मैं कवि हूँ अपनी कविता का संदेश सुनाता हूँ
हैं जहाँ कहीं भी शोले उनकी राख हटाता हूँ ।।
बलिदान सपूतों के सपनों में जब भी आते हैं
हँसते दिल के अंगारे पर आँसू बढ़ जाते हैं
सीमाओं के सौदे होते आँगन में गद्दारी
तप त्याग भाषणों में दिल में पलती है मक्कारी
इस कुसमय में भी सदा राग भैरव ही गाता हूँ || १ ||
मैं कवि हूँ....
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७०३ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८५
परिशुद्ध भावों के साथ स्वार्थ त्यागकर हम अपने कर्म को पहचानें और उसे धर्म मानकर हनुमान जी की शरण लेकर गतिमान हो जाएं
हमें केवल ज्ञान या केवल कर्म में नहीं, बल्कि दोनों में संतुलन बनाकर चलना चाहिए। जिस प्रकार व्यवहारिक जीवन के लिए अविद्या आवश्यक है उसी प्रकार आत्मिक उन्नति के लिए विद्या भी आवश्यक है। जब दोनों का समन्वय होगा , तभी हमारा जीवन पूर्ण और सार्थक बनेगा l
आज वास्तव में जीवन में अनेक प्रकार का अंधकार दिखाई दे रहा है—मूल्यों का अभाव,मनुष्य के दुष्कर्मों के कारण और मनुष्य द्वारा मनुष्यत्व की अनुभूति न करने के कारण से आतंकित पर्यावरण, अस्ताचल देशों द्वारा थोपी गयी उद्देश्यहीन शिक्षा, घर -घर में संस्कारों का अभाव और अपनी परम्पराओं से दूरी। गुरुकुल की शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं थी, बल्कि वह जीवन को संपूर्ण रूप से गढ़ने वाली व्यवस्था थी। उसमें चरित्र निर्माण, आत्मसंयम, प्रकृति के साथ सामंजस्य, गुरु के प्रति श्रद्धा और समाज के प्रति उत्तरदायित्व—इन सबका समन्वय होता था। हमें उसी शिक्षा की आवश्यकता है l
हम आत्मविश्वास जाग्रत करें उस अध्यात्म की अनुभूति करें जिसका उद्देश्य हमें दुर्बल बनाना नहीं, बल्कि भीतर से इतना सशक्त बनाना कि कठिन परिस्थितियों में भी हम सत्य का साथ दे सकें और कर्तव्य निभा सकें l
हम अध्ययन स्वाध्याय चिन्तन मनन निदिध्यासन में रत हों l
हम वह सुपात्र बनें जिसे परमात्मा खोज रहा है तो निश्चित रूप से हमारे सनातनधर्मी समाज का हमारे राष्ट्र भारत का कल्याण होगा l
प्रेमभूषण जी महाराज Trucks की चर्चा क्यों कर रहे थे, हरमेश जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l