16.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 16 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६९१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८२  तदनुसार 16 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६९१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७३

आत्मशुद्धि की ओर उन्मुख होने का प्रयास करें 



हमारे आचार्य श्री दीपक राजे जी की बहन सुश्री रेखा ताई राजे जो श्रद्धेय अशोक सिंघल जी और सिंधुताई फाटक जी की प्रेरणा से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषांगिक संगठन राष्ट्र सेविका समिति की पूर्णकालिक प्रचारक बनीं और जिन्होंने आजीवन अविवाहित रहकर देशसेवा का व्रत लिया कल हमारे बीच नहीं रहीं यद्यपि वे शारीरिक रूप से अब हमारे साथ नहीं हैं, तथापि उनका तप और त्याग,उनकी यशस्विता सदैव हमारे पथ को आलोकित करती रहेगी। उनके आदर्श और जीवन-संदेश आने वाली पीढ़ियों को निरन्तर प्रेरणा देते रहेंगे।

इस परिचय-प्रधान संसार में जब कोई अपना हमें छोड़कर चला जाता है, तब मोह स्वाभाविक रूप से मन को अत्यन्त दुःखी कर देता है। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वे हमें इस मोह से मुक्त होने की शक्ति दें तथा दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें।

आचार्य जी नित्य इन सदाचार-वेलाओं के माध्यम से राष्ट्रभक्ति, आत्मभक्ति तथा ईश्वरभक्ति जैसे उच्च जीवन-मूल्यों के विषयों को उठाते हैं और हमें उनके महत्त्व का बोध कराते हैं।


भक्ति का यह भाव और बोध ज्ञान के साथ सम्मिश्रित होकर एक अनोखी घटना के रूप में भारतवर्ष में घटित हुआ है  वह भारतवर्ष 

जो संघर्ष, स्वाभिमान और बलिदान की जाज्वल्यमान परम्परा का देश है। इस पावन भूमि पर छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, गुरुगोविन्द सिंह, बिरसा मुंडा, मंगल पांडेय, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद,बंदा बैरागी जैसे महापुरुषों ने अन्याय के विरुद्ध अडिग रहकर स्वतंत्रता और धर्मरक्षा के लिए अपने जीवन का उत्सर्ग किया।

इसी संघर्ष के बीच में अध्यात्म भी पल्लवित होता रहा l स्वामी विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी रामतीर्थ, स्वामी दयानन्द सरस्वती आदि अनगिनत साधक समाज को जाग्रत करने का कार्य करते रहे l 

किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठा ।

अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥१॥

इस जगत् का कारण क्या है? हम कहाँ से उत्पन्न हुए हैं? हम किसके द्वारा जीवित रहते हैं? और अंततः किसमें स्थित हैं?

हम किसके अधीन होकर सुख और दुःख में जीवन व्यतीत करते हैं?

ब्रह्मवेत्ताओं से ब्रह्म का जिज्ञासु प्रश्न कर रहा है

 

ऋषियों ने पहले विचार किया कि क्या काल (समय), स्वभाव, नियति, यदृच्छा (संयोग), पंचभूत या पुरुष इनमें से कोई जगत् का कारण है। परन्तु उन्होंने देखा कि ये सभी स्वयं भी किसी नियम के अधीन हैं, इसलिए ये परम कारण नहीं हो सकते।

तत्पश्चात् ध्यान-योग और गहन मनन के द्वारा उन्हें यह बोध हुआ कि इस सम्पूर्ण जगत् का मूल कारण एक ही परम देव — परमात्मा (ब्रह्म) है, जो समस्त जगत् का नियन्ता और आधार है। उसी से जगत् की उत्पत्ति होती है, उसी से जीवन का पोषण होता है और उसी में अन्ततः सब स्थित है।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने आज होने वाली किस बैठक की चर्चा की, हमारी शक्ति कैसे क्षय होती है, योद्धाशिष्यों को किसने फैलने के लिए कहा जानने के लिए सुनें l