प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 21 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६९६ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १७८
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एक अत्यन्त पवित्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए विद्यालय के संस्थापकों के मन में यह विचार अवश्य उदित हुआ होगा कि पंडित दीनदयाल जी के नाम पर एक आदर्श विद्यालय की स्थापना की जाए। इस संस्थान का शिलान्यास भी पवित्र एवं श्रेष्ठ व्यक्तियों के द्वारा कराया जाए, जिससे इसकी नींव ही उच्च आदर्शों पर आधारित हो।
विद्यालय परिसर में श्री हनुमान जी का प्राण-प्रतिष्ठित विग्रह स्थापित हो, जिससे वातावरण में सदैव आध्यात्मिकता, शक्ति और प्रेरणा का संचार बना रहे। यहाँ विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर विशेष ध्यान दिया जाए,केवल पाठ्य-सूत्रों का रटन ही उद्देश्य न हो और न ही केवल परीक्षा-परिणाम पर दृष्टि केंद्रित रहे, अपितु उनके चरित्र-निर्माण को भी समान महत्त्व दिया जाए।
विद्यार्थियों में राष्ट्रनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता तथा समाजोन्मुखता के संस्कार विकसित किए जाएं , ताकि वे आगे चलकर एक आदर्श नागरिक बन सकें। साथ ही, इस विद्यालय के शिक्षक स्वयं चरित्रवान् , आदर्शवादी और प्रेरणास्रोत हों,इस प्रकार यह विद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र न होकर, संस्कार, चरित्र और राष्ट्रभावना के निर्माण का एक सशक्त माध्यम बने। ऐसे विचार के पश्चात् विद्यालय प्रारम्भ हो गया प्रथम परिणाम से ही समाज में हमारे विद्यालय की चर्चा हो गयी और समाज के लोग आकर्षित होने लगे l यह विद्यालय एक साधारण शिक्षण संस्था से आगे बढ़कर एक प्रेरणास्रोत एवं आदर्श शिक्षण-केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। ऐसे विद्यालय के हम विद्यार्थी रहे हैं और इस कारण हमारा कर्तव्य हो जाता है कि अपने राष्ट्र के प्रति हम निष्ठावान् रहें सनातन धर्म के वैशिष्ट्य को गहनता से जानें दिशा और दृष्टि में किसी प्रकार का भ्रम न रखें
समाज की सेवा का भाव रखें संतुष्ट रहने का प्रयास करें, मात्र कार्यक्रमों को ही आयोजित न करते रहें अपनी शक्ति बुद्धि विचार कौशल को प्रेम के प्रवाह में प्रवाहित करने का प्रयत्न करते रहें, बिना लोभ लाभ के अपने कार्यक्षेत्र में जुटे रहें
पुरुष हो पुरुषार्थ करो
*आबा घंटी बज गयी* किसने कहा,विवेकानन्द की तरह किसने प्रस्थान किया,तुलसीदास जी को अपनी पत्नी में भी कौन दिखाई देते थे,केशवदास जिन्हें हिंदी साहित्य में'कठिन काव्य का प्रेत' भी कहा जाता है की किस रचना की आचार्य जी ने चर्चा की, व्यक्ति से व्यक्तित्व की ओर उन्मुखता कैसे होगी जानने के लिए सुनें