30.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्थी /पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 30 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८८८ वां* सार -संक्षेप

 नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा॥

बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी॥3॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्थी /पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 30 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८८८ वां* सार -संक्षेप



भारतीय चिन्तन अद्वितीय है। वह सम्पूर्ण मानवता को एक उदात्त जीवन-दृष्टि प्रदान करता है “कृण्वन्तो विश्वम् आर्यम्”, अर्थात् समस्त विश्व को आर्य बनाने का संकल्प। आर्य श्रेष्ठ आचरण, उदात्त विचार और संस्कारित जीवन का बोधक है। हम आर्य बाहर से नहीं आये l अपने विषय में  हमें अनेक प्रकार के भय, भ्रम और मोह से मुक्त होकर सत्य को समझना होगा। अपनी सभ्यता और संस्कृति के सम्बन्ध में ऐसे अनेक मत प्रस्तुत किए गए हैं जिन पर गम्भीरता से विचार करना आवश्यक है। हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर अपने इतिहास, परम्परा और सांस्कृतिक निरन्तरता को समझना चाहिए।

भारतीय अध्यात्म हमें इससे भी आगे ले जाता है। वह कहता है कि मनुष्य केवल शरीर और भौतिक सत्ता नहीं है; उसके भीतर परमात्मतत्त्व का प्रकाश विद्यमान है। इसलिए असंतोष,दीनता,भय, भ्रम और मोह से ऊपर उठना ही आत्मबोध की दिशा में पहला चरण है। हम स्वकर्म को अपना धर्म मानकर चलें l भगवान श्रीराम ने भी अपने जीवन में व्यक्तिगत सुख-सुविधा से ऊपर उठकर कर्तव्य और धर्म को प्रधानता दी।उन्हीं की कथा के उत्तर कांड में आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं 

भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप।

किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप॥ 72 क॥


आचार्य जी ने विषयानुराग को किस प्रकार स्पष्ट किया,राहुल सांकृत्यायन का उल्लेख क्यों किया, भैया डा अमित गुप्त का नाम क्यों लिया, विद्यालय के छात्रावास का हमारे अधिवेशन से क्या सम्बन्ध हो सकता है,

अरविन्द त्रिवेदी (1938–2021)  जिन्होंने रामानन्द सागर के धारावाहिक ‘रामायण’ में लंकापति रावण की भूमिका निभाई थी, का उल्लेख आचार्य जी ने क्यों किया जानने के लिए सुनें

29.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 29 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८८७ वां* सार -संक्षेप

 संगठन महत्त्वपूर्ण है, व्यक्ति नहीं; व्यक्ति संगठन की शक्ति का एक माध्यम मात्र है।

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 29 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८८७ वां* सार -संक्षेप

अधिवेशन संपूर्ण सफलता सहित हो गया ,

और कर्म के सद्विचार का बीज बो  गया। 

एक लक्ष्य को लेकर हम सब घर लौटे हैं, 

खरा स्वर्ण हम सभी नहीं सिक्के खोटे हैं ॥

उठो जलाओ आत्मज्योति का मंगल दीपक, 

दमके नभमंडल-प्रकाश नभ से अवनी तक। 

अब न राग कुंठित मानस का दुहरायेंगे, 

एक साथ मिलकर कर्मानुराग गायेंगे ॥



हम, जो भारत माता के पुत्र हैं,राग, कुण्ठा, निराशा, निष्क्रियता को त्याग कर कर्म के प्रति अनुराग, उत्साह और समर्पण के साथ आगे चलें , अपने सनातन धर्म की परम्परा को आगे बढ़ाएं, निःस्वार्थ भाव से भारत मां की सेवा में रत हों । यही हाल में भारत मां के सेवकों को सज्ज करने वाले महायज्ञ के उपक्रम  नई दिल्ली में सम्पन्न हुए अन्तरराष्ट्रीय अधिवेशन की वास्तविक सफलता और हमारे संकल्प की सार्थकता है।

ऐसा धैर्यवान् कौन है, जिसके शरीर में मनोरथ का कीड़ा न लगा हो? पुत्र, धन और लोक-प्रतिष्ठा की प्रबल इच्छाएँ मनुष्य की बुद्धि को मलिन कर देती हैं। जब मन इन मनोरथों में आसक्त हो जाता है, तब विवेक क्षीण होने लगता है और धैर्य भी डगमगाने लगता है। अतः आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हमें अपनी इच्छाओं पर संयम रखते हुए विवेकपूर्वक जीवन जीना चाहिए l


आचार्य जी ने किन श्वेतवेशधारी संन्यासियों की चर्चा की, भैया अरिन्दम जी और भैया प्रकाश शर्मा जी का उल्लेख क्यों हुआ,सनातन संस्कृति के अनन्य उपासक श्रद्धेय अशोक सिंघल जी का श्री चन्द्र भानु गुप्त जी से क्या सम्बन्ध था, सद्गुरु की दृष्टि के किस चित्र को आचार्य जी ने आज उकेरा जानने के लिए सुनें l

28.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 28 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८८६ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 28 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८८६ वां* सार -संक्षेप


परिवार का बोध भारतवर्ष की एक अमूल्य संपदा है अनमोल धरोहर है किन्तु आज परिवार का भाव कहीं-कहीं कुंठित होता दिखाई दे रहा है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि हम अपनी मूल जीवन-दृष्टि से भ्रमित हो गये हैं और पाश्चात्य प्रभावों की ओर आकर्षित होते हुए अपनी परम्परा और जीवन-मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। हमें,जो भारतभूमि में जन्मे हैं, ज्योतिपुरुष बनकर प्रयास करना है कि यह परिवार का भाव कुंठित न रहे l भारतभूमि में जन्म लेने वाले मनुष्य धन्य हैं ऐसा देवता भी मानते हैं । यह भूमि स्वर्ग और मोक्ष—दोनों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाली है, यहाँ जन्म लेकर मनुष्य देवत्व को भी प्राप्त कर सकता है।

यही परिवार का भाव  कल संपन्न हुए दिल्ली के अधिवेशन को अत्यन्त सफल बना गया l 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने परामर्श दिया कि हम इस कार्यक्रम की समीक्षा करें l 

आचार्य जी ने यह उद्बोधन कहां से किया, अधिवेशन को आचार्य जी ने कितने अंक प्रदान किए जानने के लिए सुनें l

27.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 27 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८८५ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 27 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८८५ वां* सार -संक्षेप


संख्या, अनुशासन, प्रेम और आत्मीयता की दृष्टि से कल नई दिल्ली में संपन्न हुआ कार्यक्रम अति प्रशंसनीय रहा l १९७५ हाईस्कूल बैच से २०२६ इंटर बैच तक उपस्थित सभी सदस्य अत्यन्त उत्साहित रहे l भाव और भावना को विशेष महत्त्व दिया गया l कार्यक्रम में व्यवधान आये किन्तु उनसे हम हताश नहीं हुए l

आज युगभारती अधिवेशन का उद्घाटन और समापन दोनों है l हम अपनी सनातन परम्परा की अखण्ड धारा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते हुए, उसके क्रम को अविच्छिन्न बनाने के प्रयास में रत हैं हमारा लक्ष्य है राष्ट्र को परम वैभव पर पुनः पहुंचाना l हम लोग रामात्मक शक्ति लेकर सनातनधर्मी समाज की निराशा, हताशा, भय और भ्रम को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं l इसी विचार के विस्तार के लिए ही हम एकत्र हुए हैं क्योंकि संगठन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है l संघे शक्तिः कलौ युगे l 

लगभग ३५ करोड़ रुपये की लागत वाली किस योजना की आचार्य जी ने चर्चा की, मानस, जो हमें शक्ति शौर्य की अनुभूति कराता है,में आज आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l

26.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 26 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८८४ वां* सार -संक्षेप

 तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं॥

नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी॥3॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 26 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८८४ वां* सार -संक्षेप




हमारा लक्ष्य है कि हम सुयोग्य, सक्षम व्यक्ति संगठित रहें ताकि हमारा सनातन धर्मी समाज भयभीत भ्रमित न रहे l संगठन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है l संगठन में अपार शक्ति होती है l एक कुशल संगठनकर्ता  प्रेम आत्मीयता के आधार पर सबको संयुत रखने का प्रयास करता है l सुयोग्य व्यक्ति के भीतर से एकांतभाव समाप्त होना आवश्यक है ताकि वह उत्साहित रह सके l हमारे भीतर अनन्त शक्तियां विद्यमान हैं l इन वेलाओं का उद्देश्य यही है कि हम अपनी अन्तर्शक्तियों को पहचानें  - कोऽहं सोऽहम्,अपने दंभ का निरसन करें l आचार्य जी कहते हैं कि हम अध्ययन स्वाध्याय अवश्य करें हमारे ग्रंथों में अद्भुत ज्ञान समाहित है हमें उनका लाभ उठाना चाहिए l ये हमारी निराशा हताशा समाप्त करने में सक्षम हैं l 


