ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वम् ब्रह्मौपनिषदं माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७१२ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९४
चिन्तन मनन अध्ययन स्वाध्याय लेखन में रत हों
वर्तमान शिक्षा अपने मूल उद्देश्य व्यक्तित्व का समग्र विकास, विचारों की स्वतंत्रता तथा जीवन मूल्यों की स्थापना से हटकर केवल औपचारिकता और संकीर्णता तक सीमित हो गई है। परिणामस्वरूप उसमें अनेक दुर्गुण उत्पन्न हो गए हैं।
इन दुर्गुणों के कारण हमारा दृष्टिकोण व्यापक न रहकर संकीर्ण हो गया है। हमारी बुद्धि, मन और सोच का विस्तार रुक गया है और हम सीमित दायरे में सोचने लगे हैं।
हमारे भीतर जो स्वाभाविक जिज्ञासा, सृजनात्मक शक्ति और निरंतर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति होती है, वह दबकर रह गई है। यही कारण है कि हम भीतर से असंतुष्ट, अपूर्ण और कहीं न कहीं बेचैन अनुभव करते हैं। आवश्यकता है हमें अपनी प्राचीन शिक्षा पद्धति की l
प्राचीन शिक्षा पद्धति का मुख्य उद्देश्य मनुष्य का समग्र विकास था। इसमें शिक्षा आचरण आधारित होती थी और गुरु-शिष्य के बीच आत्मीय संबंध रहता था। शिक्षा प्रकृति के सान्निध्य में दी जाती थी, जिससे मन एकाग्र और शांत रहता था।
इस पद्धति में स्वावलंबन, अनुशासन, चिंतन, मनन और स्वाध्याय पर विशेष बल दिया जाता था। साथ ही नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का विकास किया जाता था। शिक्षा व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार तथा जीवनोपयोगी होती थी।
हमारा साहित्य अत्यंत विस्तृत और विविधतापूर्ण है, जो जीवन के हर क्षेत्र अध्यात्म, दर्शन, समाज, कला और व्यवहार को समाहित करता है। हमारा भारत राष्ट्र पृथ्वी का मूल राष्ट्र है यहीं वेद उद्भूत हुए l वेदों का अर्थ है वह दिव्य ज्ञान, जो जीवन, प्रकृति, धर्म और सत्य के बारे में सही मार्गदर्शन देता है। हम अपने इस ज्ञान को अपने अद्भुत साहित्य को अध्यात्म को जब अनुभव करेंगे और इनको जितना जान लेंगे हम आनन्द में रहेंगे और इस आनन्द को बांटते हुए जब हम संगठन करेंगे तो वह संगठन अत्यन्त दिव्य होगा उसके सदस्यों में प्रेम आत्मीयता का विस्तार मिलेगा
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया आशीष जोग जी, उन्नाव विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य श्री स्वामीनाथ जी का उल्लेख क्यों किया जानने के लिए सुनें l