किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कशा
आभीरशुम्भा यवना: खसादय: ।
येऽन्ये च पापा यदपाश्रयाश्रया:
शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नम: ॥ १८ ॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 26 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७०१ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८३
निराशा,कुंठा से अपने को बचाएं अपना खान पान सही रखें, शौर्य से प्रमंडित अध्यात्म के उपासक बनें l
हम सनातन धर्म का पालन करने वाले स्वभावतः करुणा, उदारता और व्यापक दृष्टि से युक्त होते हैं। हमारे हृदय में उठने वाली भावनाएं केवल एक सीमा में बंधी नहीं होतीं, अपितु समस्त जगत् के कल्याण की कामना से ओत-प्रोत होती हैं। जब ये भावनाएं पावन विचारों का रूप लेती हैं, तब हमारे मुख से सहज ही यह मंगलकामना प्रकट होती है कि सभी प्राणी सुखी हों, निरोगी रहें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े। इसी प्रकार, हम संकीर्णता से ऊपर उठकर यह अनुभव करते हैं कि सम्पूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार के समान है। एक सनातनधर्मी के अंतःकरण से जो भावनाएं उदित होती हैं, वे किसी कृत्रिम प्रयास का परिणाम नहीं होतीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक, सहज और आत्मिक अनुभूति की अभिव्यक्ति होती हैं। ऐसा अद्भुत हमारा देश है भारत l कारण कार्य के सिद्धान्त अर्थात् हर कार्य (परिणाम) का कोई न कोई कारण अवश्य होता है, को भारत अनेक दृष्टियों से समझते हुए निरन्तर गतिमान रहा है।
श्रीमद्भागवत महापुराण में विभिन्न स्थानों पर यह वर्णन मिलता है कि भारतभूमि (विशेषतः जम्बूद्वीप) में अनेक बाह्य जातियाँ/जनजातियाँ आकर बस गईं और यहीं की संस्कृति में रच-बस गईं l
इसके अतिरिक्त औरास के एक विद्यालय की चर्चा क्यों हुई, शबल क्या है,किस ग्रामीण उक्ति का आचार्य जी ने उल्लेख किया,भगवान् राम ने किसे शिव जी का कार्य व्यापार संभालने का निर्देश दिया,काले दाग क्या हैं जानने के लिए सुनें l