आचार्य जी ने शक्ति -केन्द्रों को कैसे स्पष्ट किया, भैया शुभेन्दु जी का उल्लेख क्यों हुआ, उत्तर कांड में आचार्य जी ने क्या बताया, पंचपल्लव कौन कौन से हैं जानने के लिए सुनें l

25.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 25 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८८३ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६५

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 25 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८८३ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६५

आत्मशक्ति, आत्मबोध, आत्मविश्वास पुञ्जीभूत स्वरूप में अपने पास लाने की हम चेष्टा करें l


हर मनुष्य के भीतर एक अपौरुषेय तत्त्व विद्यमान है,उसके अन्तःकरण में परमात्मा का निवास है। इस सत्य का बोध तब होने लगता है, जब मनुष्य अध्यात्म की तलहटी तक पहुँचकर अपने भीतर की उस दिव्य सत्ता का साक्षात्कार करने का प्रयास करता है। यही विद्या है अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप और परमात्म-तत्त्व को जानना।

किन्तु जीवन केवल अध्यात्म-बोध तक सीमित नहीं है। इसके साथ हमें अविद्या अर्थात् भौतिकता को भी जानना आवश्यक है l अध्यात्म जब जीवन में उतरता है तो वह कर्मयोग का रूप ग्रहण करता है अर्थात् आत्मबोध के साथ अपने कर्तव्य का सम्यक् निर्वाह करना ।

इसलिए भारतीय जीवन-दृष्टि हमें विद्या और अविद्या—दोनों को भली-भाँति जानने की प्रेरणा देती है। इन दोनों का समन्वय ही जीवन को पूर्णता की ओर ले जाता है।

इसे हम उचित शिक्षा के माध्यम से जान सकते हैं l वर्तमान शिक्षा ऐसी नहीं है हम यदि उचित शिक्षा द्वारा शिक्षित हैं तो व्याकुल व्यथित नहीं रह सकते l यह उचित शिक्षा एक योग्य शिक्षक ही दे सकता है l 


शिक्षक स्वभाव से सहज स्वतंत्र विचारशील, 

संयमित स्वाध्यायी श्रमशील तपस्वी है। 

उत्साह उमंगों भरा भावनाओं का स्वर, 

निर्लिप्त मनस्वी आजीवन तेजस्वी है ll

गोस्वामी तुलसीदास जी ऐसे ही शिक्षक रहे हैं  उनका रचित श्रीरामचरितमानस सारी समस्याओं का उत्तर प्रदान कर देता है l समय समय पर प्रकट होने वाले इसी शिक्षकत्व के कारण हमारा सनातन धर्म नष्ट नहीं हुआ l

आजकल हम लोग मानस के उत्तरकांड में प्रविष्ट हैं l


श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरि दास।

पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास॥69 ख॥

हे उमा! सुंदर बुद्धि वाले सुशील, पवित्र कथा के प्रेमी और हरि के सेवक श्रोता को पाकर सज्जन अत्यंत गोपनीय रहस्य को भी प्रकट कर देते हैं॥

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,पक्षियों की बोली जानने वाले ने राजा को क्या समझाया,भैया शशि शर्मा जी १९७५, भैया देवर्षि जी की चर्चा क्यों हुई, अधिवेशन के विषय में आचार्य जी ने क्या परामर्श दिया जानने के लिए सुनें l

24.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 24 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८८२ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६४

 कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई॥

पुनि प्रभु पंचबटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा॥1॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 24 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८८२ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६४

अपने गुणों को जानने का प्रयास करें और उनके आधार पर कर्मरत हो जाएं l


जिस शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना और किसी प्रकार जीविका प्राप्त कर लेना रह जाए, वह मनुष्य को जीवन की व्यापकता और उसकी सार्थकता का बोध नहीं करा सकती। ऐसी शिक्षा से हाथ को काम तो मिल सकता है, किन्तु जीवन को दिशा नहीं मिलती। वर्तमान समय की शिक्षा ऐसी ही है l हमें आवश्यकता है ऐसी शिक्षा की जो मनुष्य को जीविका अर्जित करने का सामर्थ्य तो दे ही, साथ ही उसके भीतर संस्कार, स्वावलम्बन, शौर्य, सेवा, त्याग,लोकमंगल आदि गुण विकसित करे l आचार्य जी हमें परामर्श दे रहे हैं कि हम व्यावहारिक अध्ययन के साथ अपने सद्ग्रंथों का अध्ययन करें, स्वाध्याय करें l यदि हम सद्ग्रन्थों के अध्ययन और स्वाध्याय में रम जाएं , उनके विचारों को केवल पढ़ें नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न करें, तो हमारी प्रकृति और व्यक्तित्व में भी ऐसे गुण विकसित हो सकते हैं, जैसे पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के जीवन में दिखाई देते हैं। उन्होंने अपने विचार, आचरण और कर्म के माध्यम से समाज और राष्ट्र के जीवन में उल्लेखनीय यश एवं प्रभाव अर्जित किया।


जलते जीवन के प्रकाश में अपना जीवन तिमिर हटायें,

उस दधीचि की तपः ज्योति से एक-एक कर दीप जलाएं।

भारतभूमि की प्रकृति ही ऐसी रही है कि यहाँ संयम, निःस्वार्थता, त्याग, सेवा और राष्ट्रनिष्ठा को जीवन के उच्च आदर्श माना गया। इसी जीवन-दृष्टि की पृष्ठभूमि में पं. दीनदयाल उपाध्याय, जिनकी जयंती को कल संपूर्ण विश्व मनाने जा रहा है,जैसे अनेक महापुरुष इस भूमि पर जन्मे और उन्होंने अपने जीवन को व्यक्तिगत यश अथवा स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए समर्पित किया। हमारे पास जो  भी तत्त्व,शक्ति, सामर्थ्य, भक्ति, संयम, राष्ट्र -सेवा है उसके हम दर्शन करें, मनुष्यत्व की अनुभूति करें l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने मानस में आज क्या बताया, क्या मां कैकेयी रावण -वध में सहायक बनीं,भैया अखिलेश तिवारी जी का उल्लेख क्यों हुआ, चित्रकूट के किस स्थान का उल्लेख हुआ जानने के लिए सुनें l

23.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 23 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८८१ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६३

 इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना॥

मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधि बिपरीत भलाई नाहीं॥ ( बाल कांड )


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 23 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८८१ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६३

इन सदाचार वेलाओं को सुनकर हमारे भीतर तप त्याग संयम सेवा परोपकार शौर्य पराक्रम का भाव अवतरित हो l 



वर्तमान शिक्षा, जिसका उद्देश्य केवल जीविका अर्जित करना ही है, से इतर हमारी शिक्षा केवल जीविका का साधन नहीं, जीवन के अन्तर्निहित सामर्थ्य को जाग्रत करने की साधना थी, जहाँ गुरु केवल पाठ पढ़ाने वाला नहीं, वह शिष्य को शक्ति,शौर्य, पराक्रम, संयम,तप,त्याग, परोपकार  जैसे भावों की अनुभूति कराता था, वह जीवन का निर्माता और संस्कारों का प्रदाता था,इस शिक्षा के आधार पर विद्या से विनय, विनय से विवेक, विवेक से शौर्य और शौर्य से लोकमंगल का मार्ग प्रशस्त होता था; हमने प्रकृति को पढ़ा, आकाश को नापा, गणित को साधा, औषधि को जाना, शब्द और दर्शन में सत्य की खोज की और अध्यात्म में जीवन के परम तत्त्व का साक्षात्कार किया; हमारी शिक्षा ने ज्ञान और कर्म, विज्ञान और अध्यात्म, शौर्य और सेवा को एक सूत्र में पिरोकर हमें केवल विद्वान नहीं, सम्पूर्ण मनुष्य बनाया और इसी जीवन-दृष्टि के बल पर भारत विश्व के लिए ज्ञान, संस्कृति और जीवन-मूल्यों का मार्गदर्शक बना; हमारे यहां ज्ञान केवल अपने उत्कर्ष के लिए नहीं, अपितु समष्टि के कल्याण के लिए था l

हमें ऐसी शिक्षा की पुनर्स्थापना करनी होगी जो जीविका का सामर्थ्य तो दे ही, साथ ही जीवन-दृष्टि, संस्कार, स्वावलम्बन, शौर्य, सेवा और लोकमंगल की चेतना भी जगाए। इसी पुनर्स्थापना के प्रयास के लिए हम अधिवेशन करने जा रहे हैं l 


विश्वास करो हम उसी विप्रकुल के  सुअंश, 

जिसने धरती को अंतरिक्ष का ज्ञान दिया। 

देवों से भी ऊँचा क्षितिगति युत् कर्म धर्म का मान दिया। 

हम सुधाविन्दु के दानी हैं अभिमानी हैं, 

हम देव दुर्लभा जग की "राम कहानी" हैं ॥

आज कल हम लोग इसी राम कहानी के उत्तर कांड में रमे हुए हैं

सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ॥

देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम॥1॥


हे तात! सुनिए, मैं जिस कारण से आया था, वह सब कार्य तो यहाँ आते ही पूरा हो गया। फिर आपके दर्शन भी प्राप्त हो गए। आपका परम पवित्र आश्रम देखकर ही मेरा मोह संदेह और अनेक प्रकार के भ्रम सब जाते रहे॥1॥



गरुड़ जी की विनम्र, सरल, सुंदर प्रेमयुक्त, सुप्रद और अत्यंत पवित्र वाणी सुनते ही भुशण्डिजी के मन में परम उत्साह हुआ और वे श्री रघुनाथजी के गुणों की कथा कहने लगे l


इसके अतिरिक्त भैया आशीष जोग जी, भैया अरुण चौधरी जी का उल्लेख क्यों हुआ,शिक्षा वेदों की नासिका किस कारण है जानने के लिए सुनें l

22.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 22 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८८० वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६२

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 22 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८८० वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६२

हम अपने इष्ट हनुमान जी को सदैव अपनी स्मृति में रखें हनुमान जी हमारे भय भ्रम को दूर करते हैं हमें भक्ति शक्ति विश्वास प्रदान करते हैं हमें कर्मशील बनाते हैं l 




जब तक शिक्षा पूर्णतः सरकारी नियन्त्रण में रहेगी, तब तक उसके स्वरूप के विकृत होने की सम्भावना बनी रहेगी। आज हम शिक्षा और उसके प्रबन्धन में अनेक विकृतियाँ स्पष्ट रूप से देख रहे हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना देना या रोजगार प्राप्ति का माध्यम बनना नहीं, बल्कि व्यक्ति के ज्ञान, चरित्र, विवेक, कौशल और जीवन-मूल्यों का विकास करना है। अतः शिक्षा के सम्बन्ध में आगामी अधिवेशन में हमारा प्रमुख सुझाव यह रहेगा कि शिक्षा का दायित्व सुयोग्य, संस्कारवान् और उत्तरदायी शिक्षकों के भरोसे किया जाए। शिक्षकों को पर्याप्त स्वायत्तता, उत्तरदायित्व और सम्मान प्रदान किया जाए, ताकि वे शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने की प्रक्रिया न मानकर राष्ट्र और समाज के निर्माण का माध्यम बना सकें। 

 जो व्यक्ति केवल नौकरी पाने के लिए पढ़ाने के क्षेत्र में आता है, वह पद की दृष्टि से शिक्षक हो सकता है, परन्तु शिक्षकत्व की दृष्टि से वह अभी केवल सेवक है। वास्तविक शिक्षक तो वह है जिसके पास भाव हों  जो संवेदनशील हो l

शिक्षक वह है जो अपने ज्ञान, आचरण, संवेदना और जीवन-दृष्टि से विद्यार्थी के व्यक्तित्व का निर्माण करे l हम अपनी शिक्षा के कारण ही कभी विश्वगुरु थे 

हम हैं वही जिन्होंने सागर पर पत्थर तैराए थे..


रामकथा  विश्वास,तप,त्याग,समर्पण,शौर्य,पराक्रम और सामूहिक प्रयास की कथा है। प्रभु श्रीराम के नेतृत्व में नल-नील और वानर सेना ने असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को संभव कर दिखाया l यह कथा कर्म की ओर प्रवृत्त होने की प्रेरणा देती है l इसके आधार पर हम अपना एक सुस्पष्ट लक्ष्य बना सकते हैं l आजकल हम लोग इसी कथा के उत्तरकांड में प्रविष्ट हैं जिसमें काकभुशुण्डी–गरुड़ संवाद चल रहा है l 

आवरणमुक्त काकभुशुण्डी जी रामचरितमानस के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भक्त-पात्र हैं। वे कौए के रूप में स्थित महान् रामभक्त और ज्ञानी हैं, जो आवरणयुक्त गरुड़ जी को श्रीराम के चरित्र का उपदेश दे रहे हैं l खगराज गरुड़ जी को भगवान राम नहीं दिख रहे उनका शरीर दिख रहा है उनके सांसारिक कृत्य दिख रहे हैं l

उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला।

तहँ रह काकभुशुण्डि सुसीला॥

इस स्थान पर पहुंचकर खगराज को शान्ति मिलती है l

नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज।

आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज॥63 क॥

हे नाथ! हे खगराज! आपके दर्शन पाकर मैं कृतार्थ हो गया हूँ। अब आप मुझे आज्ञा दें कि मैं आपके लिए क्या करूँ? प्रभु! आप यहाँ किस कार्य के लिए पधारे हैं?

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भैया अरुण चौधरी जी और भैया आशीष जोग जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

21.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 21 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७९ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६१

 दीपक से अँधियार नहीं मिटता है, केवल छँटता है, 

अन्तस् का जब सूर्य उगेगा, तभी अँधेरा मिट पाएगा। 

अपनी बस साधना यही हो, सूर्योपासक सतत रहें। 

अपनी बात स्वयं अपने अन्तस्त्तत्वों के साथ करें ॥

काम कठिन है लेकिन, यह अँधियार मिटाना ही होगा। 

खुद को भ्रम भय कुंठाओं से सदा बचाना ही होगा।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 21 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७९ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६१

विद्या और अविद्या अर्थात् ज्ञान और कर्म को हम सहज रूप से समझने का प्रयास करें l हम अपने लक्ष्य को सुस्पष्ट करें जिसे अभी भी हम ठीक प्रकार से नहीं जान पाये हैं l


भारतवर्ष की भूमि अद्भुत है। इस पुण्यभूमि पर युगों से सतत चिन्तन की परम्परा प्रवाहित होती रही है। यहाँ का मनीषी चिन्तन केवल संसार को समझने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मनुष्य को जीवन की समस्याओं और बन्धनों से मुक्ति का मार्ग भी दिखाता है। इसी दृष्टि से हमारे उपनिषद् कहते हैं कि इस संसार में रहते हुए जीवन को पूर्णता की ओर ले जाने के लिए विद्या और अविद्या—दोनों का सम्यक् ज्ञान आवश्यक है। केवल विद्या का ज्ञान पर्याप्त नहीं और केवल अविद्या का ज्ञान भी जीवन को पूर्ण नहीं बनाता। दोनों के स्वरूप, प्रयोजन और मर्यादा को भलीभाँति समझकर ही मनुष्य संसार में रहते हुए अपने जीवन को सार्थक बना सकता है। अन्यथा मनुष्य भ्रमित भयभीत रहता है वह मोह से बच नहीं पाता 

अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा॥

तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई॥3॥


ब्रह्मा जी कहते हैं यह सारा चराचर जगत् तो मेरे द्वारा रचा हुआ है। जब मैं ही माया के अधीन होकर नाचने लगता हूँ, तब गरुड़ को मोह होना कोई आश्चर्य नहीं है। तदनन्तर ब्रह्मा जी सुंदर वाणी बोले- श्री रामजी की महिमा को महादेव जी जानते हैं l 

हे गरुड़! तुम शंकर जी के पास जाओ। हे तात! और कहीं किसी से न पूछना। तुम्हारे संदेह का नाश वहीं होगा।


इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय विद्यालय ( पूर्व में भारती विद्यालय ) औरास में कल सम्पन्न हुए *प्रबन्ध समिति के चयन* की चर्चा करते हुए चिरगांव और  कैलाश मोटर्स का उल्लेख क्यों हुआ,भैया मोहन जी, भैया मुकेश जी की चर्चा क्यों हुई, सात्विक भक्ति क्यों महत्त्वपूर्ण है,  आचार्य श्री जे पी जी  की किस विशेष  अनुभूति का उल्लेख आचार्य जी ने किया जानने के लिए सुनें l

20.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 20 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७८ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६०

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 20 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७८ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३६०

आगामी अधिवेशन में  कमियों की ओर ध्यान न देकर हम कर्मयोद्धा आनन्द की अनुभूति करें l संगठन के प्रति सुदृष्टि रखें सुविधाओं  के प्रति विरक्ति रखें l


हमारा देश  भारत नित्य नई-नई समस्याओं से घिरता रहता है। पहले भी ऐसा ही होता रहा है, किंतु उनकी समस्याओं के समाधान के लिए सपूत सदैव तत्पर रहते हैं। हम वही राष्ट्र भक्त सपूत हैं l हमारा लक्ष्य ही है 

राष्ट्र - निष्ठा से परिपूर्ण समाजोन्मुखी व्यक्तित्व का उत्कर्ष l

भारत की धरती ही ऐसी है कि यहां जन्म लेने वाला मनुष्य पशु पक्षी भक्ति अर्थात् विश्वास की दिशा में प्रेरित होते हैं l भक्त को कभी ऐसा अनुभव नहीं होता कि उसका भगवान पराजित हो सकता है

 किन्तु गरुड़ जी को कुछ और ही अनुभव हुआ l

जब गरुड़ जी ने युद्धभूमि में जाकर श्रीराम और लक्ष्मण को मेघनाद के नागपाश से मुक्त कराया, तो उनके मन में एक सूक्ष्म अहंकार और संदेह आ गया। उन्होंने सोचा—"श्रीराम तो स्वयं ब्रह्मांड के स्वामी और भगवान हैं। भला साक्षात भगवान एक साधारण मेघनाद के सर्पों के बंधन में कैसे बंध सकते हैं? और अगर वे भगवान हैं, तो उन्हें मुक्त कराने के लिए मुझ जैसे एक पक्षी की सहायता की आवश्यकता क्यों पड़ी?" यही विचार गरुड़ जी का मोह (अज्ञान) बन गया। तो 


गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुण्डा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा॥

देखि सैल प्रसन्न मन भयउ। माया मोह सोच सब गयऊ॥1॥

इसके अतिरिक्त औरास की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की, भैया मोहन जी, भैया विवेक गुप्त जी, भैया मुकेश जी का उल्लेख क्यों हुआ, कम पुआल का कौन सा प्रसंग था जानने के लिए सुनें l

19.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष अष्टमी /नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 19 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७७ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५९ आगामी अधिवेशन की तैयारी में जुटे रहें l हम जिज्ञासु श्रोता बनकर इन सदाचार वेलाओं का लाभ उठाने की सतत चेष्टा करें। यहाँ व्यक्त होने वाले विचारों को केवल सुनने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। यदि इनके माध्यम से प्राप्त जीवन-दृष्टि हमारे अन्तर्मन को दृढ़ बनाती है , विवेक को जाग्रत करती है और कर्म के प्रति हमें निरन्तर प्रेरित करती है तब जीवन-यात्रा में आने वाली विषम परिस्थितियाँ हमें विचलित या व्याकुल करने के स्थान पर हमारे धैर्य, पुरुषार्थ और आत्मविश्वास को और अधिक पुष्ट करेंगी तथा हम प्रत्येक परिस्थिति को स्वीकार करते हुए प्रसन्नता, संतुलन और आनन्द के साथ अपनी जीवन-यात्रा चलाने में समर्थ होंगे। हम सनातन धर्म में अटूट विश्वास रखते हैं हमारा सनातन धर्म अद्भुत है जिसमें मानव जीवन शैली का दिव्य विधान निहित है, जो जड़ में चेतन का बोध कराता है, असार के साथ सार का ज्ञान प्रदान करता है, सद्भाव समन्वित जीवन को उचित ठहराता है,संयम, तप, त्याग, दान, परोपकार,संतोष,शक्ति, शौर्य इस धर्म के आभूषण हैं l इसी सनातन जीवन-दृष्टि का अत्यन्त सहज, सरस और जीवन्त स्वरूप हमें रामचरितमानस में दिखाई देता है। रामचरितमानस केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन को आलोकित करने वाली ज्ञान-गंगा है। यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा॥ तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी॥1॥ मां भवानी प्रश्न कर रही हैं हे कृपालु प्रभु! श्रीराम का यह पवित्र और अत्यन्त मनोहर चरित्र काकभुशुण्डि जी को कहाँ से प्राप्त हुआ? हे कामदेव के शत्रु भगवान शिव! आपने यह अद्भुत रामकथा काकभुशुण्डि जी से किस प्रकार सुनी? यह प्रसंग मेरे लिए अत्यन्त कौतूहल और जिज्ञासा का विषय है। अतः कृपापूर्वक मुझे विस्तार से बताइए। इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, नारदमुनि का उल्लेख क्यों हुआ,भैया विनय वर्मा जी का नाम क्यों आया जानने के लिए सुनें l

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  अष्टमी /नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 19 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७७ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५९

आगामी अधिवेशन की तैयारी में जुटे रहें l


हम जिज्ञासु श्रोता बनकर इन सदाचार वेलाओं का लाभ उठाने की सतत चेष्टा करें। यहाँ व्यक्त होने वाले विचारों को केवल सुनने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। यदि इनके माध्यम से प्राप्त जीवन-दृष्टि हमारे अन्तर्मन को दृढ़ बनाती है , विवेक को जाग्रत करती है और कर्म के प्रति हमें निरन्तर प्रेरित करती है तब जीवन-यात्रा में आने वाली विषम परिस्थितियाँ हमें विचलित या व्याकुल करने के स्थान पर हमारे धैर्य, पुरुषार्थ और आत्मविश्वास को और अधिक पुष्ट करेंगी तथा हम प्रत्येक परिस्थिति को स्वीकार करते हुए प्रसन्नता, संतुलन और आनन्द के साथ अपनी जीवन-यात्रा चलाने में समर्थ होंगे।

हम सनातन धर्म में अटूट विश्वास रखते हैं हमारा सनातन धर्म अद्भुत है जिसमें मानव जीवन शैली का दिव्य विधान निहित है,  जो जड़ में चेतन का बोध कराता है, असार के साथ सार का ज्ञान प्रदान करता है, सद्भाव समन्वित जीवन को उचित ठहराता है,संयम, तप, त्याग, दान, परोपकार,संतोष,शक्ति, शौर्य इस धर्म के आभूषण हैं l


इसी सनातन जीवन-दृष्टि का अत्यन्त सहज, सरस और जीवन्त स्वरूप हमें रामचरितमानस में दिखाई देता है। रामचरितमानस केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन को आलोकित करने वाली ज्ञान-गंगा है।


यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा॥

तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी॥1॥

मां भवानी प्रश्न कर रही हैं 

हे कृपालु प्रभु! श्रीराम का यह पवित्र और अत्यन्त मनोहर चरित्र काकभुशुण्डि जी को कहाँ से प्राप्त हुआ? हे कामदेव के शत्रु भगवान शिव! आपने यह अद्भुत रामकथा काकभुशुण्डि जी से किस प्रकार सुनी? यह प्रसंग मेरे लिए अत्यन्त कौतूहल और जिज्ञासा का विषय है। अतः कृपापूर्वक मुझे विस्तार से बताइए।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,

नारदमुनि का उल्लेख क्यों हुआ,भैया विनय वर्मा जी का नाम क्यों आया जानने के लिए सुनें l

18.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष सप्तमी /अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७६ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५८

 पदचिह्न बनाते राह, 

रास्ते अपने आप नहीं बनते। 

राहें संसार सजाती हैं, 

मोहक वितान जिनपर तनते ॥

राहें ही नहीं अगर होंगी ,

भटकेंगे कहाँ किधर व्याकुल। 

हर बियाबान भरमाएगा, 

दहलाएगा ढीला दलदल ॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  सप्तमी /अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 18 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७६ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५८

हम सद्चिन्तन कर संगठन सूत्र तैयार करें, कुंठा निराशा भय भ्रम व्यामोह का त्याग करें, भारत में वैदिक लोकतन्त्र स्थापित हो इस दिशा में अपने प्रयास करते रहें l



