प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७१९ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०१
हम यह अनुभव करें कि परमात्मा
*बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥*
*आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥*
हमारे भीतर स्थित है
हम प्रयास करें कि हमारे भीतर संसार के कल्याणार्थ विचार उत्पन्न हों
आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हम लोगों में जो भी लोग मन में उत्पन्न होने वाली नकारात्मक भावनाओं जैसे हीनता, मोह और भ्रम आदि से ग्रस्त हैं वे इन्हें त्याग दें । ये भावनाएँ व्यक्ति की सोच को संकुचित करती हैं और उसे सही निर्णय लेने से रोकती हैं। अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अधिवेशन हमारे सामने है ,अतः हमें चाहिए कि हम उत्साह में आयें हम अपने मन को शुद्ध, स्पष्ट और सकारात्मक बनाएं । मन की उलझनों को दूर करके, एकाग्रता और आत्मविश्वास के साथ उस कार्य के लिए पूर्ण रूप से तैयार हो जाएं ।
यह अधिवेशन समाज को यह निश्चिन्तता देने के लिए है कि अभी भारतीय संस्कृति जीवित, जाग्रत और सचेत है और यह संस्कृति हम भारतीयों के माध्यम से संपूर्ण विश्व को संदेश देना चाहती है कि शिक्षा अत्यन्त विशिष्ट है शिक्षा का अर्थ केवल पाठ्यक्रम को रट लेना या परीक्षा में अंक प्राप्त कर लेना नहीं है। वास्तविक शिक्षा वह है, जो मनुष्य के भीतर ज्ञान के साथ-साथ विवेक, संस्कार और जीवन जीने की कला का विकास करे। यदि शिक्षा केवल नौकरी प्राप्त करने का साधन बनकर रह जाए, तो उसका उद्देश्य सीमित हो जाता है। शिक्षा का मूल लक्ष्य व्यक्ति को सक्षम, सजग और समाजोपयोगी बनाना है, न कि केवल आजीविका अर्जित करने वाला एक साधन मात्र।
भारत की प्राचीन गुरुकुल शिक्षा प्रणाली इसी व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित थी। वहाँ विद्यार्थी केवल शास्त्रों का अध्ययन ही नहीं करते थे, बल्कि जीवन के प्रत्येक पक्ष को समझते थे। गुरु के सान्निध्य में रहकर वे अनुशासन, संयम, सेवा, आत्मनिर्भरता और नैतिक मूल्यों का अभ्यास करते थे। शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण, आत्मविकास और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना जाग्रत करना था।
गुरुकुलों में प्रकृति के निकट रहकर विद्यार्थी सरल जीवन और उच्च विचार का अनुसरण करते थे। वहाँ ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं था, बल्कि व्यवहार, अनुभव और अभ्यास के माध्यम से आत्मसात किया जाता था। विद्यार्थी अपने गुरु से केवल विषयज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन भी प्राप्त करते थे।
इसके अतिरिक्त
भैया संतोष मिश्र जी १९८८आचार्य जी से क्या पढ़ना चाहते हैं? हनुमान जी ने विद्या कैसे ग्रहण की? किसने किसने अपने मनुष्यत्व को पहचान लिया? जानने के लिए सुनें