30.3.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 30 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७०५ वां* सार -संक्षेप

 सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।


सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।18.48।।

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 30 मार्च 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७०५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८७

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आचार्य जी नित्य प्रयास करते हैं कि हमारे भीतर जड़त्व कम से कम मात्रा में रहे और चेतनत्व में वृद्धि हो  यह हमारा सौभाग्य है हमें इसका लाभ उठाना चाहिए 


धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥


धर्म के ये दस लक्षण केवल शास्त्रों में वर्णित सिद्धांत नहीं हैं, बल्कि जीवन को संतुलित, सफल और सार्थक बनाने के साधन हैं। ये शक्ति के सूत्र हैं और विश्वास के आधार हैं l हमें समय-समय पर आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि ये गुण हमारे जीवन में कितने सक्रिय हैं। यदि हम इन्हें अपने आचरण में उतार लें, तो न केवल हमारा व्यक्तिगत जीवन सुधरेगा, बल्कि समाज और राष्ट्र भी अधिक नैतिक और समृद्ध बनेगा।

आचार्य जी ने अपनी युगभारती प्रार्थना की भूमिका स्पष्ट की 

प्रार्थना में  कहा गया है कि यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है, इसलिए मनुष्य को लोभ छोड़कर, आवश्यकतानुसार ही उपभोग करते हुए, धर्मपूर्वक जीवन जीना चाहिए।साधक निःस्वार्थ भावना से कहता है कि मुझे न स्वर्ग की इच्छा है, न सांसारिक सुखों की, बल्कि मैं केवल प्राणियों के दुःख दूर करना चाहता हूँ । इसमें सभी प्राणियों के सुखी, निरोग, शुभदर्शी और दुःखमुक्त होने की प्रार्थना भी की गई है l 


धर्म और संस्कृति 

एक विवेचना 

लेखक :रंगाहरि


(लोकहित प्रकाशन द्वारा प्रकाशित)

का उल्लेख क्यों हुआ आचार्य जी ने भैया मनीष जी भैया अरविन्द जी भैया प्रदीप जी भैया विवेक गुप्त जी के नाम क्यों लिए प्रार्थना और मन्त्र में क्या अन्तर है 

भगवान् राम का नाम लेने से जैसे 

राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल।

जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥ 27॥

क्या प्राप्त होगा जानने के लिए सुनें l