अद्भुत है यह भारतभूमि, जहाँ युग-युग में अनेक तत्त्वज्ञ ऋषि-महर्षि, मनीषी, ज्ञानी, वीर और पराक्रमी पुरुष जन्मे, जिन्होंने अपने तप, ज्ञान, साधना और पुरुषार्थ से इस भूमि को आलोकित किया। किन्तु समय-समय पर अनेक दुष्प्रयास इस पवित्र भूमि के जीवन-मूल्यों को कालुष्य से भरने, उसकी मौलिक चेतना को दुर्बल करने और उसकी सनातन जीवन-दृष्टि से समाज को विमुख करने के होते रहे हैं। किंतु भारत की विशेषता ही यह है कि प्रत्येक संकट के बीच उसकी अन्तर्निहित चेतना जाग्रत होती रही है और किसी न किसी महापुरुष, मनीषी या लोकनायक के माध्यम से समाज को पुनः अपनी मूल दिशा का बोध होता रहा है।


आज की दिशाविहीन शिक्षा शक्ति, शौर्य और पराक्रम का बोध नहीं कराती, जबकि हमारी परम्परागत शिक्षा मनुष्य के भीतर ऐसी जीवनदृष्टि का निर्माण करती थी जिसमें ज्ञान के साथ शक्ति शौर्य , विनय के साथ स्वाभिमान और भक्ति के साथ कर्मशीलता का समन्वय होता था। वह केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने वाली साधना थी; उसमें विद्यार्थी अपने सामर्थ्य को पहचानता, उसे अनुशासन में ढालता और राष्ट्र तथा समाज के हित में लगाने का संकल्प ग्रहण करता था। भगवान राम हमारे लिए मर्यादा के साथ शौर्य के भी आदर्श हैं ।अध्यात्म भी व्यवहार के रूप में भगवान राम ने किस प्रकार दिखाया है वह अद्भुत है


जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥

तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने ओमेन्द्र रत्नु का नाम क्यों लिया, राणा लाखा, राणा कुम्भा का उल्लेख क्यों हुआ,प्रेम का प्रकाश किसे देना चाहिए,भारत के लोकतन्त्र को एक कविता में आचार्य जी ने किस प्रकार परिभाषित किया जानने के लिए सुनें l

17.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष षष्ठी / सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 17 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५७

 नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होई धर्म ब्रतधारी॥

धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई॥1॥

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  षष्ठी / सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 17 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७५ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५७

हम अपने प्रयास करें उसमें सफलता असफलता का आकलन न करें प्रयास मनुष्य करता है और उसको सफलीभूत परमात्मा करता है l चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति करें l



संसार का यह शाश्वत सत्य है कि जो चाहिए, उसके लिए पुरुषार्थ करें और जो प्राप्त है, उस पर विश्वास रखें। प्रयास भविष्य को सँवारने का साधन है और विश्वास वर्तमान को स्वीकार करने की शक्ति देता है। संसार का जीवन इसी संतुलन पर चलता है।

यही अध्यात्म का चिन्तन भी हमें सिखाता है—कर्म में पुरुषार्थ और परिणाम में विश्वास। जो हमारे हाथ में है, उसके लिए पूरी निष्ठा से प्रयत्न करना और जो हमारे वश में नहीं है, उसे ईश्वर के विधान पर छोड़ देना ही जीवन की सहजता है।

किन्तु अध्यात्म का अर्थ संसार से विमुख हो जाना नहीं है। अध्यात्म के साथ संसार के साथ चलना भी आवश्यक है। जीवन की वास्तविक साधना यही है कि भीतर से हम सत्य, संयम, संतोष और विश्वास से जुड़े रहें तथा बाहर से समय, परिस्थिति और देश,समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप कर्मशील बने रहें। भारत की सात्विक मनीषा इसी का अनुमोदन करती है l श्रीरामचरितमानस इसी समन्वित जीवन-दृष्टि का अत्यन्त सजीव और प्रेरणादायी स्वरूप हमारे सामने रखता है।


गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा॥

राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा॥1॥

 हे गिरिजे! सुनो, मैंने यह उज्ज्वल पवित्र कथा, जैसी मेरी बुद्धि थी, वैसी की वैसी पूरी वर्णित कर डाली। श्री राम जी के चरित्र अनन्त हैं। वेद और मां सरस्वती भी उनका वर्णन भी नहीं कर सकते॥1॥

अबोध बालक, पागल और  सात्विक भक्त में क्या कोई अन्तर है? कलियुग का वेद कौन सा है? श्रद्धा और भक्ति कैसे जाग्रत करें? जानने के लिए सुनें l

16.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष पञ्चमी /षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 16 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७४ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५६

 भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा॥

बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा॥2॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  पञ्चमी /षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 16 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७४ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५६

आगामी अधिवेशन के लिए जुट जाएं l


ये सदाचार संप्रेषण देश और समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा देने हेतु भी रहते हैं । मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। अतः मनुष्य के रूप में जन्म पाना केवल जीवन प्राप्त करना नहीं, बल्कि मनुष्यत्व की अनुभूति करते हुए अपने जीवन को सार्थक बनाने का अवसर है।

हमारे जीवन की प्रत्येक श्वास कर्मशीलता की प्रेरणा बने। हमारा जीवन उत्साह, उमंग, कल्पनाशीलता और सृजनशीलता की गाथा बने। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, हम निराशा में न हों , बल्कि अपने सामर्थ्य को पहचानकर राष्ट्र और समाज के लिए सतत कुछ करने का प्रयत्न करते रहें।

वास्तव में मनुष्य-जीवन आजीवन कर्मशीलता का शपथ-पत्र है—अपने लिए भी, समाज के लिए भी और राष्ट्र के लिए भी। जीवन का प्रत्येक क्षण हमें यह स्मरण कराए कि हम केवल परिस्थितियों के दर्शक नहीं, बल्कि उन्हें सकारात्मक दिशा देने वाले कर्मयोगी हैं।

आइए, मनुष्यत्व को अनुभव करें, अपनी अन्तर्निहित शक्ति को जाग्रत करें और उत्साह-उमंग के साथ निरन्तर कर्म करते हुए अपने जीवन को राष्ट्रहित और समाजहित के लिए समर्पित करें l जिस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी ने राष्ट्र और समाज के लिए समर्पण दिखाते हुए मानस की रचना कर डाली जिसके उत्तरकांड में आजकल हम लोग प्रविष्ट हैं


राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं॥

जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ॥1॥


श्री राम जी के चरित्र का श्रवण कर जो तृप्त हो जाते हैं , वे तो उसके विशेष रस को जान ही नहीं पाए । जो जीवन्मुक्त महामुनि हैं, वे भी भगवान के गुण निरंतर सुनते रहते हैं l 


इसके अतिरिक्त भैया शुभेन्दु जी, भैया डा अमित गुप्त जी, भैया प्रदीप श्रीवास्तव जी का उल्लेख क्यों हुआ, हनुमान अंश की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें l

15.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी /पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७३ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५५

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  चतुर्थी /पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 15 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७३ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५५

हम अहं ब्रह्मास्मि की अनुभूति करें, प्रेम आत्मीयता का विस्तार करें l


संगठन एक ऐसा जीवन्त उपक्रम है, जिसमें यदि परिवार जैसी आत्मीयता और प्रेम का भाव समाहित हो जाए, तो वह स्वर्ग और अपवर्ग से भी श्रेष्ठ अनुभूति देने वाला बन जाता है। वहाँ व्यक्ति स्वयं को अलग नहीं, बल्कि समष्टि का अभिन्न अंग अनुभव करता है।

किन्तु जब संगठन में व्यक्तिगत स्वार्थ, अहंकार अथवा व्यक्तिगत प्रदर्शन प्रमुख हो जाता है, तब अपनत्व की अनुभूति समाप्त होने लगती है। ऐसा संगठन देखने में कितना ही बड़ा क्यों न हो, भीतर से वह उस मेले से भी तुच्छ हो जाता है, जहाँ भीड़ तो बहुत होती है, पर आत्मीयता नहीं होती।

अतः संगठन की वास्तविक शक्ति उसकी संख्या या प्रदर्शन में नहीं, बल्कि परस्पर प्रेम, आत्मीयता, विश्वास और समर्पण में निहित होती है। रामकथा में  संगठन की इसी महत्ता को व्यक्त किया गया है l


गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा॥

राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा॥1॥



हमारे सनातनधर्मी देशवासियों के जीवन में प्रेम और आत्मीयता के इस भाव का क्षीण होना कदाचित् हमारी विकृत शिक्षा-पद्धति का ही परिणाम है। इसी शिक्षा के कारण उन्हें  पराभव का इतिहास पढ़ाया गया जब कि अपने देश का इतिहास पावनतम रहा है l शिक्षा यदि केवल आजीविका अर्जित करने और व्यक्तिगत उन्नति का साधन बन जाए, तो वह व्यक्ति को अपने स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा की परिधि में सीमित कर देती है।

भारतीय दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान या कौशल प्रदान करना नहीं, बल्कि मनुष्य में आत्मीयता, संवेदना, कर्तव्यबोध और समष्टि के प्रति उत्तरदायित्व का संस्कार करना है। 

इसलिए यदि हमें सशक्त और आत्मीय समाज का निर्माण करना है, तो शिक्षा को पुनः संस्कार, चरित्र और आत्मीयता से जोड़ना होगा।


भावना का गारा क्या है, भैया वीरेन्द्र जी,भैया मोहन जी, भैया प्रदीप वाजपेयी जी,भैया मनीष कृष्णा जी, भैया आशुतोष द्विवेदी जी , भैया डा प्रवीण सारस्वत जी का उल्लेख क्यों हुआ, किस संगठन मन्त्र के जापक का आचार्य जी ने नाम लिया जानने के लिए सुनें l

14.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष तृतीया / चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 14 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७२ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५४

 हरतालिका तीज एवं श्रीगणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएँ।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  तृतीया / चतुर्थी  विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 14 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७२ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५४

परमात्मा से प्रार्थना करें कि वह हमें भीतर देखने की शक्ति प्रदान कर दे l इससे समस्याओं से ग्रस्त जीवन भी मंगलानुभूति करता रहता है l


सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः l सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ll

भारतीय संस्कृति की उस उदात्त जीवन-दृष्टि का परिचायक है, जिसमें व्यक्ति का कल्याण समाज से और समाज का कल्याण समस्त सृष्टि के कल्याण से जुड़ा हुआ है। भारत अद्भुत देश है   जो त्याग तपस्या शुचिता शौर्य पराक्रम  विक्रम का प्रतीक है जहां ऋषिकुल का अद्भुत संविधान है  जहां शरीर को नहीं आत्म को शक्ति माना जाता है जहाँ प्रार्थना केवल अपने लिए नहीं, सबके लिए होती है;

जहाँ जीवन का लक्ष्य केवल भोग नहीं, लोकमंगल है 

यही हमारी संस्कृति है।

यही हमारा सनातन धर्म है।

यही हमारे भारत की आत्मा है।

भारत के देशभक्त के अन्तःकरण में ऐसा अदम्य राष्ट्रभाव और प्रचण्ड संकल्प जाग उठता है, जो वैभव-पराभव, सुख-दुःख, अनुकूलता-प्रतिकूलता—किसी की भी चिन्ता नहीं करता। इसी अटूट राष्ट्रनिष्ठा और अदम्य पुरुषार्थ के बल पर भारत पर आई संकट की कालरात्रियाँ भी अन्ततः पार हो जाती हैं। वास्तविक इतिहास यही है l शिक्षा में इसी का समावेश होना चाहिए l

शिक्षा वह है, जो हमें जीवन के लिए उपयोगी ज्ञान, कौशल, संस्कार और विवेक प्रदान करे तथा जीवन को सार्थक और सक्षम बनाने में सहायक हो।

आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं जब से हमारा अपना विद्यालय प्रारम्भ हुआ, तब से उससे जुड़े प्रेरणादायी प्रसंगों, अनुभवों और स्मृतियों का लेखन एवं संकलन होता रहे जिससे विद्यालय की यात्रा, उसके संस्कार और उसके पीछे निहित राष्ट्रभाव आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने l

मानस की कथा में आज आचार्य जी ने क्या बताया,भैया मुकेश जी  फिल्म हनुमान अंश क्यों नहीं देख पाए,

भैया अरविन्द जी से आचार्य जी को कौन सी पुस्तक प्राप्त हुई जानने के लिए सुनें l

13.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वितीया / तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७१ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५३

 [13/09, 06:48] Praveen: प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  द्वितीया / तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७१ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५३


यह भारतभूमि अद्भुत है। असंख्य संकटों को झेलकर भी यह बार-बार विश्वास, धैर्य और आत्मशक्ति के साथ खड़ी हो जाती है। विषम से विषम, गम्भीर से गम्भीर और भयानक परिस्थितियाँ भी इसकी जीवनधारा को रोक नहीं सकीं।

ऐसे ही एक अत्यन्त कठिन काल में, जब अकबर का शासन था और सनातन धर्म के सम्मुख अनेक प्रकार की चुनौतियाँ उपस्थित थीं, चिन्तक और विचारक व्याकुल थे—सनातन धर्म कैसे सुरक्षित रहे? हमारी संस्कृति कैसे बचे? देश की आत्मा को कैसे जीवित रखा जाए?

ऐसे कालखण्ड में महामनीषी गोस्वामी तुलसीदासजी का प्राकट्य हुआ और श्रीरामचरितमानस जैसी अमर कृति का निर्माण हुआ। मानस ने केवल कथा नहीं सुनाई; उसने समाज को आस्था, मर्यादा, पुरुषार्थ, संगठन, त्याग, शौर्य, पराक्रम और राष्ट्रबोध की शक्ति प्रदान की।

तुलसीदासजी स्वयं कहते हैं—

नौमी भौम बार मधुमासा।

अवधपुरी यह चरित प्रकासा॥

जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं।

तीरथ सकल जहाँ चलि आवहिं॥

तुलसीदास जी के गुरु थे नरहर्यानंद दास जी l

 गुरु और शिष्य तुलसीदासजी का सम्बन्ध केवल औपचारिक शिक्षा का सम्बन्ध नहीं था; यह जीवन-निर्माण और साधना का सम्बन्ध था। गुरु ने तुलसीदासजी के भीतर सुप्त सामर्थ्य को जाग्रत किया और वही सामर्थ्य आगे चलकर करोड़ों लोगों के जीवन का आलोक बना।

हमारी परम्परा में गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं है; वह जीवन की दिशा देने वाला, अन्तःशक्ति को जगाने वाला और साधना को लोकमंगल से जोड़ने वाला होता है।

यह देश केवल भूमि का टुकड़ा नहीं है।

हमारे भीतर यह भाव जागना चाहिए—

यह देश मेरा, धरा मेरी, गगन मेरा;

इसके लिए समर्पित हो जीवन मेरा।

इस राष्ट्र की रक्षा और उसकी सनातन चेतना को अक्षुण्ण रखने के लिए असंख्य ज्ञात-अज्ञात महापुरुषों ने अपना जीवन अर्पित किया है। उनके त्याग के कारण ही हम आज इस महान परम्परा के उत्तराधिकारी हैं।

हमारा भारत इतना अद्भुत है कि देवता भी यहाँ जन्म लेने की अभिलाषा करते हैं। 

गायन्ति देवाः किल गीतकानि

धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

इसलिए भारत में जन्म लेना केवल गौरव का विषय नहीं, उत्तरदायित्व का भी विषय है।

आज आवश्यकता है कि हम विश्वास रखें, धैर्य रखें, अपनी जड़ों से जुड़ें और राष्ट्र तथा सनातन संस्कृति के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाएं।

भारत संकटों से हारने वाला राष्ट्र नहीं है।

भारत संकटों से शक्ति प्राप्त करके पुनः खड़ा होने वाला राष्ट्र है।।

[13/09, 06:58] Praveen: प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष  द्वितीया / तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७१ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५३

परिस्थितियों से व्याकुल न हों आगे चलते रहें योजनाएं बनाते रहें l 


यह भारतभूमि अद्भुत है। असंख्य संकटों को झेलकर भी यह बार-बार विश्वास, धैर्य और आत्मशक्ति के साथ खड़ी हो जाती है। विषम से विषम, गम्भीर से गम्भीर और भयानक परिस्थितियाँ भी इसकी जीवनधारा को रोक नहीं सकीं।

ऐसे ही एक अत्यन्त कठिन काल में, जब अकबर का शासन था और सनातन धर्म के सम्मुख अनेक प्रकार की चुनौतियाँ उपस्थित थीं, चिन्तक और विचारक व्याकुल थे—सनातन धर्म कैसे सुरक्षित रहे? हमारी संस्कृति कैसे बचे? देश की आत्मा को कैसे जीवित रखा जाए?

