16.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया /तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 16 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८१२ वां* सार -संक्षेप

 मैं संस्कृति के सामगान का चारण हूँ

क्रांतिमन्त्र का भावभरा उच्चारण हूँ।

महिमा-मण्डित सदाचारण की भाषा हूं 

तप का विग्रह संयम की परिभाषा हूँ॥ १॥


     मैं संस्कृति के...


राष्ट्र-यज्ञ का निष्ठापूर्ण समर्पण हूँ,

बलिदानी सुधियों का नियमित तर्पण हूँ।

एकमेव कर्मठता का विश्वासी हूँ,

मन-मन्दिर में रमा क्षेत्र-संन्यासी हूँ॥ २॥

     मैं संस्कृति के....

(साकल्य पृ ८७, ८८)


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया /तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 16 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८१२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९४

इन सदाचार-वेलाओं को ध्यानपूर्वक सुनें, भली-भाँति समझें, हृदय से स्वीकार करें कि हमारा सनातन धर्म अद्भुत है तत्पश्चात् उसके सिद्धान्तों को अपने जीवन में आचरण के रूप में उतारें। अपने लक्ष्य सदैव ध्यान में रखें हमारे लक्ष्य हैं 

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः

 

राष्ट्र -निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष 


परं वैभवं नेतुमेतत्स्वराष्ट्रं

समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥


तभी इन वेलाओं का श्रवण सार्थक होगा।


इन सदाचार वेलाओं के माध्यम से आचार्य जी नित्य हम साधकों को उत्साहित करते हैं वे हमें सचेत करते हैं कि हम संसार की हाय-हाय, आपाधापी और प्रपञ्चों में ही न उलझे रहें। कुछ समय आत्मचिन्तन के लिए निकालें और अनुभूति करें कि हम वास्तव में कौन हैं। हमारा वास्तविक स्वरूप शरीर या मन नहीं, अपितु शुद्ध आनन्दस्वरूप आत्मा है। इसी सत्य का उद्घोष  करते हुए भगवान आदि शंकराचार्य कहते हैं

अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो

विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।

सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः

चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥ ६॥


आजकल हम सब श्रीरामचरितमानस की पावन कथा में प्रविष्ट हैं। परमात्मा श्रीराम लोकमंगल के लिए नररूप धारण कर अपनी दिव्य लीलाओं का प्रदर्शन करने आए। मानस का श्रवण तभी सार्थक है, जब भगवान् श्रीराम के रामत्व का कुछ अंश भी हम अपने जीवन में उतार लें । यदि उनके सत्य, मर्यादा, करुणा, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग, सेवा, शौर्य, पराक्रम,धर्मपालन जैसे दिव्य गुणों को हम अपने आचरण में धारण कर लें, तभी कथा-श्रवण का वास्तविक फल प्राप्त होगा।

आइये कथा में पहुंच जाएं 

बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेजपुंज लछिमन उर लागी॥

मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥4॥

मेघनाद ने वीरघातिनी शक्ति चलाई। वह तेजपूर्ण शक्ति लक्ष्मणजी की छाती में लगी। शक्ति लगने से उन्हें मूर्च्छा आ गई। तब मेघनाद भय छोड़कर उनके पास चला गया॥4॥

भोग और त्याग का संघर्ष चल रहा है l ऐसा लग रहा है कि भोग विजयी हो गया किन्तु 


*यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई॥*

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,सुषेण योद्धा कौन था जानने के लिए सुनें

15.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८११ वां* सार

 मैं कवि हूँ अपनी कविता का संदेश सुनाता हूँ।

हैं जहाँ कहीं भी शोले उनकी राख हटाता हूँ॥

बलिदान सपूतों के सपनों में जब भी आते हैं 

हँसते दिल के अंगारे पर आँसू बढ़ जाते हैं..


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 15 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८११ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९३


राष्ट्रभक्त जनमानस में धर्म, सत्य, राष्ट्रभक्ति और जागरण की चेतना उत्पन्न करनाअनिवार्य है उसे शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति कराना नितान्त आवश्यक है



हम सौभाग्यशाली हैं कि दीर्घकाल से निरन्तर चल रही इन सदाचार वेलाओं में अनेक सांसारिक प्रपंचों में फँसे होने पर भी समय निकालकर आचार्यजी वेद, उपनिषद्,पुराण,

श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्भगवद्गीता तथा अन्य आर्ष ग्रन्थों का संदर्भ देकर  सदाचार, संस्कार, आत्मविकास, चरित्र-निर्माण, भारतीय संस्कृति, गुरुकुल परम्परा, परिवार, समाज एवं राष्ट्रधर्म का सरल, प्रेरक और व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं। हमें इनका लाभ उठाना चाहिए l वे भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण तथा महापुरुषों के जीवन-प्रसंगों के माध्यम से सत्य, शुचिता, संयम, अनुशासन, सेवा,शौर्य, पराक्रम,कर्तव्यपरायणता और धर्मनिष्ठ जीवन का संदेश देते हुए सनातन धर्म,भारतीय संस्कृति तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा के संरक्षण और संवर्धन के लिए निरन्तर प्रेरित कर रहे हैं। उनका मूल संदेश है कि सदाचार ही श्रेष्ठ चरित्र का आधार है और श्रेष्ठ चरित्र ही व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र की वास्तविक शक्ति है।


आचार्य जी कहते हैं कविता मनोरञ्जन का साधन नहीं है l कवयः क्रान्तदर्शिनः अर्थात् कवि भूत और भविष्य को जानते हैं l  हमारी महान् आर्ष काव्य-परम्परा के अन्तर्गत वैदिक ऋषि काव्य-रचनाकार ही नहीं थे,वे युगद्रष्टा, धर्मद्रष्टा और समाज के पथप्रदर्शक थे।


आचार्य जी अन्याय और षड्यन्त्र करने वालों के लिए एक बुरे स्वप्न के समान हैं l

आचार्य जी उन लोगों की आलोचना करते हैं जो स्वार्थवश अपने सिद्धान्तों और राष्ट्रहित को छोड़कर थोड़े-से लाभ के लिए बिक जाते हैं  आचार्य जी उनकी भी आलोचना करते हैं जो स्वयं वैभव और भोग-विलास में डूबे रहते हैं, किन्तु दूसरों को कर्म और त्याग का उपदेश देते हैं l आप कहते हैं कि राष्ट्र और समाज में व्याप्त अन्याय, विश्वासघात, स्वार्थ और पाखण्ड के विरुद्ध निर्भीक स्वर उठाना आवश्यक है तथा राष्ट्रभक्त जनमानस में धर्म, सत्य, राष्ट्रभक्ति और जागरण की चेतना उत्पन्न करना भी अनिवार्य है उसे शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति कराना नितान्त आवश्यक है


गोस्वामी तुलसीदास जी ने यही किया उन्हें समाज -जागरण के लिए परमात्मा द्वारा दिया गया अद्भुत कवित्व प्राप्त था

मानस में एक प्रसंग है 


बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेजपुंज लछिमन उर लागी॥

मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥4॥


मेघनाद ने वीरों का संहार करने वाली दिव्य वीरघातिनी शक्ति छोड़ी। वह अग्नि के समान तेजस्वी शक्ति लक्ष्मणजी की छाती में आ लगी। उसके प्रहार से लक्ष्मणजी मूर्छित हो गए। तब मेघनाद, यह जानकर कि लक्ष्मण अब अचेत हो गए हैं, अपना भय छोड़कर उनके निकट आ गया।

यह प्रसंग अन्य किसी रामकथा में नहीं मिलता कदाचित् इसका कारण था कि 

 विधर्मी अकबर के शासनकाल में उत्तराधिकार के संघर्षों में सत्ता के लिए भाइयों के बीच रक्तपात और आपसी वैमनस्य के उदाहरण देखने को मिलते थे। ऐसी परिस्थितियों का समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका थी। इसी संदर्भ में गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान् श्रीराम और लक्ष्मण जी के आदर्श भ्रातृ-प्रेम, त्याग, निष्ठा और परस्पर समर्पण का चित्रण करके समाज के समक्ष एक उच्च आदर्श प्रस्तुत करने का प्रयास किया लक्ष्मण जी के शक्ति लगने पर श्रीराम का विलाप और लक्ष्मण जी की राम जी के प्रति अनन्य सेवा यह संदेश देती है कि भाई-भाई का संबंध स्वार्थ या सत्ता का नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग और धर्म का होना चाहिए।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कवि श्री हरि ओम पवार जी का नाम क्यों लिया facebook पर आचार्य जी ने क्या देखा जानने के लिए सुनें

14.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 14 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८१० वां* सार -संक्षेप

 मर्यादित व्यवहार, आत्मीयता से परिपूर्ण सम्बन्ध और प्रेममय बन्धन ही जीवन को सार्थक बनाते हैं...

