प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७१४ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९६
उपासना के महत्त्व को समझें
यह संसार नाम और रूप से बना हुआ है, लेकिन भारत का वास्तविक स्वरूप इससे कहीं अधिक गहरा है। वह अनन्त है, अनादि है, अक्षय है और अमर है। जब हम इस सत्य को अपने भीतर अनुभव करेंगे , तब हमारा दृष्टिकोण ही बदल जाएगा जिस क्षण यह भाव हमारे भीतर जाग्रत होता है, उसी क्षण निराशा, कुंठा, हताशा और ईर्ष्या जैसे नकारात्मक भाव समाप्त होने लगते हैं। मन स्थिर और शांत हो जाता है और जीवन में स्वाभाविक रूप से आनंद का अनुभव होने लगता है। चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति होने लगती है किन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएं यह हमारे स्वभाव और उद्देश्य के विरुद्ध है। निष्क्रियता मनुष्य को जड़ता, निराशा और पतन की ओर ले जाती है, जबकि कर्म उसे उन्नति, आत्मविश्वास और संतोष की ओर ले जाता है। इस कारण हमारा कर्तव्य है कि हम कर्म करते रहें लेकिन केवल फल की चिंता में नहीं, बल्कि कर्तव्य भाव से।
ऐसा ही कर्तव्य निभाया मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम ने
जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।
दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने॥
अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दु:ख दहे।
जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे॥1॥
यह स्तुति भगवान श्रीराम के सगुण और निर्गुण दोनों रूपों की महिमा का वर्णन करती है। वे अद्वितीय रूप वाले, राजाओं में श्रेष्ठ हैं l आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरों को अपनी भुजाओं के बल से मार डाला। आज की परिस्थितियों में भी भुजबल को एकत्र करना अत्यन्त आवश्यक है और उस भुजबल के आधार पर संगठन भी अत्यावश्यक है l इसके साथ ही हम अपना लक्ष्य सदैव ध्यान में रखें अखंड भारत हमारा लक्ष्य है l
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया पंकज जी के किस लेख की चर्चा की,११ अप्रैल को हम क्या करने जा रहे हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम और लीला पुरुषोत्तम में क्या भेद है, वेदों में सकाम मन्त्रों की संख्या कितनी है जानने के लिए सुनें