31.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 31 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२७ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०९

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 31 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०९

तूफान फिर से कुनमुनाने सा लगा है, 

सियारों की जमातें जुट रही हैं, 

सजग हो फिर वही तेवर दिखाओ, 

स्वदेशी क्यारियाँ भी स्यात कुछ कुछ लुट रही हैं।


ऐसा प्रतीत हो रहा है कि संकट का वात्याचक्र पुनः सिर उठाने लगा है। सनातनधर्म विरोधी और राष्ट्रविरोधी शक्तियाँ एकत्र होकर अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लग गई हैं। इसलिए अब पुनः सजग होने,  संगठित होने और दृढ़ता का परिचय देने की आवश्यकता है। यदि हम सतर्क नहीं हुए, तो हमारी अपनी  संस्कृति, परम्पराएँ  क्षरित होंगी l


आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं जहां लक्ष्मण जी और रावण पहली बार आमने सामने होंगे 

निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ।

लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ॥ ८२॥



जब लक्ष्मण जी ने देखा कि अपनी वानर सेना शत्रु के प्रबल आक्रमण से अत्यन्त व्याकुल और विचलित हो गई है, तब उन्होंने कमर में तरकस कस लिया, हाथ में धनुष धारण किया और श्रीराम जी के चरणों में मस्तक झुकाकर वे क्रोधपूर्वक युद्ध के लिए चल पड़े।

लक्ष्मण जी ने  रावण के पास जाकर कहा - अरे दुष्ट! वानर भालूओं को क्या मार रहा है? मुझे देख, मैं तेरा काल हूँ। 

युद्ध चल रहा है 

रावण पृथ्वी पर गिर पड़ा, उसे कुछ भी होश न रहा। फिर मूर्च्छा छूटने पर वह प्रबल रावण उठा और उसने वह शक्ति चलाई जो ब्रह्मा ने उसे दी थी। वह ब्रह्मा की दी हुई प्रचंड शक्ति लक्ष्मण जी की ठीक छाती में लगी। वीर लक्ष्मण जी व्याकुल होकर गिर पड़े।

यह देखकर पवनपुत्र हनुमान जी कठोर वचन बोलते हुए दौड़े। हनुमान जी के आते ही रावण ने उन पर अत्यंत भयंकर घूँसे का प्रहार किया॥ हनुमान जी घुटने टेककर रह गए, पृथ्वी पर गिरे नहीं। और फिर क्रोध से भरे हुए सँभलकर उठे। हनुमान जी ने रावण को एक घूँसा मारा। वह ऐसा गिर पड़ा जैसे वज्र की मार से पर्वत गिरा हो।

हनुमान जी का यह संदेश अद्भुत है हमें भ्रमित भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हनुमान जी हम रामोपासकों की रक्षा के लिए अब भी हमारे साथ हैं l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने गुरुशिष्य के आदर्श संबन्ध को किस प्रकार व्याख्यायित किया, चोरबत्ती क्या है, भैया विनय अजमानी जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

30.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 30 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२६ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०८

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 30 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०८

श्रीरामचरितमानस, जो अत्यन्त सरल भाषा में है,का अध्ययन, चिन्तन, मनन, पठन पाठन अवश्य करें l आत्मस्थ होने का कुछ समय भी निकालें l ध्यान, धारणा, आसन, व्यायाम,प्राणायाम, सात्विक भोजन की महत्ता को समझें l


सनातन धर्म आज भी विविध रूपों में फल-फूल रहा है और सम्पूर्ण मानवता का मार्गदर्शन कर रहा है। हमारा कर्तव्य है कि हम इसके सिद्धान्तों का निष्ठापूर्वक पालन करें। साथ ही शौर्य, पराक्रम, आत्मविश्वास और पुरुषार्थ की उपासना करें। कुंठा, हताशा और निराशा को अपने जीवन में स्थान न दें।

जब अकबर के कारण देश विषम परिस्थितियों से घिरा हुआ था तब गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस नामक अद्भुत महाग्रन्थ की रचना करके समाज को आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक शक्ति का अद्वितीय आधार प्रदान किया। मानस ने जन-जन में धर्म, शौर्य,पराक्रम , मर्यादा, कर्तव्य और आत्मविश्वास का संचार किया। यही कारण है कि यह महाग्रन्थ केवल अपने समय का ही नहीं, बल्कि आज भी हमारे जीवन का अमूल्य मार्गदर्शक बना हुआ है और भविष्य में भी मानवता का पथ आलोकित करता रहेगा।


गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥

तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन॥1॥


गुरु-कृपा से विवेक प्राप्त होता है, विवेक से  प्रभु श्रीराम का चरित्र समझ में आता है और  प्रभु श्रीराम का चरित्र मनुष्य को संसार की सांसारिकता के सारे कालुष्यों से मुक्त कर देता है। वनपथ पर चलने के पश्चात् प्रभु श्रीराम का जो रामत्व प्रकट हुआ है वह अवर्णनीय है l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने लंका कांड के वर्णन में आज क्या बताया,संसद का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

29.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा )विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 29 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०७

 अपने कुलगुरु व्यास, पतंजलि,विष्णुगुप्त इत्यादि सभी को;

है प्रणाम मेरा ऋषि मुनि हर वीर सुधी को। 

धर्म सनातन राष्ट्र पुरातन जगद्वंद्य भारतमाता को, 

परमपिता परमात्म शक्ति है मान्य जिसे उस हर भ्राता को  ---------।

आज गुरूपूर्णिमा की मंगल वेला में साष्टांग प्रणाम करता हूँ  !!!


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा )विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 29 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०७

यह अविश्वास का अंधकार है आत्मदीप हो जाओ,

युगचारण जागो कसो कमर फिर से भैरवी सुनाओ l

अपने संगठन के प्रति आदरभाव रखें, अधिवेशन को सफल बनाने के लिए तैयारियां प्रारम्भ कर दें l



कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।

तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥130 ख॥


जिस प्रकार एक कामी मनुष्य का मन निरंतर स्त्री में लगा रहता है और जिस प्रकार एक लोभी का चित्त हर समय धन में रमा रहता है, उसी प्रकार हे रघुनाथ! आप मुझे प्रत्येक क्षण, बिना किसी व्यवधान के, अत्यंत प्रिय लगें।


यदि हम इसी भाव में प्रविष्ट होकर श्रीरामचरितमानस का पाठ करें, तो उसका प्रभाव केवल वाणी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर पड़ेगा। हमारे भीतर बुद्धि की निर्मलता, भक्ति की गहराई, संयम की दृढ़ता, विचारों की प्रखरता और स्वाध्याय की रुचि विकसित होगी। साथ ही, सनातन धर्म की रक्षा के लिए, समाज और राष्ट्र की उन्नति हेतु आवश्यक शौर्य, पराक्रम, आत्मविश्वास और कर्तव्यनिष्ठा भी जाग्रत होगी।


आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर के  निर्वीर्य भाव का शमन करें। देवत्व को लांघकर ईश्वरत्व तक पहुंचने की कल्पना करें l धर्म,समाज और राष्ट्र को शक्तिसम्पन्न बनाने का प्रथम चरण स्वयं को शक्तिसम्पन्न बनाना है। जब व्यक्ति विचार, चरित्र और शौर्य से समृद्ध होता है, तभी वह परिवार, समाज और राष्ट्र के उत्थान में सार्थक योगदान दे सकता है। यही श्रीरामचरितमानस के सतत अध्ययन और मनन का वास्तविक फल है।

आजकल हम लोग मानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं जहां विभीषण समझ चुके हैं कि विजय केवल साधनों से नहीं, साधना से प्राप्त होती है। बाहरी रथ, शस्त्र और सेना सीमित सामर्थ्य देते हैं, किन्तु सत्य, शील, धैर्य, विवेक, संयम, परोपकार, भक्ति, ईश्वर-विश्वास और आत्मशक्ति से निर्मित धर्मरथ अजेय होता है।


सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज।

एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज॥


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया मनुस्मृति, कालिका पुराण, कूर्म पुराण (अध्याय ११), युक्ति कल्पतरु, चाणक्य,स्मृति कौस्तुभ, पुरुषार्थ चिन्तामणि आदि का उल्लेख क्यों हुआ ,व्यास पूजा क्या है जानने के लिए सुनें l

28.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२४ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०६

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 28 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०६


हम कायरता, निराशा, आलस्य और आत्महीनता को अपने ऊपर अधिकार न करने दें। यह हमारे गौरव और इस दिव्य मानव जीवन के अनुरूप नहीं है। हम अपने हृदय की तुच्छ दुर्बलताओं, भय, मोह और संशय का त्याग करें तथा धर्म, सत्य, कर्तव्य और राष्ट्रसेवा के पथ पर दृढ़तापूर्वक खड़े होकर निष्काम भाव से कर्म में प्रवृत्त हों। 




इन सदाचार वेलाओं का श्रद्धापूर्वक श्रवण कर हम  मुमुक्षु आत्मानन्द का अनुभव करें, उत्साहपूर्वक अपने कर्तव्यों के प्रति संकल्प जाग्रत करें तथा इस दुर्लभ मानव जीवन को ईश्वरप्रदत्त अनुपम अवसर मानें। निष्काम कर्मयोग की भावना से, फल की इच्छा का त्याग कर, सनातन धर्म, राष्ट्र-निष्ठ समाज और राष्ट्र के कल्याण हेतु निरन्तर कर्मरत रहने का दृढ़ संकल्प लें।

*उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत*

रामकथा हमें यही जीवन-दर्शन प्रदान करती है। भगवान श्रीराम, जिन्होंने जीवन को एक युद्ध माना, का सम्पूर्ण जीवन कर्तव्य, त्याग, मर्यादा और निष्काम कर्म का सजीव आदर्श है। उन्होंने प्रत्येक परिस्थिति में धर्म का आश्रय लिया, लोकमंगल को सर्वोपरि रखा और बिना किसी स्वार्थ के अपने जीवन को समर्पित किया।


आजकल हम लोग इसी रामकथा  के उस प्रसंग में प्रविष्ट हैं जब भयभीत भ्रमित विभीषण को भगवान् राम समझा रहे हैं

विजय बाहरी अस्त्र-शस्त्र या भौतिक सामर्थ्य से नहीं, बल्कि सद्गुणों से निर्मित धर्मरथ पर आरूढ़ होकर ही प्राप्त होती है। जिस व्यक्ति के जीवन में शौर्य और धैर्य का संतुलन हो, सत्य और सदाचार उसकी पहचान हों, बल के साथ विवेक और आत्मसंयम जुड़ा हो तथा उसका प्रत्येक कर्म परोपकार की भावना से प्रेरित हो, उसके जीवन का रथ सम्यक् दिशा में अग्रसर होता है। इस रथ को नियंत्रित करने वाली लगाम क्षमा, करुणा और समता हैं, जो शक्ति को मर्यादा प्रदान करती हैं और व्यक्ति को अहंकार से बचाती हैं l

विभीषण को समझ में आ जाता है 

इसके अतिरिक्त भैया पवन जी, भैया पंकज जी के नाम लेकर आचार्य जी ने सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै के भाव को कैसे स्पष्ट किया,आचार्य जी ने किसे ध्यान, विधान,ज्ञान का मंगल अनुमोदन बताया, देशदर्शन क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें l

27.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 27 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 27 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०५

प्रातःकाल का हमारा जागरण हो ,  इसके पश्चात् हम शरीर का मार्जन करें ,मन के परिमार्जन  हेतु सदाचारमय विचार ग्रहण करें और अपने लक्ष्य का ध्यान रखते हुए कर्मरत हों l



रावण ने अपने आतंक को केवल बल के आधार पर नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीति के माध्यम से फैलाया। उसने अनेक राक्षसों और अपने समर्थकों को विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित किया। ताड़का, खर, दूषण और त्रिशिरा जैसे राक्षस वन क्षेत्रों में सुतीक्ष्ण शरभंग आदि ऋषियों, तपस्वियों पर अत्याचार कर रहे थे। अनेक वनवासी समुदाय भी उसके प्रभाव या भय के कारण उसके पक्ष में दिखाई देते हैं । इस प्रकार रावण ने आतंक का एक संगठित जाल बिछा रखा था।

उस समय अनेक शक्तिशाली राजा अपने-अपने राज्य और दायित्वों तक सीमित रहे। राजा दशरथ ने देवासुर संग्राम में इन्द्र की सहायता कर शम्बर का वध किया, किन्तु  रक्तपिपासु रावण के विरुद्ध कोई अभियान नहीं छेड़ा l इसी प्रकार मिथिला के राजा जनक का मुख्य ध्यान अपने राज्य और आध्यात्मिक जीवन पर केन्द्रित था। इस परिस्थिति में ऋषियों,मुनियों पर होने वाले अत्याचार निरन्तर बढ़ते गए।

यह प्रसंग हमें संकेत देता है कि जब समाज का नेतृत्व व्यापक संकट के प्रति संगठित होकर खड़ा नहीं होता, तब अधर्म और आतंक को विस्तार का अवसर मिल जाता है। इसलिए किसी भी युग में राष्ट्र और समाज की सुरक्षा सजग नेतृत्व, सामाजिक एकता और धर्मनिष्ठ नागरिकों से सुनिश्चित होती है।

आज भी यदि राष्ट्रविरोधी शक्तियाँ समाज में भ्रम, भय, विभाजन का प्रयास करें, तो उनसे सतर्क रहना आवश्यक है l

इतिहास का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यदि हम भी केवल अपने में मग्न रहें और समाज तथा राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों से विमुख हो जाएँ, तो सनातनधर्मी समाज और भारत राष्ट्र के लिए अनिष्टकारी शक्तियों को अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। सजग, उत्तरदायी और संगठित समाज ही ऐसे प्रयासों का प्रभावी उत्तर दे सकता है।

भगवान राम का जीवन सिखाता है कि सज्जन व्यक्ति केवल अपने संसार तक सीमित नहीं रहता। वह समाज, धर्म और लोकमंगल के लिए भी उत्तरदायित्व निभाता है। जहाँ अधर्म और आतंक निर्दोषों को पीड़ित करें, वहाँ धर्मनिष्ठ व्यक्ति यथाशक्ति उनके संरक्षण और न्याय के लिए खड़ा होता है। हमें भी यही करना है l

