जानता स्वर्ण नगरी है यह पर ओढ़े सीतारामी हूं
हो कोई साथ नहीं फिर भी अपने पथ का अनुगामी हूं...
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष चतुर्दशी / अमावस्या विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 18 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६९३ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७५
अपने चिन्तन पक्ष को पंगु न होने दें एक दूसरे की चिन्ता करते हुए प्रेम आत्मीयता का विस्तार करते हुए अपने संगठन युगभारती को सुदृढ़ता प्रदान करें
तुलसीदास जी कहते हैं
तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा॥
आचार्य जी भी हमें निराश्रित न छोड़ते हुए प्रतिदिन बार-बार यही स्मरण कराते हैं कि हम अपने सनातन धर्म के वैशिष्ट्य को जानें, सद्ग्रंथों का अध्ययन करें तथा चिन्तन, मनन, निदिध्यासन और लेखन करें हमारे भीतर शक्ति शौर्य पराक्रम ऐश्वर्य देशभक्ति भगवद्भक्ति उमड़ती घुमड़ती रहे
कर्मठता अद्भुत है
संसार कर्म की भूमि उत्सवों की शोभा
सत्कर्मी का मन सदा रहा इससे लोभा,
निष्क्रिय को यह जग हरदम बोझा लगता है
कर्मठ साथी का संग छोड़ वह भगता है।
कर्मठ को यह संसार हार के जैसा है ॥४॥
आचार्य जी का प्रयास रहता है कि हम सदैव उत्साहपूर्वक जीवन जीएं
जो व्यक्ति उत्साह से पूर्ण होता है, कार्यों को टालता नहीं, बल्कि समय पर पूरा करता है; जो कार्य करने की विधि को भली-भाँति जानता है और अपने कर्तव्यों में लगनपूर्वक संलग्न रहता है जो व्यसनों से दूर रहता है जो साहसी, कृतज्ञ तथा दृढ़ता रखने वाला होता है ऐसे गुणों से युक्त व्यक्ति के पास लक्ष्मी (समृद्धि और सफलता) स्वयं निवास करने के लिए चली आती है।
इसके अतिरिक्त आचार्य जी कहां बहुआयामी विश्वविद्यालय बनाना चाहते थे भैया गोपाल जी भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी भैया शशि शर्मा जी का उल्लेख क्यों हुआ सरौहां गांव के मेले की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें