तूफान कल था, आज मौसम साफ है ,
हर समर्थ सुशक्ति को सब माफ है ;
हर तरह कमजोर है आसक्त मन ?
दीनदुनिया का यही तो शाप है।
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७१५ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं १९७
स्वयं शुद्ध और जागरूक होने का प्रयास करें ताकि संसार के दुःख और अज्ञान को दूर करने की समर्थता आ सके
प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) आत्मचिंतन और ध्यान से सत्वगुण की वृद्धि होती है और मन शुद्ध होता है। ये सदाचार संप्रेषण गहन आत्मचिंतन और जीवन-दर्शन से भरपूर हैं हमें इनका लाभ उठाना चाहिए । इनमें तत्व, साधना, स्वदेशप्रेम और आत्मबोध की सुंदर अभिव्यक्ति होती है।
हमें यह भी समझना चाहिए कि जीवन में कठिनाइयाँ अस्थायी हैं। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं l इस पर विश्वास रखना चाहिए l
आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हम संस्कार सहित अपने मन को बुद्धि को विचार को एक दिशा और दृष्टि में लगाएं जैसे अपने राष्ट्र भारत, जिसकी रक्षा के लिए हनुमान जी सदैव सन्नद्ध हैं,के प्रति भक्ति भाव रखें भारत के सच्चे उपासक बनें
जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।
भगवान् राम ने भी अपने मन बुद्धि विचार को एक दिशा में लगाया उन्होंने रावण के अंत के लिए साधना की संगठन को महत्त्व देते हुए l
हमने भी अपना उद्देश्य बनाया है और युगभारती के रूप में हमारा संगठन है हम सदस्यों में आपस में प्रेम आत्मीयता का विस्तार होना चाहिए हमारा एक एक सदस्य
अपने अपने क्षेत्र में कुशल है हमें किसी सदस्य की उपेक्षा नहीं करनी है और न ही ईर्ष्या द्वेष कुंठा रखनी है
इसके अतिरिक्त भैया पंकज जी, भैया विनय जी का उल्लेख क्यों हुआ, भरत कैसे वन्दनीय हो गये, प्रेमानन्द का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें