प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७०९ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९१
मानस का अध्ययन करें इससे हम चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति करने लगेंगे
इन सदाचारपूर्ण वचनों को सुनकर हमारे अंतःकरण में उत्तम भावों का जागरण होना चाहिए। हमें उनसे प्रेरणा लेकर अपने जीवन में उत्साह का संचार करना चाहिए और केवल विचारों तक सीमित न रहकर सत्कर्मों में प्रवृत्त होना चाहिए।इससे हमारा जीवन सार्थक और समाज के लिए उपयोगी बन सकेगा l हम मनुष्य हैं हमें मनुष्यत्व की अनुभूति होनी ही चाहिए अन्यथा हम मृग के समान हैं
आहार निद्रा भय मैथुनं च
सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्
धर्मो हि तेषामधिको विशेष:
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः
हमारे भीतर मनुष्यत्व की अनुभूति जितनी अधिक होगी हम उतना ही परमात्मशक्ति से उद्दीप्त हो उठेंगे l जब हमारे भीतर परमात्मा किसी न किसी रूप में उपस्थित है तो हम दीन हीन मलिन कैसे हो सकते हैं अर्थात् नहीं हो सकते हैं l अध्यात्म और धर्म का सामञ्जस्य समझकर उसका व्यवहार करने लगेंगे तो हम आत्मानन्द को अनुभव करने लगेंगे l
नियमित और भावपूर्ण नाम-जप से मन शुद्ध होता है और आत्मा अपने स्वाभाविक आनन्द अर्थात् आत्मानन्द का अनुभव करने लगता है
भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥
तुलसीदास जी ने यह मार्ग निकाल दिया l
नरहरिदास जी ने बचपन से ही तुलसीदास जी की अद्भुत बुद्धि और आध्यात्मिक रुचि को पहचान लिया था। वे चाहते थे कि तुलसीदास जी केवल भक्ति ही न करें, बल्कि वेद, पुराण, व्याकरण और दर्शन का भी गहरा ज्ञान प्राप्त करें, जिससे उनका ज्ञान पूर्ण और प्रामाणिक बने।चित्रकूट में नरहरिदास जी ने तुलसी जी को रामभक्ति की दीक्षा दी इसके बाद उन्होंने काशी के पंचगंगा घाट पर स्थित शेष सनातन जी (जो उनके मित्र और विद्वान् थे) के पास भेजा। वहाँ तुलसीदास जी ने लगभग १५-१६ वर्षों तक संस्कृत ग्रंथों का गहन विद्याध्ययन किया।
इसके बाद उन्होंने श्रीरामचरित मानस की रचना की जो केवल एक काव्य नहीं है, भक्ति से उत्पन्न, अनुभव से परिपक्व और लोककल्याण के उद्देश्य से रचित दिव्य ग्रंथ है। मानस को उन्होंने सामान्य भाषा में प्रस्तुत किया जिससे सामान्य जन भी उसका आनन्द ले सके एक ज्ञानी भी उसमें तत्त्व के दर्शन कर सके इसका भी उन्होंने ध्यान रखा l
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