20.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 20 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१६९५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७७

 प्रात अनुभव करो "ईश का अंश हूँ"

दोपहर में प्रखर "वीर का वंश हूँ"

शाम को ज्ञानगरिमा भरा ऋषि प्रशम 

रात्रि संकल्पमय "दुष्ट पर दंश हूँ" ॥



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 20 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१६९५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७७

गांव गांव के दर्द को समझें उनका मानसिक स्वास्थ्य ठीक करने का प्रयास करें 


प्रभातकाल का यह आनन्दमय चिन्तन निःसंदेह अत्यन्त अनुपम और कल्याणकारी है, किन्तु इसका वास्तविक लाभ तभी संभव है जब यह केवल क्षणिक मनन तक सीमित न रहकर जीवन के व्यापक आयामों में प्रसारित हो।

यह विस्तार तब प्राप्त होगा जब हम इस चिन्तन को अपने दैनिक आचरण में उतारेंगे । केवल विचार करना पर्याप्त नहीं, अपितु उन श्रेष्ठ भावों को कर्म, व्यवहार और निर्णयों में अभिव्यक्त करना आवश्यक है।

जब हम बार-बार उसी शुभ विचारधारा का अनुसरण करेंगे , उसे अपने जीवन का अंग बनाएंगे तब वह स्वभाव में परिवर्तित होकर स्वयमेव विस्तृत होने लगेगा l


जब हम अपनत्व की भावना के साथ किसी के नेत्रों में झांकते हैं, तब वहाँ केवल एक व्यक्ति नहीं, अपितु एक ही स्रोत से उद्भूत शक्ति का अनुभव होता है। यह अनुभव हमें भीतर से ऊर्जा प्रदान करता है, क्योंकि उस क्षण भेद मिट जाते हैं और एकात्मता का बोध जाग्रत होता है।

ऐसा ही अद्भुत दृष्टिकोण स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो धर्म संसद १८९३ में प्रस्तुत किया। जब उन्होंने “Brothers and Sisters” कहकर अपने उद्बोधन का आरम्भ किया, तब वह केवल संबोधन नहीं था, बल्कि उस गहन आत्मीयता का प्रकटीकरण था, जिसमें सम्पूर्ण मानवता एक परिवार के रूप में दिखाई देती है।

उनके लिए वहाँ उपस्थित सभी व्यक्ति  अपरिचित नहीं थे; अपितु वे उसी परम तत्त्व की अभिव्यक्तियाँ थे, जिनसे वे स्वयं बने थे। उन्हें यह अनुभव हुआ कि बाह्य रूप, भाषा और संस्कृति में भिन्नता होते हुए भी मूलतः सब एक ही सृष्टिकर्ता की रचना हैं अपनत्व का यह भाव ही वह सेतु है, जो मनुष्यों को जोड़कर सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में अनुभव कराता हैl यही

आत्मचैतन्य आत्मदर्शन और आत्मबोध है l 


मनः बुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं

न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।

न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायु:

चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥

संपूर्ण सृष्टि ही चिदानन्द रूप है l 


सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥


भैया अक्षय जी २००८ को आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया उन्हें साधना का कौन सा उपाय बताया, सरौहां में तालाब भरने का आश्वासन किसने दिया जानने के लिए सुनें