कर्ममय जीवन जगत का मूल है
द्वीप को तट समझ लेना भूल है
गीत गाना है सदा विश्वास के
स्वप्न बुनने हैं प्रगति के, आस के
देहली - दीपक धरा का न्याय है
कर्म - कुण्ठा पतन का पर्याय है
स्वर्ण शोभा हो भले पर
अंकुरण के लिये व्याकुल बस धरा की धूल है l
( आचार्य जी की *संदेश* कविता का एक अंश )
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 17 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६९२ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७४
दिल्ली में आयोजित होने वाले अधिवेशन को सफल एवं आकर्षक बनाने हेतु हम सब पूर्ण समर्पण के साथ तत्पर हो जाएं
जब हम जीवन को केवल भौतिक सुख, धन, पद और बाह्य उपलब्धियों तक ही सीमित कर लेते हैं, तब हमारा ध्यान आत्मा, सत्य और जीवन के वास्तविक उद्देश्य से हट जाता है। ऐसी स्थिति में हम बाहरी प्रगति होने पर भी भीतर से शान्ति , आनन्द और संतोष से वंचित रहते हैं।
आत्मज्ञान की उपेक्षा के कारण हम सही और गलत का गहरा विवेक नहीं कर पाते और जीवन अज्ञानरूपी अन्धकार में ही बीतता रहता है। अतः उस अंधकार से बचना हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है
ये सदाचार वेलाएं हमें प्रकाश की ओर ले जाती हैं उत्साह, शक्ति और प्रेरणा प्रदान करती हैं व्याकुलता भय भ्रम से बचाती हैं हमें ध्यानपूर्वक सुनकर इनका लाभ उठाना चाहिए l
यह सम्पूर्ण जगत् सर्वशक्तिमान् ईश्वर से आवृत और उसी के अधीन है इसमें हमें किसी प्रकार का संदेह नहीं होना चाहिए इस प्रकार हमारे भीतर लोभ और स्वार्थ का स्थान नहीं रहेगा। हम वस्तुओं के प्रति आसक्ति त्यागकर संयमपूर्वक जीवन यापन करेंगे तथा अपने कर्तव्य कर्मों में रमेंगे किन्तु उनके प्रति अनासक्त भाव रखेंगे इस प्रकार हमारा आचरण हमारे जीवन को शुद्ध, संतुलित एवं सर्वहितकारी बना देगा l
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया सौरभ राय जी,भैया मनीष कृष्णा जी, भैया यज्ञदत्त जी का उल्लेख क्यों किया,लकड़ी के टाल का उल्लेख क्यों हुआ, ईशोपनिषद् के किन छंदों में परब्रह्म के स्वरूप का बोध है जानने के लिए सुनें