इस प्रेरणा को प्राप्त करने के लिए आइये हम प्रवेश कर जाएं लंका कांड के युद्धक्षेत्र में जहां भगवान राम के ह्रदय में कोई भय नहीं कोई भ्रम नहीं उन्हें अपने शौर्य पराक्रम पर विश्वास है


वे शंकालु विभीषण

(नाथ न रथ नहिं तन पद त्रानां । केहि बिधि जितब बीर बलवाना ।)


 को उत्तर देते हैं 

सुनहु सखा कह कृपानिधाना । जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना । २ ।

सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ।

बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे । ३ ।

ईस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ।

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा । बर बिग्यान कठिन कोदंडा । ४ ।

इसे आचार्य जी ने किस प्रकार समझाया, यम नियम के विषय में क्या बताया, अधिवेशन की चर्चा क्यों की जानने के लिए सुनें l

26.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 26 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२२ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०४

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 26 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०४

 हम अपने को भौतिक भंवर से निकालकर कुछ समय यदि आध्यात्मिक चिन्तन, स्वाध्याय,आत्ममन्थन के लिए देते हैं तो निश्चित रूप से हमारा मन उल्लसित रहेगा हमें धैर्य,भक्ति,शक्ति,शौर्य,पराक्रम प्राप्त होगा l


हमारा सनातन धर्म अद्भुत, अनादि और अनन्त है। वेदों के दिव्य मन्त्र, उपनिषदों के अमृततुल्य उद्धरण तथा पुराणों के प्रेरणादायी आख्यान हमारी अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर हैं। यही हमारे जीवन का बल, हमारी संस्कृति का आधार और हमारे आत्मविश्वास का स्रोत हैं। ये हमें ज्ञान, विवेक, साहस, धैर्य और धर्मनिष्ठा की शक्ति प्रदान करते हैं तथा प्रत्येक परिस्थिति में सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा देते हैं।

पश्चिमी प्रभावों से भ्रमित होकर यदि हम  वेद, उपनिषद और पुराणों को हेय दृष्टि से देखते हैं, तो हमारा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पतन निश्चित है । इस पतन से बचने के लिए शिक्षा का महत्त्व सर्वोपरि हो जाता है। शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य, स्वावलम्बन और सुरक्षा  हमारी संस्था के चिंतन और कार्य के प्रमुख आयाम हैं।

जब हम संसार की परिस्थितियों को सम्यक् दृष्टि से समझकर उन्हें आत्मसात् करते हैं, तब हम परिस्थितियों के दास नहीं रहते, बल्कि उन पर विवेकपूर्ण दृष्टि से विचार करने लगते हैं।  हमारे भीतर यह दृढ़ विश्वास जाग्रत होता है कि प्रत्येक परिस्थिति में हमें राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करते हुए सदैव जागरूक रहना है। वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः l

गोस्वामी तुलसीदास ने अपने समय की विषम परिस्थितियों को गहराई से समझा। उन्होंने सनातनधर्मी समाज की निराशा, विघटन और सांस्कृतिक शिथिलता को पहचानकर श्रीरामचरितमानस के माध्यम से जन-जन को धर्म, सदाचार, आत्मविश्वास और राष्ट्रचेतना के प्रति जाग्रत किया। इसी ग्रंथ के लंका कांड में आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं और उसमें आज हम लोग  एक अत्यन्त प्रेरक प्रसंग *धर्मरथ*, जिसे विभीषण -गीता और राम -गीता के नाम से भी जाना जाता है, में प्रवेश करने जा रहे हैं


यहां गोस्वामी तुलसीदासजी बताते हैं कि जीवन के वास्तविक संघर्षों में विजय बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि धर्मरूपी रथ से प्राप्त होती है। विभीषण व्याकुल हैं भ्रमित हैं 

रावण की सेना में  असंख्य अस्त्र शस्त्र हैं 

और हमारी ओर 


नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥

केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥5॥

विभीषण कहते हैं 


नाथ! न रथ, नहिं तन पद त्राना।

केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥

अर्थात्, "हे नाथ! आपके पास न रथ है, न शरीर का कवच और न ही पैरों में  पदत्राण। ऐसे में आप उस बलवान रावण को कैसे जीतेंगे?"

तब भगवान राम उसे उत्तर देते हैं 


इसके अतिरिक्त भैया पंकज जी भैया पवन जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

25.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 25 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२१ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०३

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 25 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०३

हमारा संकल्प हो कि जीवन का प्रत्येक क्षण कर्ममय बने। तब आयु हमें नहीं रोकेगी, परिस्थितियाँ हमें नहीं झुकाएँगी और अंतिम श्वास तक हम कर्तव्यपथ पर अविचल चलते रहेंगे।




शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलम्बन और सुरक्षा—इन चार आधारभूत आयामों को केन्द्र में रखकर हमारी संस्था युगभारती, जिसके लिए प्रेम और आत्मीयता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, व्यक्ति, परिवार,समाज और भारत राष्ट्र,जहां अनगिनत महापुरुषों ने निष्काम कर्मयोगी बनकर अपने त्याग, तप,  परिश्रम, शौर्य, पराक्रम और बलिदान से  वैभव, गौरव और विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित किया,के सर्वांगीण विकास हेतु कार्य और व्यवहार के स्तर पर सतत आगे बढ़ रही है। हमारा प्रयास केवल विचार देने तक सीमित नहीं, बल्कि उन्हें जीवन में उतारकर व्यक्ति, परिवार,समाज  और राष्ट्र को सशक्त, संस्कारित तथा आत्मनिर्भर बनाना है। इन्हीं चार स्तम्भों के आधार पर हम अत्यन्त पवित्र उद्देश्य के साथ निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर हैं।

हमारा प्रयास मनुष्यत्व से ईश्वरत्व की ओर आरोहण का है। यह मार्ग आत्मसंयम, सदाचार, सेवा, त्याग और लोकमंगल से प्रशस्त होता है। किन्तु जो व्यक्ति, संस्था, दल या विचारधारा समाज में विभाजन, स्वार्थ, हिंसा, घृणा अथवा नैतिक पतन को बढ़ावा दे रही हो वह राष्ट्रसेवा के आदर्श को  चरितार्थ नहीं कर सकती। यह सदैव हम ध्यान में रखें l


श्रीरामचरितमानस में धर्मरथ वाला प्रसंग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है 

धर्मरथ हमारी शक्ति और भक्ति का आधार है l हनुमान जी  जो निश्चिन्त और निष्काम भक्त हैं और जिनके जीवन में दुविधा का कोई स्थान नहीं, से इतर विभीषण दुविधाग्रस्त भक्त हैं तभी वे प्रश्न करते हैं 

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥ अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥१ll 

इसका क्या उत्तर मिलता है इसकी प्रतीक्षा हम कल तक करें 


और इसके अतिरिक्त किस प्रकार के शिक्षकों की आवश्यकता है भैया पुनीत जी और भैया अजीत जी का उल्लेख क्यों हुआ, उन्नाव विद्यालय में इस समय कौन से कार्य चल रहे हैं जानने के लिए सुनें

24.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष दशमी / एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 24 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२० वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०२

 ओ वीर वंशधर फिर अपना इतिहास पढ़ो।

अभिमंत्रित कर लो अपनी कुलिश-कृपाणों को।

आतंकी पारावार ज्वार पर इतराता,

संधान करो तरकश के पावक वाणों को।

आ गया समय फिर से अंगार उगलने का,

अरिदल से कह दो आओ काल बुलाता है।।६।।

*आओ काल बुलाता है*

पृष्ठ ६०, ६१, ६२

गीत मैं लिखता नहीं हूं

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष दशमी / एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 24 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०२

जब राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है, तब व्यक्तिगत आग्रह, अहंकार, मतभेद और विवाद स्वतः ही गौण हो जाते हैं। ऐसे समय हमारा प्रत्येक विचार, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक कर्म राष्ट्र, धर्म तथा संगठन की गरिमा को बढ़ाने वाला होना चाहिए।

आइए, हम स्वयं से एक प्रश्न करें—क्या हमारी चर्चा और हमारा व्यवहार राष्ट्र, धर्म तथा संगठन को सशक्त कर रहा है, या अनजाने में उनकी गरिमा को आहत कर रहा है ?

यदि आहत कर रहा है तो यही उचित समय है कि हम विवाद का नहीं, संवाद का मार्ग अपनाएँ, आग्रह का नहीं, समर्पण का परिचय दें  और व्यक्तिगत मतों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए आगे बढ़ें। यही हमारे वैदिक आदर्श *वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः* की सच्ची साधना है।



*वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः*

यजुर्वेद का यह दिव्य मन्त्र केवल उच्चारण का विषय नहीं, अपितु हमारे जीवन का संकल्प है। यही हमारी शक्ति,भक्ति,तत्त्वचिन्तन, विचार, संयम और कर्तव्यबोध का आधार है। इसका भाव है कि हम राष्ट्र  के लिए सदैव जागरूक रहें, सनातनी राष्ट्रभक्त समाज को जाग्रत रखें तथा धर्म, संस्कृति और सदाचार के प्रकाश से राष्ट्र का पथ आलोकित करें। हम राष्ट्र का बोध प्रबल रखें और भ्रमित होने से बचें l कालनेमियों से सावधान रहें l प्रवाहपतित होने से बचें l राष्ट्रविरोधी शक्तियों के विरुद्ध दृढ़ संकल्प के साथ खड़े हों l  अपने आत्मतत्व को हम जाग्रत करें l

ध्यान रखें 

"प्रचण्ड तेजोमय शारीरिक बल, प्रबल आत्मविश्वास युक्त बौद्धिक क्षमता एवं निस्सीम भाव सम्पन्ना मनः शक्ति का अर्जन कर अपने जीवन को निःस्पृह भाव से भारत माता के चरणों में अर्पित करना ही हमारा परम साध्य है l" 



इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया ओम प्रकाश जी भैया,मोहन जी, प्रो रघुवंश जी जो जन्मजात विकलांग थे पर क्या आरोप लगा था, मुक्तियज्ञ और संघर्षगाथा की चर्चा क्यों हुई, प्रभाकर माचवे, निराला और अज्ञेय के विषय में आचार्य जी ने क्या कहा, नरोस क्या है जानने के लिए सुनें

23.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 23 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८१९ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०१

 ताहि कि संपति सगुन सुभ, सपनेहुँ मन बिश्राम।भूतद्रोह रत मोहबस, राम बिमुख रति काम॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 23 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८१९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३०१


जब-जब सत्य संकट में पड़ता है, तब-तब त्याग, शौर्य, पराक्रम और संकल्प से युक्त महापुरुष उठ खड़े होते हैं और इतिहास की दिशा परिवर्तित कर देते हैं। हम भी इसी प्रकार बनने का प्रयास करें l


जब महाराणा प्रताप और उनके छोटे भाई शक्ति सिंह के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों स्वातियां खींचकर आमने-सामने आ गए, तब उनके कुलपुरोहित पंडित नारायणदास ने यह देखकर कि यदि दोनों भाइयों में से किसी एक की मृत्यु हुई तो मेवाड़ की अपूरणीय क्षति होगी, उन्हें रोकने का भरसक प्रयास किया।

जब दोनों नहीं माने, तब पुरोहित ने कहा कि राजपूतों का रक्त आपस में नहीं, राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए बहना चाहिए। अंततः दोनों को रोकने के लिए उन्होंने स्वयं अपनी कटार अपने वक्ष में भोंक ली और प्राण त्याग दिए। उनके इस आत्मबलिदान से दोनों भाइयों का क्रोध शांत हुआ और युद्ध टल गया।

यह प्रसंग इस तथ्य का उत्कृष्ट उदाहरण है कि भारतीय परंपरा में "पुरोहित" केवल कर्मकाण्ड कराने वाला व्यक्ति नहीं था, बल्कि धर्म, नीति, समाज और राष्ट्र का मार्गदर्शक था। इसी भावना को वेद का यह मंत्र व्यक्त करता है

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः। हम राष्ट्र में जागृति उत्पन्न करने वाले, मार्गदर्शक और धर्मरक्षक बनें l

हमारा भी यही लक्ष्य है  ऋषितुल्य पण्डित दीनदयाल जी की स्मृति में स्थापित विद्यालय में हम अध्ययन कर चुके हैं और यह हमारे लिए गौरव का विषय है किन्तु हमारा एक उत्तरदायित्व भी है। उस पावन विद्यालय से प्राप्त संस्कारों का ऋण हमें केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने चरित्र,व्यवहार,समाजोन्मुखता और राष्ट्रनिष्ठ जीवन से चुकाना ही चाहिए l परिस्थितियां इस समय भी अत्यन्त विषम हैं देव और असुर का संघर्ष आज भी चल रहा है l


भावों का ज्वालामुखी मचलता जब उर में

 हर शब्द दहकता अंगारा बन जाता है

 सुधियों में उतरा करता है इतिहास अमर

संकल्प अकल्पित मानस में ठन जाता है । 


उपहास सत्य का जब दर-दर होने लगता

 गूँजता गगन में वृत्रासुर का अट्टहास

देवता दीन-दुर्बल हो पन्थ भटकते हैं


तब युग-दधीचि आकर अड़ जाते अनायास

यह देवासुर संग्राम सत्य है 'सत्ता' का 

चिन्तन कहता है इस पर विवश विधाता है


इसके अतिरिक्त सरौंहा निवासी भैया प्रभाकर जी उपाख्य रौनक जी, भैया प्रतीक मालवीय जी, भैया मनीष कृष्णा जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

22.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष नवमी (भड़ली नवमी) विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 22 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८१८ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३००

 अस्मिञ्जीवति वीरे तु हतमप्यहतं बलम्।हनूमत्युज्झितप्राणे जीवन्तोऽपि मृता वयम्॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष नवमी (भड़ली नवमी)

विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 22 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८१८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३००

आर्ष साहित्य केवल कथाओं का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत मार्गदर्शन है। इसे केवल पढ़ें नहीं, आत्मसात् करें और उसके सनातन संदेश को आज की पीढ़ी तक उनकी भाषा और शैली में पहुँचाएँ।


हमारा आर्ष साहित्य मात्र कथाओं का संग्रह नहीं है, बल्कि जीवन के शाश्वत सत्य, आदर्श, तप ,त्याग, समर्पण, शौर्य, पराक्रम,कर्तव्य, करुणा और राष्ट्रधर्म का अमूल्य भण्डार है।  हम इन कथाओं को केवल पढ़कर न छोड़ दें l आवश्यक यह है कि हम उन कथाओं में प्रविष्ट हों, उनके पात्रों के मनोभावों को समझें, उनकी परिस्थितियों का अनुभव करें और उनके निर्णयों के पीछे निहित तत्त्वज्ञान को आत्मसात् करें।

आज की नई पीढ़ी की भाषा, सोच और जीवन-शैली भिन्न है। इसलिए केवल छंदों या पारम्परिक शैली में उपदेश देने के स्थान पर हम उन्हीं सनातन सत्यों को आधुनिक उदाहरणों, संवादों, चित्रों, लघु चलचित्रों, कथाओं और सरल भाषा के माध्यम से प्रस्तुत करें l

आजकल हम लोग लंका कांड /युद्ध कांड में प्रविष्ट हैं 

कुम्भकर्ण युद्धभूमि में उतरकर अपने अद्भुत बल और पराक्रम से वानर-सेना में भारी हाहाकार मचा देता है। वह असंख्य वानरों का संहार करता है, जिससे सेना भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगती है।

तब श्रीराम स्वयं युद्ध के लिए आगे बढ़ते हैं। दोनों महावीरों के बीच घोर युद्ध होता है। श्रीराम अपने तीक्ष्ण बाणों से पहले कुम्भकर्ण के हाथ काट देते हैं, फिर उसके चरण भी विच्छिन्न कर देते हैं। अंततः दिव्य बाण से उसका विशाल मस्तक काटकर उसका वध कर देते हैं। इसके पश्चात् रावण मेघनाद को पुनः युद्धक्षेत्र में उतरने के लिए कहता है मेघनाद वहां जाने से पहले यज्ञ के लिए सज्ज होता है विभीषण एक रहस्य श्रीराम को बताते हैं कि निकुम्भिला में यज्ञ पूर्ण कर लेने पर मेघनाद को लगभग अजेय होने का वर प्राप्त हो जाएगा l

श्रीराम की आज्ञा से लक्ष्मण, विभीषण के साथ निकुम्भिला पहुँचे और यज्ञ पूर्ण होने से पहले ही उसे युद्ध के लिए विवश किया। घोर युद्ध होता है l

मेघनाद सबको पराभूत कर देता है विभीषण यह सब देख रहे हैं वे जाम्बवान् के पास पहुँचे, तो उन्होंने सबसे पहले हनुमान जी का समाचार पूछा। विभीषण के आश्चर्य व्यक्त करने पर जाम्बवान् बोले— "यदि हनुमान जीवित हैं, तो हम सब जीवित हैं 'l

युद्ध के बाद लक्ष्मण ने  मेघनाद का वध  कर दिया।



इसके अतिरिक्त सरौंहां के भैया रौनक जी की मां जी की चर्चा क्यों हुई, भैया अशोक त्रिपाठी जी का उल्लेख क्यों हुआ,विशल्यकरणी,सन्धानी तथा सुवर्णकरणी क्या हैं जानने के लिए सुनें

21.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष अष्टमी (आज मासिक दुर्गाष्टमी और पार्वती जयंती का विशेष संयोग ) विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 21 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८१७ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९९

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष अष्टमी (आज मासिक दुर्गाष्टमी और पार्वती जयंती का विशेष संयोग ) विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 21 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८१७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९९

अपने भीतर रामत्व पल्लवित करने का प्रयास प्रारम्भ कर दें और रावणत्व के निरसन का मार्ग खोज लें l 


रामत्व और रावणत्व का संघर्ष केवल एक युग की कथा नहीं है  l देवासुर संघर्ष आज भी निरन्तर चल रहा है। यह संघर्ष हमारे अपने शरीर में, मन में, परिवार में, समाज में, राष्ट्र में और सम्पूर्ण विश्व में उपस्थित है। रामत्व सत्य, धर्म, मर्यादा, करुणा, शौर्य और पराक्रम का प्रतीक है, जबकि रावणत्व अहंकार, अन्याय, स्वार्थ और अधर्म का स्वरूप है।

हमारा कर्तव्य है कि हम समय की परिस्थितियों की भयानकता को पहचान लें, कालनेमियों के छल कपट को जान लें और धर्म की रक्षा के लिए उचित प्रहार करना सीख लें । केवल समस्याओं पर शोक करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके मूल कारणों को समझकर उन पर  विवेक,तप, त्याग, समर्पण, शौर्य, पराक्रम और संगठन के साथ प्रहार करना ही रामत्व का मार्ग है।  अकबर के शासन की विषम परिस्थितियों में वीरत्व की उपासना में सदैव रत रहने वाले गोस्वामी मार्गदर्शक राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी तुलसीदास जी ने यही संदेश श्रीरामचरितमानस की कथा के माध्यम से देने का प्रयास किया है l यह कथा हमारे आध्यात्मिक जीवन के साथ भौतिक जीवन में भी कल्याणकारी है l इस कथा का मर्म अत्यन्त गहन है l

कुम्भकर्ण युद्धक्षेत्र में प्रवेश कर चुका है उसका भयानक स्वरूप हर क्षण प्रकट हो रहा है 


पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि। जहँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि॥

चली बलीमुख सेन पराई। अति भय त्रसित न कोउ समुहाई॥5॥


इसके बाद कुम्भकर्ण ने नल और नील को भी भूमि पर पटक दिया। वह वीर वानरों को पकड़-पकड़कर चारों ओर पटकने लगा। उसके इस प्रचण्ड पराक्रम से वानर-सेना भागने लगी। सब अत्यन्त भयभीत और आतंकित हो गए; किसी में भी रुककर सेना को संगठित करने का साहस नहीं रहा।

जब रावणत्व की शक्तियाँ प्रबल होती हैं, तब अच्छे और पराक्रमी लोग भी कुछ समय के लिए विचलित हो सकते हैं।परिस्थितियाँ इतनी भयावह हो जाती हैं कि संगठन टूटने लगता है और प्रत्येक व्यक्ति अपनी रक्षा में लग जाता है।ऐसे समय में केवल शारीरिक बल पर्याप्त नहीं होता; धैर्य, नेतृत्व, संगठन और भगवान् पर अटूट विश्वास ही विजय का मार्ग प्रशस्त करते हैं यही कारण है कि आगे श्रीराम और उनके महान् सेनानायकों के नेतृत्व में वही बिखरी हुई सेना पुनः संगठित होकर अधर्म पर विजय प्राप्त करती है।


सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन।

मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन॥67॥

कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा॥

प्रथम कीन्हि प्रभु धनुष टंकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा॥1॥

श्रीराम ने हाथ में अपना दिव्य धनुष  धारण किया, कमर में बाणों का तरकस बाँधा और शत्रु-सेना का विनाश करने के लिए आगे बढ़े। युद्ध आरम्भ करने से पहले उन्होंने अपने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाकर ऐसा प्रचण्ड टंकार किया कि उसकी गर्जना सुनकर शत्रु-सेना मानो स्तब्ध और बधिर-सी हो गई।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,भावार्थ रामायण और अध्यात्म रामायण का उल्लेख क्यों हुआ, परस्पर के शुद्धीकरण के लिए आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया जानने के लिए सुनें l

20.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 20 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८१६ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९८

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 20 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८१६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९८

जो मनुष्य संसार में लिप्त होकर केवल सांसारिक भोगों की प्राप्ति के लिए आजीवन योजनाएँ और प्रबन्ध करता रहता है, उसे क्षणभर भी वास्तविक शान्ति प्राप्त नहीं होती। जितनी अधिक उसकी आसक्ति बढ़ती है, उतना ही उसका मन विक्षिप्त, चंचल और अशान्त होता जाता है।

इसलिए आवश्यक है कि हम अपना जीवन शौर्य से विभूषित आध्यात्मिक चिन्तन की ओर मोड़ें। कर्म अवश्य करें, किन्तु उसके फल की आकांक्षा में स्वयं को न बाँधें। 




जब भगवान् श्रीराम अपनी अवतार-लीला पूर्ण कर वैकुण्ठधाम को पधारने लगे, तब उन्होंने धर्म की रक्षा,हम सत्पुरुषों के पालन तथा दुष्टों के दमन का दायित्व अपने परमप्रिय भक्त श्रीहनुमान जी को सौंप दिया। श्रीहनुमान जी ने भी प्रभु के आदेश को अपने जीवन का परम धर्म मानकर स्वीकार किया।

तभी से वे इस पृथ्वी पर चिरंजीवी रूप में विराजमान हैं। जहाँ कहीं भी श्रीराम के नाम का स्मरण होता है, धर्म संकट में पड़ता है अथवा कोई भक्त निष्कपट भाव से उन्हें पुकारता है, वहाँ पवनपुत्र हनुमान उसकी रक्षा के लिए उपस्थित हो जाते हैं।

हम सब अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं कि आज भी श्री हनुमान जी जैसे जाग्रत देव हमारे रक्षक, मार्गदर्शक और संकटमोचक बने हुए हैं।

शिक्षित होना और अक्षरज्ञानी होना—दोनों में गहरा अन्तर है।

अक्षरज्ञान केवल पढ़ना-लिखना सिखाता है, जबकि वास्तविक शिक्षा मनुष्य के भीतर विवेक, चरित्र, आत्मबोध और धर्मनिष्ठा का जागरण करती है।


वह शिक्षा ही सार्थक है जो हमें अध्यात्म की अनुभूति कराए, सत्य के मार्ग पर चलना सिखाए और अन्याय के विरुद्ध निर्भीक होकर खड़े होने का शौर्य भी प्रदान करे। भगवान् राम ने जहाँ धर्म की रक्षा आवश्यक हुई, वहाँ निर्भय होकर शस्त्र उठाए l


आइये प्रवेश कर जाएं कथा में 


संजीवनी बूटी के प्रभाव से जब लक्ष्मण जी पुनः सचेत हुए, तब सम्पूर्ण वानर-सेना में हर्ष की लहर दौड़ गई। श्रीराम ने हनुमान जी को हृदय से लगाकर उनके अद्वितीय पराक्रम, भक्ति और सेवा की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की। इसके पश्चात् युद्ध पुनः आरम्भ हुआ। 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भैया अनुराग तिवारी जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

19.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 19 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८१५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९७

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 19 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८१५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९७


सांसारिक अहंकार से बचना और तात्त्विक अहंकार की अनुभूति करना — यही आध्यात्मिक जीवन का सार है।

सांसारिक अहंकार कहता है— "मैं शरीर हूँ, मैं धनवान हूँ, मैं विद्वान हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ।" यही अहंकार बन्धन, राग-द्वेष और दुःख का कारण बनता है।

तात्त्विक अहंकार के अनुसार — " मैं शुद्ध, बुद्ध, नित्य आत्मा हूँ; परमात्मा का अंश हूँ।" यह आत्मस्वरूप का बोध है। इससे विनय, समता, करुणा और परमात्मा के प्रति समर्पण उत्पन्न होता है।




भगवान श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं, अपितु स्वयं परम तत्त्व हैं। वे इस जगत से परे होते हुए भी अपनी इच्छा से इसी संसार में अवतरित हुए। जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि हुई, तब उन्होंने मानव रूप धारण कर इस सृष्टि के सत्त्व में स्वयं को प्रकट किया। उनका अवतार असुरों के संहार, सज्जनों की रक्षा, धर्म की पुनः स्थापना तथा मानव जीवन के लिए आदर्श मर्यादा स्थापित करने के लिए हुआ l उन्होंने भारत के जन जन में रामत्व प्रसारित कर दिया l हमें उसी रामत्व की अनुभूति करनी चाहिए l इसी की  अनुभूति कराने का प्रयास विषम काल में तुलसीदास जी ने अद्भुत श्रीरामचरितमानस  काव्य रचकर किया जिसमें कथा, ज्ञान, उपदेश है , विषम परिस्थितियों से निकलने का उपाय बताया गया है l

एक अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक है 


काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।

सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे॥

यह श्लोक आचार्य मम्मट कृत काव्यप्रकाश (प्रथम उल्लास) का प्रसिद्ध श्लोक है, जिसमें काव्य के प्रयोजनों यश की प्राप्ति,धन की प्राप्ति,लोकव्यवहार का ज्ञान,अशुभ का निवारण,तत्काल आनन्द की प्राप्ति और मधुर रीति से उपदेश देना,का वर्णन किया गया है। काव्य का अर्थ भी अत्यन्त गम्भीर होता है l

आजकल हम लोग मानस की कथा में प्रविष्ट हैं


भरतजी की  बात सुनकर एक बार तो भक्त हनुमान जी के मन में अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझ से बाण कैसे चलेगा? किन्तु इसके पश्चात्  प्रभु श्री राम जी के प्रभाव का विचार करके वे भरतजी के चरणों की वंदना करने लगे 

भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।

मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार॥60 ख॥


जिस भरतजी की शक्ति पर एक क्षण के लिए हनुमान जी को संदेह हुआ था, उसी भरतजी के सामर्थ्य और भक्ति का अनुभव होते ही उनका हृदय श्रद्धा से भर गया। वे समझ गए कि सच्चा बल शरीर का नहीं, भगवान के चरणों में अनन्य प्रेम का होता है।

और वहाँ लक्ष्मणजी को देखकर श्री रामजी साधारण मनुष्यों के समान अत्यन्त व्याकुल हैं भगवान राम कहते हैं 

पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार- ये जगत में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, गीतावली का उल्लेख क्यों हुआ, हमने समस्याओं के निरसन हेतु जन्म लिया है या उन्हें भोगने के लिए, जानने के लिए सुनें l

18.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८१४ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९६

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 18 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८१४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९६

आज भी रावण विद्यमान है 

उसे समाप्त करने के लिए हम अपनी कर्मठता का दीपक जलाएं समाज और देश के हित के लिए जो कुछ भी कर सकें अवश्य करें l


दीर्घकाल से यह सदाचार-संप्रेषण निरन्तर चल रहा है। यह पूज्य आचार्य जी और हम सभी के मध्य  एक सुदृढ़ सेतु है। इसी के माध्यम से हमारा पारस्परिक सम्पर्क तथा आत्मीय सम्बन्ध सतत बने हुए हैं। हम सौभाग्यशाली हैं कि आचार्य जी का मार्गदर्शन, प्रेरणा और स्नेह निरन्तर हम तक पहुँच रहा है तथा हम सब भी अपने विचारों और जिज्ञासाओं को उनके समक्ष निवेदित करते रहते हैं। इस प्रकार यह सदाचार-संप्रेषण हम सबको एक सूत्र में आबद्ध कर संगठन, संस्कार और साधना की भावना को निरन्तर पुष्ट कर रहा है।

इन दिनों हम सब रामकथा के अमृतमय प्रवाह में अवगाहन कर रहे हैं। यदि रामकथा का एक अंश भी हमारे जीवन में उतर आए, यदि रामत्व की एक किरण भी हमारे आचरण में प्रकाशित हो जाए, तो यही कथा-श्रवण सार्थक हो जाएगा l

मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।

समुझी नहिं तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत॥ 30(क)॥


गोस्वामी तुलसीदास जी के गुरु श्री नरहर्यानन्द जी रामकथा के माध्यम से जो समझाना चाहते थे, तुलसीदास जी उसको पूर्णतः नहीं समझ पाए।


हमारी स्थिति भी ऐसी ही है। परमात्मा जो कहता है और जो हमसे करवाना चाहता है यदि हम उसकी इच्छा को समझ लें और उसके अनुसार चलें तो हम भी वही हो जाएं l 

किन्तु तुलसीदास जी को जब रामकथा का तत्त्व हृदयंगम हुआ, तब वे स्वयं राममय हो गए और उनकी वाणी से अद्भुत ग्रंथ 'श्रीरामचरितमानस' का प्राकट्य हुआ।

जिसके मर्म को प्रसारित करते करते उन्होंने संपूर्ण सनातनधर्मी समाज को जाग्रत करने का प्रयास किया l 


इस समय हम लोग अयोध्या में प्रविष्ट हैं 

हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने गये थे । लौटते समय अयोध्या के ऊपर से गुजरते हुए भरत जी उन्हें कोई राक्षस समझकर बाण चला देते हैं। बाण के प्रभाव से हनुमान जी नीचे गिर जाते हैं और पूरी घटना (लक्ष्मण जी को शक्ति लगने और बूटी लाने की) बताते हैं l 

भरत जी को ज्ञात हुआ कि ये तो श्रीराम के परम भक्त हनुमान हैं। उन्होंने अत्यन्त विनयपूर्वक उनसे क्षमा माँगी, उनका सम्मान किया l इसके पश्चात् 

तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता॥

चढ़ु मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता॥3॥


भरत जी ने प्रेमपूर्वक कहा—"वत्स! यदि तुम ऐसे जाओगे तो बहुत देर हो जाएगी। प्रभात हो जाने पर तुम्हारा कार्य बिगड़ जाएगा। अतः तुम मेरे बाण पर इस पर्वत सहित बैठ जाओ। मैं तुम्हें उस स्थान पर पहुँचा देता हूँ जहाँ कृपा के धाम श्रीराम विराजमान हैं।"


समाज और राष्ट्र के लिए पूर्णरूपेण समर्पित मां कैकेयी के बारे में आचार्य जी ने क्या बताया, भैया जीतेन्द्र जी का उल्लेख क्यों हुआ, अयोध्या दर्शन वास्तव में क्या है जानने के लिए सुनें

17.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 17 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८१३ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९५

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 17 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८१३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९५

इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कर्म के अनुसार योग, भोग और रोग का अनुभव करता है। संसार अपनी गति से चल रहा है और हम भी जीवन-पथ पर निरन्तर अग्रसर हैं। इस यात्रा में यदि हम सनातनधर्मी राष्ट्रभक्तों को समान भावों वाले सहयात्री मिल जाएँ, तो काँटों से भरा मार्ग भी आनंदमय प्रतीत होता है। परन्तु यदि साथी उचित न हों , तो सुख-सुविधाओं से युक्त यात्रा भी मन को संतोष नहीं दे पाती।

इसीलिए हमारा प्रयास एक ऐसे सुदृढ़, संस्कारित,राष्ट्र और समाज के लिए सदैव समर्पित संगठन का निर्माण करना होना चाहिए, जो  हमारे जैसे प्रत्येक व्यक्ति को उचित दिशा, शक्ति और प्रेरणा प्रदान करे।

*संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढ़े चलो।*

*भला हो जिसमें देश का, वह काम सब किए चलो।*




हम अणु आत्मा हैं और परमात्मा विभु आत्मा है। विस्मृति के कारण हम अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान पाते। वस्तुतः हमारा आत्मस्वरूप परमात्मा से अभिन्न है। उपनिषद् का "तज्जलान्" महावाक्य इसी सत्य का संकेत करता है कि यह सम्पूर्ण जगत उसी ब्रह्म से उत्पन्न, उसी में स्थित और अन्ततः उसी में लीन होता है। अतः आत्मस्वरूप का बोध होने पर ज्ञात होता है कि *अहं ब्रह्मास्मि* मेरा वास्तविक स्वरूप वही ब्रह्म है।

अवतरण और उद्धरण भगवान की अद्भुत लीला हैं। उनकी लीला कब, किस पर और किस प्रकार प्रकट हो जाए, यह कोई नहीं कह सकता। महर्षि वाल्मीकि ने ही आगे चलकर गोस्वामी तुलसीदास के रूप में अवतार लिया। इसी प्रकार यह भी सत्य है कि श्रीहनुमानजी ने शिलाओं पर रामकथा अंकित की थी। श्रद्धा की दृष्टि से ये प्रसंग हम भक्तों के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। मनुष्य की दृष्टि उसके अन्तःकरण पर निर्भर करती है। यदि हमारे भीतर मलिनता होगी, तो हम हर तथ्य का अनर्थ निकालेंगे; किन्तु यदि मन निर्मल, श्रद्धामय और विवेकयुक्त होगा, तो वही प्रसंग हमें सत्य, प्रेरणा और ईश्वर की लीला के रूप में दिखाई देंगे। इसी कारण हमें मनुष्यत्व की आराधना करनी चाहिए और अपनी सोच को सकारात्मक रखना चाहिए l

यही सकारात्मक सोच हनुमान जी ने रखी 

जब मेघनाद  के शक्ति-बाण से लक्ष्मणजी मूर्छित हो गए, तब वैद्य सुषेण ने कहा कि हिमालय के द्रोणगिरि  से कुछ विशिष्ट औषधियाँ लानी होंगी, जिनमें संजीविनी भी थी।

हनुमानजी तत्काल आकाशमार्ग से हिमालय पहुँचे। रात्रि होने के कारण वे निश्चित रूप से संजीविनी की पहचान नहीं कर सके। इसलिए उन्होंने पूरा पर्वत ही उखाड़ लिया l मार्ग में भरत जी अयोध्या की रक्षा में सन्नद्ध हैं वो पूजा ध्यान में मग्न नहीं हैं 


देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।

बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि॥58॥

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, 

चित्रकूट के राम -दर्शन की चर्चा क्यों की, कायमगंज के भैया जीतेन्द्र जी और उनके ममेरे भाई की चर्चा क्यों की जानने के लिए सुनें l

16.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया /तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 16 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८१२ वां* सार -संक्षेप

 मैं संस्कृति के सामगान का चारण हूँ

क्रांतिमन्त्र का भावभरा उच्चारण हूँ।

महिमा-मण्डित सदाचारण की भाषा हूं 

तप का विग्रह संयम की परिभाषा हूँ॥ १॥


     मैं संस्कृति के...


राष्ट्र-यज्ञ का निष्ठापूर्ण समर्पण हूँ,

बलिदानी सुधियों का नियमित तर्पण हूँ।

एकमेव कर्मठता का विश्वासी हूँ,

मन-मन्दिर में रमा क्षेत्र-संन्यासी हूँ॥ २॥

     मैं संस्कृति के....

(साकल्य पृ ८७, ८८)


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया /तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 16 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८१२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९४

इन सदाचार-वेलाओं को ध्यानपूर्वक सुनें, भली-भाँति समझें, हृदय से स्वीकार करें कि हमारा सनातन धर्म अद्भुत है तत्पश्चात् उसके सिद्धान्तों को अपने जीवन में आचरण के रूप में उतारें। अपने लक्ष्य सदैव ध्यान में रखें हमारे लक्ष्य हैं 

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः

 

राष्ट्र -निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष 


परं वैभवं नेतुमेतत्स्वराष्ट्रं

समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥


तभी इन वेलाओं का श्रवण सार्थक होगा।


इन सदाचार वेलाओं के माध्यम से आचार्य जी नित्य हम साधकों को उत्साहित करते हैं वे हमें सचेत करते हैं कि हम संसार की हाय-हाय, आपाधापी और प्रपञ्चों में ही न उलझे रहें। कुछ समय आत्मचिन्तन के लिए निकालें और अनुभूति करें कि हम वास्तव में कौन हैं। हमारा वास्तविक स्वरूप शरीर या मन नहीं, अपितु शुद्ध आनन्दस्वरूप आत्मा है। इसी सत्य का उद्घोष  करते हुए भगवान आदि शंकराचार्य कहते हैं

अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो

विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।

सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः

चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥ ६॥


आजकल हम सब श्रीरामचरितमानस की पावन कथा में प्रविष्ट हैं। परमात्मा श्रीराम लोकमंगल के लिए नररूप धारण कर अपनी दिव्य लीलाओं का प्रदर्शन करने आए। मानस का श्रवण तभी सार्थक है, जब भगवान् श्रीराम के रामत्व का कुछ अंश भी हम अपने जीवन में उतार लें । यदि उनके सत्य, मर्यादा, करुणा, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग, सेवा, शौर्य, पराक्रम,धर्मपालन जैसे दिव्य गुणों को हम अपने आचरण में धारण कर लें, तभी कथा-श्रवण का वास्तविक फल प्राप्त होगा।

आइये कथा में पहुंच जाएं 

बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेजपुंज लछिमन उर लागी॥

मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥4॥

मेघनाद ने वीरघातिनी शक्ति चलाई। वह तेजपूर्ण शक्ति लक्ष्मणजी की छाती में लगी। शक्ति लगने से उन्हें मूर्च्छा आ गई। तब मेघनाद भय छोड़कर उनके पास चला गया॥4॥

भोग और त्याग का संघर्ष चल रहा है l ऐसा लग रहा है कि भोग विजयी हो गया किन्तु 


*यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई॥*

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,सुषेण योद्धा कौन था जानने के लिए सुनें

15.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८११ वां* सार

 मैं कवि हूँ अपनी कविता का संदेश सुनाता हूँ।

हैं जहाँ कहीं भी शोले उनकी राख हटाता हूँ॥

बलिदान सपूतों के सपनों में जब भी आते हैं 

हँसते दिल के अंगारे पर आँसू बढ़ जाते हैं..


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 15 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८११ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९३


राष्ट्रभक्त जनमानस में धर्म, सत्य, राष्ट्रभक्ति और जागरण की चेतना उत्पन्न करनाअनिवार्य है उसे शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति कराना नितान्त आवश्यक है



हम सौभाग्यशाली हैं कि दीर्घकाल से निरन्तर चल रही इन सदाचार वेलाओं में अनेक सांसारिक प्रपंचों में फँसे होने पर भी समय निकालकर आचार्यजी वेद, उपनिषद्,पुराण,

श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्भगवद्गीता तथा अन्य आर्ष ग्रन्थों का संदर्भ देकर  सदाचार, संस्कार, आत्मविकास, चरित्र-निर्माण, भारतीय संस्कृति, गुरुकुल परम्परा, परिवार, समाज एवं राष्ट्रधर्म का सरल, प्रेरक और व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं। हमें इनका लाभ उठाना चाहिए l वे भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण तथा महापुरुषों के जीवन-प्रसंगों के माध्यम से सत्य, शुचिता, संयम, अनुशासन, सेवा,शौर्य, पराक्रम,कर्तव्यपरायणता और धर्मनिष्ठ जीवन का संदेश देते हुए सनातन धर्म,भारतीय संस्कृति तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा के संरक्षण और संवर्धन के लिए निरन्तर प्रेरित कर रहे हैं। उनका मूल संदेश है कि सदाचार ही श्रेष्ठ चरित्र का आधार है और श्रेष्ठ चरित्र ही व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र की वास्तविक शक्ति है।


आचार्य जी कहते हैं कविता मनोरञ्जन का साधन नहीं है l कवयः क्रान्तदर्शिनः अर्थात् कवि भूत और भविष्य को जानते हैं l  हमारी महान् आर्ष काव्य-परम्परा के अन्तर्गत वैदिक ऋषि काव्य-रचनाकार ही नहीं थे,वे युगद्रष्टा, धर्मद्रष्टा और समाज के पथप्रदर्शक थे।


आचार्य जी अन्याय और षड्यन्त्र करने वालों के लिए एक बुरे स्वप्न के समान हैं l

आचार्य जी उन लोगों की आलोचना करते हैं जो स्वार्थवश अपने सिद्धान्तों और राष्ट्रहित को छोड़कर थोड़े-से लाभ के लिए बिक जाते हैं  आचार्य जी उनकी भी आलोचना करते हैं जो स्वयं वैभव और भोग-विलास में डूबे रहते हैं, किन्तु दूसरों को कर्म और त्याग का उपदेश देते हैं l आप कहते हैं कि राष्ट्र और समाज में व्याप्त अन्याय, विश्वासघात, स्वार्थ और पाखण्ड के विरुद्ध निर्भीक स्वर उठाना आवश्यक है तथा राष्ट्रभक्त जनमानस में धर्म, सत्य, राष्ट्रभक्ति और जागरण की चेतना उत्पन्न करना भी अनिवार्य है उसे शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति कराना नितान्त आवश्यक है


