12.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७८ वां* सार -संक्षेप

 वैभव चुंबक और काठ का टुकड़ा एक अभाव 

दोनों का अपने ऊपर पड़ता है बहुत प्रभाव 

काठ हानि लाभों से बाहर पूर्ण विरक्त प्रशान्त 

पर चुंबक आकर्ष -विकर्षों बीच सतत उद्भ्रान्त l


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 12 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २६०

हमारे सनातन धर्म में मनुष्य को इकाई नहीं परिवार को इकाई मानते हैं 

अपने परिवार को आदर्श परिवार बनाएं यदि द्वेष का अंकुर उभरे भी तो उसे शांत करने का प्रयास करें 



जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी जल से लिप्त नहीं होता, वैसे ही एक आदर्श गृहस्थ के रूप में हम अपने परिवार, व्यवसाय, समाज और राष्ट्र के विविध दायित्वों का निर्वाह करें किन्तु व्यक्तिगत लाभ, यश या स्वार्थ की आसक्ति से स्वयं को मुक्त रखें l हम जीवन केवल अपने सुख-साधन तक सीमित न रखें बल्कि राष्ट्र को परम वैभव पर पहुँचाने और समाज की सेवा करने के महान लक्ष्य के लिए समर्पित करें । हम कर्म करें , परन्तु पद, प्रतिष्ठा या पुरस्कार की अपेक्षा न करें सफलता मिलने पर अहंकार न करें और बाधाएँ आने पर निराश न हों l कर्तव्य, समर्पण और निष्काम भाव से किया गया प्रत्येक कार्य 'योगः कर्मसु कौशलम्' का साक्षात् उदाहरण बन जाता है।

एक किसान खेत में पूरी लगन से खेती करता है। वह भूमि जोतता है, बीज बोता है, सिंचाई करता है। परन्तु वर्षा उसके वश में नहीं है।


यदि वह हर समय केवल उपज की चिंता करता रहे, तो दुःखी रहेगा। यदि वह अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से करे और परिणाम को ईश्वर पर छोड़े, तो उसका मन शांत रहेगा।


यही बुद्धियुक्त कर्म है।


भगवान् श्रीराम राजमहलों, परिवार, राज्य और समाज के मध्य रहते हुए भी व्यक्तिगत स्वार्थ, मोह और अहंकार से सर्वथा मुक्त रहे। उनके प्रत्येक कर्म का आधार केवल धर्म, लोकमंगल और राष्ट्रकल्याण था।


सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी॥

तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका॥4॥


जब  भगवान श्रीराम वनवास का समाचार सुनाकर माता से अनुमति लेने आते हैं, तब  मां कौसल्या का हृदय पुत्र-वियोग से व्याकुल हो उठता है। फिर भी वे अपने व्यक्तिगत दुःख को धर्म के सामने नहीं रखतीं। वे समझती हैं कि पुत्र का सर्वोच्च कर्तव्य माता-पिता की आज्ञा का पालन करना है।


इसलिए वे श्रीराम के निर्णय की प्रशंसा करते हुए कहती हैं कि पिता की आज्ञा मानना केवल एक कर्तव्य नहीं, बल्कि समस्त धर्मों का सार है।


आज आचार्य जी ने सुन्दर कांड में क्या बताया,सरोज सरस्वती शिशु मन्दिर विद्या मन्दिर शुक्लागंज का उल्लेख क्यों हुआ,भक्ति के सोपान क्या हैं, भैया मोहन जी,भैया यतीन्द्र जी, भैया वीरेन्द्र जी और भैया मनीष जी की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें