4.6.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७७० वां* सार

 अस कहि चला बिभीषनु जबहीं।

आयुहीन भए सब तबहीं॥

साधु अवग्या तुरत भवानी।

कर कल्यान अखिल कै हानी॥



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज ज्येष्ठ (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास)कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 जून 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७७० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २५२

चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की  अनुभूति कर अनन्त आनन्द के साथ अपने राष्ट्र के अनन्त आनन्द को वृद्धिंगत  करें 



मनुष्य की वाञ्छाएँ प्रायः कभी पूर्ण नहीं होतीं। एक इच्छा की पूर्ति होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है, इसलिए वह प्रायः अतृप्त ही बना रहता है। किन्तु यदि किसी महापुरुष, संत या सज्जन की सन्निधि से मन को शान्ति, आनन्द और संतोष की अनुभूति होने लगे, तो उसे ईश्वर की विशेष कृपा समझना चाहिए। क्योंकि संसार की वस्तुएँ तृष्णा बढ़ाती हैं, जबकि सत्संग मन को तृप्ति और परम शान्ति प्रदान करता है। यह सदाचार वेला सत्संग का ही एक प्रकार है l अभावों के मध्य इस संगति का प्रभाव अद्भुत है l


जिस प्रकार हिमालय बाह्य रूप से हिममय होते हुए भी भीतर अग्निमय शक्ति का स्रोत है, उसी प्रकार सत्संग से प्राप्त शान्ति भी निष्क्रियता नहीं, बल्कि संयमित शक्ति, जाग्रत चेतना और धर्मनिष्ठ जीवन का आधार है। 

अटल बिहारी वाजपेयी जी हिमालय को इसी दृष्टि से देखते हुए कहते हैं 


कौन कह रहा उसे हिमालय?

वह तो हिमावृत्त ज्वालागिरि,

अणु-अणु, कण-कण, गह्वर-कन्दर,

गुंजित ध्वनित कर रहा अब तक

डिम-डिम डमरू का भैरव स्वर ।

गौरीशंकर के गिरि गह्वर

शैल-शिखर, निर्झर, वन-उपवन,

तरु तृण दीपित ।


शंकर के तीसरे नयन की-

प्रलय-वह्नि से जगमग ज्योतित।

जिसको छू कर,

क्षण भर ही में

काम रह गया था मुट्ठी भर ।


हिमालय भारतीय संस्कृति के तप, त्याग, शौर्य, पराक्रम और आत्मबल का विराट् प्रतीक है। उसके शिखर हमें निर्भीक बनने, अन्याय के सामने अडिग खड़े रहने, अपनी दुर्बलताओं पर विजय पाने तथा राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए सदैव सजग रहने की प्रेरणा देते हैं। उदाहरणार्थ इस समय कालनेमियों से सजग रहने की अत्यन्त आवश्यकता है l हिमालय का मौन स्वर मानो यह संदेश देता है कि जीवन में शीतलता और करुणा के साथ-साथ आवश्यकता होने पर शिव के समान तेज, साहस और संहारक शक्ति भी धारण करनी चाहिए। राष्ट्र की अद्भुत निधि तुलसीदास जी ने भी यही संदेश दिया l उन्हीं के रचित ग्रंथ में आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं l सुन्दरकांड का प्रसंग चल रहा है l 

भक्त विभीषण कहते हैं 


तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥46॥


मनुष्य को वास्तविक शान्ति, संतोष और कल्याण संसार की वस्तुओं या इच्छाओं की पूर्ति से नहीं, बल्कि कामनाओं का त्याग कर भगवान के भजन और सत्संग से प्राप्त होता है। रामभक्ति ही मन को शोक, चिन्ता और अशान्ति से मुक्त करती है l 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,

हनुमान जी के विग्रह में आयी किस विरूपता की आचार्य जी ने चर्चा की, श्रद्धेय बचनेश जी ने कौन सा प्रसंग बताया था, भैया पुनीत जी आज कहां जा रहे हैं जानने के लिए सुनें l