13.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७९ वां* सार -संक्षेप

 प्रथा परंपरा जहाँ भी रूढ़ि हो गई, 

कथा तरह-तरह की व्यर्थ अर्थ कर गयी,

प्रथा के साथ पूर्वजों का शौर्य बोध हो, 

उसी के साथ पीढ़ियों का ज्ञान-शोध हो ।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६१


हमें जब भौतिक लाभ और आत्मिक हित में से किसी एक का चयन करना पड़े, तब हमें आत्मिक हित को प्राथमिकता देनी चाहिए। धन, पद, प्रतिष्ठा, राज्य, परिवार अथवा समस्त सांसारिक वैभव नश्वर हैं, किन्तु आत्मा का कल्याण और धर्म का पालन शाश्वत मूल्य हैं।

चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति अद्भुत है l 




गोस्वामी तुलसीदास जी भारतीय साहित्य में एक नेतृत्वकारी साहित्यावतार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने ऐसे अध्यात्म का प्रतिपादन किया, जो शौर्य, विक्रम, पौरुष तथा पराक्रम से अलंकृत होकर व्यक्ति और समाज को धर्म तथा कर्तव्य के मार्ग पर अग्रसर करे।

तुलसीदास जी ने भगवान राम के चरित्र में आदर्श मानव जीवन के समस्त गुणों का दर्शन किया। 

कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥

कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥5॥

उन्हें भगवान राम में सत्य, धर्म, करुणा, मर्यादा, शौर्य, नीति, नेतृत्व, लोकमंगल, भक्तवत्सलता तथा परम आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत समन्वय दिखाई दिया। इसी कारण उनके लिए वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मार्गदर्शन देने वाले पूर्ण आदर्श थे। नर लीला कर रहे भगवान राम के गुणों में उन्होंने धर्म, समाज, राष्ट्र और आत्मकल्याण—सभी का समग्र दर्शन कर लिया था। इस कलियुग के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना इसलिए की कि भगवान राम के आदर्श चरित्र, वैदिक-सनातन धर्म के सिद्धान्तों तथा भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और लोकमंगल के संदेश को जनसामान्य तक सरल भाषा में पहुँचाया जा सके। उस भ्रमित राष्ट्रभक्त समाज के भ्रम और भय को दूर किया जा सके उसे संगठन की महत्ता समझाई जा सके l


आजकल इसी कल्याणकारी ग्रंथ के सुन्दर कांड में हम लोग प्रविष्ट हैं l प्रसंग है कि जब भगवान राम की वानर-सेना समुद्र तट पर पहुँची और लंका जाने के लिए समुद्र पार करना आवश्यक हुआ, तब भगवान 

अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला॥

आनन अनल अंबुपति जीहा। उतपति पालन प्रलय समीहा॥


ने मर्यादा का पालन करते हुए समुद्रदेव से मार्ग देने की प्रार्थना की। उन्होंने कुश बिछाकर तीन दिनों तक समुद्र की उपासना की, किन्तु समुद्र ने कोई उत्तर नहीं दिया l


बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।

बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥57॥

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, कामना वासना में क्या अन्तर है, दुर्गुण क्यों आवश्यक हैं, आचार्य जी आज कहां जा रहे हैं जानने के लिए सुनें l