मर्यादित व्यवहार, आत्मीयता से परिपूर्ण सम्बन्ध और प्रेममय बन्धन ही जीवन को सार्थक बनाते हैं...
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आषाढ़ कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 14 जुलाई 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८१० वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २९२
यह अविश्वास का अंधकार है आत्मदीप हो जाओ,
युगचारण जागो कसो कमर फिर से भैरवी सुनाओ l
हमें किसी भी परिस्थिति में निराश, उदास, भ्रमित, भयभीत और अविश्वासी नहीं होना चाहिए क्योंकि हम सनातनधर्मी हैं l
आचार्य श्री सन् १९७१ से सदाचारमय विचारों का सतत् प्रसार कर रहे हैं और विगत लगभग दस वर्षों से उनके ये प्रेरणादायी विचार वायवीय माध्यम के द्वारा नियमित रूप से हम सबके समक्ष पहुँच रहे हैं यह हमारा सौभाग्य है l
हमारी सनातन परम्परा अनादिकाल से अविच्छिन्न रूप में प्रवाहित होती चली आ रही है। यह परम्परा केवल किसी एक युग या कालखंड तक सीमित नहीं, बल्कि कल्प-कल्पान्तरों से निरन्तर प्रवहमान है।
महर्षियों ने अपने तप, साधना और प्रत्यक्ष अनुभूति से प्राप्त ज्ञान को केवल ग्रन्थों में ही सुरक्षित नहीं रखा, बल्कि योग्य शिष्यों को प्रदान कर उसे जीवन्त बनाए रखा।जब हम सनातनत्व पर विचार करते हैं, तब हमें स्वयं को भी इसी महान् परम्परा का एक जीवंत अंग मानना चाहिए। यह भाव जाग्रत होना चाहिए कि हम गायत्री के उपासक केवल दर्शक नहीं, अपितु उस अनादि, अखण्ड और दिव्य परम्परा के वाहक एवं संवाहक हैं। हमें अंधकार से भयभीत नहीं होना चाहिए l हम कहते हैं *वयं अमृतस्य पुत्राः* l हमारा प्रत्येक विचार, आचरण और जीवन उसी सनातन धारा के अनुरूप होना चाहिए।
*उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्त होने तक रुको मत*
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र १४)
यह संदेश भगवान् श्रीराम के जीवन में पूर्णतः साकार होता है। उन्होंने कभी विपत्ति से पलायन नहीं किया। वनवास हो, राक्षसों का अत्याचार हो या रावण से धर्मयुद्ध उन्होंने सदैव जागरूक होकर धर्म के मार्ग पर अटल रहते हुए कर्तव्य का पालन किया। उनका जीवन हमें प्रेरणा देता है कि हम भी उठें, जागें और धर्म, सत्य तथा राष्ट्र के आदर्शों की प्राप्ति तक निरन्तर पुरुषार्थ करते रहें l आइये युद्धक्षेत्र में पहुंच जाएं l
एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया॥
कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके॥4॥
तब प्रभु श्री रामजी ने एक ही बाण से सारी माया काट डाली, जैसे सूरज अंधकार के समूह को हर लेता है। तदनन्तर उन्होंने कृपाभरी दृष्टि से वानर-भालुओं की ओर देखा और इस प्रकार वे ऐसे प्रबल हो गए कि युद्ध में रोकने पर भी नहीं रुक रहे थे l
घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमति किंसुक के तरु जैसे॥
लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा॥1॥
घायल वीर उसी तरह शोभित हैं, जैसे फूले हुए पलास के पेड़। लक्ष्मण और मेघनाद दोनों योद्धा अत्यंत क्रोध करके एक-दूसरे से भिड़ते हैं
एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती॥
क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता॥2॥
एक-दूसरे को (कोई किसी को) जीत नहीं सकता। राक्षस छल-बल और अनीति करता है, तब भगवान् अनन्त जी अर्थात् लक्ष्मण जी क्रोधित हुए और उन्होंने तुरंत उसके रथ को तोड़ डाला और सारथी को टुकड़े-टुकड़े कर दिया l
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने मेघनाद, सुलोचना,पतिव्रता उर्मिला के विषय में क्या बताया,एक दिन किसने भूसा खा लिया जानने के लिए सुनें l