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 14 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८१० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९२


यह अविश्वास का अंधकार है आत्मदीप हो जाओ,

युगचारण जागो कसो कमर फिर से भैरवी सुनाओ l

हमें किसी भी परिस्थिति में निराश, उदास, भ्रमित, भयभीत और अविश्वासी नहीं होना चाहिए क्योंकि हम सनातनधर्मी हैं l 


आचार्य श्री सन् १९७१ से सदाचारमय विचारों का सतत् प्रसार कर रहे हैं और विगत लगभग दस वर्षों से उनके ये प्रेरणादायी विचार वायवीय माध्यम के द्वारा नियमित रूप से हम सबके समक्ष पहुँच रहे हैं यह हमारा सौभाग्य है l 

हमारी सनातन परम्परा अनादिकाल से अविच्छिन्न रूप में प्रवाहित होती चली आ रही है।  यह परम्परा केवल किसी एक युग या कालखंड तक सीमित नहीं, बल्कि कल्प-कल्पान्तरों से निरन्तर प्रवहमान है।

महर्षियों ने अपने तप, साधना और प्रत्यक्ष अनुभूति से प्राप्त ज्ञान को केवल ग्रन्थों में ही सुरक्षित नहीं रखा, बल्कि योग्य शिष्यों को प्रदान कर उसे जीवन्त बनाए रखा।जब हम सनातनत्व पर विचार करते हैं, तब हमें स्वयं को भी इसी महान् परम्परा का एक जीवंत अंग मानना चाहिए। यह भाव जाग्रत होना चाहिए कि हम गायत्री के उपासक केवल दर्शक नहीं, अपितु उस अनादि, अखण्ड और दिव्य परम्परा के वाहक एवं संवाहक हैं। हमें अंधकार से भयभीत नहीं होना चाहिए l हम कहते हैं *वयं अमृतस्य पुत्राः* l हमारा प्रत्येक विचार, आचरण और जीवन उसी सनातन धारा के अनुरूप होना चाहिए। 


*उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्त होने तक रुको मत*


उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।।

(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र १४)

यह संदेश भगवान् श्रीराम के जीवन में पूर्णतः साकार होता है। उन्होंने कभी विपत्ति से पलायन नहीं किया। वनवास हो, राक्षसों का अत्याचार हो या रावण से धर्मयुद्ध उन्होंने सदैव जागरूक होकर धर्म के मार्ग पर अटल रहते हुए कर्तव्य का पालन किया। उनका जीवन हमें प्रेरणा देता है कि हम भी उठें, जागें और धर्म, सत्य तथा राष्ट्र के आदर्शों की प्राप्ति तक निरन्तर  पुरुषार्थ करते रहें l आइये युद्धक्षेत्र में पहुंच जाएं l 


एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया॥

कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके॥4॥


तब प्रभु श्री रामजी ने एक ही बाण से सारी माया काट डाली, जैसे सूरज अंधकार के समूह को हर लेता है। तदनन्तर उन्होंने कृपाभरी दृष्टि से वानर-भालुओं की ओर देखा और इस प्रकार वे ऐसे प्रबल हो गए कि युद्ध में रोकने पर भी नहीं रुक रहे थे l

घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमति किंसुक के तरु जैसे॥

लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा॥1॥

घायल वीर उसी तरह शोभित हैं, जैसे फूले हुए पलास के पेड़। लक्ष्मण और मेघनाद दोनों योद्धा अत्यंत क्रोध करके एक-दूसरे से भिड़ते हैं

एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती॥

क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता॥2॥

 एक-दूसरे को (कोई किसी को) जीत नहीं सकता। राक्षस छल-बल और अनीति करता है, तब भगवान्‌ अनन्त जी अर्थात् लक्ष्मण जी क्रोधित हुए और उन्होंने तुरंत उसके रथ को तोड़ डाला और सारथी को टुकड़े-टुकड़े कर दिया l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने मेघनाद, सुलोचना,पतिव्रता उर्मिला के विषय में क्या बताया,एक दिन  किसने भूसा खा लिया जानने के लिए सुनें l

13.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०९ वां* सार -संक्षेप

 ध्रुव जहाँ अनोखा तपकर्ता, प्रह्लाद भक्ति की सीमा है।

अभिमन्यु शौर्य का तेजपुञ्ज जिसके आगे रवि धीमा है।

जोरावर, फतह, अजीत सिंह विक्रम, जुझारू का अलबेला।

केसरी-सुवन सा बाल शौर्य भारत के कण-कण पर खेला।

विक्रम की अक्षय कोष तपस्या की धरती सविशेष॥५॥

पावन मेरा देश ..........


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९१

भारत की संस्कृति अद्भुत है यदि हमारा रुझान अपनी संस्कृति, सभ्यता और सनातन मूल्यों के प्रति दृढ़ बना रहेगा, तो कोई भी वैचारिक आक्रमण हमें दुर्बल नहीं कर सकेगा।




 वर्तमान समय में वैचारिक संघर्ष का प्रबल तूफ़ान चल रहा है। ऐसे समय में अपनी संस्कृति, परम्पराओं और जीवन-मूल्यों के प्रति जागरूकता तथा निष्ठा ही हमें स्थिर, सशक्त और आत्मविश्वासी बनाए रख सकती है।

हम सब अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं कि हमारा जन्म भारत जैसी पुण्यभूमि में हुआ है। यह वही भूमि है जहाँ वेदों का प्रकाश हुआ, ऋषियों ने तप किया और अनगिनत महापुरुषों ने मानवता को धर्म, ज्ञान और सदाचार का मार्ग दिखाया।

और हम तो विशेष रूप से धन्य हैं कि हमारा जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ । यही वह पावन भूमि है जहाँ भगवान श्रीराम का जन्म अयोध्या में हुआ और जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बाल एवं किशोर लीलाओं से इस धरती को पवित्र किया।


अपनी दुर्बलता के कारण किसी विधर्मी या विदेशी शक्ति का हमारे ऊपर शासन करना  हमें  कभी स्वीकार्य नहीं रहा । इतिहास साक्षी है कि महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज,श्री गुरु गोविन्द सिंह आदि ने अन्याय, पराधीनता और धार्मिक-राजनीतिक दमन को कभी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने शौर्य ,पराक्रम,स्वाभिमान, संगठन और धर्मनिष्ठा के बल पर स्वतंत्रता तथा सम्मान की रक्षा के लिए आजीवन संघर्ष किया। यही देशाचार है   और यह सदाचार का एक भाग है सदाचार के अन्य भाग हैं जात्याचार और कुलाचार l मनु महाराज के अनुसार सदाचार धर्म के चार लक्षणों में  से एक है 


श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्।।

सदाचार को विस्तार से समझने के लिए हम कालिका पुराण अध्याय ८६,

वामन पुराण अध्याय १४,

पद्म पुराण स्वर्ग खंड,

मार्कण्डेय पुराण आदि का आश्रय ले सकते हैं


गोस्वामी तुलसीदास ने उस काल में श्रीरामचरितमानस की रचना की जब भारत पर विधर्मी का शासन था।

सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा॥

कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा॥3॥

मेघनाद कहता है 

मेरे पराक्रम का प्रदर्शन कल प्रातः देख लेना। बहुत क्या कहूँ, कल युद्ध में सब स्पष्ट हो जाएगा l 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया भगवान राम और रावण के स्वार्थ में क्या अन्तर है,वीररस का आदिमहाकाव्य कौन सा है जानने के लिए सुनें l

12.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०८ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 12 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९०

लोकाभ्युदय और राष्ट्राभ्युदय हेतु हमारे छोटे छोटे प्रयास एक विराट् शक्ति का निर्माण करेंगे अतः ऐसे प्रयास करते चलें 



जिनकी रक्षा स्वयं चिरञ्जीवी पवनपुत्र श्रीहनुमान जी जिनके पराक्रम का वर्णन करता कवितावली का निम्नांकित छंद है 


जो दससीसु महीधर ईस को बीस भुजा खुलि खेलनिहारो।

लोकप, दिग्गज, दानव, देव सबै सहमे सुनि साहसु भारो।


बीर बड़ो बिरूदैत बली, अजहूँ जग जागत जासु पँवारो।

सो हनुमान हन्यो मुठिकाँ गिरि गो गिरिराजु ज्यों गाजको मारो।38 l

जिस रावण के दस सिर थे, जो कैलास पर्वत के स्वामी भगवान शंकर के साथ अपनी बीस भुजाओं का बल दिखाते हुए खेल करने का साहस रखता था; जिसके पराक्रम का नाम सुनकर लोकपाल, दिग्गज, दानव और देवता तक भयभीत हो जाते थे;

जो महान वीर, अत्यन्त बलशाली और अपार यश वाला था, जिसकी कीर्ति आज भी संसार में प्रसिद्ध है उसी रावण को भक्तश्रेष्ठ श्रीहनुमान जी ने अपने एक घूँसे के प्रहार से ऐसा आहत कर दिया, जैसे वज्र के प्रहार से कोई विशाल पर्वत काँप उठे।



 करते हैं, उन्हें किसी प्रकार का भय, भ्रम हो ही नहीं सकता l रामभक्त-शिरोमणि श्रीहनुमानजी के दिव्य अनुग्रह से उत्साहजनक वातावरण बन रहा है और हमारी बाधाएँ एक-एक करके दूर होती जा रही हैं, जिससे आगामी अधिवेशन सफलतापूर्वक अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर हो रहा है ।

हम इस अधिवेशन के माध्यम से  राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी समाज को यह संदेश देने आए हैं कि शिक्षा वही हो जो भारत की सनातन परम्परा, संस्कृति और जीवन-मूल्यों पर आधारित हो, केवल मैकाले की शिक्षा-पद्धति का अनुकरण करने वाली नहीं। हमारा उद्देश्य समाज के भय, भ्रम और आत्मविस्मृति को दूर कर भारतीय ज्ञान-परम्परा के प्रति पुनः जागरण उत्पन्न करना है।

अपने विचारों और व्यवहार में सनातनत्व, भाव, भक्ति और भारतीयता से ओत-प्रोत भाषा को अपनाना निश्चित रूप से हमारा कल्याण करेगा साथ-साथ  हमें यशस्विता भी स्वाभाविक रूप से प्राप्त होगी।

आइये हनुमानाश्रित होकर प्रवेश कर जाएं लंका कांड में 

 जहां माल्यवान् जो रावण का वृद्ध, बुद्धिमान और अनुभवी मंत्री (तथा मातामह) था, रावण को समझाने का प्रयास कर रहा है वह रावण को नीति का उपदेश देते हुए समझाता है कि श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे वही परम भगवान हैं जिन्होंने पूर्वकाल में मधु-कैटभ, हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु जैसे महादैत्यों का वध किया था। इसलिए रावण को सीता जी को सम्मानपूर्वक लौटा देना चाहिए और श्रीराम से वैर त्याग देना चाहिए।


हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान।

जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान॥48 क॥

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया  उन्नाव विद्यालय की चर्चा क्यों हुई अधिवेशन हेतु क्या शुल्क निर्धारित हुआ है  जानने के लिए सुनें

11.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 11 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०७ वां* सार -संक्षेप

 लूम लपेटि, अकास निहारि कै, हाँकि हठी हनुमान चलाए।

 सूखि गे गात, चले नभ जात, परे भ्रमबात, न भूतल आए।

(कवितावली )



हनुमानजी के अप्रतिम बल, पराक्रम और युद्धकौशल का अत्यन्त प्रभावशाली निरूपण 


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 11 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८९


श्रीरामचरितमानस का अध्ययन करके अपने भीतर शक्ति, भक्ति, विवेक, विनय और सदाचार का विकास करें।


हीन चिन्तन से ग्रस्त कुछ लोग भगवान श्रीराम को मात्र कल्पना मानते हैं। किन्तु  भगवान श्रीराम

सात्विक यज्ञों में रत हम भारत, भारतीयता और सनातनत्व के उपासकों के लिए धर्म, मर्यादा, सत्य और आदर्श जीवन के शाश्वत प्रतीक हैं।गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार श्रीराम परब्रह्म हैं, परम सत्य हैं, इन्द्रियों से परे, अलक्ष्य, अनादि और अनुपम हैं। उनका चरित्र मानवता के लिए आदर्श है l

तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस का गम्भीर अध्ययन केवल कथा का रसास्वादन नहीं, बल्कि आत्मशक्ति का जागरण है।

मानस की प्रत्येक चौपाई, प्रत्येक प्रसंग और प्रत्येक तथ्य पर सूक्ष्म दृष्टि डालने से जीवन के गहन सत्य उद्घाटित होते हैं। इससे  हमारे भीतर आत्मविश्वास, धैर्य, विवेक और धर्मनिष्ठा का विकास होता है।

हमारा वास्तविक संघर्ष बाहर के शत्रुओं के साथ साथ अपने भीतर के विकारों काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर से चलता है।मानस का मनन इस अन्तर्द्वन्द्व को शांत कर मन में सद्विचारों की विजय स्थापित करता है। जब अन्तःकरण निर्मल होता है, तब आत्मशक्ति प्रकट होती है  सद्बुद्धि प्राप्त होती है और जीवन की बाहरी चुनौतियों का सामना करना भी सरल हो जाता है l

हम संसार को संस्कारित करने का उपक्रम लेकर चले हैं

राष्ट्रविरोधी तत्त्वों से हमें अपने राष्ट्रभक्त समाज की रक्षा करनी हैं उसे अवगत कराना है कि केवल अंधकार ही नहीं है उसे भ्रममुक्त भयमुक्त करना है 

 हमने अपने लक्ष्य बनाएं हैं 

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः 

राष्ट्र -निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष


इसके अतिरिक्त 

बैरिस्टर साहब ने केवल पानी पीने के लिए क्यों कहा,एक आचार्य श्री कोहली जी की चर्चा क्यों हुई,आज किस विद्यालय में शिक्षकों का साक्षात्कार है जहां आचार्य जी जा रहे हैं,

प्रधानमन्त्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का उल्लेख क्यों हुआ,

रावण के नाना की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

10.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष दशमी /एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०६ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष दशमी /एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 10 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८८

शौर्य शक्ति की अनुभूति करते हुए संगठन में प्रेम और आत्मीयता का विस्तार कर राष्ट्रोन्मुख और समाजोन्मुख हों l


आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं युद्ध प्रारम्भ हो चुका है आइये युद्धस्थल में प्रवेश कर जाएं -


पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा।

पावक सायक सपदि चलावा॥

भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं।

ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं॥


इसके पश्चात् कृपालु भगवान् श्रीराम मुस्कराकर धनुष पर अग्निबाण चढ़ाते हैं और तुरंत उसका संधान करते हैं। उस अग्निबाण के प्रभाव से चारों ओर प्रकाश फैल जाता है; कहीं भी अंधकार नहीं रह जाता। जैसे आत्मज्ञान के उदय होने पर मन के सभी संशय नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही उस प्रकाश से समस्त अंधकार मिट जाता है।

