8.11.23

अध्यात्म -सौरभ्य ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज कार्तिक मास कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 8 नवम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण 832 वां सार -संक्षेप

 तीर्थे तीर्थे निर्मलं ब्रह्मवृन्दं।

वृन्दे वृन्दे तत्त्वचिन्तानुवादः॥

वादे वादे जायते तत्त्वबोधः।

बोधे बोधे भासते चन्द्रचूडः॥


प्रस्तुत है अध्यात्म -सौरभ्य ¹  आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज  कार्तिक मास कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रम संवत् 2080  तदनुसार 8 नवम्बर 2023 का  सदाचार संप्रेषण 

  832 वां सार -संक्षेप


 1  अध्यात्म की सुगन्ध



उठो उत्साह का दर्पण निहारो 

सुजन सँग सत्य का आशय विचारो 

करो संसार को अर्पित स्वयं का शक्तिसौरभ 

कि "जय श्रीराम " मन ही मन उचारो।


हमें अपना उत्साह बनाए रखना चाहिए

और अच्छे साथियों को खोजना चाहिए क्योंकि सुजनों के साथ हम  बड़े से बड़े रहस्य सुलझा सकते हैं

दुर्जनों की तो भरमार है जो हमें भ्रमित करते हैं वे हमारा खाद्याखाद्य विवेक समाप्त कर सकते हैं 

यद्यपि मतियां भिन्न होती हैं लेकिन जब सुजनों के बीच अच्छे विचारों का आदान प्रदान होता है तो एक निष्कर्ष निकलता है

'जय श्री राम'  हमें शक्ति भक्ति उत्साह चैतन्य आदि बहुत कुछ से भर देता है

भले ही हम इसका उच्चारण मन ही मन करें मौन जप का अपना महत्त्व है मौन जप का यदि हमें आशय स्पष्ट हो तो हमारा जीवन दिव्य हो जाता है 

श्रद्धेय अशोक सिंघल जी पर लिखी आचार्य जी की ये पंक्तियां देखिए 

जय श्रीराम" शौर्य-स्वर देकर जिसने देश जगाया था ,

जिस स्वर ने हिंदुत्व धार को खरतर कर चमकाया था ,

जिसने भाव भक्ति को विक्रम का उद्बोध कराया था,

जिसने दंभी राजतंत्र को घुटनों बल बैठाया था....

भारत की धरती अद्भुत है अबूझ है जिन्हें इसका महत्त्व नहीं पता वो अभागे हैं 


राम की व्यापकता अद्भुत है

राम की कथा हमें उत्साह चैतन्य शक्ति सामर्थ्य से भर देती है

तुलसीदास जी कहते हैं



भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥

सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥


अच्छे भाव  से, बुरे भाव  से, क्रोध से, आलस्य से या किसी तरह से भी राम नाम जपने से सारी दिशाओं में कल्याण होता है। उसी राम नाम का स्मरण करके प्रभु राम को मस्तक नवाकर मैं राम के गुणों का वर्णन करता हूँ।


नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥

कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥


कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है।


तुलसीदास जी ने सामान्य भाषा में रामचरितमानस में राम कथा की एक परम्परा गाई है  और उसका विषय बहुत गहन है

जब भी हम भय भ्रम कष्ट दुविधा में हो उच्च स्वर में मानस का पाठ करें इससे कल्याण होगा


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें