प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज चैत्र शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७०८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९०
अपने भावों को परिशुद्ध करने के लिए नित्य चिन्तन आवश्यक है गीता और मानस को जीने की आवश्यकता है
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।।8.3।।
इसमें भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रश्नों के उत्तर में ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म का स्वरूप स्पष्ट किया है।
अविनाशी परम तत्त्व ब्रह्म है, जीव का आंतरिक स्वभाव अध्यात्म है और सृष्टि के प्राणियों की उत्पत्ति कराने वाला त्याग या सृजनात्मक क्रिया कर्म है
यह कर्म धर्म से संयुत है अध्यात्म और धर्म एक दूसरे के प्राण और शरीर हैं जिसका अध्यात्म में प्रवेश है उसे धर्म की गतिविधियां भी पता हैं वेदों में इन दोनों का सामञ्जस्य किया गया है गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार भगवान् राम अध्यात्मवादी भी हैं , धर्मवेत्ता भी हैं और कर्मकुशल तो हैं ही इसी कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम कहा गया
उनकी उपासना करने के लिए तुलसीदास जी ने नाम जप बताया
राम कहत चलु, राम कहत चलु, राम कहत चलु भाई रे।
नाहिं तौ भव-बेगारि महँ परिहै ,छूटत अति कठिनाई रे।1।
किन्तु यह जप एकांगी नहीं होना चाहिए जब ज्ञान कर्म से मुक्त हो जाता है तो व्यक्ति पुरुषार्थ से रहित हो जाता है जब कि पुरुष के लिए पुरुषार्थ अनिवार्य है परिस्थितियां भांपकर हमें विचारपूर्वक कर्म करना है इसके लिए आपसी भेदभाव दूर कर हमें संगठित होना ही होगा l एक व्यक्ति चाहे कितना ही सक्षम क्यों न हो, लेकिन कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिन्हें सफल बनाने के लिए कई लोगों का साथ आवश्यक होता है
संगठन संगठन संगठन
शंकालु होकर संगठित नहीं हो सकते इसके लिए प्रेम और आत्मीयता का विस्तार भी करें आज परिस्थितियां विषम हैं संकट टला नहीं है हमें सचेत रहना ही होगा
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने किस चित्र की चर्चा की, स्वामी रामतीर्थ ने किसे अपना बना लिया, अहं क्यों हानिकारक है, प्रातःकाल का जागरण क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें