30.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 30 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९६ वां* सार -संक्षेप

 सदा संकल्प को साथी बनाकर पग बढ़ाना है, 

विकल्पों से भरी गलियों में केवल गुनगुनाना है। 

स्व को जबतक नहीं पहचान पाया भटकता घूमा, 

पुरुष हूँ  हर समय उत्साह का उत्सव मनाना है ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 30 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७८

 हम क्षुद्र स्वार्थों से बचने का प्रयास करते रहें, आत्मनिरीक्षण करें, पर्यावरण और परिवेश का परीक्षण करें, हमारा प्रत्येक विचार, प्रत्येक कर्म और प्रत्येक संकल्प समाज तथा राष्ट्र के कल्याण के लिए समर्पित हो। हम समान विचारधारा के व्यक्तियों का संगठन करें और उसके माध्यम से राष्ट्रभक्त समाज को आश्वस्त करें कि अंधकार ही व्याप्त नहीं है l



हमारा सनातन धर्म अद्भुत और अनुपम है। हम संपूर्ण वसुधा को अपना कुटुम्ब मानते हैं l एकात्म भाव भारतवर्ष की एक विलक्षण निधि है l हमारी शिक्षा-पद्धति केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं,अपितु मनुष्य के समग्र व्यक्तित्व के निर्माण का दिव्य साधन है। वह हमें सिखाती है कि शिक्षा प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग है; अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है; सूचना नहीं, बल्कि आत्मप्रकाश है।


भारतीय परम्परा में गुरु और शिष्य दोनों सत्य के साधक हैं। गुरु ज्ञान के प्रदाता मात्र नहीं, अपितु जीवन के पथ-प्रदर्शक हैं  और शिष्य केवल श्रोता नहीं, बल्कि श्रद्धा, जिज्ञासा तथा साधना के द्वारा सत्य का अन्वेषी है। दोनों का लक्ष्य एक ही है—ज्ञान के माध्यम से आत्मोन्नति, चरित्र-निर्माण, समाज और देश के लोकमंगल की स्थापना। इसी महान आदर्श का उद्घोष वैदिक शान्तिमन्त्र "ॐ सह नाववतु..." करता है, जिसमें गुरु और शिष्य साथ-साथ संरक्षण, पोषण, पुरुषार्थ, तेजस्विता तथा परस्पर सद्भाव की प्रार्थना करते हैं। यह सनातन संस्कृति का शाश्वत संदेश है l इसी प्रकार के शाश्वत संदेशों को लोकभाषा में जन-जन तक पहुँचाने का दिव्य कार्य राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी समाजसेवी गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के माध्यम से किया। आइये प्रवेश करें मानस की इस दिव्य कथा में 


अच्छे से अच्छा उपदेश, उत्कृष्ट शिक्षा तथा श्रेष्ठ संगति भी उस व्यक्ति  जैसे रावण का सुधार नहीं कर सकती, जिसकी नीयत दूषित हो अथवा जो अपनी मूर्खता, अहंकार और हठधर्मिता का परित्याग करने के लिए तैयार न हो l

फूलहिं फरहिं न बेत, जदपि सुधा बरसहिं जलद।

मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम॥

 

मन्दोदरी रावण को अत्यन्त विनयपूर्वक समझा रही है कि श्रीराम को साधारण मनुष्य समझने की भूल मत करो। वे समस्त चराचर जगत के स्वामी, परमब्रह्म और धर्म के अधिष्ठाता हैं। उनसे वैर करने में किसी का कल्याण नहीं है। तुम अहंकार का परित्याग कर सीताजी को ससम्मान लौटा दो और श्रीराम की शरण ग्रहण कर लो l

आगे आचार्य जी ने अंगद का उल्लेख करते हुए कथा में क्या बताया,आचार्य जी ने किस प्रकार मधु कैटभ जो भगवान की रज और तम शक्तियां हैं से संबन्धित कथा बताई, सनातन धर्म की शोभा के रूप में प्रतिष्ठित दिव्य कथाओं का आनन्द प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना चाहिए, भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

29.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 29 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९५ वां* सार -संक्षेप

 रामं भजन्ति निपुणा मनसा वचसाऽनिशम्।

अनायासेन संसारं तीर्त्वा यान्ति हरेः पदम्॥


"जो विवेकी, तत्त्वज्ञ और कुशल साधक निरन्तर मन से तथा वाणी से भगवान श्रीराम का भजन करते हैं, वे सहज ही इस जन्म-मरणरूपी संसार-सागर को पार करके भगवान हरि के परम पद (मोक्ष) को प्राप्त हो जाते हैं।"


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 29 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७७

हम रामात्मक भाव लेकर सांसारिक कर्मों में लिप्त हों अर्थात् अपने विचार, वाणी और आचरण में भगवान श्रीराम के गुणों को धारण करें जब हम इस भाव के साथ अपने पारिवारिक, सामाजिक, व्यावसायिक तथा राष्ट्रीय दायित्वों का निर्वाह करेंगे तब हमारे कर्म  धर्ममय और लोककल्याणकारी बन जाएंगे l



संसार में रहकर कर्म करना हमारा स्वाभाविक कर्तव्य है किन्तु उन कर्मों के पीछे यदि स्वार्थ, अहंकार और आसक्ति के स्थान पर मर्यादा, सत्यनिष्ठा, सेवा, करुणा और कर्तव्यपरायणता का भाव हो, तो वही रामात्मक भाव है।

राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥


लंका कांड में एक प्रसंग उस समय का है जब मंदोदरी अपने पति रावण को समझा रही हैं।

सजल नयन कह जुग कर जोरी।सुनहु प्रानपति बिनती मोरी॥कंत राम बिरोध परिहरहू।जानि मनुज जनि हठ मन धरहू॥


मन्दोदरी अश्रुपूर्ण नेत्रों से हाथ जोड़कर कहती हैं—"हे मेरे प्राणप्रिय स्वामी! मेरी विनती सुनिए। श्रीराम से वैर त्याग दीजिए। उन्हें केवल साधारण मनुष्य समझकर अपने मन में हठ मत कीजिए। वे साधारण मानव नहीं, परम दिव्य शक्ति हैं।"

बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु।

लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु॥ 14॥


भगवान श्रीराम सीमित मानवीय देह में प्रकट होकर भी अनन्त, सर्वव्यापक और विश्वस्वरूप परमात्मा हैं। उनका अवतार केवल मानव-लीला है; वास्तविक स्वरूप समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।


मन्दोदरी गीता क्या है  तुलसीदास जी ने चौपाई 

"सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥

संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी॥" कहां से प्रेरित होकर  लिखी,खलनायक प्रायः शास्त्रवचन नहीं कहता  इसे आचार्य जी ने कैसे स्पष्ट किया, साहस शब्द का अर्थोत्कर्ष न होता तो वास्तव में इसका क्या अर्थ है जानने के लिए सुनें l

28.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९४ वां* सार -संक्षेप

 अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग।

रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग॥ 13 (ख)॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी  विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 28 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७६

सनातन धर्म के शाश्वत सिद्धान्तों को विस्मृत या उपेक्षित न करें l सनातन धर्म अद्भुत है l

शिक्षा का आधार त्याग है अतः शिक्षा को व्यवसाय बना देना उसकी गरिमा और उद्देश्य—दोनों के प्रतिकूल है।



यह हमारा सौभाग्य है कि आचार्य जी इन गम्भीर तात्त्विक एवं सदाचार-प्रेरक प्रवचनों के माध्यम से हमें सद्विचारों को आत्मसात् करने, उत्साह और प्रफुल्लता के साथ राष्ट्र तथा समाज के कल्याण में प्रवृत्त होने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। साथ ही वे अद्भुत सनातन धर्म की दिव्य परम्परा तथा विविधताओं में एकता से अनुप्राणित भारत की अद्भुत सांस्कृतिक महिमा का भी साक्षात्कार कराते हैं।रावणत्व आज भी समाज में विद्यमान है। इसलिए हम प्रतिवर्ष रावण-दहन कर उसके अहंकार, अधर्म, अन्याय और दुराचार के प्रतीक स्वरूप का परित्याग करने का संकल्प लेते हैं। यही सनातन धर्म की समन्वयवादी दृष्टि है। सनातन धर्म किसी व्यक्ति के प्रति द्वेष नहीं, अपितु उसके दुर्गुणों के परित्याग का संदेश देता है। जो व्यक्ति भयानक भौतिकवादी रावण की पूजा या महिमा का भाव रखता है, वह वस्तुतः उसके दोषों अहंकार, दम्भ, स्वेच्छाचार और अधर्म को अपने भीतर स्थान दे रहा होता है।किन्तु हमारा लक्ष्य दुर्गुणों का उन्मूलन और सद्गुणों का विकास है। तो आइये प्रवेश करें सद्गुणों को आत्मसात् करने के लिए श्रीरामचरित मानस में 


समुद्र पर सेतु निर्माण के उपरान्त भगवान श्रीराम अपनी वानर-सेना सहित सुवेल पर पहुँचे हैं रावण के साथ युद्ध करने की स्थितियां बन रही हैं l

छत्र मुकुट तांटक तब हते एकहीं बान।

सब कें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान॥ 13 (क)॥

सुवेल पर्वत पर स्थित भगवान श्रीराम ने एक ही बाण से रावण का छत्र, उसका मुकुट तथा मन्दोदरी के ताटङ्क (कर्णाभूषण) काट गिराए। यह सब सबके देखते-देखते हुआ, किन्तु यह रहस्य कोई भी नहीं समझ सका कि यह कैसे हुआ।

यह घटना केवल भगवान श्रीराम के अद्भुत धनुर्विद्या-कौशल का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि एक मौन चेतावनी भी है। भगवान बिना युद्ध आरम्भ किए ही रावण को यह संकेत देते हैं कि यदि वे चाहें तो एक ही बाण में उसका अन्त कर सकते हैं।तथापि वे उसे सुधरने और धर्म का आश्रय लेने का अवसर देते हैं। यह श्रीराम की शक्ति के साथ-साथ उनकी मर्यादा, धैर्य और करुणा का भी परिचायक है।

इसके अतिरिक्त  श्री चुन्नीलाल कुरील के साथ 'रावण और उसकी लंका' पुस्तक की चर्चा क्यों हुई राधामाधव चिन्तन पुस्तक का उल्लेख क्यों हुआ भैया आशीष जोग का नाम आचार्य जी ने क्यों लिया जानने के लिए सुनें

27.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 27 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी  विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 27 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७५


 हम सनातनधर्मी समाज को धर्म, नीति, कर्तव्य, आदर्श और चरित्र का पाठ पढ़ाकर उसे जाग्रत करने का प्रयास करें उसे शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की महत्ता से अवगत कराएं l



शिक्षा हमारे सनातन धर्म का एक अद्भुत एवं जीवन-निर्माणकारी संस्कार है। हमारे शास्त्रों में गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक मानव-जीवन को पवित्र और परिष्कृत बनाने के लिए विविध संस्कारों का विधान किया गया है। इन सभी संस्कारों में शिक्षा का स्थान अत्यन्त विशिष्ट है l शिक्षा केवल ज्ञानार्जन और जीविकोपार्जन का माध्यम नहीं, अपितु साधना भी है और सिद्धि भी। वह हमारे भीतर संस्कारों का बीजारोपण करती है, श्रेष्ठ विचारों का विकास करती है तथा हमारे व्यक्तित्व को संयम, अनुशासन और सदाचार की दिशा में प्रेरित करती है। शिक्षा हमारे अंतःकरण में सात्त्विक शक्ति का जागरण कर हमें लोकमंगल के पथ पर अग्रसर करती है। सौभाग्य से हमें इस महान शिक्षा-परम्परा का जो कुछ भी अंश दीनदयाल विद्यालय से प्राप्त हुआ है, उसी के आधार पर हम राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी समाज को शिक्षा के इस वास्तविक स्वरूप का अनुभव कराएं l समाज यह समझे कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका अर्जित करना नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण, व्यक्तित्व-विकास और राष्ट्र-निर्माण है।

यही वह शिक्षा थी जो हमारे प्राचीन गुरुकुलों में प्रदान की जाती थी—जहाँ विद्या के साथ विनय, ज्ञान के साथ आचरण और बौद्धिक विकास के साथ नैतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान का भी समन्वय होता था।


सन्त, विचारक, ध्यानी, ज्ञानी, समाजसेवी,चिन्तक, आंदोलनकर्ता, विद्वान, स्वामी दयानन्द के अनुयायी  तथा सनातन धर्म के पोषक स्वामी श्रद्धानन्द जिनका जन्म मुंशी राम विज के रूप में हुआ था ,द्वारा सन् १९०२ में स्थापित गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार आज भी भारतीय गुरुकुल परम्परा की गौरवशाली शिक्षा-पद्धति को जीवंत रखते हुए वैदिक संस्कृति, भारतीय दर्शन तथा आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के समन्वित शिक्षण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है l गोस्वामी तुलसीदास जी ने शिक्षा, संस्कार और लोकजागरण का महान कार्य श्रीरामचरितमानस के माध्यम से किया। उन्होंने सनातनधर्मी समाज को धर्म, नीति, कर्तव्य, आदर्श और चरित्र का पाठ पढ़ाकर उसे जाग्रत करने का प्रयास किया। आइए, हम भी उसी लोकमंगलकारी ग्रन्थ जो भक्ति के साथ शक्ति की भी अनुभूति कराता है श्रीरामचरितमानस की पावन कथा में प्रवेश करें और उसके दिव्य संदेशों का श्रवण कर अपने जीवन को आलोकित करें।

इस समय हम लंका कांड में प्रविष्ट हैं 


प्रहस्त रावण के चरण पकड़कर विनम्रतापूर्वक कहता है—

नाथ चरन गहि कहउँ दससीसा।

सुनहु बचन मम परिहरि दीसा॥

जेहि देखेँ कुसल जाहि तोरी।

सो सीता देहु, करहु पुनि प्रीती॥



"हे नाथ! हे दशानन! मेरे वचनों को हितकर समझकर सुनिए। जिस उपाय से आपका कल्याण हो, वही कीजिए। सीताजी को श्रीराम को लौटा दीजिए और उनसे पुनः मैत्री स्थापित कर लीजिए।"

और उधर समुद्र पर सेतु बाँधकर लंका पहुँचने के पश्चात् भगवान श्रीराम ने लंका के समीप स्थित सुबेल पर्वत पर अपनी सेना के साथ पड़ाव डाल रखा है । वहीं से लंका का निरीक्षण हो रहा है और आगे की युद्ध-रणनीति बनाई जा रही है । यही वह स्थान है जहाँ विभीषण, सुग्रीव, हनुमान जी आदि के साथ युद्ध-संबंधी मंत्रणा चल रही है l

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l

26.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 26 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९२ वां* सार -संक्षेप

 समस्त जीव मात्र का बस एक मित्र है, 

कि सच कहूँ मनुष्य सिर्फ शिव चरित्र है, 

मनुष्य का विकास दिव्य देव से बड़ा, 

मनुष्य जग जहान के लिए सदा खड़ा,....


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वादशी  विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 26 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७४

धर्माधारित जीवन अपनाएं क्योंकि यह किसी का अनिष्ट नहीं करता l इसी के अनुसार अपने कार्यों को संशोधित करें l देश और समाज के हित के कार्य अवश्य करें l



आज समाज में जो नैतिक पतन, भ्रष्टाचार, हिंसा, पर्यावरण संकट, पारिवारिक विघटन और सामाजिक असंतुलन दिखाई देता है, उसका मूल कारण शिक्षा की दिशा और स्वरूप है। यदि शिक्षा केवल आजीविका का साधन बनकर रह जाए और चरित्र, संस्कार, कर्तव्यबोध तथा राष्ट्रभाव का निर्माण न करे, तो वही शिक्षा अनेक समस्याओं को जन्म देती है। मैकाले द्वारा थोपी गयी यही शिक्षा इस समय चल रही है इसके विपरीत यदि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का समग्र विकास हो—उसमें ज्ञान के साथ विवेक, कौशल के साथ संस्कार, अधिकारों के साथ कर्तव्य और विज्ञान के साथ मानवीय मूल्य भी हों जैसी हमारी वैदिक शिक्षा थी तो वही शिक्षा सभी समस्याओं का स्थायी समाधान बन जाती है।

इसीलिए शिक्षा को केवल प्रशासनिक विषय न मानकर राष्ट्र-निर्माण का विषय समझना होगा। शिक्षा-नीति के निर्माण और संचालन में शिक्षाविदों, आचार्यों तथा शिक्षा के क्षेत्र में दीर्घ अनुभव रखने वाले व्यक्तियों की निर्णायक भूमिका होनी चाहिए। शिक्षा की दिशा और स्वरूप का निर्धारण मुख्यतः शिक्षा-जगत के अनुभवी मनीषियों के हाथों में होना चाहिए।

गोस्वामी तुलसीदास ने शिक्षा को केवल अक्षरज्ञान नहीं, बल्कि जीवन-निर्माण का साधन माना l उनके समय में समाज निराशा, विभाजन, नैतिक पतन और सांस्कृतिक संकट से जूझ रहा था क्योंकि अकबर का शासन था l श्रीरामचरितमानस के माध्यम से उन्होंने पूरे समाज को धर्म, कर्तव्य, मर्यादा, सेवा और आदर्श जीवन का पाठ पढ़ाया और जाग्रत करने का प्रयास किया ठीक उसी प्रकार जैसे भगवान् राम विषम परिस्थितियों में धर्म, विवेक, साहस और कर्तव्य के साथ खड़े रहे l

 आजीवन भोग का भोगी कामान्ध रावण व्याकुल है किन्तु अपनी व्याकुलता प्रदर्शित नहीं कर रहा है मन्दोदरी से वह प्रेम करता है किन्तु उससे भयभीत भी रहता है इस कारण उसका असम्मान कभी नहीं करता l 


रामहि सौपि जानकी नाइ कमल पद माथ।सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ॥

श्रीसीताजी सहित भगवान श्रीराम के चरणकमलों में अपना मस्तक झुकाकर सब कुछ उन्हें समर्पित कर दीजिए। तत्पश्चात अपने पुत्र को राज्य का भार सौंपकर वन में जाकर भगवान श्रीरघुनाथ का भजन कीजिए।


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भैया शुभेन्दु शेखर जी, भैया पंकज श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों किया, प्रहस्त ने रावण से क्या कहा,बाँस के रोग "घमोई" की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें l

25.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 25 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९१ वां* सार -संक्षेप

 बंदउँ संत असज्जन चरना।

दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥

बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं।

मिलत एक दुख दारून देहीं॥

गोस्वामी तुलसीदास जी ने अत्यन्त सूक्ष्म विनोदपूर्ण शैली में संत और असंत दोनों का उल्लेख किया है। संतों का संग सुख, शान्ति और कल्याण प्रदान करता है, इसलिए उनसे वियोग असह्य लगता है। दूसरी ओर दुष्टों का संग आरम्भ से ही कष्ट, अशान्ति और दुःख का कारण बनता है। इस प्रकार दोनों दुःखदायी हैं, किन्तु एक का वियोग दुःख देता है तो दूसरे का संयोग।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष एकादशी ( निर्जला एकादशी ) विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 25 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७३

अपनी दृष्टि से  समाज और राष्ट्र के कल्याणार्थ अपनी सृष्टि निर्मित करें 


आचार्य जी जीवन को दिशा देने वाले गुरु-स्वरूप श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्भगवद्गीता तथा अन्य अद्वितीय मार्गदर्शक ग्रन्थों के आधार पर प्रतिदिन हमें प्रेरणा प्रदान करते हैं, जिससे हम जीवन में कभी निराश, हताश या व्यथित न हों। हम सदैव अपनी सोच सकारात्मक रखें l हम शक्ति पराक्रम की अनुभूति कर सकें l वे हमें बाह्य परिस्थितियों और दूसरों के आचरण पर ध्यान केन्द्रित करने के स्थान पर आत्मदर्शन की ओर उन्मुख करते हैं। यदि हम स्वयं को देखना और समझना प्रारम्भ कर दें , तो हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है।

'दूसरे क्या कर रहे हैं, क्या नहीं कर रहे हैं'—इस चिन्ता में समय नष्ट करने की अपेक्षा हमें यह विचार करना चाहिए कि हमारे लिए तो कार्य के अनेक क्षेत्र खुले हुए हैं। हम वहां ध्यान दें l समाज, राष्ट्र और संस्कृति की सेवा के अनगिनत अवसर हमारे सामने हैं। अतः हमें निरन्तर कर्मरत रहते हुए अपने कर्तव्य-पथ पर अग्रसर रहना चाहिए।

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥


मोहांध और कामान्ध रावण के विवेक पर ऐसा आवरण पड़ गया था कि समुद्र पर बने श्रीरामसेतु जैसे अभूतपूर्व कार्य को भी वह तुच्छ समझता रहा।

जब रावण अपनी हार की चिंता भुलाकर महल लौटा, तब रानी मंदोदरी ने अपने पति रावण के चरण पकड़कर अत्यंत विनम्रता और विवेक के साथ यह विनती की

कि भगवान् राम से बैर न करें 


नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों॥

तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा॥


रात्रि में जुगनू का प्रकाश कुछ दिखाई देता है, परन्तु सूर्य के उदय होते ही उसका अस्तित्व ही नहीं रह जाता। उसी प्रकार रावण का बल संसार को बड़ा प्रतीत हो सकता है, किन्तु श्रीराम की दिव्य शक्ति के सम्मुख वह नगण्य है।


इसके अतिरिक्त सात्विक पत्नी के निर्देशों की अवहेलना करने पर क्या होता है, फेसी क्या है, उच्चारण का शास्त्र क्या है जानने के लिए सुनें

24.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 24 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९० वां* सार

 शिक्षा स्वरूप के सहित स्वात्म का दर्शन है,

सभ्यता व्यवस्था-युत सौन्दर्य प्रदर्शन है, 

शिक्षा भुजबल के साथ आत्मबल का हुलास, 

वह समय पड़े पर प्रखर बुद्धिबल का विलास ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 24 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७२

हमारा पौरुष, विवेक, पुरुषार्थ जाग्रत रहे हम जीवन भर सन्मार्ग से भटकें नहीं इसके लिए हर संभव प्रयास करें l देश और समाज के महत्त्व को समझते हुए कर्मरत रहें l संगठन के भाव को प्रबल रखते हुए संघर्ष के लिए सदैव तत्पर रहें l 



यद्यपि विकृत एवं पराधीन मानसिकता से प्रेरित शिक्षा-व्यवस्था द्वारा हमें अपने साहित्य, अपनी ज्ञान-परम्परा, अपनी मातृभूमि तथा अपनी भाषा से विमुख करने का प्रयास किया गया  तथापि हम सनातनधर्मी राष्ट्रभक्तों को अपने आर्ष साहित्य, अपनी ज्ञान-परम्परा, अपने पराक्रम और शौर्य, अपनी पावन धरा तथा अपनी मातृभाषा के प्रति गहन श्रद्धा, आदर और भक्ति का भाव रखना चाहिए।

ये अमूल्य धरोहरें हमारे व्यक्तित्व को संस्कारित करती हैं, हमारी पहचान को सुरक्षित रखती हैं तथा हमें अपने गौरवशाली विलक्षण अतीत से जोड़कर भविष्य के लिए दिशा प्रदान करती हैं।

जब हमें अपने साहित्य पर गर्व होता है, अपने ज्ञान पर विश्वास होता है, अपनी भूमि से आत्मीयता होती है और अपनी भाषा से प्रेम होता है, तब हम आत्मविश्वास, स्वाभिमान और सांस्कृतिक चेतना के साथ आगे बढ़ते हैं । अतः हमें अपनी इस अमूल्य विरासत का जिसके आधार पर हम कभी विश्वगुरु कहलाए,केवल सम्मान ही नहीं करना चाहिए, अपितु उसे आत्मसात् कर उसके संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार का भी सतत प्रयास करना चाहिए। भावी पीढ़ी को भी इस ओर उन्मुख करने का प्रयत्न करना चाहिए l

श्री रामचरितमानस भारतीय साहित्य, संस्कृति और भक्ति परम्परा का एक अनुपम महाकाव्य है इससे हम जीवनोपयोगी अनेक शिक्षाएँ ग्रहण कर सकते हैं। यह केवल एक धार्मिक ग्रन्थ नहीं, अपितु मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष का मार्गदर्शन करने वाला लोकमंगलकारी ग्रंथ है। 

आजकल हम लोग लंका कांड में प्रविष्ट हैं सेतु बन चुका है 

अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई॥सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा॥

उस अद्भुत दृश्य और कौतुक को देखकर दोनों भाई— श्रीराम और लक्ष्मण— मुस्कराए। करुणामूर्ति रघुनाथजी फिर अपनी सेना सहित आगे बढ़े। उनके साथ असंख्य वानर-वीरों और यूथपतियों (वानर-सेनापतियों) की ऐसी विशाल भीड़ थी कि उसका वर्णन करना भी सम्भव नहीं है।

यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान् श्रीराम की सहज, धैर्यपूर्ण और प्रसन्नचित्त वृत्ति का चित्रण करते हैं। युद्ध जैसे गंभीर अवसर पर भी श्रीराम विचलित नहीं होते, अपितु परिस्थिति को देखकर मुस्करा देते हैं। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि महान नेतृत्व विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, प्रसन्नता और आत्मविश्वास बनाए रखता है।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया पवन जी, भैया अरविन्द जी, भैया गोपाल जी, गोपाल पाठा, प्रदीप सिंह  का उल्लेख क्यों किया, आचार्य जी ने तैत्तिरीयोपनिषद् की वल्लियों के विषय में क्या बताया   जानने के लिए सुनें

23.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 23 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७८९ वां* सार -संक्षेप

