नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे।
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे।
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 7 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६८२ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६४
श्रीमद्भग्वद्गीता, जिसका एक एक छंद जीवन का तत्त्व है,के दूसरे अध्याय के ४७ से ५३ तक के छंद पढ़ें निःसंदेह इनसे शान्ति और आनन्द की अनुभूति होगी
प्रातःकाल की ये सदाचार वेलाएं हमारे जीवन को उन्नत बनाने की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण साधना हैं। इनका वास्तविक लाभ हमें तभी प्राप्त होगा , जब हम केवल बाह्य रूप से उपस्थित न रहते हुए इनके भावों और आदर्शों में भी प्रवेश करेंगे l
भाव की भाषा जहां व्यवहार के पथ पर चली है
और सात्विक शक्ति को चैतन्य की झंकृति मिली है
वहीं सन्निधि का अनोखा प्रेममय संबल मिला है
सहज प्रेमी साथियों का हर तरह का बल मिला है
इसी बल को ज्ञानियों ने संगठन का नाम देकर
और मानव को विधाता ने यशस्वी काम देकर
जगत के झंझा झकोरों पर विजय का पथ दिखाया
और मानव को मनन चिन्तन भरा जीवन सुझाया
हमें अपने विचार और व्यवहार को देशभक्ति के संस्कारों से अनुप्राणित करना चाहिए। यदि हमारे जीवन में राष्ट्र के प्रति श्रद्धा, कर्तव्य और समर्पण की भावना जाग्रत होती है, तभी यह कहा जा सकता है कि हम वास्तव में युगभारती संस्था के सच्चे सदस्य हैं l देशभक्ति अपने आप में एक अद्भुत और पवित्र भावना है। जब मनुष्य अपने देश को केवल भूमि का टुकड़ा न मानकर पवित्र चेतना और दिव्यता का प्रतीक समझने लगता है, तब उसे उसी में परमात्मा का दर्शन होने लगता है। यही उच्च दृष्टि महान् संत स्वामी रामतीर्थ की थी। वे एक अत्यन्त मस्त, निर्भीक और उच्चकोटि के योगी थे, जिन्होंने भारतभूमि में ही ईश्वर की झलक का अनुभव किया।
वास्तव में यह धरती ऐसे ही अद्भुत संतों और महापुरुषों की तपस्या से पवित्र बनी है। उनके आदर्श हमें यह प्रेरणा देते हैं कि हम अपने जीवन में उच्च विचार, श्रेष्ठ आचरण और गहन राष्ट्रभक्ति को स्थान दें।
राष्ट्र को और अधिक विभूतिमत्ता प्रदान करने के लिए हमें कर्मरत रहना चाहिए l
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिः।
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं।
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥
किन्तु हम अपने कर्म करें,उन कर्मों के फल में आसक्ति मत रखें l जब मनुष्य कर्म करता है तो उसके मन में सफलता और असफलता का विचार उत्पन्न होता है। यदि सफलता मिलती है तो अहंकार और हर्ष होता है और असफलता होने पर शोक तथा निराशा उत्पन्न होती है।
किन्तु योगी का मार्ग इससे भिन्न है।
योगी व्यक्ति सिद्धि (सफलता) और असिद्धि (असफलता) दोनों स्थितियों में समभाव रखता है। वह अपने कर्तव्य का पालन तो पूर्ण निष्ठा से करता है, परन्तु परिणाम को ईश्वर पर छोड़ देता है। हमें यही योगी का मार्ग अपनाना चाहिए l
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया सिद्धनाथ जी भैया मनीष जी भैया मोहन जी भैया वीरेन्द्र जी का उल्लेख क्यों किया मुक्ति और भुक्ति में क्या अन्तर है कृपण कौन हैं माधवेन्द्र पुरी का नाम क्यों लिया जानने के लिए सुनें