प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 13 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६८८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७०
हमारा जीवन,चैतन्य, शक्ति,बुद्धि,विचार, भौतिक वैभव, आध्यात्मिकता समाजोन्मुखी और राष्ट्रोन्मुखी हो यह प्रयास करें
आचार्य जी का यह सतत् प्रयत्न—जिसके द्वारा हम उनके राष्ट्रभक्त मानस-पुत्र उत्थित, उत्साहित, प्रबुद्ध, जाग्रत और कर्मनिष्ठ बन सकें तथा अपने वास्तविक मनुष्यत्व जो किसी का अकल्याण नहीं चाहता है का साक्षात्कार कर सकें—निस्संदेह अवर्णनीय और अप्रतिम है।
हम लोगों का यह परम सौभाग्य है कि आचार्य जी अपने जीवन का दीप इस प्रकार प्रज्वलित कर रहे हैं कि उसकी ज्योति हम सबके जीवन में प्रकाश और प्रेरणा भर रही है l
ऐसी ज्योति कि जिसे देखकर ही अंधियार जले
हर उलूकवंशी को हर पल कुलिश* समान खले
हम ऐसे सामर्थ्य से सम्पन्न बनें कि उसके प्रयोग की आवश्यकता ही उत्पन्न न हो। हमारे तेज और पुरुषार्थ के दर्शन मात्र से दुष्टजन भयभीत हों तथा अपने राष्ट्रभक्त आत्मीय जनों के हृदय में निर्भयता और विश्वास का संचार हो l हमारी उपस्थिति से वायुमंडल सुगन्धित हो जाए l इसी के आधार पर हम संगठन गठित कर पाएंगे l इन प्रयासों से हमारा भारत देश कभी भोग -आगार नहीं हो पायेगा वह आर्ष परम्परा को सतत् प्रवाहमान् एवं चलायमान् बनाए रखेगा l
*वज्र
आचार्य जी ने उस किस प्रसंग का उल्लेख किया जब वे संघ के नियमित कार्यकर्ता थे, भैया विवेक भूषण १९८३ के पिता जी श्री राम अवतार वाजपेयी जी का उल्लेख क्यों हुआ,*निवास* किस स्थान का नाम था, अधिवेशन किसका प्रस्तुतीकरण है जानने के लिए सुनें