वार्थ से ऊपर उठाकर सहअस्तित्व, प्रेम, करुणा और सहयोग की ओर प्रेरित करती है l यही भावना हम अपने संगठन युगभारती में भी विकसित करें l हम वैभव और अभाव दोनों में सम रहने का प्रयास करें l संतुष्ट व्यक्ति का ही सचमुच इस जग में सच्चा जीवन है l संसार और संसारेतर दोनों का चिन्तन करें l
यह चिन्तन व्यक्ति को केवल भौतिक जीवन तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे व्यापक और आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करता है। हम कर्म करें किन्तु फल की इच्छा न करें l समाजोन्मुख और राष्ट्रोन्मुख जीवन जीने का जो संकल्प लिया है उस ओर अपने पग बढ़ाते रहें l
आचार्य जी ने भैया प्रदीप वाजपेयी जी १९८९, भैया मनीष कृष्णा जी, भैया पंकज श्रीवास्तव जी के नाम क्यों लिए, तरुण चेतना शिविर १९९२ की चर्चा क्यों हुई,आचार्य जी से जीवनी लिखने के लिए किसने कहा था जानने के लिए सुनें