जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥4॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७७६ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५८
हमारे लिए अहंकार का निरसन अत्यन्त आवश्यक है अन्यथा हमें सत्य के दर्शन कभी नहीं होंगे l
आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस के सुन्दर कांड में प्रविष्ट हैं
सुन्दरकाण्ड की विशेषता यह है कि इसमें निराशा के बीच आशा, संकट के बीच साहस और कठिन परिस्थितियों में भी ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास का संदेश मिलता है। जब मां सीताजी का कोई समाचार नहीं मिल रहा था और समस्त वानर-सेना चिन्तित थी, तब हनुमानजी अपने बल, बुद्धि और भक्ति के सहारे समुद्र लाँघकर लंका पहुँचते हैं। वहाँ वे अनेक बाधाओं को पार करते हुए अशोकवाटिका में सीताजी का पता लगाते हैं, उन्हें श्रीराम का सन्देश सुनाते हैं और उनके हृदय में आशा का संचार करते हैं।
इस काण्ड में हनुमानजी की विनम्रता विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है। असाधारण शक्ति होने पर भी वे स्वयं को श्रीराम का सेवक ही मानते हैं। वे प्रत्येक सफलता का श्रेय अपने प्रभु को देते हैं। इससे यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची महानता अहंकार में नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण में निहित होती है।
आइये प्रवेश करें इसी अद्भुत प्रेरक सुन्दर कांड में
तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥1॥
लक्ष्मण जी के चरणों में मस्तक नवाकर, प्रभु राम के गुणों की कथा का वर्णन करते हुए गुप्तचर शुक और सारण
( जो पूर्वजन्म में मुनि थे और भगवान के भक्त और तपस्वी थे। किसी कारणवश उन्हें शाप प्राप्त हुआ कि वे राक्षस-योनि में जन्म लेंगे और रावण के मंत्री बनेंगे। शाप के प्रभाव से वे लंका में शुक और सारण नामक राक्षस बने )तुरंत ही चल दिए।भगवान राम के स्वभाव से अभिभूत होकर दोनों गुप्तचर भगवान राम का यशगान करते हुए लंका में आए और उन्होंने रावण के चरणों में सिर नवाए॥
कामी और क्रोधी रावण ने हँसकर बात पूछी- अरे शुक! अपनी कुशलता का क्यों नहीं वर्णन करता ? उस विभीषण का समाचार सुना, मृत्यु जिसके अत्यंत निकट आ गई है॥उस मूर्ख ने राज्य करते हुए लंका को त्याग दिया। अभागा अब जौ का कीड़ा बनेगा ( जैसे जौ के साथ घुन भी पिस जाता है, वैसे ही नर वानरों के साथ वह भी मारा जाएगा), तत्पश्चात् भालु और वानरों की सेना का हाल वर्णित कर , जो कठिन काल की प्रेरणा से इस क्षेत्र में चली आई है॥
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया बिजली की समस्या की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की जानने के लिए सुनें