 त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि। ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि॥



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 23 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७८९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७१

सफलता की कामना करें किन्तु साधना में रत रहें 

समाज के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करें 




जो जहाँ है, वहीं आत्मबोध, आत्मचिन्तन और आत्मजागरण का प्रयास करे। अपने वास्तविक स्वरूप को पहचाने तथा यह स्मरण रखे कि हमारा जीवन केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं और स्वार्थों की पूर्ति के लिए नहीं है। हम इस राष्ट्र की चेतना के जीवंत प्रतिनिधि हैं। इसी आधार पर हम कहते हैं वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः l

यदि भारत माता हमारे लिए वन्दनीया, पूजनीया और आराध्या हैं , तो उनके समक्ष उपस्थित संकटों, चुनौतियों और कष्टों को दूर करने का प्रयत्न करना हमारा पवित्र कर्तव्य है। जो शक्तियाँ राष्ट्र, संस्कृति और समाज के प्रति द्वेष का भाव रखती हैं, उनका विवेकपूर्ण और दृढ़ प्रतिकार करना भी हमारा दायित्व है। हमें समाज में छिपे उन कालनेमियों को पहचानते रहना चाहिए जो कल्याण के मार्ग में बाधक  हैं और लोकमंगल के कार्यों में विघ्न उपस्थित करते हैं।

हमें दीपक के समान निरन्तर जलते रहना है। स्वयं तपकर भी दूसरों को प्रकाश देना, निराशा में आशा का संचार करना, अज्ञान में ज्ञान का दीप प्रज्वलित करना तथा समाज में सद्भाव, जागरण और पुरुषार्थ का प्रकाश प्रसरित करना ही साधना का दिव्य स्वरूप है।

हम सफलता की कामना अवश्य करते हैं, किन्तु हमारा विश्वास केवल सफलता में नहीं, बल्कि सतत् साधना में है। हम विश्राम, प्रमाद और निराशा को अपने जीवन में स्थान नहीं देंगे। सिद्धि की प्राप्ति हेतु आजीवन पुरुषार्थरत रहेंगे तथा प्रत्येक परिस्थिति में अपने कर्तव्य-पथ पर दृढ़तापूर्वक अग्रसर रहेंगे।

हमारा प्रयत्न व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र के सुदृढ़ एवं आत्मीय संयोजन का होगा। हम एकात्म मानव-दर्शन के उस आदर्श को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे, जिसमें सम्पूर्ण समाज को एक ही विराट् चेतना का अभिन्न अंग माना गया है। किन्तु इतना ध्यान अवश्य रखना है राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी समाज ही हमारा अंग है l यह बोध उचित शिक्षा से ही संभव है l

शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका अर्जन या धनोपार्जन नहीं है। सच्ची शिक्षा वह है जो मनुष्य को स्वावलम्बी बनाए, उसके भीतर आत्मविश्वास जाग्रत करे, उसके चरित्र को दृढ़ बनाए,उसके जीवन में भक्ति, संवेदना और कर्तव्यनिष्ठा का संचार करे तथा उसे समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी नागरिक बनाए। 

शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य के समग्र व्यक्तित्व के विकास की प्रक्रिया है।


शिक्षा ऐसी हो जो रामत्व की अनुभूति कराए भगवान राम ने अपनी भुजा उठाकर प्रतिज्ञा की कि पृथ्वी को निशाचरों के अत्याचारों से मुक्त करेंगे। यह  अधर्म, अन्याय, अत्याचार और भय के उन्मूलन का उद्घोष था।  शिक्षा ऐसी हो जो हमें उच्च लक्ष्य निर्धारित करने का साहस दे , उसके लिए निरन्तर पुरुषार्थ करने की प्रेरणा दे विपरीत परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने की शक्ति  दे तथा धर्म और लोकमंगल के लिए जीवन समर्पित  की भावना प्रदान करे ।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया विवेक सचान जी, भैया मनीष कृष्णा जी, भैया पवन मिश्र जी का उल्लेख क्यों किया, मैहर किसे कहते हैं, तुलसीदास जी का क्या कौशल था,जानने के लिए सुनें l

22.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 22 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७८८ वां* सार -संक्षेप

 तिफ़्ल में बू आए क्या माँ बाप के अतवार की

दूध तो डिब्बे का है तालीम है सरकार की


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 22 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७८८ वां* सार -संक्षेप

स्थान :शारदा नगर कानपुर


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७०


युगभारती एक वैचारिक संगठन है। अतः इसके सदस्य के रूप में हमें अपने विचारों की दृढ़ता, आचरण की शुचिता और लक्ष्य के प्रति अटूट विश्वास के साथ निरन्तर आगे बढ़ते रहना चाहिए l हमें ऐसी शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना चाहिए जो मनुष्य को केवल जीविकोपार्जन का साधन न बनाए, अपितु उसे शक्तिसम्पन्न, चरित्रवान, आत्मनिर्भर, राष्ट्रनिष्ठ और मानवता के प्रति संवेदनशील बनाए। साथ ही वह ऐसी विवेकपूर्ण दृष्टि भी प्रदान करे, जिससे वह कालनेमियों को पहचान सके और उन्हें उचित दण्ड देने का सामर्थ्य रख सके l



सनातन धर्म की आर्ष चिन्तना और विधि व्यवस्था अद्भुत है l जो कुछ भी होता है, वह परमात्मा की ही प्रेरणा और व्यवस्था से होता है। सीमित बुद्धि के कारण हम अनेक घटनाओं का तात्कालिक कारण तो देख लेते हैं, पर उनके दूरगामी परिणामों को नहीं समझ पाते। परमात्मा सर्वज्ञ, सर्वहितकारी और करुणामय है, अतः वह जो भी करता है, उसमें किसी न किसी रूप में हमारा कल्याण निहित होता है। इसलिए सुख में अहंकार और दुःख में निराशा के स्थान पर हमें श्रद्धा, धैर्य और विश्वास बनाए रखना चाहिए। 


यह अविश्वास का अंधकार है आत्मदीप हो जाओ.....

(अपने दर्द मैं दुलरा रहा हूं )

अविश्वास का अर्थ केवल ईश्वर पर विश्वास का अभाव नहीं है, स्वयं पर, अपने कर्तव्य पर, अपने लक्ष्य पर और जीवन के दिव्य उद्देश्य पर से विश्वास खो देना भी अविश्वास ही है। जब हम बार-बार की असफलताओं, विपरीत परिस्थितियों या दूसरों के व्यवहार से निराश होकर अपने भीतर की शक्ति को भूल जाते हैं , तब हमारे जीवन में अन्धकार छा जाता है। 

हम अपने भीतर स्थित चेतना, विवेक, श्रद्धा और आत्मबल को जाग्रत करें l जिस प्रकार दीपक स्वयं जलकर अपने आसपास का अन्धकार दूर करता है, उसी प्रकार हमें अपने भीतर ज्ञान, विश्वास और पुरुषार्थ का दीप प्रज्वलित करना चाहिए।

भगवान बुद्ध का प्रसिद्ध उपदेश "अप्प दीपो भव" (स्वयं अपना दीपक बनो) भी इसी सत्य की ओर संकेत करता है।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने अरुण योगीराज का नाम क्यों लिया भैया विभास जी का उल्लेख क्यों हुआ मानस में आज आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें

21.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 21 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७८७ वां* सार -संक्षेप

 "अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस के पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ। योग के माध्यम से आप स्वस्थ शरीर, प्रसन्न मन तथा संतुलित जीवन प्राप्त करें, यही मंगलकामना है।"

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 21 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७८७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६९

हमारा संगठन चरित्रसम्पन्न युवाओं का संगठन है। अतः इसके सदस्य के रूप में हमें सदैव ऐसा आचरण करना चाहिए जिससे संगठन की प्रतिष्ठा बढ़े,  देशभक्त सनातनधर्मी समाज का विश्वास दृढ़ हो और राष्ट्रहित की भावना सुदृढ़ हो।


हम सदैव आशान्वित रहें और सकारात्मक दृष्टि बनाए रखें। हम साधक हैं। साधक का कर्तव्य है कि वह साधना-पथ में आने वाली विविध शक्तियों, तत्त्वों, विधियों अथवा व्यवस्थाओं में उलझकर अपना ध्यान विचलित न होने दे। उसका चित्त केवल अपने साध्य पर केन्द्रित रहे। जब लक्ष्य के प्रति निष्ठा और विश्वास दृढ़ होता है, तब मार्ग की बाधाएँ स्वयं गौण हो जाती हैं और साधना निरन्तर प्रगति की ओर अग्रसर होती है।हमारे विचार सनातन धर्म के शाश्वत सिद्धान्तों, जैसे धर्म, करुणा, संयम, सेवा,शौर्य, पराक्रम,सदाचार और आत्मोन्नति पर आधारित रहें । हम क्षणिक प्रवृत्तियों के स्थान पर कालातीत मूल्यों को महत्व दें हम संसार को केवल अपने हित की दृष्टि से नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के कल्याण की दृष्टि से देखें l पीड़ित, शोषित एवं सताए हुए भारतदेश के भक्तों के संरक्षण और कल्याण के लिए समर्पित रहें यह ध्यान रखें कि प्रतिघात के बिना शत्रु भयभीत नहीं होता। हम जाग्रत हों अपने धर्म, संस्कृति और राष्ट्र के गौरव की रक्षा के लिए सजग, संगठित और समर्थ  बनें l रामत्व की अनुभूति करें l 


भगवान् राम क्या हैं,

लव निमेष परमानु जुग, बरष कलप सर चंड।भजसि न मन तेहि राम कहँ, कालु जासु कोदंड॥

का उल्लेख करते हुए आचार्य जी ने परमाणु, अणु, त्रसरेणु,त्रुटि, लव, वेध, निमेष, काष्ठा आदि का विस्तृत निरूपण किस प्रकार किया,  यदि शिक्षित को उचित शिक्षा मिली होगी तो वह कैसा कैसा नहीं होगा जानने के लिए सुनें

20.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 20 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७८६ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 20 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७८६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६८

अपने सनातन धर्म पर विश्वास करें, क्योंकि यह केवल एक उपासना-पद्धति नहीं, अपितु जीवन जीने की एक समग्र और शाश्वत दृष्टि है। आइए, हम अपने आचरण, संस्कार और कर्तव्यनिष्ठ जीवन के माध्यम से इस गौरवशाली परम्परा को समझें, अपनाएँ और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ



दुर्भाग्यवश हमारी विकृत एवं औपनिवेशिक शिक्षा-पद्धति के प्रभाव से भारतीय ग्रन्थों के विषय में अनेक भ्रान्तियाँ फैलाई गईं। उन्हें केवल कल्पना, अन्धविश्वास अथवा असंगत कथाओं का संग्रह मान लिया गया, जबकि वास्तव में वे भारतीय संस्कृति, जीवन-मूल्यों और सनातन परम्परा के अक्षय भण्डार हैं।


पौराणिक आख्यान तथा अन्य भारतीय ग्रन्थों में वर्णित कथाएँ केवल ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण नहीं हैं; वे भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन और सनातन जीवन-दृष्टि की अमरता के आलंकारिक, प्रतीकात्मक और दार्शनिक निरूपण हैं। उनमें निहित पात्र, घटनाएँ और प्रसंग मानव-स्वभाव, नैतिक संघर्ष, आध्यात्मिक साधना तथा सार्वकालिक सत्यों के गूढ़ संकेतक हैं। उदाहरणार्थ पद्मपुराण में पाताल खंड में भगवान् श्रीराम का वर्णन है l हमें इनका अध्ययन करने के लिए अपने मन को केन्द्रित करते हुए भावों विचारों के स्थैर्य के साथ अपना कुछ समय निर्धारित करना चाहिए l


गोस्वामी तुलसीदास, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन सेवा,साधना, रामात्मक संगठन में नियोजित किया,ने श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम के वैकुण्ठगमन का वर्णन नहीं किया। उनका उद्देश्य ऐसे आदर्श पुरुषोत्तम  भगवान राम का चरित्र समाज के समक्ष रखना था, जो धर्म, मर्यादा, कर्तव्य, त्याग, लोकमंगल और राष्ट्रधर्म की प्रेरणा दे सके। क्योंकि तुलसीदास ऐसे काल में प्रकट हुए जब समाज राजनीतिक पराधीनता, सांस्कृतिक विघटन और आत्मविस्मृति से ग्रस्त था। उन्होंने श्रीराम के चरित्र के माध्यम से समाज में आत्मविश्वास, धर्मनिष्ठा, सदाचार और सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जागरण करने का प्रयत्न किया। 

असंख्य आक्रमणों, विपत्तियों और चुनौतियों के उपरान्त भी भारतभूमि, भारतीय संस्कृति तथा सनातन धर्म अक्षुण्ण बने हुए हैं। भारतभूमि, भारतीय संस्कृति तथा सनातन धर्म को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए युग-युगांतर से अनेक संतों, महापुरुषों और संगठनों ने कार्य किया है। आधुनिक काल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी समाज-संगठन, सेवा, संस्कार और राष्ट्रीय चेतना के माध्यम से इस दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान देने का प्रयास किया है।


