जीवन केवल जिन्दा रहना ही नहीं मित्र !
आजीवन कर्मशीलता का यह शपथ-पत्र,
जीवन उत्साह उमंगों की अद्भुत गाथा,
कल्पनाशीलता मुदिता शुचिता का प्रपत्र ll१ll
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 14 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६८९ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७१
हम ईश्वरत्व की अनुभूति करें जिसके लिए हमें अपने तन को संयमित कर मन को अवश्य ही नियन्त्रित करना चाहिए शरीर में ही अनुरक्त न रहकर मन को भी परखने का प्रयास करें
हमने भारतभूमि में जन्म लिया है—यह हमारे लिए परम सौभाग्य और गौरव का विषय है। यह भूमि केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, अपितु अनादिकाल से धर्म, ज्ञान, तप, त्याग और संस्कृति की पावन साधना-भूमि रही है। यहाँ की परम्पराएँ हमें केवल भौतिक उन्नति की ओर ही नहीं, बल्कि आत्मिक उत्कर्ष और लोकमंगल की दिशा में भी प्रेरित करती हैं। संसार के परिवर्तनशील स्वरूप में रहते हुए हमें बल प्रदान करती हैं l
आचार्य जी का नित्य यही प्रयास रहता है कि हम सबके भीतर सनातनधर्मी भाव सुदृढ़ बना रहे ।जब यह भाव हमारे जीवन में दृढ़ होता है, तब निराशा और हताशा हमारे समीप भी नहीं आती, क्योंकि हमारा दृष्टिकोण व्यापक और आशावान् बन जाता है। हम सत्कर्मों की ओर प्रेरित हों इसके लिए आचार्य जी अपना बहुमूल्य समय दे रहे हैं और आप चाहते हैं कि हम अपने जीवन को केवल व्यक्तिगत सुख तक सीमित न रख समाज, राष्ट्र और समस्त सृष्टि के कल्याण की भावना की ओर समर्पित करें साथ ही हम यह भी जानें कि भक्ति केवल भावनात्मक श्रद्धा भर नहीं है,वह परमशक्ति के प्रति गहन विश्वास और आत्मसमर्पण की अवस्था है। इस भक्ति में केवल शक्ति की अनुभूति ही नहीं, बल्कि उसके प्रभाव की अभिव्यक्ति भी हमारे आचरण, वाणी और कर्मों में प्रकट हो यही बात तो आचार्य जी दोहराते हैं ।
पराशर धर्म संहिता का उल्लेख क्यों हुआ, भैया पुनीत जी की चर्चा क्यों हुई,स्वाभाविक कार्य क्या हैं, क्या आजीवन कर्मशीलता में वार्द्धक्य बाधा बनता है जानने के लिए सुनें