3.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७६९ वां* सार -संक्षेप

 सुसमर्थ सनातन धर्म जगत का जीवन है, 

वैश्विक कल्याण इसी का मंगल चिंतन है, 

इसके विपरीत सभी मत जीवन-शैली हैं, 

ये सब परजीवी अमरबेलि सी फैली हैं। 

हम सभी सनातनधर्मी हिन्दू जाग्रत हों, 

पहचानें, अपने तत्वबोध से अवगत हों, 

बल बुद्धि पराक्रम वाली शिवसाधना करें,

भारतमाता की सच्ची आराधना करें ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७६९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५१

हम मनुष्य हैं अतः मनुष्यत्व की अनुभूति करें 

श्रीरामचरितमानस का अवगाहन करें जो केवल एक ग्रन्थ नहीं, अपितु जीवन का प्रकाशस्तम्भ है। इसका प्रत्येक प्रसंग मनुष्य को कर्तव्यबोध, आत्मविश्वास, धैर्य, भक्ति और लोकमंगल की प्रेरणा देकर उसे भीतर से शक्तिसंपन्न बनाता है।




संसार में संकटों का अभाव कभी नहीं रहा और न कभी रहेगा। चुनौतियों, संघर्षों तथा विपरीत परिस्थितियों के मध्य भी हमें प्रसन्नचित्त रहना, संयम बनाए रखना, निरन्तर स्वाध्याय करना तथा अपनी सामर्थ्य का विकास करना है ।आज आवश्यकता इस बात की है कि  भारत देश के राष्ट्रनिष्ठ हिन्दू समाज को आश्वस्त किया जाए कि चारों ओर केवल अन्धकार ही नहीं है। आशा, साहस और संकल्प की ज्योति आज भी प्रज्वलित है। उन्हें यह अनुभव कराना होगा कि भय, भ्रम और निराशा के वशीभूत होने की आवश्यकता नहीं है।

जब हम जैसे जागरूक और कर्तव्यनिष्ठ लोग दृढ़ता के साथ खड़े होते हैं, तब संकटों का अन्धकार स्वयं छँटने लगता है। अतः हमें आत्मबल, संगठन, सेवा, स्वाध्याय और पराक्रम की विधि व्यवस्थाओं के आधार पर समाज में विश्वास का वातावरण निर्मित करना है , जिससे प्रत्येक व्यक्ति यह अनुभव कर सके कि वह अकेला नहीं है; उसके साथ एक जाग्रत, संवेदनशील और उत्तरदायी समाज खड़ा है।

दूसरों के कार्यों का अनुकरण करने के स्थान पर अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करना ही श्रेयस्कर है l और हमारा कर्तव्य है राष्ट्रनिष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष l

सुन्दरकाण्ड का सार भी यही है कि संकटों के बीच हम स्वयं दीपक बनें और निराश समाज को यह विश्वास दिलाएं कि अन्धकार कितना भी घना हो, हनुमान जी जैसा साहस, भगवान राम जैसा आदर्श और धर्म जैसा प्रकाश आज भी हमारे साथ है।

विभीषण भगवान राम की शरण में आ चुके हैं 

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥1॥



भगवान श्रीराम कहते हैं— यदि किसी व्यक्ति पर करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या जैसे महापाप भी लगे हों, तब भी यदि वह मेरी शरण में आ जाए तो मैं उसका त्याग नहीं करता। जब कोई जीव सच्चे हृदय से मेरी ओर उन्मुख होकर मेरे सम्मुख आता है, उसी क्षण उसके करोड़ों जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं।

सनमुख होइ' का अर्थ केवल शारीरिक रूप से भगवान के सामने आना नहीं है, बल्कि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को भगवान की ओर मोड़ देना है। रामाश्रित हो जाना अद्भुत है l जैसे ही जीव ईश्वराभिमुख होता है, वैसे ही उसके भीतर का अज्ञान, पाप और अंधकार मिटने लगता है।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, कालनेमि अभियान की चर्चा क्यों हुई, भैया सिद्धार्थ सिंह जी, भैया पुनीत जी, भैया पवन जी, भैया डा अवधेश जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l