इसके अतिरिक्त भैया पवन जी,भैया सौरभ द्विवेदी की चर्चा क्यों हुई, दीनदयाल विद्यालय में लोगों ने क्या देखा, रामजन्मभूमि का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

19.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 19 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७८५ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 19 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७८५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६७


हम प्रयास करें कि हमारा शरीर इतना स्वस्थ, हल्का और स्फूर्तिमय रहे कि वह हमारे उच्च उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक बन सके। शरीर भोग का साधन नहीं, साधना का साधन है। जब वह संयम, उचित आहार और नियमित परिश्रम से संतुलित रहता है, तब वह धर्म, कर्तव्य, सेवा और आत्मविकास के मार्ग में समर्थ सहयोगी बन जाता है।



श्रीरामचरितमानस केवल एक ग्रन्थ नहीं, अपितु हमारे जीवन का आश्रय , शक्ति, संजीवनी तथा सत्कर्मों की प्रेरणा का अक्षय स्रोत है। यह लोकमंगल की भावना से रचित ऐसी अमूल्य निधि है, जिसने असंख्य व्यक्तियों को निराशा में आशा, दुर्बलता में सामर्थ्य और भ्रम में मार्गदर्शन प्रदान किया है।

गोस्वामी तुलसीदास जब इस निधि की रचना कर रहे थे, तब वे  समाज के लिए अपरिचित  नहीं थे। वे विद्वान् कथावाचक के रूप में दूर-दूर तक विख्यात हो चुके थे। उन्हें 'गोस्वामी' की सम्मानित पदवी प्राप्त थी और समाज में उनका आदर था। व्यक्तिगत यश, प्रतिष्ठा और सम्मान की दृष्टि से उन्हें किसी उपलब्धि की आवश्यकता नहीं थी।

तथापि उनके संवेदनशील हृदय में अपने समाज और राष्ट्र के प्रति गहरी वेदना विद्यमान थी। उन्होंने देखा कि जनसामान्य भय, भ्रम, निराशा और आत्मविस्मृति के वातावरण में जीवन व्यतीत कर रहा है। अकबर के कुशासन के प्रभाव से लोगों का आत्मविश्वास क्षीण हो रहा है , सामाजिक एकता दुर्बल पड़ रही है और अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं के प्रति श्रद्धा भी डगमगाने लगी है ।

ऐसे समय में तुलसीदास ने लोकभाषा में रामचरितमानस की रचना करके जनमानस में आत्मबल, धर्मनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता और सांस्कृतिक गौरव का पुनर्जागरण किया। उनके लिए यह केवल काव्य-रचना नहीं थी, बल्कि समाज के भय और भ्रम को दूर करने का एक महायज्ञ था। रामचरितमानस के माध्यम से उन्होंने जन-जन को यह विश्वास दिलाया कि धर्म, सत्य, साहस और मर्यादा की शक्ति किसी भी विपरीत परिस्थिति पर विजय प्राप्त कर सकती है


सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।

सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥60॥


भगवान श्रीराम, जिनके जन्म के अनेक कारण हैं और जिनमें सर्वाधिक प्रमुख कारण धर्म की रक्षा और सज्जनों की पीड़ा का निवारण है,के गुणों का श्रद्धापूर्वक श्रवण और मनन जीवन का परम कल्याणकारी साधन है। यह मनुष्य के भीतर ऐसी आध्यात्मिक शक्ति उत्पन्न करता है कि वह संसार के भय, मोह और दुःखों को पार कर लेता है, मानो बिना नौका के ही महासागर पार कर गया हो।भगवान् राम दुष्टों के वध के लिए सदैव सन्नद्ध रहे l 

इसके अतिरिक्त हरिशंकर  शर्मा जी का उल्लेख क्यों हुआ,प्रश्नोत्तर मणिमाला की चर्चा करते हुए आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l

18.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७८४ वां* सार -संक्षेप

 बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।

बिनु हरि भजन न तव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥122 क॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 18 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७८४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६६


प्रातःकाल शीघ्र जागें, संयमपूर्ण सात्विक आहार ग्रहण करें तथा उचित संगति का अवश्य ध्यान रखें । अपने मन के विकारों को निरन्तर घटाने का प्रयास करें। सामान्य मनुष्य के लिए समस्त विकारों का पूर्णतः अभाव हो जाना अत्यन्त कठिन है, किन्तु उन्हें सूक्ष्म और नियंत्रित अवस्था में रखना सम्भव है। इसलिए मनुष्यत्व की अनुभूति करते हुए आत्मशुद्धि और आत्मसंयम की दिशा में निरन्तर प्रयत्नशील रहें। अपनों की भावनाओं का सम्मान करें जिससे संगठन सुदृढ़ बन सके, भगवान राम के कार्यो को ध्यान में रखते हुए भगवान हनुमान के समान निष्ठा, बल, विनय, सेवा-भाव और साधना हमें भी प्राप्त हो— ऐसी मंगलकामना करें।



सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति में स्वयं को प्रस्तुत करने, अपनी बात कहने और अपनी पहचान बनाने की इच्छा होती है। यह स्वाभाविक है। किन्तु जब ध्यान केवल स्वयं पर ही केन्द्रित रह जाता है और अपने सजातीय राष्ट्रभक्त जनों को जानने, समझने तथा उनके सुख-दुःख में सहभागी बनने की भावना नहीं रहती, तब तक प्रभावशाली संगठन का निर्माण नहीं हो पाता।

संगठन का आधार “मैं” नहीं, अपितु “हम” की भावना है।

जब हम अपने अतिरिक्त अपनों को भी जानेंगे , उनके गुणों, आवश्यकताओं, अनुभवों और भावनाओं का सम्मान करेंगे , तभी परस्पर विश्वास, सहयोग और आत्मीयता का वातावरण बनेगा l यही किसी सशक्त और जीवंत संगठन की वास्तविक नींव है। आचार्य जी युगभारती का यही स्वरूप चाहते हैं  युगभारती इस कारण आवश्यक है क्योंकि समाज का वह वर्ग जो राष्ट्र के हित, संस्कृति और मूल्यों के प्रति निष्ठावान है, वर्तमान परिस्थितियों में अनेक प्रकार की आशंकाओं, भ्रांतियों और अनिश्चितताओं का अनुभव कर रहा है। वह आशा और विश्वास के साथ हमारी ओर देख रहा है। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम अपने ज्ञान, आचरण, संगठन-शक्ति और आत्मविश्वास के द्वारा उसके मन में स्पष्टता, साहस और विश्वास का संचार कर सकें l


भैया विजय दीक्षित जी की अखंड साधना का विशेष उल्लेख क्यों हुआ, भैया मुकेश जी की चर्चा क्यों हुई, शिक्षा -संग्रह पुस्तक का नाम आचार्य जी ने क्यों लिया, अधिवेशन की सफलता किस कारण संभव है जानने के लिए सुनें l

17.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 16 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७८२ वां* सार -संक्षेप

 राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा॥

सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई॥9॥

भगवान् भक्ति के स्रोत हैं, परन्तु उस भक्ति तक पहुँचाने वाले संत हैं; अतः सत्संग ही भगवद्भक्ति का प्रमुख साधन है।



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 17 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७८३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६५

हम अनुभव करें कि हमारे भीतर भी शूरत्व,वीरत्व , त्याग , तप, भक्ति  समाहित है l


जब-जब समाज पर अधर्म, अन्याय और स्वार्थ की छाया गहराती है, तब-तब लोकमंगल के लिए कोई  न कोई अवतार उपस्थित हो जाता है। त्रेतायुग में भी दुष्टों की कमी नहीं थी। रावण और उसके समान अहंकार, अत्याचार तथा अधर्म की शक्तियाँ प्रबल थीं। तब भगवान् श्रीराम ने धर्म की स्थापना, सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के विनाश का संकल्प लिया।


कालांतर में भारतभूमि ने अनेक विषम परिस्थितियाँ देखीं हैं महाराणा प्रताप के काल में  अकबर का शासन था राष्ट्र, संस्कृति और स्वाभिमान अनेक चुनौतियों से जूझ रहे थे। ऐसे संक्रमणकाल में गोस्वामी तुलसीदास ने  राष्ट्र -भक्त समाज की व्यथा को केवल देखा ही नहीं, उसे अपने हृदय में अनुभव किया। उन्होंने समझ लिया कि किसी समाज की वास्तविक शक्ति  उसके चरित्र, संस्कार और आत्मविश्वास में निहित होती है।


इसी भावना से उन्होंने रामचरितमानस की रचना की। मानस केवल एक काव्य नहीं, बल्कि जनमानस को जाग्रत करने वाला सांस्कृतिक उद्घोष है। उसने निराश समाज में आशा का दीप जलाया, बिखरे हुए जनसमुदाय को धर्म, मर्यादा और कर्तव्य का स्मरण कराया तथा यह संदेश दिया कि संगठन, सदाचार और आत्मबल ही समाज की वास्तविक रक्षा कर सकते हैं।


तुलसीदास ने श्रीराम के आदर्श चरित्र के माध्यम से जन-जन को यह शिक्षा दी कि संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, यदि समाज अपने मूल्यों, संस्कृति और धर्म से जुड़ा रहे, तो उसका उत्थान निश्चित है। यही मानस का शाश्वत संदेश है और यही उसकी अमरता का आधार है l


तुलसीदासजी कहते हैं कि जो मनुष्य सच्चे हृदय, विनम्रता और प्रेम के साथ आध्यात्मिक सत्य की खोज करता है, उसे भक्ति रूपी अमूल्य मणि प्राप्त होती है। यह भक्ति ऐसी निधि है जिसमें संसार और परमार्थ—दोनों के कल्याण का सार समाहित है।


भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी॥

मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा ll 


निष्कपट भाव से खोजने वाला व्यक्ति भक्ति रूपी अमूल्य रत्न प्राप्त करता है। और जब भक्ति जागती है, तब अनुभव होता है कि भगवान् अपने भक्तों पर इतनी कृपा करते हैं कि भक्त का स्थान अत्यन्त गौरवपूर्ण हो जाता है। इसलिए संत-संग और भक्त-सेवा, भगवद्प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन हैं।


भक्ति शीतल पर्यावरण कैसे है, भैया अरविन्द जी भैया प्रदीप वाजपेयी जी का उल्लेख क्यों हुआ, आचार्य जी किस स्वप्न की चर्चा करेंगे, आचार्य जी के अध्यापक पं माता प्रसाद जी किस प्रसंग में आये, भीलाराणा क्या है जानने के लिए सुनें l

16.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 16 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७८२ वां* सार -संक्षेप

 इंद्री द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना॥

आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देहिं कपाट उघारी॥6


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 16 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७८२ वां* सार -संक्षेप


स्थान : भैया अरविन्द जी का आवास, लक्ष्मणपुरी 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६४


यह अविश्वास का अंधकार है आत्मदीप हो जाओ,

युगचारण जागो कसो कमर फिर से भैरवी सुनाओ l


वर्तमान समय में निराशा, संशय, भय और अविश्वास का अंधकार व्याप्त है। ऐसे समय में हम स्वयं अपने भीतर ज्ञान, विवेक, साहस और आत्मविश्वास का दीपक प्रज्वलित करें l

हम जागरूक राष्ट्रभक्त समाज को दिशा देने का सामर्थ्य रखते हैं अतः हमें आलस्य और निष्क्रियता त्यागकर पुनः सक्रिय होने की आवश्यकता है। हम दृढ़ संकल्प के साथ कर्तव्य-पालन के लिए तैयार रहें  हम सोए हुए समाज को जगा दे, उसमें साहस, आत्मगौरव और नवचेतना का संचार कर देंl





हमारे भीतर स्थित चेतना ही हमारी वास्तविक शक्ति है। हम प्रयास करें कि हमारी चैतन्य-शक्ति सदैव जाग्रत और सक्रिय रहे , जिससे हम अपने विचारों, भावनाओं और आचरण पर सतर्क दृष्टि रख सकें । 


जाग्रत चेतना हमें व्यसनों और कुसंगति से दूर रहने की प्रेरणा देती है तथा हमें आत्मसंयम, सदाचार और विवेक के मार्ग पर अग्रसर करती है। ऐसी स्थिति में हम केवल अपने हित का ही नहीं, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के कल्याण का भी विचार करते हैं । हम अपने जीवन को सत्कर्मों, सेवा, परोपकार, सत्य और धर्म के पालन से सार्थक बनाते हैं । इन हितकारी सदाचार वेलाओं का यही उद्देश्य है कि हम जाग्रत रहें अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखें l

यदि इन्द्रियों पर नियन्त्रण न रखा जाए, तो विषयासक्ति धीरे-धीरे मन को अपने वश में कर लेती है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।


राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।

तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥ 21॥

राम - नाम  का जप महत्त्वपूर्ण है हम जप करें तो भगवान राम के कृत्यों पर भी ध्यान दें l तभी जप सार्थक है l

