एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ।
बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ॥ 29(ग)॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७०७ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १८९
लेखन एक योग है इसके महत्त्व को समझें चिन्तन मनन अध्ययन स्वाध्याय लेखन में रत हों
तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा॥
भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई॥
गुरुदेव ने उस ज्ञान को बार-बार समझाया, फिर भी मेरी बुद्धि के अनुसार ही मुझे थोड़ा-बहुत समझ में आया। उसी को (श्रीरामचरित मानस के रूप में )मैं अपनी भाषा (अवधी) में प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिससे मेरे मन को संतोष और ज्ञान की प्राप्ति हो सके।
आचार्य जी भी बार बार यही प्रयास कर रहे हैं कि हम इन सदाचार संप्रेषणों को सुनकर अपने भीतर सात्विक भाव लाएं, भक्ति में शक्ति की अनुभूति करें,सांसारिक बोझ को ढोने के लिए अपने भीतर आत्मशक्ति विकसित करें l
इस नाम रूपात्मक जगत में नाम स्मरण करते ही उससे जुड़ा रूप प्रकट हो जाता है
जैसे भगवान् राम का नाम लेते ही उनका संकल्प, उनका धर्म और उनका पुरुषार्थ सामने आ जाता है
भगवान् राम का अद्भुत संकल्प
*निसिचर हीन करहुँ महि, भुज उठाइ प्रण कीन्ह* हमें प्रेरित करने लगता है
हम अपने भीतर गुरुत्व लाएं और भावी पीढ़ी को संस्कारित करें
भैया ऋषि जी, भैया विनय अजमानी जी, भैया कवि पवन जी, भैया पवन पांडेय जी का उल्लेख क्यों हुआ आचार्य श्रीराम शर्मा की किन दो पुस्तिकाओं की चर्चा हुई , संगठन के क्या सूत्र हैं जानने के लिए सुनें l