11.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 11 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१७ वां* सार

 गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही॥

जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा॥1॥

मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा॥

चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया॥2॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 11 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९९

ब्रह्मवेला में जागरण मन को उत्फुल्ल करने का एक अत्यन्त श्रेष्ठ उपाय है इस जागरण के साथ प्रकृति के दर्शन का भी प्रयास करें तो यह निश्चित रूप से आनन्द में वृद्धि करेगा l दंभ से बचें l आगामी अधिवेशन के लिए पूर्णरूपेण समर्पित होवें l 


इन सदाचार संप्रेषणों के माध्यम से जो कुछ व्यक्त किया जा रहा है, वह बौद्धिक जानकारी  या विद्वत्ता का प्रदर्शन नहीं है। यह आचार्य जी के हृदय से उत्पन्न अनुभूतियों, संवेदनाओं और अंतरंग भावों की अभिव्यक्ति है। हमें इन संप्रेषणों का लाभ उठाना चाहिए l


किसी भी कार्य के लिए हमें अच्छे से अच्छा प्रयास करना चाहिए अर्थात् पूर्ण समर्पण,मन, बुद्धि और सामर्थ्य के साथ कार्य करना चाहिए l ऐसा प्रयास हमारे भीतर आत्मविश्वास पैदा करता है,हमारी क्षमताओं को विकसित करता है l यह भी महत्त्वपूर्ण है कि प्रयास केवल परिणाम के लिए न हो, बल्कि स्वयं कर्म की उत्कृष्टता के लिए हो। जब हम अपने कर्म को श्रेष्ठ बनाते हैं, तो वह स्वयं ही एक साधना बन जाता है।साथ ही जीवन की अनिश्चितता को  भी हम स्वीकारें । संसार में हर परिणाम हमारे नियंत्रण में नहीं होता। अनेक बाहरी परिस्थितियाँ, समय, संयोग और अन्य लोगों के निर्णय भी परिणाम को प्रभावित करते हैं। यदि हम केवल अच्छे परिणाम की अपेक्षा रखेंगे तो विपरीत होने पर टूट भी जाएंगे अतः जब हम पहले से ही यह समझ लें कि परिणाम कुछ भी हो सकता है, तो हमारा मन संतुलित रहता है। हम सफलता में अहंकार से नहीं भरते और असफलता में निराशा में नहीं डूबते ।

यह दृष्टिकोण हमें भयमुक्त भी बनाता है। जब हमें यह स्वीकार होता है कि हम हर परिणाम के लिए तैयार हैं, तब हम जोखिम लेने से नहीं डरते। हम नए कार्यों में आगे बढ़ते हैं, क्योंकि हमें असफलता का भय रोक नहीं पाता। यही भाव हमें सच्चे अर्थों में कर्मयोगी बनाता है l इस परिवर्तनशील क्षरणशील मरणधर्मा संसार में यही पौरुष की परिभाषा है l 


परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते। स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् ॥

जो इस वंश, जो परमात्मा के अंश से उत्पन्न है, की चिन्ता करता है वह मानव वंश है l


भैया अरविन्द तिवारी जी, भैया मोहन जी, भैया प्रदीप जी का उल्लेख क्यों हुआ,आचार्य जी ने किस डेढ़ कदम की चर्चा की,पं दीनदयाल जी ने किस सूत्र पर भविष्य का बृहद् वितान ताना जानने के लिए सुनें