जिह्वा से श्रद्धापूर्वक किया गया राम-नाम का जप मनुष्य के अन्तःकरण को भी आलोकित करता है और उसके बाह्य जीवन को भी। भीतर का अज्ञान, भय, मोह, विकार और अशान्ति दूर होती है, तथा बाहर के व्यवहार में सदाचार, मधुरता, विवेक और धर्म का प्रकाश प्रकट होता है।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने रजत शर्मा का उल्लेख क्यों किया, भैया प्रदीप जी की चर्चा क्यों हुई  जानने के लिए सुनें l

15.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष अमावस्या, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७८१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष अमावस्या, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 15 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७८१ वां* सार -संक्षेप


स्थान : भैया अरविन्द जी का आवास, लक्ष्मणपुरी


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६३


ईश्वर ने इस संसार को जड़ और चेतन पदार्थों सहित गुण और दोष दोनों से युक्त बनाया है l हम संसार में रहते हुए गुणों को ग्रहण करें और दोषों का त्याग करें l राष्ट्रोन्मुखी समाजोन्मुखी रहते हुए अपनी भूमिका को पहचानकर उसके अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करें l



भारतीय दर्शन में संसार को अनित्य और क्षणभंगुर कहा गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि संसार असत्य है, बल्कि यह कि इसकी सभी वस्तुएँ परिवर्तन के अधीन हैं। परिवर्तन ही संसार का नियम है। जो इस सत्य को समझ लेता है, वह सुख में अत्यधिक आसक्त नहीं होता और दुःख में निराश नहीं होता, क्योंकि वह जानता है कि दोनों अवस्थाएँ स्थायी नहीं हैं।

यही कारण है कि महापुरुष संसार में रहते हुए भी विवेक, धैर्य और समत्व बनाए रखने की शिक्षा देते हैं। परिवर्तनशील संसार में स्थिरता बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि अपने अंतःकरण, आत्मबोध

( चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्,ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥ ) में खोजनी चाहिए l

यह संसार स्वयं में एक अद्भुत रचना है, इस अद्भुत संसार में भारत एक विलक्षण स्थान रखता है। संसार की विविधता, रहस्य, सौन्दर्य और आध्यात्मिक गहराई का अनुभव भारतवर्ष के मनीषियों ने जितनी व्यापकता और सूक्ष्मता से किया है, वैसा उदाहरण विश्व के इतिहास में दुर्लभ है।


भारत परमात्मा की एक विशिष्ट कृति है। प्रकृति की समृद्धि, ऋषियों की ज्ञान-परम्परा, आध्यात्मिक चिन्तन, सांस्कृतिक वैभव और मानवीय मूल्यों का जो अद्भुत संगम यहाँ दिखाई देता है, वह इसे अनन्य बनाता है।

इसी भूमि में भगवान् राम का प्राकट्य हुआ।रामत्व  गुणों की अद्भुत समष्टि है जब मनुष्य संसार की परिवर्तनशीलता को समझकर सत्य, करुणा, मर्यादा, शक्ति और लोकहित के मार्ग पर चलता है, तब उसके जीवन में रामत्व का उदय होता है l 

कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।

तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥130 ख॥


पृथ्वीराज चौहान का उल्लेख क्यों हुआ, भैया शैलेन्द्र पांडेय जी की चर्चा क्यों हुई, बाल बुद्धि क्या है जानने के लिए सुनें l

14.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 14 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

 गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।

या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥


जो साक्षात् कमलनाभ भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) के मुखकमल से प्रकट हुई है , उसी श्रीमद्भगवद्गीता का भली-भाँति गायन और अध्ययन करना चाहिए। अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या प्रयोजन? अर्थात्, जो ज्ञान स्वयं भगवान के मुख से निकला हो, वह सम्पूर्ण वेदों और शास्त्रों का सार है, इसलिए उसी का अभ्यास सर्वोपरि है।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 14 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७८० वां* सार -संक्षेप

स्थान : भैया अरविन्द जी का आवास, लखनऊ 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६२

भारतवर्ष की  विलक्षण आर्ष परम्परा को गहराई से जानने का प्रयास करें l सन्मार्ग पर चलने का प्रयत्न करते रहें l



इन वेलाओं का उद्देश्य है कि हम आत्मविश्वास की यह अनुभूति करें कि हम जीव ईश्वर का अंश हैं  (सोऽहम् ) किन्तु नश्वर शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध, चेतन, अविनाशी और आनन्दस्वरूप आत्मा हैं, हमारे अन्तःकरण में प्रेम, आत्मीयता, सदाचारमय विचार, राष्ट्रभक्ति, समाज सेवा का भाव प्रविष्ट हो सके,  हम अच्छे-बुरे में भेद करके अच्छाई को ग्रहण करें और बुराई को छोड़ दें,हम प्रयास करें कि हमारे सभी राष्ट्रभक्त बन्धु सुखी हों, सभी रोगमुक्त और स्वस्थ रहें, सभी का जीवन मंगलमय हो तथा सभी को शुभ और कल्याणकारी वस्तुओं का दर्शन हो। किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।

आचार्य जी ने श्रीरामचरितमानस की भी चर्चा की l

इसके अतिरिक्त बूजी जी, बैरिस्टर साहब, दीनदयाल जी, भैया शशि शर्मा जी, भैया अरविन्द जी,

महाराजा देवी सरस्वती शिशु मन्दिर  तिलक नगर कानपुर का उल्लेख क्यों हुआ, किन भैया ने अष्टावक्र गीता और श्रीमद्भगवद्गीता में भेद जानना चाहा,जालिम सिंह की चर्चा क्यों हुई, युद्ध कांड और लंका कांड में अन्तर क्या है जानने के लिए सुनें l

13.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७९ वां* सार -संक्षेप

 प्रथा परंपरा जहाँ भी रूढ़ि हो गई, 

कथा तरह-तरह की व्यर्थ अर्थ कर गयी,

प्रथा के साथ पूर्वजों का शौर्य बोध हो, 

उसी के साथ पीढ़ियों का ज्ञान-शोध हो ।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६१


हमें जब भौतिक लाभ और आत्मिक हित में से किसी एक का चयन करना पड़े, तब हमें आत्मिक हित को प्राथमिकता देनी चाहिए। धन, पद, प्रतिष्ठा, राज्य, परिवार अथवा समस्त सांसारिक वैभव नश्वर हैं, किन्तु आत्मा का कल्याण और धर्म का पालन शाश्वत मूल्य हैं।

चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति अद्भुत है l 




गोस्वामी तुलसीदास जी भारतीय साहित्य में एक नेतृत्वकारी साहित्यावतार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने ऐसे अध्यात्म का प्रतिपादन किया, जो शौर्य, विक्रम, पौरुष तथा पराक्रम से अलंकृत होकर व्यक्ति और समाज को धर्म तथा कर्तव्य के मार्ग पर अग्रसर करे।

तुलसीदास जी ने भगवान राम के चरित्र में आदर्श मानव जीवन के समस्त गुणों का दर्शन किया। 

कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥

कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥5॥

उन्हें भगवान राम में सत्य, धर्म, करुणा, मर्यादा, शौर्य, नीति, नेतृत्व, लोकमंगल, भक्तवत्सलता तथा परम आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत समन्वय दिखाई दिया। इसी कारण उनके लिए वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मार्गदर्शन देने वाले पूर्ण आदर्श थे। नर लीला कर रहे भगवान राम के गुणों में उन्होंने धर्म, समाज, राष्ट्र और आत्मकल्याण—सभी का समग्र दर्शन कर लिया था। इस कलियुग के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना इसलिए की कि भगवान राम के आदर्श चरित्र, वैदिक-सनातन धर्म के सिद्धान्तों तथा भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और लोकमंगल के संदेश को जनसामान्य तक सरल भाषा में पहुँचाया जा सके। उस भ्रमित राष्ट्रभक्त समाज के भ्रम और भय को दूर किया जा सके उसे संगठन की महत्ता समझाई जा सके l


आजकल इसी कल्याणकारी ग्रंथ के सुन्दर कांड में हम लोग प्रविष्ट हैं l प्रसंग है कि जब भगवान राम की वानर-सेना समुद्र तट पर पहुँची और लंका जाने के लिए समुद्र पार करना आवश्यक हुआ, तब भगवान 

अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला॥

आनन अनल अंबुपति जीहा। उतपति पालन प्रलय समीहा॥


ने मर्यादा का पालन करते हुए समुद्रदेव से मार्ग देने की प्रार्थना की। उन्होंने कुश बिछाकर तीन दिनों तक समुद्र की उपासना की, किन्तु समुद्र ने कोई उत्तर नहीं दिया l


बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।

बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥57॥

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, कामना वासना में क्या अन्तर है, दुर्गुण क्यों आवश्यक हैं, आचार्य जी आज कहां जा रहे हैं जानने के लिए सुनें l

12.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७८ वां* सार -संक्षेप

 वैभव चुंबक और काठ का टुकड़ा एक अभाव 

दोनों का अपने ऊपर पड़ता है बहुत प्रभाव 

काठ हानि लाभों से बाहर पूर्ण विरक्त प्रशान्त 

पर चुंबक आकर्ष -विकर्षों बीच सतत उद्भ्रान्त l


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 12 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६०

हमारे सनातन धर्म में मनुष्य को इकाई नहीं परिवार को इकाई मानते हैं 

अपने परिवार को आदर्श परिवार बनाएं यदि द्वेष का अंकुर उभरे भी तो उसे शांत करने का प्रयास करें 



जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी जल से लिप्त नहीं होता, वैसे ही एक आदर्श गृहस्थ के रूप में हम अपने परिवार, व्यवसाय, समाज और राष्ट्र के विविध दायित्वों का निर्वाह करें किन्तु व्यक्तिगत लाभ, यश या स्वार्थ की आसक्ति से स्वयं को मुक्त रखें l हम जीवन केवल अपने सुख-साधन तक सीमित न रखें बल्कि राष्ट्र को परम वैभव पर पहुँचाने और समाज की सेवा करने के महान लक्ष्य के लिए समर्पित करें । हम कर्म करें , परन्तु पद, प्रतिष्ठा या पुरस्कार की अपेक्षा न करें सफलता मिलने पर अहंकार न करें और बाधाएँ आने पर निराश न हों l कर्तव्य, समर्पण और निष्काम भाव से किया गया प्रत्येक कार्य 'योगः कर्मसु कौशलम्' का साक्षात् उदाहरण बन जाता है।

एक किसान खेत में पूरी लगन से खेती करता है। वह भूमि जोतता है, बीज बोता है, सिंचाई करता है। परन्तु वर्षा उसके वश में नहीं है।


यदि वह हर समय केवल उपज की चिंता करता रहे, तो दुःखी रहेगा। यदि वह अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से करे और परिणाम को ईश्वर पर छोड़े, तो उसका मन शांत रहेगा।


यही बुद्धियुक्त कर्म है।


भगवान् श्रीराम राजमहलों, परिवार, राज्य और समाज के मध्य रहते हुए भी व्यक्तिगत स्वार्थ, मोह और अहंकार से सर्वथा मुक्त रहे। उनके प्रत्येक कर्म का आधार केवल धर्म, लोकमंगल और राष्ट्रकल्याण था।


सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी॥

तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका॥4॥


जब  भगवान श्रीराम वनवास का समाचार सुनाकर माता से अनुमति लेने आते हैं, तब  मां कौसल्या का हृदय पुत्र-वियोग से व्याकुल हो उठता है। फिर भी वे अपने व्यक्तिगत दुःख को धर्म के सामने नहीं रखतीं। वे समझती हैं कि पुत्र का सर्वोच्च कर्तव्य माता-पिता की आज्ञा का पालन करना है।


इसलिए वे श्रीराम के निर्णय की प्रशंसा करते हुए कहती हैं कि पिता की आज्ञा मानना केवल एक कर्तव्य नहीं, बल्कि समस्त धर्मों का सार है।


आज आचार्य जी ने सुन्दर कांड में क्या बताया,सरोज सरस्वती शिशु मन्दिर विद्या मन्दिर शुक्लागंज का उल्लेख क्यों हुआ,भक्ति के सोपान क्या हैं, भैया मोहन जी,भैया यतीन्द्र जी, भैया वीरेन्द्र जी और भैया मनीष जी की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

11.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७६ वां* सार

 मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत्।आत्मवत् सर्वभूतेषु, यः पश्यति सः पण्डितः॥


जो व्यक्ति दूसरों की पत्नी को अपनी माता के समान , दूसरों के धन को मिट्टी के ढेले के समान और सभी प्राणियों को अपने समान  देखता है, वही पण्डित है


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 11 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५९

हम सेवा के चार आधार स्तंभों शिक्षा स्वास्थ्य स्वावलंबन और सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने का प्रयास करें l


