5.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७११ वां* सार

 मानव जीवन अनुपम अद्भुत सौभाग्य सदन,

तब, जब हम होते हैं शान्त और उत्फुल्ल बदन ।




प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७११ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९३

प्रातःकाल उठकर आत्मबोध का प्रयास करें 


मनुष्य का शरीर मिलना अपने आप में एक दुर्लभ अवसर है। हमें केवल शरीर ही नहीं मिला, बल्कि मन, बुद्धि और विचार करने की क्षमता भी मिली है। यही क्षमताएँ हमें अन्य जीवों से अलग बनाती हैं। जब हम इस बात को अनुभव करते हैं कि हम सोच सकते हैं, निर्णय ले सकते हैं और अपने जीवन को दिशा दे सकते हैं, तब हमारे भीतर आत्मविश्वास उत्पन्न होता है।

यह अनुभूति हमें यह विश्वास दिलाती है कि हम केवल परिस्थितियों के अधीन नहीं हैं, बल्कि अपने प्रयासों और सही विचारों के माध्यम से अपने जीवन को बदल सकते हैं। हमने अपना लक्ष्य बनाया है समाजोन्मुखी व्यक्तित्व  का उत्कर्ष l


जब हम समाजोन्मुखी कार्य करते हैं तो यदि हम यह भाव रख लें कि “यह कार्य मुझसे ईश्वर करवा रहे हैं, मैं तो केवल एक माध्यम हूँ”, तो हमारा मन विनम्र बना रहता है l यह भावना सेवा को पवित्र बनाती है और व्यक्ति को दंभ से बचाकर विनम्रता और आत्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।

आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम व्याकुलता से  भी बचें l

संपूर्ण सृष्टि परमात्मा की रचना है। परमात्मा ने मनुष्य को भी रचा और उसमें सत, रज तथा तम ये तीनों गुण स्थापित किए। साथ ही उसे स्वतंत्रता भी दी कि वह अपने जीवन का मार्ग स्वयं चुन सके।

मनुष्य इस स्वतंत्रता का कैसे उपयोग करता है, यही उसके जीवन की दिशा तय करता है

यदि वह इसका उपयोग दुष्टता में करता है, तो उसके भीतर विकार उत्पन्न होते हैं।और यदि वह इसे शिष्टता, सदाचार और सत्य के मार्ग में लगाता है, तो उसके भीतर विचार विकसित होते हैं। हमें सदाचारमय मार्ग चुनना है हम समाज और देश के लिए कार्य करते हुए यशस्वी होने का प्रयास करें l


इसके अतिरिक्त भैया आशीष जोग जी की चर्चा क्यों हुई, ब्रह्मानन्द सहोदर क्या है, किस वेद में पद्य और गद्य दोनों है जानने के लिए सुनें