भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती॥
जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता॥5॥
होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी॥6॥
मेरी रचना भगवान् शिवजी की कृपा से ऐसी सुशोभित होगी, जैसी तारागणों सहित चन्द्रमा के साथ रात शोभित होती है, जो इस कथा को प्रेम सहित एवं सावधानी के साथ समझ-बूझकर कहें-सुनेंगे, वे कलियुग के पापों से रहित और सुंदर कल्याण के भागी होकर श्री रामचन्द्रजी के चरणों के प्रेमी बन जाएँगे॥5-6॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 25 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७०० वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८२
उत्साहित रहें संतुष्ट रहें शक्ति की अनुभूति करें
आगामी अधिवेशन में शिक्षा विषय पर हमें चर्चा करनी है शिक्षा मानव जीवन का आधार है। यह केवल ज्ञान प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का माध्यम है। शिक्षा के द्वारा ही मनुष्य में विचार करने की क्षमता, सही-गलत का विवेक, समाज और देश के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती है। ज्ञान अपने आप में अमूल्य है, परन्तु उसके उचित बखान के लिए शिक्षक का होना अत्यन्त आवश्यक है।
शिक्षक जटिल विषयों को सहज बनाकर शिष्य के मन में उतारते हैं। वे अनुभव के आधार पर ज्ञान को जीवंत करते हैं और जीवन में उसके उपयोग का मार्ग बताते हैं।किन्तु शिक्षक को सरलचित्त, स्वभाव से जिज्ञासु, विवेक का आश्रय लेकर चलने वाला,अच्छा मनोवैज्ञानिक, शरीर मन बुद्धि से स्वस्थ होना अत्यन्त आवश्यक है lशिक्षक का श्रेष्ठ व्यक्तित्व ही श्रेष्ठ शिक्षा का आधार होता है।
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बताया कि श्रीरामचरित मानस का पाठ हम अवश्य करें इससे हमारी व्याकुलता दूर होगी
पद्धति ग्रंथ किसे कहते हैं, भैया डा सौरभ राय जी, भैया पवन जी, भैया रवि गुप्त जी, भैया अक्षय जी का उल्लेख क्यों हुआ, किस संदर्भ में "सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।
सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान॥" दोहे का आचार्य जी ने उल्लेख किया, श्रद्धेय अशोक सिंघल जी सूक्ष्म शक्तियों के विषय में क्या कहते थे जानने के लिए सुनें