अनेक बार आक्रमणों तथा विपरीत परिस्थितियों के कारण भारत की बहुमूल्य ज्ञान-सम्पदा को क्षति पहुँची। अनेक ग्रन्थ नष्ट हुए, तथापि भारतीय ऋषियों द्वारा रचित पुराण और अन्य शास्त्र पूर्णतः लुप्त नहीं हुए। यह हमारे सांस्कृतिक जीवन की अद्भुत शक्ति का प्रमाण है कि अनेक विपत्तियों के पश्चात् भी वे आज तक सुरक्षित हैं।

 दास -वृत्ति की ओर उन्मुख करने वाली और आत्म से दूर ले जाने वाली आधुनिक शिक्षा-पद्धति के प्रभाव से हम लोगों के मन में यह धारणा बैठ गई कि पुराण केवल कल्पना, मिथक अथवा मनोरञ्जनात्मक कथाएँ हैं। किन्तु भारतीय परम्परा में पुराणों का उद्देश्य केवल कथा-कहानी कहना नहीं था। ऋषियों ने गूढ़ दार्शनिक सिद्धान्तों, इतिहास-स्मृतियों, नैतिक आदर्शों, लोकाचार, भूगोल, वंशावलियों तथा आध्यात्मिक शिक्षाओं को जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए कथा-शैली का अत्यन्त कुशल प्रयोग किया।

इस दृष्टि से पुराण ऋषियों की अद्वितीय शिक्षण-पद्धति के उदाहरण हैं। उनमें निहित प्रत्येक कथा का लक्ष्य केवल मनोरञ्जन नहीं, बल्कि धर्म, नीति, लोकमंगल और आत्मोन्नति के सिद्धान्तों को सरल एवं स्मरणीय रूप में प्रस्तुत करना है।


अतः हमारा परम कर्तव्य है कि हम अपने विलक्षण एवं गौरवशाली साहित्य का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन करें, उसके वास्तविक स्वरूप को समझें तथा अपनी ज्ञान-परम्परा को पुनः आत्मसात् करें। जब हमारी शिक्षा अपनी सांस्कृतिक जड़ों, ऋषियों के चिन्तन और सनातन ज्ञान-स्रोतों से पुनः संयुत हो जाएगी, तभी वह वास्तव में सनाथ होगी l हम साधक हैं। हम अपने राष्ट्र को परम वैभव के शिखर पर पहुँचाने की साधना में निरन्तर रत हैं। हमारी साधना केवल व्यक्तिगत उन्नति के लिए नहीं, अपितु राष्ट्र, संस्कृति और समस्त समाज के उत्कर्ष के लिए है। ज्ञान, चरित्र, परिश्रम और आत्मानुशासन के माध्यम से हम ऐसे भारत के निर्माण का संकल्प ले चुके हैं जो अपनी सनातन ज्ञान-परम्परा से आलोकित होकर विश्व के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे। यही कार्य गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस  ग्रंथ आदि रचकर किया  उसी अद्भुत ग्रंथ के सुन्दरकांड में हम लोग आजकल प्रविष्ट हैं तो आइये पुनः पहुंचे उस प्रसंग में जब विभीषण रावण का त्याग करके श्रीराम की शरण में आते हैं। वानर-सेना में कुछ लोग उन पर सन्देह करते हैं।


भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥

सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥4॥


(जान पड़ता है) यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है, इसलिए मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँध रखा जाए। (श्री रामजी ने कहा-) हे मित्र! तुमने नीति तो अच्छी विचारी, परंतु मेरा प्रण तो है शरणागत के भय को हर लेना!॥4॥


किन्तु हमें शरणागत और कालनेमि में अन्तर पता होना चाहिए l और इसको परखने के लिए हमारी बुद्धि  जाग्रत और सशक्त होनी चाहिए l ज्ञान के साथ शक्ति भी आवश्यक है l 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने क्या बताया, आचार्य जी ने नीति वाक्यामृत की चर्चा क्यों की, भैया शशि जी, भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

10.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७६ वां* सार -संक्षेप

 जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥

अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥4॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 10 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५८

हमारे लिए अहंकार का निरसन अत्यन्त आवश्यक है अन्यथा हमें सत्य के दर्शन कभी नहीं होंगे l



आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस के सुन्दर कांड में प्रविष्ट हैं 

सुन्दरकाण्ड की विशेषता यह है कि इसमें निराशा के बीच आशा, संकट के बीच साहस और कठिन परिस्थितियों में भी ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास का संदेश मिलता है। जब मां सीताजी का कोई समाचार नहीं मिल रहा था और समस्त वानर-सेना चिन्तित थी, तब हनुमानजी अपने बल, बुद्धि और भक्ति के सहारे समुद्र लाँघकर लंका पहुँचते हैं। वहाँ वे अनेक बाधाओं को पार करते हुए अशोकवाटिका में सीताजी का पता लगाते हैं, उन्हें श्रीराम का सन्देश सुनाते हैं और उनके हृदय में आशा का संचार करते हैं।

इस काण्ड में हनुमानजी की विनम्रता विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है। असाधारण शक्ति होने पर भी वे स्वयं को श्रीराम का सेवक ही मानते हैं। वे प्रत्येक सफलता का श्रेय अपने प्रभु को देते हैं। इससे यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची महानता अहंकार में नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण में निहित होती है।

आइये प्रवेश करें इसी अद्भुत प्रेरक सुन्दर कांड में 


तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥

कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥1॥



लक्ष्मण जी के चरणों में मस्तक नवाकर, प्रभु राम के गुणों की कथा का वर्णन करते हुए  गुप्तचर शुक और सारण

( जो पूर्वजन्म में मुनि थे और भगवान के भक्त और तपस्वी थे। किसी कारणवश उन्हें शाप प्राप्त हुआ कि वे राक्षस-योनि में जन्म लेंगे और रावण के मंत्री बनेंगे। शाप के प्रभाव से वे लंका में शुक और सारण नामक राक्षस बने )तुरंत ही चल दिए।भगवान राम के स्वभाव  से अभिभूत होकर दोनों गुप्तचर भगवान राम का यशगान करते हुए  लंका में आए और उन्होंने रावण के चरणों में सिर नवाए॥


कामी और क्रोधी रावण ने हँसकर बात पूछी- अरे शुक! अपनी कुशलता का क्यों नहीं  वर्णन करता ? उस विभीषण का समाचार सुना, मृत्यु जिसके अत्यंत निकट आ गई है॥उस मूर्ख ने राज्य करते हुए लंका को त्याग दिया। अभागा अब जौ का कीड़ा बनेगा ( जैसे जौ के साथ घुन भी पिस जाता है, वैसे ही नर वानरों के साथ वह भी मारा जाएगा), तत्पश्चात् भालु और वानरों की सेना का हाल वर्णित कर , जो कठिन काल की प्रेरणा से इस क्षेत्र में चली आई है॥

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया बिजली की समस्या की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की जानने के लिए सुनें

9.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७५ वां* सार -संक्षेप

 फूटी स्मिति सीता-ध्यान-लीन राम के अधर,

फिर विश्व-विजय-भावना हृदय में आई भर,


वे आए याद दिव्य शर अगणित मंत्रपूत,—

फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत,....


मां सीता की स्मृति भगवान् श्रीराम के लिए प्रेरणा और शक्ति का स्रोत बनती है। क्षणभर पहले जो मन निराशा और चिन्ता से घिरा था, वह पुनः उत्साह, आत्मविश्वास और विजय-संकल्प से भर उठता है। दिव्य बाणों का स्मरण उनके पराक्रम और युद्ध-सामर्थ्य के पुनर्जागरण का प्रतीक है।

(*राम की शक्ति -पूजा*  से )


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 9 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५७

मानस एक ऐसा अद्भुत ग्रंथ है जो हमें मार्गदर्शन देता है इसके आधार पर हम भावी योजनाएं बनाएं l उनमें हम निश्चित रूप से सफल होंगे क्योंकि हनुमान जी हमारे साथ हैं l



आजकल हम लोग कल्याणार्थ सुन्दर कांड के पाठ में प्रविष्ट हैं 


मनुष्यत्व के अनुभव में पारंगत भगवान् श्रीराम समुद्र पार कर लंका पहुँचने के उपाय पर विचार कर रहे हैं। वे सुग्रीव और विभीषण से परामर्श लेकर यह आदर्श प्रस्तुत करते हैं कि बुद्धिमान और महान् व्यक्ति भी महत्त्वपूर्ण कार्यों में अपने सहयोगियों के परामर्श का सम्मान करते हैं। साथ ही, समुद्र की विशालता और दुर्गमता  आगामी चुनौती की गंभीरता को प्रकट कर रही है।


विभीषण ने समुद्र से मार्ग माँगने का उचित उपाय बताया। लक्ष्मण जी,

(जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते) ऐसे कि जो संसार में जितने भी राक्षस हैं, उन सबको एक पल  में नष्ट कर सकते हैं,को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने कहा कि आपके बाण करोड़ों समुद्रों को भी सुखाने की शक्ति रखते हैं  तो समुद्र से याचना करने की आवश्यकता नहीं है l

किन्तु मर्यादा और नीति यही कहती है कि पहले विनम्रता और उचित उपाय का आश्रय लिया जाए। इसलिए  भगवान् श्रीराम समुद्र के तट पर जाकर उसका सम्मान करते हुए मार्ग देने की प्रार्थना करने लगे।

कथा में आगे शुक और सारण का उल्लेख हुआ है l 

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।

सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥52॥

लक्ष्मणजी ने दूतों से कहा

 उस मूर्ख रावण से मेरा यह उदार और हितकारी सन्देश स्पष्ट शब्दों में कह देना कि वह माता सीता को सम्मानपूर्वक लौटा दे और आकर  मैत्री स्थापित कर ले। यदि वह ऐसा नहीं करेगा, तो समझ ले कि उसका विनाशकाल निकट आ पहुँचा है।



इसके अतिरिक्त गुप्तसार संग्रह का उल्लेख करते हुए आचार्य जी ने बताया कि कुश के आसन पर बैठने से ज्ञान की वृद्धि होती है (यह ऊर्जा के क्षय को रोकता है। इस पर बैठकर पूजा, ध्यान या जप करने से अर्जित ऊर्जा धरती में नहीं जाती। यह मन की एकाग्रता बढ़ाता है और कामनाओं की तत्काल पूर्ति में सहायक होता है )l

भैया पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

8.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७४ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 8 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५६

आगामी अधिवेशन की सफलता के लिए हम सभी मनोयोगपूर्वक जुट जाएँ। पूर्ण समर्पण, उत्साह और उत्तरदायित्व-बोध के साथ संगठित होकर कार्य करें। हमारी एकता, अनुशासन और सामूहिक पुरुषार्थ ही अधिवेशन को सफल, गरिमामय और उद्देश्यपूर्ण बनाएँगे l




शिक्षक नौकर नहीं होता है , वह समाज का संस्कारदाता और राष्ट्र का निर्माता होता है। नौकरी करना अपेक्षाकृत सरल है, किन्तु शिक्षक होना अत्यन्त दुष्कर उत्तरदायित्व है। जिस व्यक्ति में जी३वनपर्यन्त शिक्षकत्व का बोध, कर्तव्यनिष्ठा और लोकमंगल की भावना बनी रहती है, वही वास्तव में भारतराष्ट्र के कल्याण का महान साधक बनता है। उसके द्वारा प्रदान किए गए संस्कार पीढ़ियों का निर्माण करते हैं और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला रखते हैं।

शिक्षक अपने शिष्य को पुत्रवत् स्नेह प्रदान करता है। वह उसे दुलारता है, पुचकारता है, आवश्यकता होने पर अनुशासन का महत्त्व भी समझाता है। शिष्य की प्रगति, चरित्र-निर्माण और यशस्विता के लिए वह निरन्तर चिन्तित रहता है तथा उसे भी चिन्तन मनन के लिए प्रेरित करता है, शिष्य को सत्कर्मोन्मुख करता है । शिष्य की सफलता में ही शिक्षक अपनी सफलता का दर्शन करता है। आचार्य जी ऐसे ही शिक्षक हैं l 

सच्चा शिक्षक केवल विषयज्ञान नहीं देता, अपितु जीवन जीने की कला भी सिखाता है। वह अपने शिष्यों को बताता है कि कर्म करते रहो, फल की चिन्ता मत करो l वह उसे आत्मा की नित्यता और शरीर की नश्वरता का बोध कराता है। ऐसे शिष्य को जब कर्म, कर्तव्य, आत्मा और जीवन के वास्तविक स्वरूप का  ज्ञान हो जाता है, तब वह जीवन से ऊबता नहीं, बल्कि प्रत्येक परिस्थिति में उसका आनन्द लेना सीख जाता है l श्रीरामचरितमानस हमें शक्ति बुद्धि विचार कौशल और संगठन की महत्ता का उद्बोध कराता है l भगवान राम ने मनुष्य के रूप में जीवन का  जी आदर्श प्रस्तुत किया वह अद्वितीय है l

