11.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७६ वां* सार

 मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत्।आत्मवत् सर्वभूतेषु, यः पश्यति सः पण्डितः॥


जो व्यक्ति दूसरों की पत्नी को अपनी माता के समान , दूसरों के धन को मिट्टी के ढेले के समान और सभी प्राणियों को अपने समान  देखता है, वही पण्डित है


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 11 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५९

हम सेवा के चार आधार स्तंभों शिक्षा स्वास्थ्य स्वावलंबन और सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने का प्रयास करें l


अनेक बार आक्रमणों तथा विपरीत परिस्थितियों के कारण भारत की बहुमूल्य ज्ञान-सम्पदा को क्षति पहुँची। अनेक ग्रन्थ नष्ट हुए, तथापि भारतीय ऋषियों द्वारा रचित पुराण और अन्य शास्त्र पूर्णतः लुप्त नहीं हुए। यह हमारे सांस्कृतिक जीवन की अद्भुत शक्ति का प्रमाण है कि अनेक विपत्तियों के पश्चात् भी वे आज तक सुरक्षित हैं।

 दास -वृत्ति की ओर उन्मुख करने वाली और आत्म से दूर ले जाने वाली आधुनिक शिक्षा-पद्धति के प्रभाव से हम लोगों के मन में यह धारणा बैठ गई कि पुराण केवल कल्पना, मिथक अथवा मनोरञ्जनात्मक कथाएँ हैं। किन्तु भारतीय परम्परा में पुराणों का उद्देश्य केवल कथा-कहानी कहना नहीं था। ऋषियों ने गूढ़ दार्शनिक सिद्धान्तों, इतिहास-स्मृतियों, नैतिक आदर्शों, लोकाचार, भूगोल, वंशावलियों तथा आध्यात्मिक शिक्षाओं को जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए कथा-शैली का अत्यन्त कुशल प्रयोग किया।

इस दृष्टि से पुराण ऋषियों की अद्वितीय शिक्षण-पद्धति के उदाहरण हैं। उनमें निहित प्रत्येक कथा का लक्ष्य केवल मनोरञ्जन नहीं, बल्कि धर्म, नीति, लोकमंगल और आत्मोन्नति के सिद्धान्तों को सरल एवं स्मरणीय रूप में प्रस्तुत करना है।


अतः हमारा परम कर्तव्य है कि हम अपने विलक्षण एवं गौरवशाली साहित्य का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन करें, उसके वास्तविक स्वरूप को समझें तथा अपनी ज्ञान-परम्परा को पुनः आत्मसात् करें। जब हमारी शिक्षा अपनी सांस्कृतिक जड़ों, ऋषियों के चिन्तन और सनातन ज्ञान-स्रोतों से पुनः संयुत हो जाएगी, तभी वह वास्तव में सनाथ होगी l हम साधक हैं। हम अपने राष्ट्र को परम वैभव के शिखर पर पहुँचाने की साधना में निरन्तर रत हैं। हमारी साधना केवल व्यक्तिगत उन्नति के लिए नहीं, अपितु राष्ट्र, संस्कृति और समस्त समाज के उत्कर्ष के लिए है। ज्ञान, चरित्र, परिश्रम और आत्मानुशासन के माध्यम से हम ऐसे भारत के निर्माण का संकल्प ले चुके हैं जो अपनी सनातन ज्ञान-परम्परा से आलोकित होकर विश्व के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे। यही कार्य गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस  ग्रंथ आदि रचकर किया  उसी अद्भुत ग्रंथ के सुन्दरकांड में हम लोग आजकल प्रविष्ट हैं तो आइये पुनः पहुंचे उस प्रसंग में जब विभीषण रावण का त्याग करके श्रीराम की शरण में आते हैं। वानर-सेना में कुछ लोग उन पर सन्देह करते हैं।


भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥

सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥4॥


(जान पड़ता है) यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है, इसलिए मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँध रखा जाए। (श्री रामजी ने कहा-) हे मित्र! तुमने नीति तो अच्छी विचारी, परंतु मेरा प्रण तो है शरणागत के भय को हर लेना!॥4॥


किन्तु हमें शरणागत और कालनेमि में अन्तर पता होना चाहिए l और इसको परखने के लिए हमारी बुद्धि  जाग्रत और सशक्त होनी चाहिए l ज्ञान के साथ शक्ति भी आवश्यक है l 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने क्या बताया, आचार्य जी ने नीति वाक्यामृत की चर्चा क्यों की, भैया शशि जी, भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l