7.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७१३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 7 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७१३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९५

भाव के साथ विचार और क्रिया भी संयुत होनी चाहिए हम लोग आपस में ईर्ष्या, भ्रम, शंका आदि दोषों से बचें प्रेम आत्मीयता का विस्तार करें 

अधिवेशन की तैयारी प्रारम्भ कर दें 




हम मनुष्यत्व की अनुभूति करें l मनुष्य केवल शरीर या बुद्धि नहीं है, बल्कि उसमें संवेदना, करुणा, विवेक, नैतिकता और आत्मचेतना होती है। जब व्यक्ति इन गुणों को जाग्रत करता है जैसे सत्य बोलना, दूसरों के दुःख को समझना, कर्तव्य निभाना तब वह वास्तविक अर्थ में मनुष्य बनता है। केवल जन्म से मनुष्य होना पर्याप्त नहीं, बल्कि व्यवहार और विचार से मनुष्यत्व की अनुभूति आवश्यक है।

इसके पश्चात् हम “पुरुषत्व की ओर प्रयाण” करें अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर परम चेतना से एकत्व की ओर बढ़ना l 

श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम योग के प्रथम छंद 

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।


छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।१५/१

के अनुसार इस संसार को अश्वत्थ (पीपल) के वृक्ष के समान कहा गया है, जिसका मूल ऊपर की ओर है और शाखाएँ नीचे की ओर फैली हुई हैं। जिसके पत्ते वेदों के छन्द हैं, और जो इस वृक्ष को जान लेता है, वही सच्चा वेदज्ञ होता है।


यह संसार एक उल्टे वृक्ष के समान बताया गया है। सामान्य वृक्ष में जड़ नीचे और शाखाएँ ऊपर होती हैं, लेकिन यहाँ जड़ ऊपर है। इसका संकेत यह है कि इस जगत का मूल परमात्मा है, जो ऊपर अर्थात् परम धाम में स्थित है। उसी परम सत्य से यह सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न होती है, इसलिए उसे मूल कहा गया है।

नीचे की ओर फैली शाखाएँ इस संसार के विविध रूपों का प्रतीक हैं, जैसे विभिन्न लोक, जीव, कर्म, इच्छाएँ और भोग-वासनाएँ। ये सब परमात्मा से उत्पन्न होकर संसार में विस्तार पाते हैं।

इस वृक्ष को अश्वत्थ कहा गया है। अश्वत्थ का एक अर्थ यह भी है कि जो स्थायी नहीं है, अर्थात् यह संसार नित्य बदलने वाला है। आज जो है, वह कल नहीं रहेगा। इसके पत्ते वेदों के छन्द कहे गए हैं। जैसे वृक्ष के पत्ते उसे पोषण देते हैं, वैसे ही वेद इस संसार के ज्ञान और धर्म का आधार हैं। वेदों के माध्यम से ही मनुष्य को यह समझ में आता है कि इस संसार का स्वरूप क्या है और इससे पार कैसे जाया जा सकता है।

जो व्यक्ति इस वृक्ष के वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है, अर्थात् यह जान लेता है कि संसार का मूल परमात्मा है, यह जगत अनित्य है और वेद ही इसके ज्ञान का साधन हैं, वही सच्चा वेदज्ञ कहलाता है। केवल वेदों को पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके गूढ़ अर्थ को समझकर जीवन में उतारना ही वास्तविक ज्ञान है।



आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम अध्यात्म में प्रवेश के लिए उच्च कोटि के संत रामसुखदास जी की टीका साधक संजीविनी का अध्ययन करें

५ अप्रैल के कार्यक्रम की चर्चा क्यों हुई, भैया डा अमित जी भैया अजय शंकर जी का उल्लेख क्यों हुआ, सेवा का स्वरूप कैसा हो, कड़े जी कौन थे जानने के लिए सुनें