प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८२ तदनुसार 8 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६८३ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १६५
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥ सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ॥3
आदि अरण्य कांड की चौपाइयां स्मरण कर लें
समाज देवतुल्य है। वह परमात्मा की यन्त्रमय, तन्त्रमय तथा मन्त्रमय शक्ति का विस्तार है। समाज मनुष्यों को एक सूत्र में बांधता है और उन्हें मर्यादित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। किन्तु जब समाज में विकृति उत्पन्न हो जाती है, तब वही समाज विष के समान कष्टदायक भी हो सकता है। इसलिए हमें सदैव समाजोन्मुख रहने का प्रयास करना चाहिए, जिससे समाज की शुद्धता, सद्भावना और संतुलन बना रहे। इसी प्रकार राष्ट्र के उत्थान के लिए हमें राष्ट्रोन्मुख भी रहना चाहिए l हम मात्र शरीर मन बुद्धि विचार न होकर इनका समन्वित स्वरूप हैं यही समन्वय हमें मनुष्य बनाता है l
परहित सरिस धरम नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
अर्थात् दूसरों का हित करना ही सर्वोच्च धर्म है।
यह वही भावना है कि समाज मनुष्यों को जोड़ता है और उसके कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए।
मानस में समाज, मर्यादा, समन्वय और लोककल्याण का ही आदर्श प्रस्तुत किया गया है।
आचार्य जी ने अप्रतिम भक्त शबरी का उल्लेख किया
भगवान् राम जो सर्वज्ञ हैं किन्तु अज्ञ बनकर जिससे भक्त का मन मोहित हो जाए प्रश्न करते हैं
जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी॥5॥
इस पर शबरी कहती हैं
पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥
सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा॥6॥
इसके अतिरिक्त आचार्य जी आज कहां जा रहे हैं स्वामी रामतीर्थ की चर्चा क्यों हुई भगवान् राम जी के जन्म के अनेक कारणों में किस एक कारण का उल्लेख आचार्य जी ने किया जानने के लिए सुनें