ऐसे कालखण्ड में महामनीषी गोस्वामी तुलसीदासजी का प्राकट्य हुआ और श्रीरामचरितमानस जैसी अमर कृति का निर्माण हुआ। मानस ने केवल कथा नहीं सुनाई; उसने समाज को आस्था, मर्यादा, पुरुषार्थ, संगठन, त्याग, शौर्य, पराक्रम और राष्ट्रबोध की शक्ति प्रदान की। यह अद्भुत कृति है l 


तुलसीदासजी स्वयं कहते हैं—

नौमी भौम बार मधुमासा।

अवधपुरी यह चरित प्रकासा॥

जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं।

तीरथ सकल जहाँ चलि आवहिं॥

तुलसीदास जी के गुरु थे नरहर्यानंद दास जी l

 गुरु और शिष्य तुलसीदासजी का सम्बन्ध केवल औपचारिक शिक्षा का सम्बन्ध नहीं था; यह जीवन-निर्माण और साधना का सम्बन्ध था। गुरु ने तुलसीदासजी के भीतर सुप्त सामर्थ्य को जाग्रत किया और वही सामर्थ्य आगे चलकर करोड़ों लोगों के जीवन का आलोक बना।

हमारी परम्परा में गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं है; वह जीवन की दिशा देने वाला, अन्तःशक्ति को जगाने वाला और साधना को लोकमंगल से जोड़ने वाला होता है।

यह देश केवल भूमि का टुकड़ा नहीं है।

हमारे भीतर यह भाव जागना चाहिए—

यह देश मेरा, धरा मेरी, गगन मेरा;

इसके लिए समर्पित हो जीवन मेरा।

इस राष्ट्र की रक्षा और उसकी सनातन चेतना को अक्षुण्ण रखने के लिए असंख्य ज्ञात-अज्ञात महापुरुषों ने अपना जीवन अर्पित किया है। उनके त्याग के कारण ही हम आज इस महान परम्परा के उत्तराधिकारी हैं।

हमारा भारत इतना अद्भुत है कि देवता भी यहाँ जन्म लेने की अभिलाषा करते हैं। 

गायन्ति देवाः किल गीतकानि

धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

इसलिए भारत में जन्म लेना केवल गौरव का विषय नहीं, उत्तरदायित्व का भी विषय है।

आज आवश्यकता है कि हम विश्वास रखें, धैर्य रखें, अपनी जड़ों से जुड़ें और राष्ट्र तथा सनातन संस्कृति के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाएं।

भारत संकटों से हारने वाला राष्ट्र नहीं है।

भारत संकटों से शक्ति प्राप्त करके पुनः खड़ा होने वाला राष्ट्र है।।


भैया (डा )अजय कटियार जी के किस परामर्श की आचार्य जी ने चर्चा की, नियम का परिपालन क्या शक्ति प्रदान करता है, हनुमान अंश का उल्लेख क्यों हुआ,कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया, वसिष्ठ जी का विशेष उल्लेख क्यों हुआ, मन्त्र -पूत कुशा क्या है जानने के लिए सुनें l

12.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष प्रतिपदा / द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८७० वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५२

 त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक॥

संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे॥4॥



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष प्रतिपदा / द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 12 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८७० वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५२

केवल संतों के गुणों को जानना पर्याप्त नहीं; उन्हें अपने जीवन में उतारना ही वास्तविक साधना है। अतः प्रतिदिन स्वयं से पूछें—मैंने आज क्या किया, क्या करना चाहिए था और क्या अभी शेष है?





मनुष्य-योनि, जिसे देवयोनि से भी श्रेष्ठ कहा गया है, हमें प्राप्त होना स्वयं में परम सौभाग्य है। यह जीवन केवल भोग के लिए नहीं, अपितु आत्म-दर्शन और आत्मोन्नति के अभ्यास का अवसर है। यदि हम निरन्तर आत्म-दर्शन का अभ्यास करें, तो विकृत परिस्थितियों के प्रभाव से कुछ समय के लिए ही सही, स्वयं को मुक्त कर सकते हैं।

मनुष्य का उत्साह और पुरुषार्थ अद्भुत है। यही उसे असम्भव प्रतीत होने वाले कार्यों को करने में समर्थ बनाता है और यही साधना के माध्यम से उसे ईश्वरत्व की ओर ले जाने में भी सक्षम है। जब मनुष्य कर्म के प्रति अनुराग रखकर निरन्तर सत्कर्म करता रहता है, तब अनेक बार उसे स्वयं भी ज्ञात नहीं होता कि वह कितना कुछ कर चुका है।

‘रामचरितमानस’ तो अपने आप में अद्भुत ग्रन्थ है। यह केवल पढ़ने अथवा सुनने का ग्रन्थ नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली साधना है। गोस्वामी तुलसीदास जी का जीवन इसका जीवंत उदाहरण है। जीवनपर्यन्त सेवा, सत्कर्म, भक्ति और लोकमंगल उनके जीवन के प्रमुख अंग बन गए। उनके जीवन की साधना और उनके द्वारा रचित मानस—दोनों ही हमें यह प्रेरणा देते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में रामात्मकता का प्रवेश कराकर स्वयं का भी उत्थान कर सकता है और देश समाज के लिए भी मंगलकारी बन सकता है।

आइए, मनुष्य जीवन के इस दुर्लभ अवसर को पहचानें, आत्म-दर्शन का अभ्यास करें, कर्म के प्रति अनुराग रखें और अपने जीवन को सत्कर्म, सेवा तथा साधना से सार्थक बनाने का प्रयास करें।


भरत महाराज ने भगवान श्रीराम से संत के लक्षण जानने की जिज्ञासा प्रकट की। उनकी जिज्ञासा का समाधान करते हुए  भगवान श्रीराम ने संतों के स्वभाव और आचरण का विस्तार से वर्णन किया। साथ ही, संत के स्वरूप को और अधिक स्पष्ट करने के लिए उन्होंने असंत के लक्षण भी बताए।


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, संगठित एकत्रीकरण से क्या तात्पर्य है जानने के लिए सुनें

11.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष अमावस्या / शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 11 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६९ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५१

 संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई॥

संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता॥3॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष अमावस्या / शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 11 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६९ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५१


हम कलियुग के वे बीज हैं,

जो सत्य, सत्त्व और तत्त्व के लिए संघर्षरत हैं।आइए, हम अपने भीतर के चैतन्य को जाग्रत रखें,

सत्य के प्रति अडिग रहें और

सनातन जीवन-दृष्टि को अपने आचरण से पुष्ट करें।



हम संसार की समस्याओं के समाधान के लिए उत्सुक और उत्फुल्ल रहें—यह प्रेरणा हमें आदरणीय आचार्य जी निरन्तर देते हैं। आगामी अधिवेशन इसी भाव को जाग्रत करने और उसे सामूहिक चिन्तन एवं कर्म में परिणत करने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर है।

अधिवेशन में हम इस विषय पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने जा रहे हैं कि विकसित भारत के निर्माण के लिए कैसा शिक्षा-तन्त्र आवश्यक है। साथ ही, हम परस्पर प्रेम, आत्मीयता और अपनत्व की अनुभूति को भी सुदृढ़ करने जा रहे हैं। यही हमारे संगठन की वास्तविक शक्ति है।

हमारा सूत्र सद्वृत्तियों से जुड़ा हुआ है और इसी कारण हम दीनदयाल विद्यालय से भी आत्मीय रूप से संयुत हैं। यह जुड़ाव केवल किसी संस्था अथवा स्थान से नहीं, बल्कि उन जीवन-मूल्यों से है जो हमें संस्कारित करते हैं और समाज तथा राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व का बोध कराते हैं।

हम सभी अपने-अपने परिवार और कार्यक्षेत्र में व्यस्त हैं, फिर भी हमें अपने व्यापक दायित्व को विस्मृत नहीं करना है। आत्मश्लाघा और दम्भ से बचते हुए, विनम्रता, आत्मीयता और सामूहिकता के साथ आगे बढ़ना है।

अब अधिवेशन के लिए समय बहुत कम शेष है। अतः हम सभी पूरी तत्परता से उसके लिए जुट जाएँ। कार्यक्रम की रूपरेखा स्पष्ट हो, आवश्यक योजनाएँ बन चुकी हों और प्रत्येक कार्य के लिए अपना-अपना दायित्व निर्धारित हो—इस दिशा में अभी से सक्रिय होना आवश्यक है।

