15.7.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८११ वां* सार

 मैं कवि हूँ अपनी कविता का संदेश सुनाता हूँ।

हैं जहाँ कहीं भी शोले उनकी राख हटाता हूँ॥

बलिदान सपूतों के सपनों में जब भी आते हैं 

हँसते दिल के अंगारे पर आँसू बढ़ जाते हैं..


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 15 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८११ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९३


राष्ट्रभक्त जनमानस में धर्म, सत्य, राष्ट्रभक्ति और जागरण की चेतना उत्पन्न करनाअनिवार्य है उसे शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति कराना नितान्त आवश्यक है



हम सौभाग्यशाली हैं कि दीर्घकाल से निरन्तर चल रही इन सदाचार वेलाओं में अनेक सांसारिक प्रपंचों में फँसे होने पर भी समय निकालकर आचार्यजी वेद, उपनिषद्,पुराण,

श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्भगवद्गीता तथा अन्य आर्ष ग्रन्थों का संदर्भ देकर  सदाचार, संस्कार, आत्मविकास, चरित्र-निर्माण, भारतीय संस्कृति, गुरुकुल परम्परा, परिवार, समाज एवं राष्ट्रधर्म का सरल, प्रेरक और व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं। हमें इनका लाभ उठाना चाहिए l वे भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण तथा महापुरुषों के जीवन-प्रसंगों के माध्यम से सत्य, शुचिता, संयम, अनुशासन, सेवा,शौर्य, पराक्रम,कर्तव्यपरायणता और धर्मनिष्ठ जीवन का संदेश देते हुए सनातन धर्म,भारतीय संस्कृति तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा के संरक्षण और संवर्धन के लिए निरन्तर प्रेरित कर रहे हैं। उनका मूल संदेश है कि सदाचार ही श्रेष्ठ चरित्र का आधार है और श्रेष्ठ चरित्र ही व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र की वास्तविक शक्ति है।


आचार्य जी कहते हैं कविता मनोरञ्जन का साधन नहीं है l कवयः क्रान्तदर्शिनः अर्थात् कवि भूत और भविष्य को जानते हैं l  हमारी महान् आर्ष काव्य-परम्परा के अन्तर्गत वैदिक ऋषि काव्य-रचनाकार ही नहीं थे,वे युगद्रष्टा, धर्मद्रष्टा और समाज के पथप्रदर्शक थे।


आचार्य जी अन्याय और षड्यन्त्र करने वालों के लिए एक बुरे स्वप्न के समान हैं l

आचार्य जी उन लोगों की आलोचना करते हैं जो स्वार्थवश अपने सिद्धान्तों और राष्ट्रहित को छोड़कर थोड़े-से लाभ के लिए बिक जाते हैं  आचार्य जी उनकी भी आलोचना करते हैं जो स्वयं वैभव और भोग-विलास में डूबे रहते हैं, किन्तु दूसरों को कर्म और त्याग का उपदेश देते हैं l आप कहते हैं कि राष्ट्र और समाज में व्याप्त अन्याय, विश्वासघात, स्वार्थ और पाखण्ड के विरुद्ध निर्भीक स्वर उठाना आवश्यक है तथा राष्ट्रभक्त जनमानस में धर्म, सत्य, राष्ट्रभक्ति और जागरण की चेतना उत्पन्न करना भी अनिवार्य है उसे शौर्य प्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति कराना नितान्त आवश्यक है


गोस्वामी तुलसीदास जी ने यही किया उन्हें समाज -जागरण के लिए परमात्मा द्वारा दिया गया अद्भुत कवित्व प्राप्त था

मानस में एक प्रसंग है 


बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेजपुंज लछिमन उर लागी॥

मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥4॥


मेघनाद ने वीरों का संहार करने वाली दिव्य वीरघातिनी शक्ति छोड़ी। वह अग्नि के समान तेजस्वी शक्ति लक्ष्मणजी की छाती में आ लगी। उसके प्रहार से लक्ष्मणजी मूर्छित हो गए। तब मेघनाद, यह जानकर कि लक्ष्मण अब अचेत हो गए हैं, अपना भय छोड़कर उनके निकट आ गया।

यह प्रसंग अन्य किसी रामकथा में नहीं मिलता कदाचित् इसका कारण था कि 

 विधर्मी अकबर के शासनकाल में उत्तराधिकार के संघर्षों में सत्ता के लिए भाइयों के बीच रक्तपात और आपसी वैमनस्य के उदाहरण देखने को मिलते थे। ऐसी परिस्थितियों का समाज पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका थी। इसी संदर्भ में गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान् श्रीराम और लक्ष्मण जी के आदर्श भ्रातृ-प्रेम, त्याग, निष्ठा और परस्पर समर्पण का चित्रण करके समाज के समक्ष एक उच्च आदर्श प्रस्तुत करने का प्रयास किया लक्ष्मण जी के शक्ति लगने पर श्रीराम का विलाप और लक्ष्मण जी की राम जी के प्रति अनन्य सेवा यह संदेश देती है कि भाई-भाई का संबंध स्वार्थ या सत्ता का नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग और धर्म का होना चाहिए।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने कवि श्री हरि ओम पवार जी का नाम क्यों लिया facebook पर आचार्य जी ने क्या देखा जानने के लिए सुनें