गोस्वामी तुलसीदास जी ने यही किया उन्हें समाज -जागरण के लिए परमात्मा द्वारा दिया गया अद्भुत कवित्व प्राप्त था

मानस में एक प्रसंग है 


बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेजपुंज लछिमन उर लागी॥

मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥4॥


मेघनाद ने वीरों का संहार करने वाली दिव्य वीरघातिनी शक्ति छोड़ी। वह अग्नि के समान तेजस्वी शक्ति लक्ष्मणजी की छाती में आ लगी। उसके प्रहार से लक्ष्मणजी मूर्छित हो गए। तब मेघनाद, यह जानकर कि लक्ष्मण अब अचेत हो गए हैं, अपना भय छोड़कर उनके निकट आ गया।

यह प्रसंग अन्य किसी रामकथा में नहीं मिलता कदाचित् इसका कारण था कि 

 विधर्मी अकबर के शासनकाल में उत्तराधिकार के संघर्षों में सत्ता के लिए भाइयों के बीच रक्तपात और आपसी वैमनस्य के उदाहरण देखने को मिलते थे। ऐसी परिस्थितियों का समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका थी। इसी संदर्भ में गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान् श्रीराम और लक्ष्मण जी के आदर्श भ्रातृ-प्रेम, त्याग, निष्ठा और परस्पर समर्पण का चित्रण करके समाज के समक्ष एक उच्च आदर्श प्रस्तुत करने का प्रयास किया लक्ष्मण जी के शक्ति लगने पर श्रीराम का विलाप और लक्ष्मण जी की राम जी के प्रति अनन्य सेवा यह संदेश देती है कि भाई-भाई का संबंध स्वार्थ या सत्ता का नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग और धर्म का होना चाहिए।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कवि श्री हरि ओम पवार जी का नाम क्यों लिया facebook पर आचार्य जी ने क्या देखा जानने के लिए सुनें

14.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 14 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८१० वां* सार -संक्षेप

 मर्यादित व्यवहार, आत्मीयता से परिपूर्ण सम्बन्ध और प्रेममय बन्धन ही जीवन को सार्थक बनाते हैं...

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 14 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८१० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९२


यह अविश्वास का अंधकार है आत्मदीप हो जाओ,

युगचारण जागो कसो कमर फिर से भैरवी सुनाओ l

हमें किसी भी परिस्थिति में निराश, उदास, भ्रमित, भयभीत और अविश्वासी नहीं होना चाहिए क्योंकि हम सनातनधर्मी हैं l 


आचार्य श्री सन् १९७१ से सदाचारमय विचारों का सतत् प्रसार कर रहे हैं और विगत लगभग दस वर्षों से उनके ये प्रेरणादायी विचार वायवीय माध्यम के द्वारा नियमित रूप से हम सबके समक्ष पहुँच रहे हैं यह हमारा सौभाग्य है l 

हमारी सनातन परम्परा अनादिकाल से अविच्छिन्न रूप में प्रवाहित होती चली आ रही है।  यह परम्परा केवल किसी एक युग या कालखंड तक सीमित नहीं, बल्कि कल्प-कल्पान्तरों से निरन्तर प्रवहमान है।

महर्षियों ने अपने तप, साधना और प्रत्यक्ष अनुभूति से प्राप्त ज्ञान को केवल ग्रन्थों में ही सुरक्षित नहीं रखा, बल्कि योग्य शिष्यों को प्रदान कर उसे जीवन्त बनाए रखा।जब हम सनातनत्व पर विचार करते हैं, तब हमें स्वयं को भी इसी महान् परम्परा का एक जीवंत अंग मानना चाहिए। यह भाव जाग्रत होना चाहिए कि हम गायत्री के उपासक केवल दर्शक नहीं, अपितु उस अनादि, अखण्ड और दिव्य परम्परा के वाहक एवं संवाहक हैं। हमें अंधकार से भयभीत नहीं होना चाहिए l हम कहते हैं *वयं अमृतस्य पुत्राः* l हमारा प्रत्येक विचार, आचरण और जीवन उसी सनातन धारा के अनुरूप होना चाहिए। 


*उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्त होने तक रुको मत*


उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।।

(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र १४)

यह संदेश भगवान् श्रीराम के जीवन में पूर्णतः साकार होता है। उन्होंने कभी विपत्ति से पलायन नहीं किया। वनवास हो, राक्षसों का अत्याचार हो या रावण से धर्मयुद्ध उन्होंने सदैव जागरूक होकर धर्म के मार्ग पर अटल रहते हुए कर्तव्य का पालन किया। उनका जीवन हमें प्रेरणा देता है कि हम भी उठें, जागें और धर्म, सत्य तथा राष्ट्र के आदर्शों की प्राप्ति तक निरन्तर  पुरुषार्थ करते रहें l आइये युद्धक्षेत्र में पहुंच जाएं l 


एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया॥

कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके॥4॥


तब प्रभु श्री रामजी ने एक ही बाण से सारी माया काट डाली, जैसे सूरज अंधकार के समूह को हर लेता है। तदनन्तर उन्होंने कृपाभरी दृष्टि से वानर-भालुओं की ओर देखा और इस प्रकार वे ऐसे प्रबल हो गए कि युद्ध में रोकने पर भी नहीं रुक रहे थे l

घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमति किंसुक के तरु जैसे॥

लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा॥1॥

घायल वीर उसी तरह शोभित हैं, जैसे फूले हुए पलास के पेड़। लक्ष्मण और मेघनाद दोनों योद्धा अत्यंत क्रोध करके एक-दूसरे से भिड़ते हैं

एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती॥

क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता॥2॥

 एक-दूसरे को (कोई किसी को) जीत नहीं सकता। राक्षस छल-बल और अनीति करता है, तब भगवान्‌ अनन्त जी अर्थात् लक्ष्मण जी क्रोधित हुए और उन्होंने तुरंत उसके रथ को तोड़ डाला और सारथी को टुकड़े-टुकड़े कर दिया l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने मेघनाद, सुलोचना,पतिव्रता उर्मिला के विषय में क्या बताया,एक दिन  किसने भूसा खा लिया जानने के लिए सुनें l

13.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०९ वां* सार -संक्षेप

 ध्रुव जहाँ अनोखा तपकर्ता, प्रह्लाद भक्ति की सीमा है।

अभिमन्यु शौर्य का तेजपुञ्ज जिसके आगे रवि धीमा है।

जोरावर, फतह, अजीत सिंह विक्रम, जुझारू का अलबेला।

केसरी-सुवन सा बाल शौर्य भारत के कण-कण पर खेला।

विक्रम की अक्षय कोष तपस्या की धरती सविशेष॥५॥

पावन मेरा देश ..........


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९१

भारत की संस्कृति अद्भुत है यदि हमारा रुझान अपनी संस्कृति, सभ्यता और सनातन मूल्यों के प्रति दृढ़ बना रहेगा, तो कोई भी वैचारिक आक्रमण हमें दुर्बल नहीं कर सकेगा।




 वर्तमान समय में वैचारिक संघर्ष का प्रबल तूफ़ान चल रहा है। ऐसे समय में अपनी संस्कृति, परम्पराओं और जीवन-मूल्यों के प्रति जागरूकता तथा निष्ठा ही हमें स्थिर, सशक्त और आत्मविश्वासी बनाए रख सकती है।

हम सब अत्यन्त सौभाग्यशाली हैं कि हमारा जन्म भारत जैसी पुण्यभूमि में हुआ है। यह वही भूमि है जहाँ वेदों का प्रकाश हुआ, ऋषियों ने तप किया और अनगिनत महापुरुषों ने मानवता को धर्म, ज्ञान और सदाचार का मार्ग दिखाया।

और हम तो विशेष रूप से धन्य हैं कि हमारा जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ । यही वह पावन भूमि है जहाँ भगवान श्रीराम का जन्म अयोध्या में हुआ और जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बाल एवं किशोर लीलाओं से इस धरती को पवित्र किया।


अपनी दुर्बलता के कारण किसी विधर्मी या विदेशी शक्ति का हमारे ऊपर शासन करना  हमें  कभी स्वीकार्य नहीं रहा । इतिहास साक्षी है कि महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज,श्री गुरु गोविन्द सिंह आदि ने अन्याय, पराधीनता और धार्मिक-राजनीतिक दमन को कभी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने शौर्य ,पराक्रम,स्वाभिमान, संगठन और धर्मनिष्ठा के बल पर स्वतंत्रता तथा सम्मान की रक्षा के लिए आजीवन संघर्ष किया। यही देशाचार है   और यह सदाचार का एक भाग है सदाचार के अन्य भाग हैं जात्याचार और कुलाचार l मनु महाराज के अनुसार सदाचार धर्म के चार लक्षणों में  से एक है 


श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्।।

सदाचार को विस्तार से समझने के लिए हम कालिका पुराण अध्याय ८६,

वामन पुराण अध्याय १४,

पद्म पुराण स्वर्ग खंड,

मार्कण्डेय पुराण आदि का आश्रय ले सकते हैं


गोस्वामी तुलसीदास ने उस काल में श्रीरामचरितमानस की रचना की जब भारत पर विधर्मी का शासन था।

सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा॥

कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा॥3॥

मेघनाद कहता है 

मेरे पराक्रम का प्रदर्शन कल प्रातः देख लेना। बहुत क्या कहूँ, कल युद्ध में सब स्पष्ट हो जाएगा l 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया भगवान राम और रावण के स्वार्थ में क्या अन्तर है,वीररस का आदिमहाकाव्य कौन सा है जानने के लिए सुनें l

12.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०८ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 12 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९०

लोकाभ्युदय और राष्ट्राभ्युदय हेतु हमारे छोटे छोटे प्रयास एक विराट् शक्ति का निर्माण करेंगे अतः ऐसे प्रयास करते चलें 



जिनकी रक्षा स्वयं चिरञ्जीवी पवनपुत्र श्रीहनुमान जी जिनके पराक्रम का वर्णन करता कवितावली का निम्नांकित छंद है 


जो दससीसु महीधर ईस को बीस भुजा खुलि खेलनिहारो।

लोकप, दिग्गज, दानव, देव सबै सहमे सुनि साहसु भारो।


बीर बड़ो बिरूदैत बली, अजहूँ जग जागत जासु पँवारो।

सो हनुमान हन्यो मुठिकाँ गिरि गो गिरिराजु ज्यों गाजको मारो।38 l

जिस रावण के दस सिर थे, जो कैलास पर्वत के स्वामी भगवान शंकर के साथ अपनी बीस भुजाओं का बल दिखाते हुए खेल करने का साहस रखता था; जिसके पराक्रम का नाम सुनकर लोकपाल, दिग्गज, दानव और देवता तक भयभीत हो जाते थे;

जो महान वीर, अत्यन्त बलशाली और अपार यश वाला था, जिसकी कीर्ति आज भी संसार में प्रसिद्ध है उसी रावण को भक्तश्रेष्ठ श्रीहनुमान जी ने अपने एक घूँसे के प्रहार से ऐसा आहत कर दिया, जैसे वज्र के प्रहार से कोई विशाल पर्वत काँप उठे।



 करते हैं, उन्हें किसी प्रकार का भय, भ्रम हो ही नहीं सकता l रामभक्त-शिरोमणि श्रीहनुमानजी के दिव्य अनुग्रह से उत्साहजनक वातावरण बन रहा है और हमारी बाधाएँ एक-एक करके दूर होती जा रही हैं, जिससे आगामी अधिवेशन सफलतापूर्वक अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर हो रहा है ।

हम इस अधिवेशन के माध्यम से  राष्ट्रभक्त सनातनधर्मी समाज को यह संदेश देने आए हैं कि शिक्षा वही हो जो भारत की सनातन परम्परा, संस्कृति और जीवन-मूल्यों पर आधारित हो, केवल मैकाले की शिक्षा-पद्धति का अनुकरण करने वाली नहीं। हमारा उद्देश्य समाज के भय, भ्रम और आत्मविस्मृति को दूर कर भारतीय ज्ञान-परम्परा के प्रति पुनः जागरण उत्पन्न करना है।

अपने विचारों और व्यवहार में सनातनत्व, भाव, भक्ति और भारतीयता से ओत-प्रोत भाषा को अपनाना निश्चित रूप से हमारा कल्याण करेगा साथ-साथ  हमें यशस्विता भी स्वाभाविक रूप से प्राप्त होगी।

आइये हनुमानाश्रित होकर प्रवेश कर जाएं लंका कांड में 

 जहां माल्यवान् जो रावण का वृद्ध, बुद्धिमान और अनुभवी मंत्री (तथा मातामह) था, रावण को समझाने का प्रयास कर रहा है वह रावण को नीति का उपदेश देते हुए समझाता है कि श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे वही परम भगवान हैं जिन्होंने पूर्वकाल में मधु-कैटभ, हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु जैसे महादैत्यों का वध किया था। इसलिए रावण को सीता जी को सम्मानपूर्वक लौटा देना चाहिए और श्रीराम से वैर त्याग देना चाहिए।


हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान।

जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान॥48 क॥

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया  उन्नाव विद्यालय की चर्चा क्यों हुई अधिवेशन हेतु क्या शुल्क निर्धारित हुआ है  जानने के लिए सुनें

11.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 11 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०७ वां* सार -संक्षेप

 लूम लपेटि, अकास निहारि कै, हाँकि हठी हनुमान चलाए।

 सूखि गे गात, चले नभ जात, परे भ्रमबात, न भूतल आए।

(कवितावली )



हनुमानजी के अप्रतिम बल, पराक्रम और युद्धकौशल का अत्यन्त प्रभावशाली निरूपण 


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 11 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८९


श्रीरामचरितमानस का अध्ययन करके अपने भीतर शक्ति, भक्ति, विवेक, विनय और सदाचार का विकास करें।


हीन चिन्तन से ग्रस्त कुछ लोग भगवान श्रीराम को मात्र कल्पना मानते हैं। किन्तु  भगवान श्रीराम