जब-जब धर्म की हानि होती है और दुष्ट, अधर्मी तथा अभिमानी लोगों का प्रभाव बढ़ने लगता है, तब-तब करुणासागर भगवान विभिन्न अवतार धारण करके सज्जनों की पीड़ा का निवारण करते हैं तथा धर्म की पुनः स्थापना करते हैं।

भगवान राम समुद्र पार करने के लिए विचार कर रहे हैं 


सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥

संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँति॥3॥


 हे वानरराज! हे वीर लंकापति! बताइए, इस गम्भीर समुद्र को किस प्रकार पार किया जाए? यह समुद्र मगरमच्छों, सर्पों और विशाल मछलियों से भरा हुआ है। इसकी गहराई अथाह है और इसे पार करना हर प्रकार से अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है।


यद्यपि भगवान राम सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं, तथापि वे लोकमर्यादा का पालन करते हुए अपने सहयोगियों से परामर्श करते हैं। इससे नेतृत्व का यह आदर्श प्रकट होता है कि महानतम व्यक्ति भी सामूहिक विचार-विमर्श का सम्मान करता है और महत्वपूर्ण कार्यों में सहयोगियों की राय लेता है।अद्भुत है भगवान राम की माया लीला l 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भगवान राम के एकनिष्ठ सेवक कौन हैं, भैया पंकज जी की किस पुस्तक की चर्चा हुई, शुक और सारण, जो रावण के दो प्रमुख मंत्री तथा गुप्तचर थे, क्यों चर्चा में आये जानने के लिए सुनें l

7.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७३ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 7 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५५

शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति करते हुए संगठन के लिए जब हम एकत्र हों उसमें धन को अधिक महत्त्व न दें अन्यथा मन व्यग्र होगा साथ ही दंभ अहंकार से भी बचें l संगठन में प्रेम और आत्मीयता महत्त्वपूर्ण है l


सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन को सामर्थ्य, साहस और उत्तरदायित्व से युक्त बनाने वाली संस्कृति है। किसी भी देवी देवता को हम देखें तो उनके हाथों में शस्त्र दिखेंगे l ये शस्त्र केवल युद्ध के उपकरण नहीं हैं, वे धर्मरक्षा, अन्याय-प्रतिरोध, आत्मसंयम और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक हैं। भगवान विष्णु का चक्र, भगवान शिव का त्रिशूल, माँ दुर्गा के विविध आयुध और भगवान राम का धनुष सभी यह संदेश देते हैं कि सज्जनता के साथ शक्ति का होना भी आवश्यक है। मां सरस्वती के हाथों में वीणा है वह भी शक्ति और शौर्य को उद्भासित कर रही है वह आत्मिक शक्ति का स्रोत है l

वैदिक वाक्य “वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः” हमारे जैसे प्रत्येक जागरूक नागरिक का आदर्श है। सनातन परम्परा हमें सिखाती है कि धर्म का पालन केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित न रहे, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण से भी जुड़ा हो।

आज आवश्यकता है कि सनातनी समाज अपने भीतर शौर्य, आत्मविश्वास, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का विकास करे। ऐसा समाज जो ज्ञान में प्रखर हो, चरित्र में दृढ़ हो, सेवा में अग्रणी हो और आवश्यकता पड़ने पर धर्म तथा राष्ट्र की रक्षा के लिए खड़ा होने का साहस रखता हो। इसके लिए हमारी शिक्षा भी महत्त्वपूर्ण है 

वर्तमान समय में चल रही शिक्षा निराशा हताशा कुंठा को वृद्धिंगत कर रही है यह शिक्षा व्यापार है l हमारे लिए इसे परिवर्तित करना नितान्त आवश्यक है l


गोस्वामी तुलसीदास ने अपने युग की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का सूक्ष्म अवलोकन किया। उन्होंने यह अनुभव किया कि समाज दिशाहीनता, निराशा और विघटन की ओर अग्रसर हो रहा है। अतः लोकमंगल की भावना से प्रेरित होकर उन्होंने श्रीरामचरितमानस की रचना की, जिससे जनसामान्य को धर्म, नीति, सदाचार, भक्ति और आदर्श जीवन के मूल्यों का सरल एवं प्रभावी शिक्षण प्राप्त हो सके l


रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।

जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥49क

रावण का क्रोध अग्नि के समान था और उसकी उग्र श्वासें उस अग्नि को प्रचण्ड बनाने वाली वायु के समान थीं। ऐसे भयंकर क्रोध की अग्नि में विभीषण मानो जल रहे थे। उस समय श्रीराम ने उन्हें अपनी शरण में लेकर न केवल उनकी रक्षा की, बल्कि आगे चलकर उन्हें अखण्ड लंका का राज्य भी प्रदान किया।


अधर्म के बीच सत्य का पक्ष लेने वाला व्यक्ति यदि अकेला भी पड़ जाए, तो ईश्वर स्वयं उसका सहारा बनते हैं।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने बैठकों के लिए क्या परामर्श दिया, युगभारती प्रार्थना की चर्चा क्यों हुई, प्रार्थना का दूसरा छंद कहां से लिया गया है जानने के लिए सुनें l

6.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७२ वां* सार

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 6 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५४

जब हम आत्मचिन्तन करते हैं तो आनन्द में रहते हैं और जब लोकचिन्तन करते हैं तो व्याकुल रहते हैं किन्तु लोक को जब आत्म के साथ संयुत करने का प्रयास करते हैं तो उत्साह प्राप्त होता है l



समस्याओं का अस्तित्व जीवन का स्वाभाविक अंग है। यदि समस्याएँ ही न हों, तो समाधान की खोज, नवोन्मेष की प्रेरणा और पुरुषार्थ का अवसर भी नहीं मिलेगा। अनेक बार वही कठिनाइयाँ हमें विचार करने, सीखने और अपनी क्षमताओं का विकास करने के लिए प्रेरित करती हैं।

संसार के साथ सामंजस्य केवल अनुकूल परिस्थितियों से नहीं बनता, बल्कि प्रतिकूलताओं का धैर्यपूर्वक सामना करने और उनके समाधान खोजने से बनता है। यदि हम  समस्याओं से भागते हैं तो हम विकास के अवसरों से भी दूर हो जाते हैं परन्तु  उन्हें समझकर समाधान की दिशा में प्रयत्न करते हैं तो जीवन में स्थिरता और सफलता प्राप्त करते हैं l

समस्याएँ पुरुषार्थ को जाग्रत करती हैं और शरीर उस पुरुषार्थ के प्रकट होने का माध्यम बनता है।शरीर धारण करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है। यह शरीर एक ओर रोगों का घर कहा गया है  परन्तु दूसरी ओर यही शरीर धर्म, साधना, सेवा, ज्ञानार्जन और लोकमंगल का साधन भी है। अतः शरीर के प्रति न तो अत्यधिक आसक्ति रखनी चाहिए और न ही उसकी उपेक्षा करनी चाहिए। उसकी आवश्यक देखभाल, स्वच्छता, स्वास्थ्य-संरक्षण और पोषण आवश्यक है, क्योंकि स्वस्थ शरीर से ही उच्च आदर्शों की पूर्ति सम्भव होती है। किन्तु साथ ही यह स्मरण भी रहना चाहिए कि शरीर साधन है, साध्य नहीं। इसका उद्देश्य केवल भोग नहीं, अपितु कर्तव्य, सेवा, साधना और आत्मविकास है।

इस प्रकार शरीर के प्रति समभाव रखना चाहिए— न मोह, न तिरस्कार; न अहंकार, न उपेक्षा। उसकी रक्षा करें, परन्तु उसे ही अपना सम्पूर्ण स्वरूप न मानें।

यदि मनुष्य अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक और लोककल्याण की भावना से पालन करता है, तो वही उसकी ईश्वर-पूजा बन जाती है।

जो शिक्षक निष्ठापूर्वक शिक्षा देता है, जो कृषक परिश्रमपूर्वक अन्न उत्पन्न करता है, जो चिकित्सक सेवा-भाव से रोगियों का उपचार करता है, जो सैनिक राष्ट्ररक्षा करता है, जो साधक स्वाध्याय,साधना, लेखन -योग करता है—वे सभी अपने-अपने कर्म द्वारा परमात्मा की आराधना कर रहे होते हैं।

तुलसीदासजी संकेत करते हैं कि जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म का आश्रय नहीं छोड़ता, उसकी रक्षा स्वयं भगवान् करते हैं। रावण के राज्य से निष्कासित विभीषण को श्रीराम ने न केवल शरण दी, बल्कि आगे चलकर लंका का अखण्ड राज्य भी प्रदान किया 


रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड। जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥

सुन्दर कांड में आचार्य जी ने आज और क्या बताया,साध्वी ऋतंभरा (दीदी माँ) के गुरु युगपुरुष महामंडलेश्वर स्वामी परमानंद गिरिजी महाराज का उल्लेख क्यों हुआ, जाजमऊ की चर्चा क्यों हुई, भैया अरविन्द जी की किस योजना का संकेत हुआ, भैया संतोष मिश्र जी द्वारा दी गयी किस पुस्तक का उल्लेख हुआ जानने के लिए सुनें l

5.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७१ वां सार

 तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥46॥



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५३

लेखन एक योग है इसे अपने जीवन में अवश्य महत्त्व दें 


मन का मनका टूट रहा है,

बेगाना जग छूट रहा है l

इस मन को कैसे समझाऊं,

कांचा घट अब फूट रहा है  ll 

जब मृत्यु या शरीर के क्षीण होने का समय निकट आता दिखाई देता है तब मनुष्य को अनुभव होता है कि संसार की वस्तुएँ स्थायी नहीं हैं  केवल ईश्वर, आत्मा और सत्कर्म ही शाश्वत हैं।

या जब विवेक का उदय होता है तो मनुष्य समझने लगता है कि संसार का उपयोग तो किया जा सकता है, परन्तु उसे जीवन का अंतिम आश्रय नहीं बनाया जा सकता। और इस प्रकार वह आत्मचिन्तन, सत्संग, भक्ति और धर्म की ओर उन्मुख होता है।

जब तन केवल भोग में और मन केवल इच्छाओं में उलझ जाता है, तब अशान्ति उत्पन्न होती है। परन्तु जब तन सेवा में, मन भक्ति में और बुद्धि विवेक में स्थित होती है, तब जीवन आनन्दमय बन जाता है।

श्रीरामचरितमानस  जीवन को सही ढंग से जीने की कला सिखाने वाला ग्रन्थ है l सुन्दरकांड का पाठ हमारा अभिप्रेत है l 


सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।

ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥48॥

भगवान् श्रीराम कहते हैं कि जो मनुष्य सगुण स्वरूप में भगवान् की उपासना करते हैं, सदैव दूसरों के हित में लगे रहते हैं, नीति और धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करते हैं तथा जिनके हृदय में ब्राह्मणों, विद्वानों और ज्ञानपरम्परा के प्रति श्रद्धा एवं प्रेम होता है, वे मुझे अपने प्राणों के समान प्रिय हैं।


जो व्यक्ति ईश्वर-भक्ति के साथ समाज-हित,राष्ट्र -हित,मर्यादा, अनुशासन और सद्जनों के सम्मान को अपनाता है, वही भगवान् का सच्चा भक्त कहलाता है।॥


भैया पुनीत जी, भैया अरविन्द जी, श्री सुनील मिश्र जी का उल्लेख क्यों हुआ, तन मन धन के स्थान पर तन मन के साथ GUN का उल्लेख कौन करता था,सगुणोपासक कैसा विश्वासी होता है जानने के लिए सुनें

4.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७० वां* सार

 अस कहि चला बिभीषनु जबहीं।

आयुहीन भए सब तबहीं॥

साधु अवग्या तुरत भवानी।

कर कल्यान अखिल कै हानी॥



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५२

चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की  अनुभूति कर अनन्त आनन्द के साथ अपने राष्ट्र के अनन्त आनन्द को वृद्धिंगत  करें 



मनुष्य की वाञ्छाएँ प्रायः कभी पूर्ण नहीं होतीं। एक इच्छा की पूर्ति होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है, इसलिए वह प्रायः अतृप्त ही बना रहता है। किन्तु यदि किसी महापुरुष, संत या सज्जन की सन्निधि से मन को शान्ति, आनन्द और संतोष की अनुभूति होने लगे, तो उसे ईश्वर की विशेष कृपा समझना चाहिए। क्योंकि संसार की वस्तुएँ तृष्णा बढ़ाती हैं, जबकि सत्संग मन को तृप्ति और परम शान्ति प्रदान करता है। यह सदाचार वेला सत्संग का ही एक प्रकार है l अभावों के मध्य इस संगति का प्रभाव अद्भुत है l


जिस प्रकार हिमालय बाह्य रूप से हिममय होते हुए भी भीतर अग्निमय शक्ति का स्रोत है, उसी प्रकार सत्संग से प्राप्त शान्ति भी निष्क्रियता नहीं, बल्कि संयमित शक्ति, जाग्रत चेतना और धर्मनिष्ठ जीवन का आधार है। 

अटल बिहारी वाजपेयी जी हिमालय को इसी दृष्टि से देखते हुए कहते हैं 


कौन कह रहा उसे हिमालय?