तुलसीदासजी यहाँ केवल युद्ध का दृश्य नहीं दिखाते, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक सत्य भी प्रकट करते हैं। युद्धभूमि का यह दृश्य साधक के अंतःकरण का भी चित्र है। जब तक मन में अज्ञान का अंधकार है, तब तक संशय, भय और मोह बने रहते हैं। परन्तु श्रीराम की कृपा से ज्ञान का प्रकाश प्राप्त होते ही ये सभी विकार समाप्त हो जाते हैं। मनुष्य के जीवन में समस्याओं का मूल कारण प्रायः अज्ञान और भ्रम होता है। सत्य का ज्ञान, सद्गुरु का उपदेश तथा भगवान् की कृपा जीवन के समस्त संशयों का निवारण कर देती है। इसलिए बाहरी अंधकार से अधिक आवश्यक है कि हम अपने अंतःकरण के अज्ञानरूपी अंधकार को ज्ञानरूपी प्रकाश से दूर करें। आचार्य जी नित्य यही कर रहे हैं ताकि आर्यसंस्कृति के उपासक हम सनातनधर्मियों को 

 रामत्व की अनुभूति हो और  हम अपने भीतर शक्ति बुद्धि विचार विवेक प्राप्त कर देशहित और समाजहित के कार्यों में संलग्न हों जिस देश को भगवान राम का ऐसा अद्भुत नेतृत्व मिला हो उसे १९६२ के चीन से युद्ध में भारी मूल्य चुकाने के लिए विवश होना पड़ा l यदि हम आत्मबल के साथ परमात्म की शक्ति की अनुभूति करते रहेंगे तो हमें इस प्रकार विवश नहीं होना पड़ेगा l इसके लिए हमें संगठन की महत्ता को भी समझना होगा और संगठन को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रेम और आत्मीयता का विस्तार आवश्यक है संगठन के हर सदस्य को प्रेम की पराकाष्ठा का दर्शन हो जैसा मानस के निम्नांकित प्रसंग में दिखा 


मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी॥

परम प्रेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई॥1॥


मिलन की प्रीति कैसे बखानी जाए? वह तो कविकुल के लिए कर्म, मन, वाणी तीनों से अगम है। दोनों भाई (भरतजी और श्री रामजी) मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को भुलाकर परम प्रेम से पूर्ण हो रहे हैं


श्रीराम और भरतजी का यह मिलन लौकिक स्नेह से कहीं ऊपर, दिव्य प्रेम की पराकाष्ठा का दर्शन कराता है। दोनों भाई प्रेम में इतने तल्लीन हो गए कि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार—अन्तःकरण के चारों अंग मानो अपनी सत्ता ही भूल गए। मन का संकल्प-विकल्प, बुद्धि का विचार, चित्त का स्मरण तथा अहंकार का 'मैं' भाव—सब प्रेम में विलीन हो गए। उस समय उनके अन्तःकरण में केवल निष्काम, निर्मल और आत्मसमर्पित प्रेम ही प्रवाहित हो रहा था। यह प्रसंग बताता है कि जहाँ प्रेम पूर्णतः निःस्वार्थ और ईश्वरमय होता है, वहाँ अहंकार तथा समस्त मानसिक भेद स्वतः समाप्त हो जाते हैं और केवल एकत्व, अपनत्व तथा आनन्द का अनुभव शेष रह जाता है। यही सच्चे प्रेम और भक्ति की सर्वोच्च अवस्था है।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने तुलसीदास जी के अन्य किन ग्रंथों की चर्चा की, भैया डा पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

9.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष नवमी /दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०५ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष नवमी /दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 9 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८७


हम भी संसार की अनेक समस्याओं और चुनौतियों के बीच जीवन व्यतीत कर रहे हैं। स्वाभाविक है कि हम भी यशस्विता की आकांक्षा रखते हैं—चाहे वह हमारे व्यक्तिगत पुरुषार्थ के माध्यम से प्राप्त हो, चाहे हमारे परिवार के द्वारा अथवा युगभारती संस्था के माध्यम से।

किन्तु हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए कि यश हमारा लक्ष्य नहीं, अपितु सत्य, धर्म और लोकमंगल के प्रति निष्ठापूर्ण कर्म का स्वाभाविक परिणाम होना चाहिए। यदि हमारा ध्यान केवल सत्य, कर्तव्य और अपने ध्येय पर स्थिर रहेगा, तो प्राप्त होने वाला यश भी सार्थक होगा और हमारी साधना भी निष्कलुष बनी रहेगी। 



कीट मनोरथ दारु शरीरा।

जेहि लगि घुन कोसि बसि धीरा।।


मनुष्य का शरीर लकड़ी के समान है और उसकी असंख्य इच्छाएँ उस लकड़ी में लगे घुन के समान हैं। जैसे घुन लकड़ी को भीतर ही भीतर खोखला कर देता है, वैसे ही अनियंत्रित कामनाएँ मनुष्य के जीवन और अन्तःकरण को भीतर-ही-भीतर क्षीण एवं दुर्बल कर देती हैं।

इस उपमा के द्वारा तुलसीदास जी यह शिक्षा देते हैं कि यदि मनुष्य अपनी इच्छाओं पर संयम नहीं रखता, तो वे उसकी शान्ति, विवेक और आध्यात्मिक उन्नति का नाश कर देती हैं। अतः जीवन को सार्थक बनाने के लिए कामनाओं पर नियंत्रण तथा भगवान् की भक्ति और वैराग्य का आश्रय आवश्यक है।


"सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि कै मति इन्ह कृत न मालिनी।।"


यहाँ "ईषणा-त्रय" का उल्लेख है गोस्वामी तुलसीदास जी इस चौपाई में संकेत करते हैं कि पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणा—ये तीनों ऐसी प्रबल आसक्तियाँ हैं, जिन्होंने बड़े-बड़े बुद्धिमानों के विवेक को भी मलिन कर दिया है। सत्य के मार्ग पर चलने वाले साधक के लिए ये बाधाओं के समान हैं। जब मनुष्य पुत्र-मोह, धन-लालसा अथवा यश-प्राप्ति की इच्छा से प्रेरित होकर कार्य करता है, तब उसके निर्णय निष्पक्ष नहीं रह जाते और सत्य का मार्ग धूमिल होने लगता है।


अतः सत्य के साधक का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन का केन्द्र केवल सत्य, धर्म तथा कर्तव्य को बनाए। उसका ध्यान सदैव अपने परम लक्ष्य पर स्थिर रहे। तब कोई भी मोह, प्रलोभन, भय अथवा प्रतिष्ठा की आकांक्षा उसे सत्य के पथ से विचलित नहीं कर सकेगी। यही दृढ़ता साधना की सफलता का आधार है और यही धर्ममय जीवन की पहचान भी है।

आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं जहां राम- रावण युद्ध चल रहा है 

भगवान् श्रीराम लंका के शासक और उसकी प्रजा के मनोबल को क्षीण कर रहे हैं । रावण हनुमान जी का अद्भुत पराक्रम प्रत्यक्ष देख चुका था। उसने अकेले हनुमान जी द्वारा अशोकवाटिका का विध्वंस, अनेक राक्षसों का संहार और लंका-दहन का दृश्य अपनी आँखों से देखा था। इसके पश्चात् अंगद ने रावण की सभा में अपने अद्वितीय बल, धैर्य और निर्भीकता का परिचय देकर उसके आत्मविश्वास को और भी डिगा दिया।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने चीन से अब हमारे भयभीत न होने का क्या कारण बताया, चम्पत राय का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

8.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष अष्टमी / नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०४ वां* सार -संक्षेप

 अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा॥

लंकाँ द्वौ कपि सोहहिं कैसें। मथहिं सिंधु दुइ मंदर जैसें॥४॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष अष्टमी / नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 8 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८६

हमारे भीतर अनेक विचार, भाव, प्रतिभाएँ और संकल्प होते हैं। यदि वे केवल मन में ही रह जाएँ और व्यवहार, वाणी या कर्म के रूप में प्रकट न हों, तो उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।अतः आइए, हम अपने भावों, विचारों और संकल्पों को अभिव्यक्त करें तथा उन्हें कर्मरूप में परिणत कर जीवन को सार्थक बनाएँ।


आजकल हम लोग मानस के लंकाकांड में प्रविष्ट हैं 

सेतुनिर्माण के पश्चात् अंगद की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो जाती है l

अंगद केवल  भगवान श्रीराम के दूत बनकर नहीं गए थे, बल्कि एक कुशल दूत, नीतिज्ञ और गुप्तचर के रूप में भी कार्य कर रहे थे। उन्होंने रावण को धर्म का उपदेश दिया, उसकी शक्ति और अहंकार का परीक्षण किया, सभा का मनोभाव समझा और लौटकर लंका की सैन्य एवं दुर्ग-व्यवस्था का पूरा विवरण श्रीराम को सुनाया।


श्रीराम अंगद की चतुराई और नीति-कौशल से प्रसन्न होकर मुस्कुराए। इसके बाद अंगद ने लंका के चारों द्वारों, रक्षा-व्यवस्था, सेना की तैनाती तथा युद्ध की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण सभी सूचनाएँ विस्तार से प्रस्तुत कीं। 


रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए॥

लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा॥1॥


जब श्रीराम को शत्रु (रावण) के विषय में समाचार प्राप्त हुआ, तब उन्होंने अपने सभी मंत्रियों और प्रमुख सहयोगियों को अपने समीप बुलाया। फिर उन्होंने कहा— "लंका के चारों द्वार अत्यन्त सुदृढ़ और सुरक्षित हैं। बताइए, किस प्रकार आक्रमण किया जाए? इस विषय में आप सब विचार करें।"


महान नेतृत्व का लक्षण यह है कि वह अहंकारवश अकेले निर्णय नहीं लेता, बल्कि योग्य साथियों से विचार-विमर्श कर उचित नीति का निर्धारण करता है।

नेतृत्व का एक प्रमुख दायित्व अपने अनुयायियों के हृदय में यह अटूट विश्वास स्थापित करना है कि उनका नायक प्रत्येक चुनौती का सामना करने में पूर्णतः समर्थ है और विजय निश्चित है। यही विश्वास उनके भीतर उत्साह, साहस, पराक्रम और अडिग मनोबल का संचार करता है तथा उन्हें अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पूर्ण समर्पण के साथ कर्मक्षेत्र में प्रवृत्त करता है l

श्रीराम ने अपने प्रताप, सामर्थ्य और विजय के प्रति सबको आश्वस्त करते हुए वानर-सेना का उत्साहवर्धन किया और उन्हें उचित प्रकार से समझाया। प्रभु के वचनों को सुनते ही वानर वीरों के हृदय में अद्भुत उत्साह और आत्मविश्वास जाग उठा। वे सिंहनाद करते हुए पूर्ण पराक्रम के साथ युद्ध के लिए दौड़ पड़े।

आगे आचार्य जी ने क्या बताया साकेत में भगवान राम को रामानन्दी मैथिलीशरण गुप्त ने किस रूप में प्रकट किया, भैया शुभेन्दु शेखर जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

7.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष सप्तमी / अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष सप्तमी / अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 7 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८५

हम अपना चिंतन भ्रम और भय से मुक्त रखते हुए सत्य, आत्मविश्वास और सकारात्मक दृष्टि से प्रेरित रखें क्योंकि तभी वह राष्ट्र और समाज के लिए कल्याणकारी बनेगा l

जैसे हम अपने शरीर और वस्त्रों की स्वच्छता का ध्यान रखते हैं, वैसे ही अपने विचारों की पवित्रता और सकारात्मकता का भी ध्यान रखना आवश्यक हैl

भारत मल का जोहड़ नहीं, बल्कि संस्कृति, स्वच्छता, शौर्य और सदाचार का पावन तीर्थ बने अतः राष्ट्रविरोधी तत्त्वों का विधिसम्मत और दृढ़ प्रतिरोध और उनके समक्ष शक्ति और शौर्य का प्रदर्शन आवश्यक है l



हमने अपना लक्ष्य बनाया है 

*राष्ट्र -निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष*

उस आधार पर हमारे विचार केवल अपने व्यक्तिगत हित तक सीमित नहीं रहने चाहिए।


यद्यपि चिन्तन मानव जीवन का अमृत है 

पर वह यदि सीमाओं में ही अवरुद्ध रहा l

तो समझो उसका हाल वही हो जाता है 

जैसे जल छोटी सीमा बीच निरुद्ध बहा ll 



 जब हमारा चिंतन देश, समाज और समष्टि के कल्याण से संयुत होता है, तभी वह वास्तव में सार्थक और जीवनदायी बनता है। यदि हम केवल अपने परिवार या निजी स्वार्थ तक ही सोचते रहें, तो वह चिंतन संकीर्ण है। ऐसा सीमित चिंतन समाज की उन्नति में अपेक्षित योगदान नहीं दे पाता।

संकीर्ण और स्वार्थपरक विचार भी  समाज और राष्ट्र के विकास में सहायक नहीं बनते। इसके विपरीत, जब विचारों का विस्तार समाज,राष्ट्र, संस्कृति, मानवता और लोकमंगल तक होता है, तब वही चिंतन समाज में जागरण, संगठन, सेवा और प्रगति का आधार बनता है। व्यापक चिंतन ही हमें यशस्वी बनाता है और राष्ट्र को शक्तिशाली एवं समृद्ध बनाने में योगदान देता है।

ऐसा ही व्यापक, निर्भय और लोकमंगलकारी चिंतन गोस्वामी तुलसीदास जी का था। श्रीरामचरितमानस, जो हर संकट में हमें मार्ग दिखा देता है,में  भगवान श्रीराम व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना, सज्जनों की रक्षा और अधर्म के उन्मूलन के लिए कार्य करते हैं। आजकल हम लोग लंका कांड में प्रविष्ट हैं 

इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा॥

अति आदर समीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी॥2॥


हे बालि के पुत्र! मुझे जानने का बड़ा कौतूहल है कि जो रावण राक्षसों के कुल का तिलक है और जिसके अतुलनीय बाहुबल की संसार भर में धाक है उसके  मुकुट तुमने कैसे उतार दिए l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने क्या बताया 

श्री हरि ओम पवार जी,कवयित्री व्याख्या मिश्रा जी, भैया पवन जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

6.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष षष्ठी /सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०२ वां* सार -संक्षेप

 यथार्थकथनं यच्च सर्वलोकसुखप्रदम्।

तत् सत्यमिति विज्ञेयमसत्यं तद्विपर्ययः॥ 

जो कथन वास्तविक हो तथा समस्त लोक के लिए हितकारी और सुखदायक हो, वही सत्य कहलाता है। इसके विपरीत जो हो, वह असत्य है। 

 (पद्मपुराण क्रियायोगसार अध्याय  १६)

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष षष्ठी /सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 6 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८४

इस सदाचार वेला के माध्यम से हम उस तत्त्व की प्राप्ति का प्रयास करें जिससे हम दिन भर ऊर्जस्वित रहें


जिसके मन में यह अटूट विश्वास होता है कि उस पर भगवान् की कृपा है, वह कभी अहंकार में चूर नहीं होता। वह अपने बल, बुद्धिमत्ता, सामर्थ्य और उपलब्धियों को अपना नहीं, अपितु भगवान् का अनुग्रह मानता है। वह स्वयं को परमात्मा का अंश समझता है। जब हम उस परम अंशी के अंश हैं, तब न हम दीन हैं, न हीन, हमारे भीतर आत्मगौरव, आत्मविश्वास और विनम्रता का अद्भुत समन्वय रहता है।

