ज्ञान, भक्ति, कर्म, विचार, भाव इस संसार के रत्नाकर के रत्न हैं हम इन्हीं में से किसी रत्न के पारखी बनकर उसे सुरक्षित रखने का प्रयास करें तो यह हमारी विशेषता होगी और इसके लिए.....
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 29 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७०४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८६
हम नित्य का जीवन संस्कारित करें हम अपने भीतर उतरकर साधना, चिंतन,सत्संग आदि के माध्यम से ज्ञान, भक्ति, भाव, विचार, कर्म आदि गुणों को जाग्रत करें , तो हमारा जीवन स्वयं एक अमूल्य रत्न बन जाएगा l
हम प्रायः यह समझ लेते हैं कि केवल अध्ययन, स्वाध्याय, चिन्तन, मनन, निदिध्यासन, लेखन, सत्संगति जैसे शब्दों को जानना ही पर्याप्त है, परन्तु वास्तविकता यह है कि जब तक इन भावों में भीतर से प्रवेश नहीं होता, तब तक आत्मशक्ति का बोध नहीं हो सकता।आज के जीवन में व्यस्तता, समयाभाव और सफलता की तीव्र दौड़ ने मन को अत्यन्त व्यग्र बना दिया है। हम असफलता से बचने के लिए इतना चिंतित रहते हैं कि भीतर की शांति और स्थिरता को ही खो देते हैं। यह व्यग्रता ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है, क्योंकि इससे आत्मबल डगमगाने लगता है।
वास्तव में आत्मबल तब सुदृढ़ होता है जब यह विश्वास दृढ़ हो जाता है कि परमात्मा हमारे भीतर ही विराजमान है l
यह नाम रूपात्मक जगत है नाम के साथ रूप के कार्य संयुत रहते हैं भगवान् राम का नाम केवल एक स्मरण नहीं, बल्कि आदर्श जीवन की सम्पूर्ण प्रेरणा को जगा देता है। जैसे ही उनका नाम मन में आता है, उनके चरित्र के सभी प्रसंग सामने आ जाते हैं जैसे उनकी सत्यनिष्ठा, मर्यादा, त्याग, करुणा और अडिग संकल्प।
भगवान राम का स्मरण हमें यही प्रेरणा देता है कि लक्ष्य व्यापक हित का होना चाहिए l तुलसीदास जी कहते हैं
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।
नाम सुप्रेम पियूष ह्रद तिन्हहुँ किए मन मीन॥ 22
जिस मनुष्य का मन किसी भौतिक वस्तु, पद, प्रतिष्ठा या सुख की चाह में नहीं भटकता, बल्कि पूर्णतः भगवान श्रीराम की भक्ति में ही रम जाता है। तो उसका हृदय प्रेम से भरा एक शांत, गहरा सरोवर बन जाता है, और उसमें राम-नाम का मधुर रस अमृत के समान प्रवाहित होता रहता है। उसका मन उस सरोवर में विचरण करने वाली मछली की तरह हो जाता है—जो उसी में जीती है, उसी में आनंद पाती है और उससे अलग होने की कल्पना भी नहीं कर सकती।
आचार्य जी ने द्राक्षा -भक्षण उत्सव की चर्चा क्यों की, कृत्य रत्नाकर पुस्तक के किस भाग का उल्लेख हुआ, भैया प्रखर श्रीवास्तव जी का नाम किस प्रसंग में आया, राम नाम बैंक क्या है जानने के लिए सुनें