भावना मानवी जीवन की सुरसरिता है
इसमें अवगाहन जिसके मन को भाता है,
सचमुच ही वह संसार सार का ज्ञाता है,
जीवन भर उसको ही सत्कर्म सुहाता है।
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष एकादशी/द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 15 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६९० वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७२
संवेदना भरपूर लेकिन कर्मवृत्ति अभाव है
परिदेवनारत हम सभी का यही बना स्वभाव है
जागें जगाएं कर्म के प्रति वृत्ति को खरधार दें
कर्मानुरागी बन चलें सोया समाज सुधार दें
हमारे भीतर संवेदनाएं तो प्रचुर मात्रा में हैं , किन्तु कर्म करने की प्रवृत्ति का अभाव दिखाई देता है। हम प्रायः परिस्थितियों पर विलाप करने और असंतोष प्रकट करने में ही समय व्यतीत कर देते हैं। यह प्रवृत्ति हमारे स्वभाव का अंग बनती जा रही है। अतः आवश्यक है कि हम स्वयं जागें और दूसरों को भी जाग्रत करें, तथा अपने भीतर कर्मशीलता की तीक्ष्ण और दृढ़ वृत्ति उत्पन्न करें। जब हम कर्म के प्रति अनुरागी बनकर आगे बढ़ेंगे, तभी सुप्त समाज को जाग्रत कर उसका वास्तविक सुधार कर सकेंगे।
हम उस समाज को जगाना चाहते हैं जो पाश्चात्य प्रभाव और अन्य विभिन्न भ्रमों के कारण, अपने स्व-रूप से विमुख और शंकित हो गया है। ऐसे सनातनधर्मी समाज को यह अनुभव कराना आवश्यक है कि सनातन धर्म केवल एक परम्परा नहीं, बल्कि अद्भुत शक्ति, साहस और अमर जीवन-दृष्टि का स्रोत है। हमें यह आत्मविश्वास जाग्रत करना होगा कि उसे विपत्तियों और प्रभंजनों से भयभीत नहीं होना चाहिए ,उसे अपनों और परायों के बीच के भेद की स्पष्टता होनी चाहिए
उस सुप्त समाज को यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि हमारा भारत देश वेदविदों का देश है भारत की पहचान केवल एक राष्ट्र के रूप में नहीं, बल्कि वैदिक ज्ञान, ऋषि-परम्परा और उच्च आध्यात्मिक संस्कृति के केन्द्र के रूप में है। यही परम्परा हमें अपने जीवन को उच्च, मर्यादित और लोकहितकारी बनाने की प्रेरणा देती है। आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हम आत्मबोध से युक्त रहें मनुष्यत्व की अनुभूति करें संगठित रहें दंभ का विसर्जन करते रहें शुभ शक्तियों को देशहित बांधने का प्रयास करते रहें l
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