यही सनातनधर्मी भाव है। इसी आध्यात्मिक आधार ने हिन्दुत्व को सहस्राब्दियों तक जीवित और जाग्रत रखा है। असंख्य आक्रमणों, संकटों, कष्टों और विपरीत परिस्थितियों के बाद भी इसकी जीवनधारा अविच्छिन्न बनी रही।

इतिहास साक्षी है कि संसार के अनेक देशों की पहचान बदल गई, उनकी सभ्यताएँ परिवर्तित हो गईं, उनके नाम, स्वरूप और सांस्कृतिक आधार तक परिवर्तित हो गए  किन्तु भारत आज भी भारत है। उसकी आत्मा, उसका सनातन संस्कार और उसका आध्यात्मिक अधिष्ठान आज भी अक्षुण्ण है। यही सनातन संस्कृति की अमरता और उसकी अद्वितीय जीवनशक्ति का प्रमाण है।


यही सनातनधर्मी दृष्टि हमारी शिक्षा का भी मूलाधार है। इसी के आधार पर विश्वभर में हमें सम्मान प्राप्त हुआ l शिक्षा संस्कार व्यवहार आचार है  शिक्षा हमारे जीवन का आधार  और साधन भी है शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना या जीविका का साधन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराना, उसके भीतर निहित दिव्यता को जाग्रत करना और उसके चरित्र का निर्माण करना है। ऐसी शिक्षा व्यक्ति को अहंकारी नहीं, उत्तरदायी बनाती है, लोकमंगल के लिए समर्पित बनाती है।

शिक्षा हमें बताती है कि छल से मिश्रित सत्य सत्य नहीं है 


न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः।

न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम्।

नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति।

न तत् सत्यं यच्छलेनानुविद्धम्॥



वह सभा सभा नहीं, जहाँ अनुभवी और धर्मज्ञ वृद्ध न हों।


वे वृद्ध भी वास्तविक वृद्ध नहीं, जो धर्म की बात न कहें।


वह धर्म धर्म नहीं, जिसमें सत्य न हो।


और वह सत्य भी सत्य नहीं, जो छल से मिश्रित हो।

अत्यन्तलोकहितं सत्यम्।

श्रीरामचरितमानस में जो सत्य का आख्यान है वह शौर्य और शक्ति के साथ सम्मिश्रित आख्यान है l

सत्य का पालन वही कर सकता है, जिसके भीतर साहस, धैर्य और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा हो।

अंगद का यह प्रसंग इसका उत्कृष्ट उदाहरण है—


भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत रिपु मद भाग।

कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग॥ 34(ख)॥


अर्थात् जैसे करोड़ों विघ्न आने पर भी संत अपने मन से नीति का त्याग नहीं करते, वैसे ही अंगद का चरण भूमि से तनिक भी नहीं डिगा और उसे देखकर शत्रुओं का मद चूर हो गया।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया भैया मनीष कृष्णा जी का उल्लेख क्यों हुआ कल सम्पन्न हुई बैठक की चर्चा क्यों हुई सत्य के क्या क्या पर्यायवाची शब्द हैं जानने के लिए सुनें l

5.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८३


 हमारे भावों के केंद्र में राष्ट्र और समाज हों तथा हम अपने भावों का विस्तार व्यक्तिगत हित से ऊपर उठाकर लोकमंगल तक करें इससे हमारा जीवन यशस्वी बनेगा l जब हम अपने जीवन को समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित करेंगे तो हमारी  कीर्ति चिरस्थायी होगी l हम अत्यन्त मूल्यवान रत्न होंगे l



आचार्य जी विशेष रूप से श्रीरामचरितमानस के उन प्रसंगों का उल्लेख करते हैं, जो हमारे भीतर उत्साह, आत्मविश्वास, धैर्य, साहस, पुरुषार्थ, कर्तव्यनिष्ठा तथा राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पण का भाव जाग्रत करें । उनके अनुसार मानस केवल भक्ति का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को जाग्रत , संगठित और कर्मयोगी बनाने वाला प्रेरणास्रोत भी है। इसके पात्र और प्रसंग हमें विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म का पालन करते हुए निर्भय होकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। जैसी निर्भयता अंगद ने प्रकट की 


"राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा॥"


रावण के दरबार में जब अंगद  जिनके लिए प्रसिद्ध है कि 


रोप्यौ पाँव पैज कै बिचारि रघुवीरबल,

⁠लागे भट सिमिटि न नेकु टसकतु है।

तज्यौ धीर धरनि, धरनिधर धसकत,

⁠धराधर धीर भार सहि न सकतु है॥

महाबली बालि को दबत दलकतु भूमि,

⁠तुलसी उछरि सिंधु मेरु मसकतु है।

कमठ कठिन पीठि, घठा परो मंदर को,

⁠आयो सोई काम, पै करेजो कसकतु है॥


रावण को समझा रहे थे, तब अहंकारी रावण  नर लीला कर रहे भगवान श्रीराम को केवल एक साधारण मनुष्य मानता था। इस पर अंगद उसे तीव्र फटकार लगाते हुए कहते हैं— "अरे मूर्ख रावण! तू किस आधार पर श्रीराम को साधारण मनुष्य समझता है? यदि केवल बाह्य रूप देखकर निर्णय करना ही तेरी बुद्धि है, तो क्या कामदेव केवल धनुष धारण करने वाला एक साधारण धनुर्धर है? और क्या गंगाजी केवल एक सामान्य नदी हैं? जिस प्रकार कामदेव और गंगा का महत्त्व उनके बाह्य रूप से कहीं अधिक है, उसी प्रकार श्रीराम भी सामान्य मनुष्य नहीं, स्वयं परमब्रह्म हैं। उनके वास्तविक स्वरूप को न पहचानना ही तेरे अज्ञान और अहंकार का प्रमाण है।"


रामत्व, रामात्मकता  अध्यात्म और शौर्य का अद्भुत सम्मिलन है। अध्यात्म मनुष्य को अहंकार से मुक्त कर आत्मबोध की ओर ले जाता है और शौर्य उसे अन्याय, अधर्म तथा अत्याचार के विरुद्ध निर्भीक होकर खड़े होने की प्रेरणा देता है।

श्रीराम के जीवन में करुणा और पराक्रम, विनम्रता और वीरता, तप और तेज, नीति और शक्ति सभी का समन्वय दिखाई देता है। यही समन्वय रामत्व की पहचान है। इसलिए राम का अनुसरण केवल पूजा नहीं, बल्कि ऐसे जीवन का निर्माण है जिसमें आत्मोन्नति और लोककल्याण साथ-साथ चलते हैं। जो भय और भ्रम में जीते हैं, वे रामत्व का पूर्ण अनुभव नहीं कर सकते।अनेक दुविधाओं में उलझा मन न तो दृढ़ निर्णय ले पाता है और न ही धर्म के मार्ग पर अडिग रह सकता है।

इसके अतिरिक्त 

आचार्य जी ने अयोध्या (तत्कालीन फैज़ाबाद) के पूर्व जिलाधिकारी कृष्ण कुमार नायर (के. के. नायर) जो रामजन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख, किंतु अपेक्षाकृत अल्पचर्चित नायकों में से एक थे और जो सन् १९४९ में रामलला के प्राकट्य के समय  फैज़ाबाद के जिलाधिकारी थे। 

(उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा रामलला की प्रतिमा हटाने के निर्देश दिए गए थे, किंतु के. के. नायर ने उन निर्देशों का पालन करने से मना कर दिया। ) का उल्लेख क्यों किया, बैठकों के विषय में आचार्य जी ने क्या परामर्श दिए, ब्रह्मा के वरदान और जनता के वरदान से आचार्य जी का क्या आशय है जानने के लिए सुनें l

