साधना सिद्धि के लिए जहाँ पर होती है
विपदा अनगिन रूपों में विघ्न संजोती है
संयम के पाँव स्वभाव छोड़कर हिलते हैं
नियमों के आगे वैकल्पिक पथ खुलते हैं
साधना कुलाचारों में भटकी फिरती है
सिद्धियाँ सुखों सुविधाओं से आ घिरती हैं
इसलिए साधको सिद्धिमुक्त साधना भजो
कर्तव्य करो फल का व्यामोह विचार तजो l
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७६८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५०
हम साधक समाजसेवा की साधना में रत रहें ताकि हर व्यक्ति सुशिक्षित रहे स्वस्थ रहे स्वावलम्बी बने और सुरक्षित रहे किन्तु ध्यातव्य है कि फल और सिद्धि के मोह का त्याग कर निष्काम भाव से साधना करना ही साधक का धर्म है l
हनुमान जी सिद्धि-मुक्त साधना के सर्वोत्तम आदर्श हैं। उनके पास असीम बल, ज्ञान, पराक्रम और अनेक सिद्धियाँ थीं, फिर भी उन्होंने कभी सिद्धियों या फल की कामना नहीं की। उनका एकमात्र लक्ष्य था— प्रभु श्रीराम की सेवा और आज्ञापालन।
"राम काज कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम।"
सुन्दरकाण्ड में हनुमान जी का चरित्र सिद्धि-मुक्त साधना का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
आइये प्रवेश करें इसी सुन्दर कांड में
विभीषण दरबार से अपमानित हो चुके हैं
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥41॥
विभीषण रावण से कहते हैं—“श्रीराम सर्वसमर्थ हैं और उनका संकल्प कभी निष्फल नहीं होता। तुम्हारी सभा विनाश के प्रभाव में आकर सत्य और हितकारी बात को स्वीकार नहीं कर रही है। इसलिए अब मैं श्रीरघुवीर की शरण में जाता हूँ; इसके लिए मुझे दोष मत देना।”
विभीषण के ऐसा कहकर सभा से चले जाते ही रावण और उसकी सभा के लोगों की आयु तथा सौभाग्य क्षीण हो गया, अर्थात् उनका विनाश निश्चित हो गया। हे भवानी! सज्जन पुरुषों का अपमान या उनकी अवज्ञा तत्काल ही समस्त कल्याण का नाश कर देती है और अनेक प्रकार की हानियों का कारण बनती है।
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,ब्रह्मानन्द सहोदर किसे कहते हैं, भैया डा पङ्कज श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों हुआ,कौन सी विचारधाराएं हमें अशक्त बनाती हैं जानने के लिए सुनें l