हमारे देश को सबकुछ दिया परमात्मा तूने,
मगर रणकर्कषात्मक वृत्ति से वंचित किया क्यों है ?
अपरिमित शौर्य संयम साधना संकल्प सेवा दे,
सहिष्णुस्युत भावना-अतिरेक से सिंचित किया क्यों है??
(ओम शंकर 11/04/2022)
प्रस्तुत है ज्ञान -अवारपार ¹ आचार्य श्री ओम शङ्कर जी का आज कार्तिक मास कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रम संवत् 2080 तदनुसार 9 नवम्बर 2023 का सदाचार संप्रेषण
833 वां सार -संक्षेप
1 ज्ञान का समुद्र
प्रतिदिन आचार्य जी हमें उत्साहित करने का प्रयास करते हैं यदि हम अणु आत्मा विभु आत्मा परमात्मा की कृपा पर पूर्ण आस्था और विश्वास रखें तो निश्चित रूप से संघर्षों में हमें सफलता मिलेगी
उठो जागृत मनीषा बुद्धि के प्राखर्य जगसंगर जयस्वी!
उठो विश्वास के विग्रह मनोनिग्रह विभव भव के तपस्वी!
उठो सत्याचरण के ज्ञान भव विज्ञान अणु-विभु के मनस्वी !
उठो हुंकार जग विस्तार के वेत्ता प्रबल बल हे यशस्वी!
सुप्त मनीषा मनुष्य को बहुत भ्रमित रखती है इसी कारण हमें अपनी मनीषा को जाग्रत रखना चाहिए बुद्धि प्रखर रखनी चाहिए संसार रूपी संग्राम में विजय प्राप्त करने की कामना से हम चलें संसार को पार करने के उत्साह का अपना महत्त्व है आचार्य जी इसके लिए हमें उत्साहित कर रहे हैं
सांसारिक वैभव को तपस्वी की भांति देखकर अपने पर अपने भारतीय जीवन दर्शन पर अपनी भाषा पर हमें पूर्ण विश्वास रखना चाहिए सत्य असत्य का विवेक रखें
विद्या अविद्या का भी सामञ्जस्य रखें प्रबल बल का हम अनुभव करें
प्रातःकाल हमें यदि इतना उत्साह मिल जाए तो वास्तव में हमारे ऊपर भगवान् की कृपा है
तुलसीदास जी ने रामचरित मानस के रूप में हमें एक अद्भुत ग्रंथ दिया है इसके बालकांड का प्रारम्भ अयोध्याकांड का मध्य और उत्तरकांड का अंत तो और भी अधिक अद्भुत है
मंगल करनि कलिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।
गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की॥
प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी
भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥
राम कथा जो भगवान राम का गुणाख्यान है मंगल करने वाली,कलियुग के पापों को हरने वाली है। मेरी यह खराब कविता रूपी नदी की चाल पवित्र जल वाली नदी की चाल की तरह टेढ़ी है। प्रभु राम के सुंदर यश द्वारा यह कविता अति सुंदर तथा सज्जनों के मन को अच्छी लगने वाली हो जाएगी। श्मशान की अपवित्र राख भी शिव जी के अंग की संगति पाकर सुहावनी लगती है और स्मरण करते ही पवित्र करने वाली होती है।
भगवान के प्रति तुलसीदास जी का दैन्य अद्भुत है
बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के॥
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरम ध्वज धंधक धोरी॥2॥
जो श्री रामजी के भक्त कहलवाकर लोगों को ठगते हैं, जो लोभ,क्रोध,काम के गुलाम हैं और जो धींगाधींगी करने वाले, धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले दम्भी और कपटपूर्ण धन्धों का बोझ ढोने वाले हैं, संसार के ऐसे लोगों में सबसे पहले तो मेरी ही गिनती है
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने सिकंदर का उल्लेख क्यों किया भैया अजय जी का नाम क्यों लिया जानने के लिए सुनें