4.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८२

अपनी समीक्षा नित्य करें और देखें कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने जाने अनजाने समाज का अहित कर दिया हो, ध्यान रखें कि हमने अपना लक्ष्य बनाया है समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष  अतः हमें समाज और राष्ट्र के हित के ही कार्य करने हैं l 


गायन्ति देवाः किल गीतिकानि

धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते

भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥


यह उद्घोष प्रत्येक हिन्दू,जो पराजित मानसिकता का कभी नहीं रहा, जो अत्यन्त संवेदनशील, समावेशी, भावुक है, जिसने पराश्रयता को कभी स्वीकार नहीं किया,को स्मरण कराता है कि भारत की पवित्र भूमि पर जन्म लेकर वह ऐसा जीवन जिए जो राष्ट्र, संस्कृति और सनातन मूल्यों की प्रतिष्ठा करे तथा अंततः मोक्ष का अधिकारी बने।


देवता स्वयं यह गीत गाते हैं कि धन्य हैं वे मनुष्य जिन्हें भारतभूमि में जन्म प्राप्त हुआ है। क्योंकि हिन्दू जीवन दृष्टि में भारतभूमि ऐसी पवित्र कर्मभूमि है जहाँ मनुष्य न केवल स्वर्ग की प्राप्ति कर सकता है, बल्कि मोक्ष का भी अधिकारी बन सकता है। इसलिए देवता भी अपने देवत्व का भोग समाप्त होने पर पुनः भारत में मनुष्य जन्म पाने की इच्छा रखते हैं, ताकि कर्म करके परम मुक्ति प्राप्त कर सकें। इस श्लोक में भारतवर्ष को केवल जन्मभूमि नहीं, बल्कि कर्मभूमि कहा गया है।


सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥48॥


 देवताओं के लोक भोगभूमि हैं, जहाँ मुख्यतः पूर्वकृत पुण्यों का फल भोगा जाता है; जबकि भारतभूमि वह स्थान है जहाँ पुरुषार्थ, साधना, धर्म, ज्ञान और भक्ति के द्वारा मोक्ष तक पहुँचा जा सकता है। इसीलिए देवता भी भारत, जिसकी स्थिति ऐसी है कि अनेक शक्तियाँ उसके सामर्थ्य, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और वैश्विक प्रभाव को सहज रूप से स्वीकार नहीं करना चाहतीं। अनेक लोग और राष्ट्र भारत की विशाल अर्थव्यवस्था, व्यापार,ज्ञान, प्रतिभा और संसाधनों से लाभ तो लेना चाहते हैं, परंतु  उसको आत्मनिर्भर, शक्तिशाली और विश्व में अग्रणी भूमिका निभाते हुए नहीं देख सकते,में मनुष्य-जन्म को अपने देवत्व से अधिक श्रेष्ठ मानते हैं।

इसी जीवन-दृष्टि का सजीव स्वरूप श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम के चरित्र में दिखाई देता है। भगवान श्रीराम ने कभी सुख, वैभव या अधिकार को जीवन का लक्ष्य नहीं बनाया उन्होंने धर्म और कर्तव्य को सर्वोपरि रखा। आजकल हम लोग मानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं 

पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा॥

मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती॥


अंगद क्रोध में भरकर कहते हैं— "अरे रावण! व्यर्थ की डींगें हाँकते हुए तुझे तनिक भी लज्जा नहीं आती। हे निर्लज्ज! तू अपने ही कुल का विनाश करने वाला है। ऐसे अधर्म और अहंकार के बाद भी अपने तथाकथित बल पर घमण्ड करता फिरता है; फिर भी तेरी छाती लज्जा से फटती नहीं।"

यह वही कह सकता है जिसे शौर्य और पराक्रम की अनुभूति हो जो अत्यन्त बलशाली हो हम सनातनधर्मी राष्ट्रभक्तों को भी इसी शौर्य पराक्रम की अनुभूति करनी है l


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने आगे क्या बताया,आचार्य जी ने चम्पत राय जी, होसबोले जी का नाम क्यों लिया, प्रयागराज के अक्षय वट का उल्लेख क्यों हुआ, कौवा रोर क्या है, ९ वीं कक्षा में किसके प्रवेश की चर्चा हुई जानने के लिए सुनें l

3.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्थी ( कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी ) विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८१

अपने भीतर रामात्मकता धारण करें जिससे हम जाग्रत और सचेत रहेंगे आत्मचिन्तन करते हुए अपने भीतर के मल का निरसन करते रहेंगे l शुद्ध बुद्ध प्रबुद्ध राष्ट्रोन्मुख समाजोन्मुख होंगे l



जो स्वयं अपने दोषों, सीमाओं और अंतःकरण का निष्पक्ष अवलोकन नहीं कर सकता, वह दूसरों के गुण-दोषों का यथार्थ मूल्यांकन भी नहीं कर सकता। आत्मदर्शन विवेक, विनम्रता और न्यायबुद्धि का आधार है। जो व्यक्ति पहले स्वयं को परखता है, वही दूसरों के विषय में संतुलित, निष्पक्ष और सार्थक मत देने का अधिकारी होता है। 

आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस के उस प्रसंग में हैं जहां अंगद जी और रावण के बीच संवाद चल रहा है

सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला। है कपि एक महा बलसीला॥

आवा प्रथम नगरु जेहिं जारा। सुनत बचन कह बालिकुमारा॥


रावण अपनी सभा में वानर-सेना का उपहास करते हुए कहता है कि नल और नील तो केवल शिल्पकला में निपुण हैं। वे समुद्र पर सेतु बनाने जैसे निर्माण-कार्य जानते हैं, युद्ध करना उनका कार्य नहीं है। हाँ, उनमें एक वानर अवश्य अत्यन्त बलशाली है वही जो पहले लंका में आया था और अकेले ही पूरी लंका को अग्नि के हवाले कर गया था l 

रावण के मुख से यह बात सुनकर बालि-पुत्र अंगद जी मुस्कराकर उत्तर देने लगे। वे समझ गए कि रावण बाहर से अहंकार दिखा रहा है, पर भीतर से हनुमान जी के पराक्रम को स्वीकार कर चुका है। अब अंगद जी उसके इसी अहंकार को तोड़ने  का प्रयास करते हैं l वे रावण को मानसिक रूप से अत्यन्त शिथिल करना चाहते हैं l 

सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी॥

तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवत सव सम चौदह प्रानी॥


 जिस व्यक्ति के जीवन में धर्म, विवेक, भक्ति, सदाचार और लोकमंगल का भाव नहीं है, उसका जीवन केवल सांस लेने तक सीमित रह जाता है। मनुष्य का वास्तविक जीवन उसके उच्च आदर्शों, सत्कर्मों और ईश्वराभिमुखता से सार्थक होता है।उसका जीवन ईश्वरविमुखता से निरर्थक होता है l



अंगद कहते हैं—"हे दुष्ट! मैं तुझे इसलिए नहीं मारता कि मेरे प्रभु श्रीराम ने मुझे दूत बनाकर भेजा है, योद्धा बनाकर नहीं। दूत का धर्म संदेश देना है, युद्ध करना नहीं। इसलिए अब मेरे भीतर क्रोध उत्पन्न मत कर।"

वार्तालाप आगे चलता है  किन्तु जब रावण ने भगवान श्रीराम की निन्दा की, तब अंगद जी का धैर्य टूट गया।

जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा।

क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा॥

हरि हर निंदा सुनइ जो काना।

होइ पाप गोघात समाना॥

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, आज भी रामत्व कैसे प्रसरित हो रहा है जानने के लिए सुनें l

2.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९८ वां* सार

 सिंधु तरो उनको बनरा, तुसपै धनुरेख गई न तरी।

बाँध्योइ बाँधत सो न बँध्यो उन बारिधि बाँधि कै बाट करी।।

अजहूँ रघुनाथ-प्रताप की बात तुम्हैं दसकंठ न जानि परी।

तेलनि तूलनि पूँछि जरी (जड़ी हुई, युक्त) न जरी गढ़, लंक जराई जरी।।26।।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 2 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८०

