मैं संस्कृति के सामगान का चारण हूँ
क्रांतिमन्त्र का भावभरा उच्चारण हूँ।
महिमा-मण्डित सदाचारण की भाषा हूं
तप का विग्रह संयम की परिभाषा हूँ॥ १॥
मैं संस्कृति के...
राष्ट्र-यज्ञ का निष्ठापूर्ण समर्पण हूँ,
बलिदानी सुधियों का नियमित तर्पण हूँ।
एकमेव कर्मठता का विश्वासी हूँ,
मन-मन्दिर में रमा क्षेत्र-संन्यासी हूँ॥ २॥
मैं संस्कृति के....
(साकल्य पृ ८७, ८८)
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया /तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 16 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८१२ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९४
इन सदाचार-वेलाओं को ध्यानपूर्वक सुनें, भली-भाँति समझें, हृदय से स्वीकार करें कि हमारा सनातन धर्म अद्भुत है तत्पश्चात् उसके सिद्धान्तों को अपने जीवन में आचरण के रूप में उतारें। अपने लक्ष्य सदैव ध्यान में रखें हमारे लक्ष्य हैं
वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः
राष्ट्र -निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष
परं वैभवं नेतुमेतत्स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥
तभी इन वेलाओं का श्रवण सार्थक होगा।
इन सदाचार वेलाओं के माध्यम से आचार्य जी नित्य हम साधकों को उत्साहित करते हैं वे हमें सचेत करते हैं कि हम संसार की हाय-हाय, आपाधापी और प्रपञ्चों में ही न उलझे रहें। कुछ समय आत्मचिन्तन के लिए निकालें और अनुभूति करें कि हम वास्तव में कौन हैं। हमारा वास्तविक स्वरूप शरीर या मन नहीं, अपितु शुद्ध आनन्दस्वरूप आत्मा है। इसी सत्य का उद्घोष करते हुए भगवान आदि शंकराचार्य कहते हैं
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो
विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।
सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः
चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥ ६॥
आजकल हम सब श्रीरामचरितमानस की पावन कथा में प्रविष्ट हैं। परमात्मा श्रीराम लोकमंगल के लिए नररूप धारण कर अपनी दिव्य लीलाओं का प्रदर्शन करने आए। मानस का श्रवण तभी सार्थक है, जब भगवान् श्रीराम के रामत्व का कुछ अंश भी हम अपने जीवन में उतार लें । यदि उनके सत्य, मर्यादा, करुणा, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग, सेवा, शौर्य, पराक्रम,धर्मपालन जैसे दिव्य गुणों को हम अपने आचरण में धारण कर लें, तभी कथा-श्रवण का वास्तविक फल प्राप्त होगा।
आइये कथा में पहुंच जाएं
बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेजपुंज लछिमन उर लागी॥
मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥4॥
मेघनाद ने वीरघातिनी शक्ति चलाई। वह तेजपूर्ण शक्ति लक्ष्मणजी की छाती में लगी। शक्ति लगने से उन्हें मूर्च्छा आ गई। तब मेघनाद भय छोड़कर उनके पास चला गया॥4॥
भोग और त्याग का संघर्ष चल रहा है l ऐसा लग रहा है कि भोग विजयी हो गया किन्तु
*यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई॥*
इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,सुषेण योद्धा कौन था जानने के लिए सुनें