सात्विक यज्ञों में रत हम भारत, भारतीयता और सनातनत्व के उपासकों के लिए धर्म, मर्यादा, सत्य और आदर्श जीवन के शाश्वत प्रतीक हैं।गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार श्रीराम परब्रह्म हैं, परम सत्य हैं, इन्द्रियों से परे, अलक्ष्य, अनादि और अनुपम हैं। उनका चरित्र मानवता के लिए आदर्श है l

तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस का गम्भीर अध्ययन केवल कथा का रसास्वादन नहीं, बल्कि आत्मशक्ति का जागरण है।

मानस की प्रत्येक चौपाई, प्रत्येक प्रसंग और प्रत्येक तथ्य पर सूक्ष्म दृष्टि डालने से जीवन के गहन सत्य उद्घाटित होते हैं। इससे  हमारे भीतर आत्मविश्वास, धैर्य, विवेक और धर्मनिष्ठा का विकास होता है।

हमारा वास्तविक संघर्ष बाहर के शत्रुओं के साथ साथ अपने भीतर के विकारों काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर से चलता है।मानस का मनन इस अन्तर्द्वन्द्व को शांत कर मन में सद्विचारों की विजय स्थापित करता है। जब अन्तःकरण निर्मल होता है, तब आत्मशक्ति प्रकट होती है  सद्बुद्धि प्राप्त होती है और जीवन की बाहरी चुनौतियों का सामना करना भी सरल हो जाता है l

हम संसार को संस्कारित करने का उपक्रम लेकर चले हैं

राष्ट्रविरोधी तत्त्वों से हमें अपने राष्ट्रभक्त समाज की रक्षा करनी हैं उसे अवगत कराना है कि केवल अंधकार ही नहीं है उसे भ्रममुक्त भयमुक्त करना है 

 हमने अपने लक्ष्य बनाएं हैं 

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः 

राष्ट्र -निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष


इसके अतिरिक्त 

बैरिस्टर साहब ने केवल पानी पीने के लिए क्यों कहा,एक आचार्य श्री कोहली जी की चर्चा क्यों हुई,आज किस विद्यालय में शिक्षकों का साक्षात्कार है जहां आचार्य जी जा रहे हैं,

प्रधानमन्त्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का उल्लेख क्यों हुआ,

रावण के नाना की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें

10.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष दशमी /एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०६ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष दशमी /एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 10 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०६ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८८

शौर्य शक्ति की अनुभूति करते हुए संगठन में प्रेम और आत्मीयता का विस्तार कर राष्ट्रोन्मुख और समाजोन्मुख हों l


आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं युद्ध प्रारम्भ हो चुका है आइये युद्धस्थल में प्रवेश कर जाएं -


पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा।

पावक सायक सपदि चलावा॥

भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं।

ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं॥


इसके पश्चात् कृपालु भगवान् श्रीराम मुस्कराकर धनुष पर अग्निबाण चढ़ाते हैं और तुरंत उसका संधान करते हैं। उस अग्निबाण के प्रभाव से चारों ओर प्रकाश फैल जाता है; कहीं भी अंधकार नहीं रह जाता। जैसे आत्मज्ञान के उदय होने पर मन के सभी संशय नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही उस प्रकाश से समस्त अंधकार मिट जाता है।

तुलसीदासजी यहाँ केवल युद्ध का दृश्य नहीं दिखाते, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक सत्य भी प्रकट करते हैं। युद्धभूमि का यह दृश्य साधक के अंतःकरण का भी चित्र है। जब तक मन में अज्ञान का अंधकार है, तब तक संशय, भय और मोह बने रहते हैं। परन्तु श्रीराम की कृपा से ज्ञान का प्रकाश प्राप्त होते ही ये सभी विकार समाप्त हो जाते हैं। मनुष्य के जीवन में समस्याओं का मूल कारण प्रायः अज्ञान और भ्रम होता है। सत्य का ज्ञान, सद्गुरु का उपदेश तथा भगवान् की कृपा जीवन के समस्त संशयों का निवारण कर देती है। इसलिए बाहरी अंधकार से अधिक आवश्यक है कि हम अपने अंतःकरण के अज्ञानरूपी अंधकार को ज्ञानरूपी प्रकाश से दूर करें। आचार्य जी नित्य यही कर रहे हैं ताकि आर्यसंस्कृति के उपासक हम सनातनधर्मियों को 

 रामत्व की अनुभूति हो और  हम अपने भीतर शक्ति बुद्धि विचार विवेक प्राप्त कर देशहित और समाजहित के कार्यों में संलग्न हों जिस देश को भगवान राम का ऐसा अद्भुत नेतृत्व मिला हो उसे १९६२ के चीन से युद्ध में भारी मूल्य चुकाने के लिए विवश होना पड़ा l यदि हम आत्मबल के साथ परमात्म की शक्ति की अनुभूति करते रहेंगे तो हमें इस प्रकार विवश नहीं होना पड़ेगा l इसके लिए हमें संगठन की महत्ता को भी समझना होगा और संगठन को सुदृढ़ बनाने के लिए प्रेम और आत्मीयता का विस्तार आवश्यक है संगठन के हर सदस्य को प्रेम की पराकाष्ठा का दर्शन हो जैसा मानस के निम्नांकित प्रसंग में दिखा 


मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी॥

परम प्रेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई॥1॥


मिलन की प्रीति कैसे बखानी जाए? वह तो कविकुल के लिए कर्म, मन, वाणी तीनों से अगम है। दोनों भाई (भरतजी और श्री रामजी) मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को भुलाकर परम प्रेम से पूर्ण हो रहे हैं


श्रीराम और भरतजी का यह मिलन लौकिक स्नेह से कहीं ऊपर, दिव्य प्रेम की पराकाष्ठा का दर्शन कराता है। दोनों भाई प्रेम में इतने तल्लीन हो गए कि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार—अन्तःकरण के चारों अंग मानो अपनी सत्ता ही भूल गए। मन का संकल्प-विकल्प, बुद्धि का विचार, चित्त का स्मरण तथा अहंकार का 'मैं' भाव—सब प्रेम में विलीन हो गए। उस समय उनके अन्तःकरण में केवल निष्काम, निर्मल और आत्मसमर्पित प्रेम ही प्रवाहित हो रहा था। यह प्रसंग बताता है कि जहाँ प्रेम पूर्णतः निःस्वार्थ और ईश्वरमय होता है, वहाँ अहंकार तथा समस्त मानसिक भेद स्वतः समाप्त हो जाते हैं और केवल एकत्व, अपनत्व तथा आनन्द का अनुभव शेष रह जाता है। यही सच्चे प्रेम और भक्ति की सर्वोच्च अवस्था है।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने तुलसीदास जी के अन्य किन ग्रंथों की चर्चा की, भैया डा पंकज जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें

9.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष नवमी /दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०५ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष नवमी /दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 9 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०५ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८७


हम भी संसार की अनेक समस्याओं और चुनौतियों के बीच जीवन व्यतीत कर रहे हैं। स्वाभाविक है कि हम भी यशस्विता की आकांक्षा रखते हैं—चाहे वह हमारे व्यक्तिगत पुरुषार्थ के माध्यम से प्राप्त हो, चाहे हमारे परिवार के द्वारा अथवा युगभारती संस्था के माध्यम से।

किन्तु हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए कि यश हमारा लक्ष्य नहीं, अपितु सत्य, धर्म और लोकमंगल के प्रति निष्ठापूर्ण कर्म का स्वाभाविक परिणाम होना चाहिए। यदि हमारा ध्यान केवल सत्य, कर्तव्य और अपने ध्येय पर स्थिर रहेगा, तो प्राप्त होने वाला यश भी सार्थक होगा और हमारी साधना भी निष्कलुष बनी रहेगी। 



कीट मनोरथ दारु शरीरा।

जेहि लगि घुन कोसि बसि धीरा।।


मनुष्य का शरीर लकड़ी के समान है और उसकी असंख्य इच्छाएँ उस लकड़ी में लगे घुन के समान हैं। जैसे घुन लकड़ी को भीतर ही भीतर खोखला कर देता है, वैसे ही अनियंत्रित कामनाएँ मनुष्य के जीवन और अन्तःकरण को भीतर-ही-भीतर क्षीण एवं दुर्बल कर देती हैं।

इस उपमा के द्वारा तुलसीदास जी यह शिक्षा देते हैं कि यदि मनुष्य अपनी इच्छाओं पर संयम नहीं रखता, तो वे उसकी शान्ति, विवेक और आध्यात्मिक उन्नति का नाश कर देती हैं। अतः जीवन को सार्थक बनाने के लिए कामनाओं पर नियंत्रण तथा भगवान् की भक्ति और वैराग्य का आश्रय आवश्यक है।


"सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि कै मति इन्ह कृत न मालिनी।।"


यहाँ "ईषणा-त्रय" का उल्लेख है गोस्वामी तुलसीदास जी इस चौपाई में संकेत करते हैं कि पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणा—ये तीनों ऐसी प्रबल आसक्तियाँ हैं, जिन्होंने बड़े-बड़े बुद्धिमानों के विवेक को भी मलिन कर दिया है। सत्य के मार्ग पर चलने वाले साधक के लिए ये बाधाओं के समान हैं। जब मनुष्य पुत्र-मोह, धन-लालसा अथवा यश-प्राप्ति की इच्छा से प्रेरित होकर कार्य करता है, तब उसके निर्णय निष्पक्ष नहीं रह जाते और सत्य का मार्ग धूमिल होने लगता है।


अतः सत्य के साधक का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन का केन्द्र केवल सत्य, धर्म तथा कर्तव्य को बनाए। उसका ध्यान सदैव अपने परम लक्ष्य पर स्थिर रहे। तब कोई भी मोह, प्रलोभन, भय अथवा प्रतिष्ठा की आकांक्षा उसे सत्य के पथ से विचलित नहीं कर सकेगी। यही दृढ़ता साधना की सफलता का आधार है और यही धर्ममय जीवन की पहचान भी है।

आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं जहां राम- रावण युद्ध चल रहा है 

भगवान् श्रीराम लंका के शासक और उसकी प्रजा के मनोबल को क्षीण कर रहे हैं । रावण हनुमान जी का अद्भुत पराक्रम प्रत्यक्ष देख चुका था। उसने अकेले हनुमान जी द्वारा अशोकवाटिका का विध्वंस, अनेक राक्षसों का संहार और लंका-दहन का दृश्य अपनी आँखों से देखा था। इसके पश्चात् अंगद ने रावण की सभा में अपने अद्वितीय बल, धैर्य और निर्भीकता का परिचय देकर उसके आत्मविश्वास को और भी डिगा दिया।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने चीन से अब हमारे भयभीत न होने का क्या कारण बताया, चम्पत राय का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

8.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष अष्टमी / नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०४ वां* सार -संक्षेप

 अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा॥

लंकाँ द्वौ कपि सोहहिं कैसें। मथहिं सिंधु दुइ मंदर जैसें॥४॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष अष्टमी / नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 8 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८६

हमारे भीतर अनेक विचार, भाव, प्रतिभाएँ और संकल्प होते हैं। यदि वे केवल मन में ही रह जाएँ और व्यवहार, वाणी या कर्म के रूप में प्रकट न हों, तो उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।अतः आइए, हम अपने भावों, विचारों और संकल्पों को अभिव्यक्त करें तथा उन्हें कर्मरूप में परिणत कर जीवन को सार्थक बनाएँ।


आजकल हम लोग मानस के लंकाकांड में प्रविष्ट हैं 

सेतुनिर्माण के पश्चात् अंगद की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो जाती है l

अंगद केवल  भगवान श्रीराम के दूत बनकर नहीं गए थे, बल्कि एक कुशल दूत, नीतिज्ञ और गुप्तचर के रूप में भी कार्य कर रहे थे। उन्होंने रावण को धर्म का उपदेश दिया, उसकी शक्ति और अहंकार का परीक्षण किया, सभा का मनोभाव समझा और लौटकर लंका की सैन्य एवं दुर्ग-व्यवस्था का पूरा विवरण श्रीराम को सुनाया।


श्रीराम अंगद की चतुराई और नीति-कौशल से प्रसन्न होकर मुस्कुराए। इसके बाद अंगद ने लंका के चारों द्वारों, रक्षा-व्यवस्था, सेना की तैनाती तथा युद्ध की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण सभी सूचनाएँ विस्तार से प्रस्तुत कीं। 


रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए॥

लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा॥1॥


जब श्रीराम को शत्रु (रावण) के विषय में समाचार प्राप्त हुआ, तब उन्होंने अपने सभी मंत्रियों और प्रमुख सहयोगियों को अपने समीप बुलाया। फिर उन्होंने कहा— "लंका के चारों द्वार अत्यन्त सुदृढ़ और सुरक्षित हैं। बताइए, किस प्रकार आक्रमण किया जाए? इस विषय में आप सब विचार करें।"


महान नेतृत्व का लक्षण यह है कि वह अहंकारवश अकेले निर्णय नहीं लेता, बल्कि योग्य साथियों से विचार-विमर्श कर उचित नीति का निर्धारण करता है।

नेतृत्व का एक प्रमुख दायित्व अपने अनुयायियों के हृदय में यह अटूट विश्वास स्थापित करना है कि उनका नायक प्रत्येक चुनौती का सामना करने में पूर्णतः समर्थ है और विजय निश्चित है। यही विश्वास उनके भीतर उत्साह, साहस, पराक्रम और अडिग मनोबल का संचार करता है तथा उन्हें अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पूर्ण समर्पण के साथ कर्मक्षेत्र में प्रवृत्त करता है l

श्रीराम ने अपने प्रताप, सामर्थ्य और विजय के प्रति सबको आश्वस्त करते हुए वानर-सेना का उत्साहवर्धन किया और उन्हें उचित प्रकार से समझाया। प्रभु के वचनों को सुनते ही वानर वीरों के हृदय में अद्भुत उत्साह और आत्मविश्वास जाग उठा। वे सिंहनाद करते हुए पूर्ण पराक्रम के साथ युद्ध के लिए दौड़ पड़े।

