प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 23 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१६९८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८०
अपने भीतर ईश्वरत्व को अनुभव करने के लिए शरीर को हल्का रखें उसे विचारशील चिन्तनशील बनाएं प्रातःकाल संसार से इतर सोचें l संगठन के लिए जो भी छोटे छोटे कार्य हैं उन्हें अवश्य करें l
प्राचीन भारतीय शिक्षा मुख्यतः गुरुकुल प्रणाली पर आधारित थी जिसमें विद्यार्थी गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करता था। यह शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन तक सीमित नहीं थी उससे भावपक्ष भी संयुत था और इस प्रकार वह जीवन के समग्र विकास पर केंद्रित थी। इसका उद्देश्य चरित्र निर्माण, आत्मज्ञान, कर्तव्यबोध, आत्मविश्वास और नैतिकता का विकास करना था।गुरु और शिष्य के बीच घनिष्ठ और आत्मीय संबंध होते थे, जिसमें शिक्षा के साथ-साथ संस्कारों का भी विशेष महत्व था। इस प्रकार प्राचीन शिक्षा मनुष्य को एक आदर्श, संतुलित और समाजोपयोगी व्यक्ति बनाने का माध्यम थी।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली का केंद्र “जीवन निर्माण” से हटकर “नौकरी प्राप्ति” की ओर झुक गया l वर्तमान शिक्षा से वैदिक शिक्षा को संयुत करने के लिए हमें अपने मन बुद्धि विचार और शरीर को अनुशासित करना पडेगा l अनुशासन महत्त्वपूर्ण है l मनुष्य के जीवन का एक अनुशासन है l संपूर्ण सृष्टि में ही अनुशासन है l हमारे ऋषियों ने इसके महत्त्व को अनुभव किया है l जो व्यक्ति जीवन में अनुशासन, संयम और सही दिशा का पालन नहीं करता, वह धीरे-धीरे अपने भीतर के प्रकाश को खो देता है। आलस्य, असंयम, अव्यवस्थित दिनचर्या और अनियमितता व्यक्ति को अज्ञान और पतन की ओर ले जाती है। ऐसे लोग उन अंधकारमय अवस्थाओं को प्राप्त होते हैं, जो अपने ही आत्मा का नाश करने वाले होते हैं। ये अपने शरीर और इन्द्रियों की शक्ति पर निर्भर रहते हैं l
असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः।तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने नाना जी देशमुख जी का नाम क्यों लिया कार्य करने की प्रेरणा हमें कहां से मिलती है समाज हमारे ऊपर विश्वास कैसे करेगा जानने के लिए सुनें