वह तो हिमावृत्त ज्वालागिरि,

अणु-अणु, कण-कण, गह्वर-कन्दर,

गुंजित ध्वनित कर रहा अब तक

डिम-डिम डमरू का भैरव स्वर ।

गौरीशंकर के गिरि गह्वर

शैल-शिखर, निर्झर, वन-उपवन,

तरु तृण दीपित ।


शंकर के तीसरे नयन की-

प्रलय-वह्नि से जगमग ज्योतित।

जिसको छू कर,

क्षण भर ही में

काम रह गया था मुट्ठी भर ।


हिमालय भारतीय संस्कृति के तप, त्याग, शौर्य, पराक्रम और आत्मबल का विराट् प्रतीक है। उसके शिखर हमें निर्भीक बनने, अन्याय के सामने अडिग खड़े रहने, अपनी दुर्बलताओं पर विजय पाने तथा राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए सदैव सजग रहने की प्रेरणा देते हैं। उदाहरणार्थ इस समय कालनेमियों से सजग रहने की अत्यन्त आवश्यकता है l हिमालय का मौन स्वर मानो यह संदेश देता है कि जीवन में शीतलता और करुणा के साथ-साथ आवश्यकता होने पर शिव के समान तेज, साहस और संहारक शक्ति भी धारण करनी चाहिए। राष्ट्र की अद्भुत निधि तुलसीदास जी ने भी यही संदेश दिया l उन्हीं के रचित ग्रंथ में आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं l सुन्दरकांड का प्रसंग चल रहा है l 

भक्त विभीषण कहते हैं 


तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥46॥


मनुष्य को वास्तविक शान्ति, संतोष और कल्याण संसार की वस्तुओं या इच्छाओं की पूर्ति से नहीं, बल्कि कामनाओं का त्याग कर भगवान के भजन और सत्संग से प्राप्त होता है। रामभक्ति ही मन को शोक, चिन्ता और अशान्ति से मुक्त करती है l 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,

हनुमान जी के विग्रह में आयी किस विरूपता की आचार्य जी ने चर्चा की, श्रद्धेय बचनेश जी ने कौन सा प्रसंग बताया था, भैया पुनीत जी आज कहां जा रहे हैं जानने के लिए सुनें l

3.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६९ वां* सार -संक्षेप

 सुसमर्थ सनातन धर्म जगत का जीवन है, 

वैश्विक कल्याण इसी का मंगल चिंतन है, 

इसके विपरीत सभी मत जीवन-शैली हैं, 

ये सब परजीवी अमरबेलि सी फैली हैं। 

हम सभी सनातनधर्मी हिन्दू जाग्रत हों, 

पहचानें, अपने तत्वबोध से अवगत हों, 

बल बुद्धि पराक्रम वाली शिवसाधना करें,

भारतमाता की सच्ची आराधना करें ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५१

हम मनुष्य हैं अतः मनुष्यत्व की अनुभूति करें 

श्रीरामचरितमानस का अवगाहन करें जो केवल एक ग्रन्थ नहीं, अपितु जीवन का प्रकाशस्तम्भ है। इसका प्रत्येक प्रसंग मनुष्य को कर्तव्यबोध, आत्मविश्वास, धैर्य, भक्ति और लोकमंगल की प्रेरणा देकर उसे भीतर से शक्तिसंपन्न बनाता है।




संसार में संकटों का अभाव कभी नहीं रहा और न कभी रहेगा। चुनौतियों, संघर्षों तथा विपरीत परिस्थितियों के मध्य भी हमें प्रसन्नचित्त रहना, संयम बनाए रखना, निरन्तर स्वाध्याय करना तथा अपनी सामर्थ्य का विकास करना है ।आज आवश्यकता इस बात की है कि  भारत देश के राष्ट्रनिष्ठ हिन्दू समाज को आश्वस्त किया जाए कि चारों ओर केवल अन्धकार ही नहीं है। आशा, साहस और संकल्प की ज्योति आज भी प्रज्वलित है। उन्हें यह अनुभव कराना होगा कि भय, भ्रम और निराशा के वशीभूत होने की आवश्यकता नहीं है।

जब हम जैसे जागरूक और कर्तव्यनिष्ठ लोग दृढ़ता के साथ खड़े होते हैं, तब संकटों का अन्धकार स्वयं छँटने लगता है। अतः हमें आत्मबल, संगठन, सेवा, स्वाध्याय और पराक्रम की विधि व्यवस्थाओं के आधार पर समाज में विश्वास का वातावरण निर्मित करना है , जिससे प्रत्येक व्यक्ति यह अनुभव कर सके कि वह अकेला नहीं है; उसके साथ एक जाग्रत, संवेदनशील और उत्तरदायी समाज खड़ा है।

दूसरों के कार्यों का अनुकरण करने के स्थान पर अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करना ही श्रेयस्कर है l और हमारा कर्तव्य है राष्ट्रनिष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष l

सुन्दरकाण्ड का सार भी यही है कि संकटों के बीच हम स्वयं दीपक बनें और निराश समाज को यह विश्वास दिलाएं कि अन्धकार कितना भी घना हो, हनुमान जी जैसा साहस, भगवान राम जैसा आदर्श और धर्म जैसा प्रकाश आज भी हमारे साथ है।

विभीषण भगवान राम की शरण में आ चुके हैं 

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥1॥



भगवान श्रीराम कहते हैं— यदि किसी व्यक्ति पर करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या जैसे महापाप भी लगे हों, तब भी यदि वह मेरी शरण में आ जाए तो मैं उसका त्याग नहीं करता। जब कोई जीव सच्चे हृदय से मेरी ओर उन्मुख होकर मेरे सम्मुख आता है, उसी क्षण उसके करोड़ों जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं।

सनमुख होइ' का अर्थ केवल शारीरिक रूप से भगवान के सामने आना नहीं है, बल्कि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को भगवान की ओर मोड़ देना है। रामाश्रित हो जाना अद्भुत है l जैसे ही जीव ईश्वराभिमुख होता है, वैसे ही उसके भीतर का अज्ञान, पाप और अंधकार मिटने लगता है।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, कालनेमि अभियान की चर्चा क्यों हुई, भैया सिद्धार्थ सिंह जी, भैया पुनीत जी, भैया पवन जी, भैया डा अवधेश जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

2.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६८ वां* सार -संक्षेप

 साधना सिद्धि के लिए जहाँ पर होती है 

विपदा अनगिन रूपों में विघ्न संजोती है 

संयम के पाँव स्वभाव छोड़कर हिलते हैं

नियमों के आगे वैकल्पिक पथ खुलते हैं 

साधना कुलाचारों में भटकी फिरती है 

सिद्धियाँ सुखों सुविधाओं से आ घिरती हैं

इसलिए साधको सिद्धिमुक्त साधना भजो 

कर्तव्य करो फल का व्यामोह विचार तजो l


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 2 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५०

हम साधक समाजसेवा की साधना में रत रहें ताकि हर व्यक्ति  सुशिक्षित रहे स्वस्थ रहे स्वावलम्बी बने और सुरक्षित रहे किन्तु ध्यातव्य है कि फल और सिद्धि के मोह का त्याग कर निष्काम भाव से साधना करना ही साधक का धर्म है l


हनुमान जी सिद्धि-मुक्त साधना के सर्वोत्तम आदर्श हैं। उनके पास असीम बल, ज्ञान, पराक्रम और अनेक सिद्धियाँ थीं, फिर भी उन्होंने कभी सिद्धियों या फल की कामना नहीं की। उनका एकमात्र लक्ष्य था— प्रभु श्रीराम की सेवा और आज्ञापालन।

"राम काज कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम।"

सुन्दरकाण्ड में हनुमान जी का चरित्र सिद्धि-मुक्त साधना का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।

आइये प्रवेश करें इसी सुन्दर कांड में 

विभीषण दरबार से अपमानित हो चुके हैं 


रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।

मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥41॥

विभीषण रावण से कहते हैं—“श्रीराम सर्वसमर्थ हैं और उनका संकल्प कभी निष्फल नहीं होता। तुम्हारी सभा विनाश के प्रभाव में आकर सत्य और हितकारी बात को स्वीकार नहीं कर रही है। इसलिए अब मैं श्रीरघुवीर की शरण में जाता हूँ; इसके लिए मुझे दोष मत देना।”

विभीषण के ऐसा कहकर सभा से चले जाते ही रावण और उसकी सभा के लोगों की आयु तथा सौभाग्य क्षीण हो गया, अर्थात् उनका विनाश निश्चित हो गया। हे भवानी! सज्जन पुरुषों का अपमान या उनकी अवज्ञा तत्काल ही समस्त कल्याण का नाश कर देती है और अनेक प्रकार की हानियों का कारण बनती है।


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,ब्रह्मानन्द सहोदर किसे कहते हैं, भैया डा पङ्कज श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों हुआ,कौन सी विचारधाराएं  हमें अशक्त बनाती हैं जानने के लिए सुनें l

1.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६७ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २४९

आत्मविधान का दर्शन करते हुए जीवन में चलें 

जब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप, अपने कर्तव्य, अपने मूल्यों और जीवन के परम लक्ष्य को समझकर चलता है, तभी उसका जीवन सार्थक, संतुलित और प्रकाशमय बनता है।



जिस व्यक्ति के जीवन में श्रेष्ठ संस्कार प्रवेश कर जाते हैं, उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व रूपान्तरित हो जाता है। भक्ति के संस्कार, सद्विचारों के संस्कार, उत्तम व्यवहार के संस्कार तथा सत्त्व, रजस् और तमस् जैसी प्रवृत्तियों को संतुलित करने वाले संस्कार मनुष्य को महानता की ओर ले जाते हैं मनुष्य की महानता उसके पद, धन या बाह्य वैभव से नहीं, अपितु उसके संस्कारों की उत्कृष्टता से मापी जाती है। जिस व्यक्ति में जितने उच्च और पवित्र संस्कार होते हैं, वह उतना ही महान् होता है।

संस्कार विचारों का आधार होते हैं, चरित्र की नींव होते हैं और व्यवहार की शोभा होते हैं। संस्कार ही विचारों को दिशा देते हैं, भावनाओं को परिष्कृत करते हैं तथा आचरण को मर्यादित और आदर्श बनाते हैं।


अतः संस्कार मानव जीवन की वह अमूल्य निधि है, जो साधारण व्यक्ति को असाधारण बना सकती है और मनुष्य को मनुष्यता की सर्वोच्च ऊँचाइयों तक पहुँचा सकती है

किसी राष्ट्र की वास्तविक संस्कृति उसके साधारण नागरिकों के दैनिक आचरण में प्रतिबिम्बित होती है।

संस्कृति केवल ग्रन्थों, भवनों, कला-कृतियों या उत्सवों का नाम नहीं है। किसी समाज के सामान्य व्यक्ति का दैनिक व्यवहार, बोलचाल, शिष्टाचार, पारिवारिक सम्बन्ध, अतिथि-सत्कार, बड़ों के प्रति सम्मान, प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण तथा नैतिक आचरण—ये सभी मिलकर उसकी संस्कृति को प्रकट करते हैं।


श्रीरामचरितमानस संस्कारों का अक्षय भण्डार है। यह मनुष्य को भक्ति, विनय, मर्यादा, सेवा, त्याग, कर्तव्य और सदाचार का पाठ पढ़ाता है।


पठए बालि होहिं मन मैला।

भागौं तुरत तजौं यह सैला॥

बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ।

माथ नाइ पूछत अस भयऊ॥


सुग्रीव ने सोचा—

"यदि ये मन के कपटी और दुष्ट बालि द्वारा भेजे गए हों, तो मैं तुरन्त इस पर्वत को छोड़कर भाग जाऊँ।"

सुग्रीव की यह बात सुनकर हनुमान जी ब्राह्मण का रूप धारण करके उन दोनों राजकुमारों के पास गए और मस्तक झुकाकर विनम्रतापूर्वक पूछने लगे।

हे वीर! साँवले और गोरे शरीर वाले आप कौन हैं, जो क्षत्रिय के रूप में वन में फिर रहे हैं? हे स्वामी! कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलने वाले आप किस कारण वन में विचर रहे हैं?॥ आदि 

 इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने आज सुन्दर कांड के उस प्रसंग का उल्लेख किया  जब विभीषण, जिसमें संस्कार प्रविष्ट हैं,रावण को समझा रहे हैं 

बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।

परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥39क॥

हे दशानन! मैं बार-बार आपके चरणों में पड़कर विनती करता हूँ कि आप अपने अभिमान, मोह और घमण्ड का त्याग कर दें और अयोध्यापति श्रीराम का आश्रय ग्रहण करें।

किन्तु रावण को समझ में नहीं आता l

इसके अतिरिक्त देशदर्शन में उदयपुर की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की,परान्तर कोविद कौन हैं,हम सम्मान के पात्र कैसे हो सकते हैं,इंदौर की महान् महारानी अहिल्याबाई होल्कर का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l