हम अपने संगठन में संवेदनशीलता , सहयोग, सहानुभूति का ध्यान रखें l




हम मनुष्य हैं। विचार, भावना और संवेदना ही हमें अन्य प्राणियों से विशिष्ट बनाती है। भावों का विश्लेषण करना, दूसरों के सुख-दुःख को अनुभव करना और उनके प्रति आत्मीयता रखना मनुष्य होने का वास्तविक लक्षण है। यही मनुष्यत्व है l संवेदनशीलता मनुष्य को प्राप्त परमात्मा का एक अनुपम उपहार है  यह उनकी कृपा का प्रसाद और जीवन का अमूल्य वरदान है।

हम सब युगभारती से संयुत हैं, जो दीनदयाल विद्यालय के पूर्व छात्रों द्वारा संचालित एक विशिष्ट संस्था है। हमारे संगठन की वास्तविक शक्ति केवल हमारी संख्या, संसाधनों या व्यवस्थाओं में नहीं, बल्कि हम सदस्यों के बीच विद्यमान संवेदना, सहयोग, सहानुभूति और पारस्परिक विश्वास में निहित  है।

जैसे मानव-शरीर के सभी अंग एक-दूसरे के सुख-दुःख से जुड़े रहते हैं और मिलकर सम्पूर्ण शरीर को स्वस्थ एवं सक्षम बनाते हैं, वैसे ही प्रत्येक सदस्य भी एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायी  है। जब किसी एक सदस्य को आवश्यकता हो, तब अन्य सदस्य उसके साथ खड़े हों; जब किसी को सफलता मिले, तो सभी उसकी प्रसन्नता में सहभागी बनें। यही संगठनात्मकता हमारी संस्था को जीवंत, सशक्त, समाज और राष्ट्र के लिए कल्याणकारी और दीर्घजीवी बना देगी l

आइए, हम केवल एक संस्था के सदस्य न रहें, बल्कि एक परिवार की भाँति संवेदना, सहयोग, सहानुभूति और सेवा के भाव से संयुत रहें। यह रामात्मकता ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है और यही हमारी पहचान भी।

रामकथा में एक प्रसंग आता है जब लक्ष्मण जी संजीवनी बूटी के प्रभाव से पुनः सचेत हुए


हृदय घाउ मेरे पीर रघुबीरै |

  पाइ सजीवन, जागि कहत यों प्रेमपुलकि बिसराय सरीरै ||


  मोहि कहा बूझत पुनि पुनि, जैसे पाठ-अरथ-चरचा कीरै |

  सोभा-सुख, छति-लाहु भूपकहँ, केवल कान्ति-मोल हीरै ||


  तुलसी सुनि सौमित्रि-बचन सब धरि न सकत धीरौ धीरै |

  उपमा राम-लषनकी प्रीतिकी क्यों दीजै खीरै-नीरै ||

यह पद भ्रातृ-प्रेम, सेवा, समर्पण और आत्मविस्मृति का अनुपम आदर्श प्रस्तुत करता है।  तुलसीदास इस प्रसंग के माध्यम से बताते हैं कि सच्चा प्रेम वही है जिसमें अपने सुख-दुःख का बोध मिट जाए और प्रिय के सुख-दुःख में ही अपना जीवन समाहित हो जाए।

आजकल हम लोग लंका कांड में प्रविष्ट हैं

दसन गहहु तृन कंठ कुठारी, परिजन सहित संग निज नारी।सादर जनकसुता करि आगें, देहु राम कहँ बिसरिहि लागें।

अंगद रावण को समझाते हुए कहते हैं कि "हे रावण! तुम अपने दाँतों में तिनका दबाकर (अर्थात पूर्ण दीनता व क्षमा याचना की मुद्रा में) और गले में कुठार (कुल्हाड़ी) डालकर, अपने परिवार तथा अपनी पत्नी के साथ, माता सीता को आदरपूर्वक आगे करके श्रीराम को सौंप दो, तभी तुम्हारा कल्याण होगा।"

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,ऐसा ज्ञान जो अंतःकरण में विवेक का दीप प्रज्वलित करे को आचार्य जी ने किस उदाहरण से स्पष्ट किया जानने के लिए सुनें

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1.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९७ वां* सार -संक्षेप

 यत् त्वया मत्तः अधीतं तद् उत्सृज।"

"जो यजुर्वेद तुमने मुझसे पढ़ा है, उसे त्याग दो (उगल दो)।"


यह प्रसिद्ध संवाद महर्षि वैशम्पायन और याज्ञवल्क्य के बीच की एक पौराणिक घटना को दर्शाता है, जिसके परिणामस्वरूप यजुर्वेद का विभाजन हुआ था l


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७९

 राष्ट्र हमारी सर्वोच्च निष्ठा, हमारी भक्ति, हमारी शक्ति, हमारी पूजा और हमारे अटूट विश्वास का आधार है, अतः शिक्षा का प्रत्येक आयाम भी राष्ट्रहित, संस्कृति-संरक्षण और लोककल्याण के आदर्शों से प्रेरित होना चाहिए।



वेद प्राचीन शैक्षिक परम्परा का मूल आधार हैं । वेद केवल धार्मिक ग्रन्थ नहीं हैं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, भाषा, गणित, चिकित्सा, खगोल, पर्यावरण तथा नैतिक जीवन के आदिम स्रोत हैं। अतः वैदिक ज्ञान का गंभीर अध्ययन आवश्यक है, जिससे हम प्रमाणपूर्वक यह प्रतिपादित कर सकें कि भारतीय शैक्षिक परम्परा अत्यन्त प्राचीन, समृद्ध और मानव के लिए अत्यन्त कल्याणकारी रही है।हमने अपना उद्देश्य निर्धारित किया है 

 *वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः* यजुर्वेद ९.२३


यदि हम राष्ट्र के प्रति जाग्रत हैं, यदि राष्ट्र ही हमारी भक्ति, हमारी शक्ति, हमारी पूजा और हमारा अटूट विश्वास है, तो हमारी शिक्षा भी उसी से अनुप्राणित होनी चाहिए। ऐसी शिक्षा केवल जीविकोपार्जन का साधन न होकर राष्ट्रनिर्माण, चरित्र-निर्माण, सांस्कृतिक संरक्षण तथा कर्तव्यबोध का माध्यम बने। जब शिक्षा का लक्ष्य राष्ट्र के गौरव, संस्कृति और लोककल्याण से जुड़ता है, तभी वह अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करती है।

यही आदर्श श्रीरामचरितमानस में भगवान् श्रीराम के चरित्र में प्रत्यक्ष दिखाई देता है।

आजकल हम लोग लंका कांड में प्रविष्ट हैं l


गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज।सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज॥

श्रीराम के चरणकमलों का स्मरण करके अंगद रावण की सभा में पहुँचे। वे सिंह के समान निर्भीक और तेजस्वी थे। उन्होंने सभा में चारों ओर निडर दृष्टि डाली। वे धैर्य, वीरता और अपार बल के साक्षात् स्वरूप थे।

अंगद का चरित्र इस बात का आदर्श है कि जो व्यक्ति उच्च आदर्शों, गुरु और राष्ट्रधर्म के प्रति निष्ठावान होता है, वही विपरीत परिस्थितियों में भी सिंह के समान निर्भय रहता है।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,पद्धति ग्रंथ किसे कहते हैं,उन्नाव विद्यालय में चल रहे पूर्त कार्यों का उल्लेख आचार्य जी ने क्यों किया, भैया मनीष कृष्णा जी के घर पर कल संपन्न हुई बैठक में कौन कौन उपस्थित रहा, अधिवेशन में शिक्षा विषय पर प्रस्ताव पारित  कराने हेतु आचार्य जी ने क्या सुझाव दिया जानने के लिए सुनें l