आगे आचार्य जी ने क्या बताया साकेत में भगवान राम को रामानन्दी मैथिलीशरण गुप्त ने किस रूप में प्रकट किया, भैया शुभेन्दु शेखर जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

7.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष सप्तमी / अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०३ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष सप्तमी / अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 7 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८५

हम अपना चिंतन भ्रम और भय से मुक्त रखते हुए सत्य, आत्मविश्वास और सकारात्मक दृष्टि से प्रेरित रखें क्योंकि तभी वह राष्ट्र और समाज के लिए कल्याणकारी बनेगा l

जैसे हम अपने शरीर और वस्त्रों की स्वच्छता का ध्यान रखते हैं, वैसे ही अपने विचारों की पवित्रता और सकारात्मकता का भी ध्यान रखना आवश्यक हैl

भारत मल का जोहड़ नहीं, बल्कि संस्कृति, स्वच्छता, शौर्य और सदाचार का पावन तीर्थ बने अतः राष्ट्रविरोधी तत्त्वों का विधिसम्मत और दृढ़ प्रतिरोध और उनके समक्ष शक्ति और शौर्य का प्रदर्शन आवश्यक है l



हमने अपना लक्ष्य बनाया है 

*राष्ट्र -निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष*

उस आधार पर हमारे विचार केवल अपने व्यक्तिगत हित तक सीमित नहीं रहने चाहिए।


यद्यपि चिन्तन मानव जीवन का अमृत है 

पर वह यदि सीमाओं में ही अवरुद्ध रहा l

तो समझो उसका हाल वही हो जाता है 

जैसे जल छोटी सीमा बीच निरुद्ध बहा ll 



 जब हमारा चिंतन देश, समाज और समष्टि के कल्याण से संयुत होता है, तभी वह वास्तव में सार्थक और जीवनदायी बनता है। यदि हम केवल अपने परिवार या निजी स्वार्थ तक ही सोचते रहें, तो वह चिंतन संकीर्ण है। ऐसा सीमित चिंतन समाज की उन्नति में अपेक्षित योगदान नहीं दे पाता।

संकीर्ण और स्वार्थपरक विचार भी  समाज और राष्ट्र के विकास में सहायक नहीं बनते। इसके विपरीत, जब विचारों का विस्तार समाज,राष्ट्र, संस्कृति, मानवता और लोकमंगल तक होता है, तब वही चिंतन समाज में जागरण, संगठन, सेवा और प्रगति का आधार बनता है। व्यापक चिंतन ही हमें यशस्वी बनाता है और राष्ट्र को शक्तिशाली एवं समृद्ध बनाने में योगदान देता है।

ऐसा ही व्यापक, निर्भय और लोकमंगलकारी चिंतन गोस्वामी तुलसीदास जी का था। श्रीरामचरितमानस, जो हर संकट में हमें मार्ग दिखा देता है,में  भगवान श्रीराम व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना, सज्जनों की रक्षा और अधर्म के उन्मूलन के लिए कार्य करते हैं। आजकल हम लोग लंका कांड में प्रविष्ट हैं 

इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा॥

अति आदर समीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी॥2॥


हे बालि के पुत्र! मुझे जानने का बड़ा कौतूहल है कि जो रावण राक्षसों के कुल का तिलक है और जिसके अतुलनीय बाहुबल की संसार भर में धाक है उसके  मुकुट तुमने कैसे उतार दिए l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने क्या बताया 

श्री हरि ओम पवार जी,कवयित्री व्याख्या मिश्रा जी, भैया पवन जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

6.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष षष्ठी /सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०२ वां* सार -संक्षेप

 यथार्थकथनं यच्च सर्वलोकसुखप्रदम्।

तत् सत्यमिति विज्ञेयमसत्यं तद्विपर्ययः॥ 

जो कथन वास्तविक हो तथा समस्त लोक के लिए हितकारी और सुखदायक हो, वही सत्य कहलाता है। इसके विपरीत जो हो, वह असत्य है। 

 (पद्मपुराण क्रियायोगसार अध्याय  १६)

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष षष्ठी /सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 6 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८४

इस सदाचार वेला के माध्यम से हम उस तत्त्व की प्राप्ति का प्रयास करें जिससे हम दिन भर ऊर्जस्वित रहें


जिसके मन में यह अटूट विश्वास होता है कि उस पर भगवान् की कृपा है, वह कभी अहंकार में चूर नहीं होता। वह अपने बल, बुद्धिमत्ता, सामर्थ्य और उपलब्धियों को अपना नहीं, अपितु भगवान् का अनुग्रह मानता है। वह स्वयं को परमात्मा का अंश समझता है। जब हम उस परम अंशी के अंश हैं, तब न हम दीन हैं, न हीन, हमारे भीतर आत्मगौरव, आत्मविश्वास और विनम्रता का अद्भुत समन्वय रहता है।

यही सनातनधर्मी भाव है। इसी आध्यात्मिक आधार ने हिन्दुत्व को सहस्राब्दियों तक जीवित और जाग्रत रखा है। असंख्य आक्रमणों, संकटों, कष्टों और विपरीत परिस्थितियों के बाद भी इसकी जीवनधारा अविच्छिन्न बनी रही।

इतिहास साक्षी है कि संसार के अनेक देशों की पहचान बदल गई, उनकी सभ्यताएँ परिवर्तित हो गईं, उनके नाम, स्वरूप और सांस्कृतिक आधार तक परिवर्तित हो गए  किन्तु भारत आज भी भारत है। उसकी आत्मा, उसका सनातन संस्कार और उसका आध्यात्मिक अधिष्ठान आज भी अक्षुण्ण है। यही सनातन संस्कृति की अमरता और उसकी अद्वितीय जीवनशक्ति का प्रमाण है।


यही सनातनधर्मी दृष्टि हमारी शिक्षा का भी मूलाधार है। इसी के आधार पर विश्वभर में हमें सम्मान प्राप्त हुआ l शिक्षा संस्कार व्यवहार आचार है  शिक्षा हमारे जीवन का आधार  और साधन भी है शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना या जीविका का साधन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराना, उसके भीतर निहित दिव्यता को जाग्रत करना और उसके चरित्र का निर्माण करना है। ऐसी शिक्षा व्यक्ति को अहंकारी नहीं, उत्तरदायी बनाती है, लोकमंगल के लिए समर्पित बनाती है।

शिक्षा हमें बताती है कि छल से मिश्रित सत्य सत्य नहीं है 


न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः।

न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम्।

नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति।

न तत् सत्यं यच्छलेनानुविद्धम्॥



वह सभा सभा नहीं, जहाँ अनुभवी और धर्मज्ञ वृद्ध न हों।


वे वृद्ध भी वास्तविक वृद्ध नहीं, जो धर्म की बात न कहें।


वह धर्म धर्म नहीं, जिसमें सत्य न हो।


और वह सत्य भी सत्य नहीं, जो छल से मिश्रित हो।

अत्यन्तलोकहितं सत्यम्।

श्रीरामचरितमानस में जो सत्य का आख्यान है वह शौर्य और शक्ति के साथ सम्मिश्रित आख्यान है l

सत्य का पालन वही कर सकता है, जिसके भीतर साहस, धैर्य और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा हो।

अंगद का यह प्रसंग इसका उत्कृष्ट उदाहरण है—


भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत रिपु मद भाग।

कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग॥ 34(ख)॥


अर्थात् जैसे करोड़ों विघ्न आने पर भी संत अपने मन से नीति का त्याग नहीं करते, वैसे ही अंगद का चरण भूमि से तनिक भी नहीं डिगा और उसे देखकर शत्रुओं का मद चूर हो गया।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया भैया मनीष कृष्णा जी का उल्लेख क्यों हुआ कल सम्पन्न हुई बैठक की चर्चा क्यों हुई सत्य के क्या क्या पर्यायवाची शब्द हैं जानने के लिए सुनें l

5.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०१ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८३


 हमारे भावों के केंद्र में राष्ट्र और समाज हों तथा हम अपने भावों का विस्तार व्यक्तिगत हित से ऊपर उठाकर लोकमंगल तक करें इससे हमारा जीवन यशस्वी बनेगा l जब हम अपने जीवन को समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित करेंगे तो हमारी  कीर्ति चिरस्थायी होगी l हम अत्यन्त मूल्यवान रत्न होंगे l



आचार्य जी विशेष रूप से श्रीरामचरितमानस के उन प्रसंगों का उल्लेख करते हैं, जो हमारे भीतर उत्साह, आत्मविश्वास, धैर्य, साहस, पुरुषार्थ, कर्तव्यनिष्ठा तथा राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पण का भाव जाग्रत करें । उनके अनुसार मानस केवल भक्ति का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को जाग्रत , संगठित और कर्मयोगी बनाने वाला प्रेरणास्रोत भी है। इसके पात्र और प्रसंग हमें विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म का पालन करते हुए निर्भय होकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। जैसी निर्भयता अंगद ने प्रकट की 


"राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा॥"


रावण के दरबार में जब अंगद  जिनके लिए प्रसिद्ध है कि 


रोप्यौ पाँव पैज कै बिचारि रघुवीरबल,

⁠लागे भट सिमिटि न नेकु टसकतु है।

तज्यौ धीर धरनि, धरनिधर धसकत,

⁠धराधर धीर भार सहि न सकतु है॥

महाबली बालि को दबत दलकतु भूमि,

⁠तुलसी उछरि सिंधु मेरु मसकतु है।

कमठ कठिन पीठि, घठा परो मंदर को,

⁠आयो सोई काम, पै करेजो कसकतु है॥


रावण को समझा रहे थे, तब अहंकारी रावण  नर लीला कर रहे भगवान श्रीराम को केवल एक साधारण मनुष्य मानता था। इस पर अंगद उसे तीव्र फटकार लगाते हुए कहते हैं— "अरे मूर्ख रावण! तू किस आधार पर श्रीराम को साधारण मनुष्य समझता है? यदि केवल बाह्य रूप देखकर निर्णय करना ही तेरी बुद्धि है, तो क्या कामदेव केवल धनुष धारण करने वाला एक साधारण धनुर्धर है? और क्या गंगाजी केवल एक सामान्य नदी हैं? जिस प्रकार कामदेव और गंगा का महत्त्व उनके बाह्य रूप से कहीं अधिक है, उसी प्रकार श्रीराम भी सामान्य मनुष्य नहीं, स्वयं परमब्रह्म हैं। उनके वास्तविक स्वरूप को न पहचानना ही तेरे अज्ञान और अहंकार का प्रमाण है।"


रामत्व, रामात्मकता  अध्यात्म और शौर्य का अद्भुत सम्मिलन है। अध्यात्म मनुष्य को अहंकार से मुक्त कर आत्मबोध की ओर ले जाता है और शौर्य उसे अन्याय, अधर्म तथा अत्याचार के विरुद्ध निर्भीक होकर खड़े होने की प्रेरणा देता है।

श्रीराम के जीवन में करुणा और पराक्रम, विनम्रता और वीरता, तप और तेज, नीति और शक्ति सभी का समन्वय दिखाई देता है। यही समन्वय रामत्व की पहचान है। इसलिए राम का अनुसरण केवल पूजा नहीं, बल्कि ऐसे जीवन का निर्माण है जिसमें आत्मोन्नति और लोककल्याण साथ-साथ चलते हैं। जो भय और भ्रम में जीते हैं, वे रामत्व का पूर्ण अनुभव नहीं कर सकते।अनेक दुविधाओं में उलझा मन न तो दृढ़ निर्णय ले पाता है और न ही धर्म के मार्ग पर अडिग रह सकता है।

इसके अतिरिक्त 

आचार्य जी ने अयोध्या (तत्कालीन फैज़ाबाद) के पूर्व जिलाधिकारी कृष्ण कुमार नायर (के. के. नायर) जो रामजन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख, किंतु अपेक्षाकृत अल्पचर्चित नायकों में से एक थे और जो सन् १९४९ में रामलला के प्राकट्य के समय  फैज़ाबाद के जिलाधिकारी थे। 

(उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा रामलला की प्रतिमा हटाने के निर्देश दिए गए थे, किंतु के. के. नायर ने उन निर्देशों का पालन करने से मना कर दिया। ) का उल्लेख क्यों किया, बैठकों के विषय में आचार्य जी ने क्या परामर्श दिए, ब्रह्मा के वरदान और जनता के वरदान से आचार्य जी का क्या आशय है जानने के लिए सुनें l

4.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८०० वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८०० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८२

अपनी समीक्षा नित्य करें और देखें कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने जाने अनजाने समाज का अहित कर दिया हो, ध्यान रखें कि हमने अपना लक्ष्य बनाया है समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष  अतः हमें समाज और राष्ट्र के हित के ही कार्य करने हैं l 


गायन्ति देवाः किल गीतिकानि

धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते

भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥


यह उद्घोष प्रत्येक हिन्दू,जो पराजित मानसिकता का कभी नहीं रहा, जो अत्यन्त संवेदनशील, समावेशी, भावुक है, जिसने पराश्रयता को कभी स्वीकार नहीं किया,को स्मरण कराता है कि भारत की पवित्र भूमि पर जन्म लेकर वह ऐसा जीवन जिए जो राष्ट्र, संस्कृति और सनातन मूल्यों की प्रतिष्ठा करे तथा अंततः मोक्ष का अधिकारी बने।


देवता स्वयं यह गीत गाते हैं कि धन्य हैं वे मनुष्य जिन्हें भारतभूमि में जन्म प्राप्त हुआ है। क्योंकि हिन्दू जीवन दृष्टि में भारतभूमि ऐसी पवित्र कर्मभूमि है जहाँ मनुष्य न केवल स्वर्ग की प्राप्ति कर सकता है, बल्कि मोक्ष का भी अधिकारी बन सकता है। इसलिए देवता भी अपने देवत्व का भोग समाप्त होने पर पुनः भारत में मनुष्य जन्म पाने की इच्छा रखते हैं, ताकि कर्म करके परम मुक्ति प्राप्त कर सकें। इस श्लोक में भारतवर्ष को केवल जन्मभूमि नहीं, बल्कि कर्मभूमि कहा गया है।


सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥48॥


 देवताओं के लोक भोगभूमि हैं, जहाँ मुख्यतः पूर्वकृत पुण्यों का फल भोगा जाता है; जबकि भारतभूमि वह स्थान है जहाँ पुरुषार्थ, साधना, धर्म, ज्ञान और भक्ति के द्वारा मोक्ष तक पहुँचा जा सकता है। इसीलिए देवता भी भारत, जिसकी स्थिति ऐसी है कि अनेक शक्तियाँ उसके सामर्थ्य, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और वैश्विक प्रभाव को सहज रूप से स्वीकार नहीं करना चाहतीं। अनेक लोग और राष्ट्र भारत की विशाल अर्थव्यवस्था, व्यापार,ज्ञान, प्रतिभा और संसाधनों से लाभ तो लेना चाहते हैं, परंतु  उसको आत्मनिर्भर, शक्तिशाली और विश्व में अग्रणी भूमिका निभाते हुए नहीं देख सकते,में मनुष्य-जन्म को अपने देवत्व से अधिक श्रेष्ठ मानते हैं।

इसी जीवन-दृष्टि का सजीव स्वरूप श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम के चरित्र में दिखाई देता है। भगवान श्रीराम ने कभी सुख, वैभव या अधिकार को जीवन का लक्ष्य नहीं बनाया उन्होंने धर्म और कर्तव्य को सर्वोपरि रखा। आजकल हम लोग मानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं 

पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा॥

मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती॥


अंगद क्रोध में भरकर कहते हैं— "अरे रावण! व्यर्थ की डींगें हाँकते हुए तुझे तनिक भी लज्जा नहीं आती। हे निर्लज्ज! तू अपने ही कुल का विनाश करने वाला है। ऐसे अधर्म और अहंकार के बाद भी अपने तथाकथित बल पर घमण्ड करता फिरता है; फिर भी तेरी छाती लज्जा से फटती नहीं।"

यह वही कह सकता है जिसे शौर्य और पराक्रम की अनुभूति हो जो अत्यन्त बलशाली हो हम सनातनधर्मी राष्ट्रभक्तों को भी इसी शौर्य पराक्रम की अनुभूति करनी है l


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने आगे क्या बताया,आचार्य जी ने चम्पत राय जी, होसबोले जी का नाम क्यों लिया, प्रयागराज के अक्षय वट का उल्लेख क्यों हुआ, कौवा रोर क्या है, ९ वीं कक्षा में किसके प्रवेश की चर्चा हुई जानने के लिए सुनें l

3.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष चतुर्थी ( कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी ) विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८१

अपने भीतर रामात्मकता धारण करें जिससे हम जाग्रत और सचेत रहेंगे आत्मचिन्तन करते हुए अपने भीतर के मल का निरसन करते रहेंगे l शुद्ध बुद्ध प्रबुद्ध राष्ट्रोन्मुख समाजोन्मुख होंगे l



जो स्वयं अपने दोषों, सीमाओं और अंतःकरण का निष्पक्ष अवलोकन नहीं कर सकता, वह दूसरों के गुण-दोषों का यथार्थ मूल्यांकन भी नहीं कर सकता। आत्मदर्शन विवेक, विनम्रता और न्यायबुद्धि का आधार है। जो व्यक्ति पहले स्वयं को परखता है, वही दूसरों के विषय में संतुलित, निष्पक्ष और सार्थक मत देने का अधिकारी होता है। 

आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस के उस प्रसंग में हैं जहां अंगद जी और रावण के बीच संवाद चल रहा है

सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला। है कपि एक महा बलसीला॥

आवा प्रथम नगरु जेहिं जारा। सुनत बचन कह बालिकुमारा॥


रावण अपनी सभा में वानर-सेना का उपहास करते हुए कहता है कि नल और नील तो केवल शिल्पकला में निपुण हैं। वे समुद्र पर सेतु बनाने जैसे निर्माण-कार्य जानते हैं, युद्ध करना उनका कार्य नहीं है। हाँ, उनमें एक वानर अवश्य अत्यन्त बलशाली है वही जो पहले लंका में आया था और अकेले ही पूरी लंका को अग्नि के हवाले कर गया था l 

रावण के मुख से यह बात सुनकर बालि-पुत्र अंगद जी मुस्कराकर उत्तर देने लगे। वे समझ गए कि रावण बाहर से अहंकार दिखा रहा है, पर भीतर से हनुमान जी के पराक्रम को स्वीकार कर चुका है। अब अंगद जी उसके इसी अहंकार को तोड़ने  का प्रयास करते हैं l वे रावण को मानसिक रूप से अत्यन्त शिथिल करना चाहते हैं l 

सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी॥

तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवत सव सम चौदह प्रानी॥


 जिस व्यक्ति के जीवन में धर्म, विवेक, भक्ति, सदाचार और लोकमंगल का भाव नहीं है, उसका जीवन केवल सांस लेने तक सीमित रह जाता है। मनुष्य का वास्तविक जीवन उसके उच्च आदर्शों, सत्कर्मों और ईश्वराभिमुखता से सार्थक होता है।उसका जीवन ईश्वरविमुखता से निरर्थक होता है l



अंगद कहते हैं—"हे दुष्ट! मैं तुझे इसलिए नहीं मारता कि मेरे प्रभु श्रीराम ने मुझे दूत बनाकर भेजा है, योद्धा बनाकर नहीं। दूत का धर्म संदेश देना है, युद्ध करना नहीं। इसलिए अब मेरे भीतर क्रोध उत्पन्न मत कर।"

वार्तालाप आगे चलता है  किन्तु जब रावण ने भगवान श्रीराम की निन्दा की, तब अंगद जी का धैर्य टूट गया।

जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा।

क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा॥

हरि हर निंदा सुनइ जो काना।

होइ पाप गोघात समाना॥

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, आज भी रामत्व कैसे प्रसरित हो रहा है जानने के लिए सुनें l

2.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९८ वां* सार

 सिंधु तरो उनको बनरा, तुसपै धनुरेख गई न तरी।

बाँध्योइ बाँधत सो न बँध्यो उन बारिधि बाँधि कै बाट करी।।

अजहूँ रघुनाथ-प्रताप की बात तुम्हैं दसकंठ न जानि परी।

तेलनि तूलनि पूँछि जरी (जड़ी हुई, युक्त) न जरी गढ़, लंक जराई जरी।।26।।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 2 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २८०

हम अपने संगठन में संवेदनशीलता , सहयोग, सहानुभूति का ध्यान रखें l




हम मनुष्य हैं। विचार, भावना और संवेदना ही हमें अन्य प्राणियों से विशिष्ट बनाती है। भावों का विश्लेषण करना, दूसरों के सुख-दुःख को अनुभव करना और उनके प्रति आत्मीयता रखना मनुष्य होने का वास्तविक लक्षण है। यही मनुष्यत्व है l संवेदनशीलता मनुष्य को प्राप्त परमात्मा का एक अनुपम उपहार है  यह उनकी कृपा का प्रसाद और जीवन का अमूल्य वरदान है।

हम सब युगभारती से संयुत हैं, जो दीनदयाल विद्यालय के पूर्व छात्रों द्वारा संचालित एक विशिष्ट संस्था है। हमारे संगठन की वास्तविक शक्ति केवल हमारी संख्या, संसाधनों या व्यवस्थाओं में नहीं, बल्कि हम सदस्यों के बीच विद्यमान संवेदना, सहयोग, सहानुभूति और पारस्परिक विश्वास में निहित  है।

जैसे मानव-शरीर के सभी अंग एक-दूसरे के सुख-दुःख से जुड़े रहते हैं और मिलकर सम्पूर्ण शरीर को स्वस्थ एवं सक्षम बनाते हैं, वैसे ही प्रत्येक सदस्य भी एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायी  है। जब किसी एक सदस्य को आवश्यकता हो, तब अन्य सदस्य उसके साथ खड़े हों; जब किसी को सफलता मिले, तो सभी उसकी प्रसन्नता में सहभागी बनें। यही संगठनात्मकता हमारी संस्था को जीवंत, सशक्त, समाज और राष्ट्र के लिए कल्याणकारी और दीर्घजीवी बना देगी l

आइए, हम केवल एक संस्था के सदस्य न रहें, बल्कि एक परिवार की भाँति संवेदना, सहयोग, सहानुभूति और सेवा के भाव से संयुत रहें। यह रामात्मकता ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है और यही हमारी पहचान भी।

रामकथा में एक प्रसंग आता है जब लक्ष्मण जी संजीवनी बूटी के प्रभाव से पुनः सचेत हुए


हृदय घाउ मेरे पीर रघुबीरै |

  पाइ सजीवन, जागि कहत यों प्रेमपुलकि बिसराय सरीरै ||


  मोहि कहा बूझत पुनि पुनि, जैसे पाठ-अरथ-चरचा कीरै |

  सोभा-सुख, छति-लाहु भूपकहँ, केवल कान्ति-मोल हीरै ||


  तुलसी सुनि सौमित्रि-बचन सब धरि न सकत धीरौ धीरै |

  उपमा राम-लषनकी प्रीतिकी क्यों दीजै खीरै-नीरै ||

यह पद भ्रातृ-प्रेम, सेवा, समर्पण और आत्मविस्मृति का अनुपम आदर्श प्रस्तुत करता है।  तुलसीदास इस प्रसंग के माध्यम से बताते हैं कि सच्चा प्रेम वही है जिसमें अपने सुख-दुःख का बोध मिट जाए और प्रिय के सुख-दुःख में ही अपना जीवन समाहित हो जाए।

आजकल हम लोग लंका कांड में प्रविष्ट हैं

दसन गहहु तृन कंठ कुठारी, परिजन सहित संग निज नारी।सादर जनकसुता करि आगें, देहु राम कहँ बिसरिहि लागें।

अंगद रावण को समझाते हुए कहते हैं कि "हे रावण! तुम अपने दाँतों में तिनका दबाकर (अर्थात पूर्ण दीनता व क्षमा याचना की मुद्रा में) और गले में कुठार (कुल्हाड़ी) डालकर, अपने परिवार तथा अपनी पत्नी के साथ, माता सीता को आदरपूर्वक आगे करके श्रीराम को सौंप दो, तभी तुम्हारा कल्याण होगा।"

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,ऐसा ज्ञान जो अंतःकरण में विवेक का दीप प्रज्वलित करे को आचार्य जी ने किस उदाहरण से स्पष्ट किया जानने के लिए सुनें

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1.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७९७ वां* सार -संक्षेप

 यत् त्वया मत्तः अधीतं तद् उत्सृज।"

"जो यजुर्वेद तुमने मुझसे पढ़ा है, उसे त्याग दो (उगल दो)।"


यह प्रसिद्ध संवाद महर्षि वैशम्पायन और याज्ञवल्क्य के बीच की एक पौराणिक घटना को दर्शाता है, जिसके परिणामस्वरूप यजुर्वेद का विभाजन हुआ था l


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७९७ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २७९

 राष्ट्र हमारी सर्वोच्च निष्ठा, हमारी भक्ति, हमारी शक्ति, हमारी पूजा और हमारे अटूट विश्वास का आधार है, अतः शिक्षा का प्रत्येक आयाम भी राष्ट्रहित, संस्कृति-संरक्षण और लोककल्याण के आदर्शों से प्रेरित होना चाहिए।



वेद प्राचीन शैक्षिक परम्परा का मूल आधार हैं । वेद केवल धार्मिक ग्रन्थ नहीं हैं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, भाषा, गणित, चिकित्सा, खगोल, पर्यावरण तथा नैतिक जीवन के आदिम स्रोत हैं। अतः वैदिक ज्ञान का गंभीर अध्ययन आवश्यक है, जिससे हम प्रमाणपूर्वक यह प्रतिपादित कर सकें कि भारतीय शैक्षिक परम्परा अत्यन्त प्राचीन, समृद्ध और मानव के लिए अत्यन्त कल्याणकारी रही है।हमने अपना उद्देश्य निर्धारित किया है 

 *वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः* यजुर्वेद ९.२३


यदि हम राष्ट्र के प्रति जाग्रत हैं, यदि राष्ट्र ही हमारी भक्ति, हमारी शक्ति, हमारी पूजा और हमारा अटूट विश्वास है, तो हमारी शिक्षा भी उसी से अनुप्राणित होनी चाहिए। ऐसी शिक्षा केवल जीविकोपार्जन का साधन न होकर राष्ट्रनिर्माण, चरित्र-निर्माण, सांस्कृतिक संरक्षण तथा कर्तव्यबोध का माध्यम बने। जब शिक्षा का लक्ष्य राष्ट्र के गौरव, संस्कृति और लोककल्याण से जुड़ता है, तभी वह अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करती है।

यही आदर्श श्रीरामचरितमानस में भगवान् श्रीराम के चरित्र में प्रत्यक्ष दिखाई देता है।

आजकल हम लोग लंका कांड में प्रविष्ट हैं l


गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज।सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज॥

श्रीराम के चरणकमलों का स्मरण करके अंगद रावण की सभा में पहुँचे। वे सिंह के समान निर्भीक और तेजस्वी थे। उन्होंने सभा में चारों ओर निडर दृष्टि डाली। वे धैर्य, वीरता और अपार बल के साक्षात् स्वरूप थे।

अंगद का चरित्र इस बात का आदर्श है कि जो व्यक्ति उच्च आदर्शों, गुरु और राष्ट्रधर्म के प्रति निष्ठावान होता है, वही विपरीत परिस्थितियों में भी सिंह के समान निर्भय रहता है।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,पद्धति ग्रंथ किसे कहते हैं,उन्नाव विद्यालय में चल रहे पूर्त कार्यों का उल्लेख आचार्य जी ने क्यों किया, भैया मनीष कृष्णा जी के घर पर कल संपन्न हुई बैठक में कौन कौन उपस्थित रहा, अधिवेशन में शिक्षा विषय पर प्रस्ताव पारित  कराने हेतु आचार्य जी ने क्या सुझाव दिया जानने के लिए सुनें l