आइए, शेष समय को केवल प्रतीक्षा में न बिताकर चिन्तन, योजना और क्रियान्वयन में लगाएँ। अधिवेशन केवल एक कार्यक्रम न बने, बल्कि हमारे भीतर नई ऊर्जा, नई दिशा और राष्ट्रहित में कुछ सार्थक करने का सामूहिक संकल्प जाग्रत करने वाला अवसर बने।

जैसी राष्ट्रहित के लिए गोस्वामी तुलसीदास ने सार्थक कार्य किया जिनके द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस एक अद्भुत ग्रंथ है जो मनुष्य की समस्याओं का उत्तर देता है इस ग्रंथ से स्पष्ट हो जाता है कि सनातन धर्म मानवजाति के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है 

सनातनधर्मिता के कारण ही हम जीवित जाग्रत सचेत सक्रिय हैं l


आचार्य जी ने उत्तर कांड में आज क्या बताया,आत्मिक अवस्था संसार के विकारों से कैसे मुक्त रहती है,संत और संसारी में भय के विषय में क्या अन्तर है,मनुष्य के लिए शब्द -संसार निधि कैसे है? जानने के लिए सुनें l

10.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६८ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५०

 यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ १८.७८॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष चतुर्दशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 10 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६८ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३५०

इन उद्बोधनों को केवल सुनना ही नहीं, बल्कि इनके माध्यम से संसार में जीने की श्रेष्ठ शैली सीखना, जीवन को सार्थक और यशस्वी बनाने का प्रयास करना हमारा ध्येय हो। हम निरन्तर भारत माता की सेवा में रत रहें और अपने प्रत्येक कर्म को राष्ट्रहित से जोड़ें।

आगामी अधिवेशन के लिए अपनी तैयारियों को चरम पर पहुँचाएँ।


चिन्तन, मनन, अध्ययन और स्वाध्याय केवल ज्ञान अर्जित करने के साधन नहीं हैं। इनका वास्तविक उद्देश्य है—अपने भीतर शक्ति का जागरण करना, अपने चैतन्य को जाग्रत करना और जीवन को अधिक सजग, समर्थ एवं सार्थक बनाना।


ज्ञान हमारे आचरण और कर्म में दिखाई देना चाहिए; केवल अपने ज्ञान का प्रदर्शन करना उसका उद्देश्य नहीं है।

अतः हम ज्ञान को संग्रहित करने के साथ-साथ उसे जीवन में उतारने और समाज तथा राष्ट्र के हित में प्रयुक्त करने का प्रयास करें l


संसार में व्याप्त उन विकारों और प्रवृत्तियों का दृढ़तापूर्वक प्रतिरोध करना हमारा कर्तव्य है, जो सनातन धर्म ,जिसमें संसार संसार के सार और संसारेतर जीवन का चिन्तन है,जिसमें आत्मस्वरूप का बोध है,जो बताता है कि हम कभी मरते नहीं हैं,के मूल्यों को नष्ट करने, समाज को विभाजित करने अथवा भारतमाता के प्रति वैरभाव उत्पन्न करने का प्रयास करती हैं।

ऐसी प्रवृत्तियों के सामने निश्चेष्ट होकर बैठ जाना हमारा धर्म नहीं है। अन्याय और अधर्म का विधिसम्मत एवं दृढ़ प्रतिकार करना आवश्यक है। जो जहाँ है, वह अपने सामर्थ्य, विवेक और मर्यादा के अनुसार धर्म, समाज और राष्ट्र की रक्षा में योगदान दे। अतः हमारा संकल्प हो कि हम स्वयं  भगवान राम, जिन्होंने मनुष्य का अवतार लेकर हमें दिशा दर्शन प्रदान किया,के आदर्शों से प्रेरणा लेकर धैर्य, शौर्य, विवेक, संयम और संगठन के साथ अधर्म का प्रतिरोध करेंगे और धर्म तथा राष्ट्रहित की स्थापना के लिए सतत कर्मरत रहेंगे।


क्या माया के कारण ही सृष्टि की रचना संभव है? सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी॥

जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय॥1॥ का उल्लेख करते हुए अनपायनी  को कैसे आचार्य जी ने स्पष्ट किया?, मानसिंह का चित्र क्यों नहीं लगाते? जानने के लिए सुनें l

9.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६७ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४९

 सनातन धर्म पर विश्वास भारत की निशानी है, 

अतुल पौरुष पराक्रम त्याग तप इसकी कहानी है, 

हुआ जिसको कोई भ्रम इस विषय पर सच समझ लो वह,

कोई भटका हुआ बहुरूपिया व्याकुल गुमानी है ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 9 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६७ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४९


रामकथा से प्राप्त प्रकाश को अपने तक सीमित न रखकर भारतवर्ष के कालुष्य को दूर करने के लिए संकल्पित हों और उसके लिए सतत कर्म करें।आगामी अधिवेशन भी इसी उद्देश्य हेतु है l




भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा॥

सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए॥1॥



जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए॥

ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना॥2॥


सनातन धर्म का  कथात्मक चिन्तन वास्तव में अद्भुत और अत्यन्त गहन है। यह केवल कथा सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन, कर्म, आत्मा और परमात्मा के रहस्यों को समझने का मार्ग है। इसलिए इसे सहज बुद्धि से तुरंत समझ लेना सम्भव नहीं होता।

जिनकी बुद्धि अभी अत्यधिक सांसारिक विषयों में उलझी हुई है, वेद, पुराण,उपनिषद् आदि उन्हें कठिन और नीरस प्रतीत होते हैं। वे उनसे ऊबने लगते हैं और उनसे दूर भागते हैं। वस्तुतः यह ऊबना  उनके कर्मों का भोग है।

बालि इसका सटीक उदाहरण है। जब तक उसका अन्तकाल नहीं आया, तब तक वह भगवान् श्रीराम के कार्य और अपने कर्म के गूढ़ सत्य को पूर्णतः नहीं समझ सका।


जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥

जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अबिनासी॥2॥


 यदि उसे पहले ही वह ज्ञान प्राप्त हो गया होता, तो सम्भवतः वह अपने जीवन में अपकर्म नहीं करता 

ज्ञान का उदय संसार छोड़ने के पश्चात् ही हो, ऐसा आवश्यक नहीं है। संसार में रहते हुए, अपने कर्मों को करते हुए यदि किसी मनुष्य के भीतर सत्य का बोध जाग जाए, जीवन का वास्तविक उद्देश्य दिखाई देने लगे, परमात्मा की ओर उसकी दृष्टि मुड़ जाए, उसे रामात्मकता का अनुभव होने लगे तो इससे बड़ा सौभाग्य उसके लिए क्या हो सकता है?


हम अपने दैनिक क्रियाकलापों में विविध रूपों से रामात्मकता के दर्शन करने के अभ्यासी बनें। जीवन की प्रत्येक घटना, प्रत्येक सम्बन्ध, प्रत्येक कर्तव्य और प्रत्येक परिस्थिति में श्रीराम के किसी न किसी स्वरूप को पहचानने का प्रयास करें।

हमारा लक्ष्य केवल रामकथा सुनना न हो, बल्कि अपने जीवन को राममय दृष्टि से देखना होl कठिन परिस्थितियों में धैर्य, विपत्ति में विवेक, कर्तव्य के प्रति निष्ठा, वचन-पालन, सत्यनिष्ठा, मर्यादा, करुणा, क्षमा,शौर्य, पराक्रम,शरणागतवत्सलता, संगठन-कौशल और लोकहित, देशहित के प्रति पूर्ण उत्तरदायित्व—ये प्रभु राम के वे गुण हैं, जिन्हें हम ग्रहण कर सकते हैं धीरे-धीरे यही अभ्यास हमारे दृष्टिकोण को बदल देगा। तब प्रभु राम केवल मन्दिर में पूजित होने वाले आराध्य नहीं रहेंगे, बल्कि हमारे विचार, व्यवहार, कर्म और जीवन-दृष्टि में निरन्तर प्रकट होने लगेंगे।

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने आज किस फिल्म की चर्चा की, विषय विशेषज्ञ का उल्लेख क्यों हुआ, रामकृष्ण परमहंस जी ने स्वामी विवेकानन्द जी को क्या लक्ष्य बताया जानने के लिए सुनें l

8.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६६ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४८

 आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं

समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे

स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।2.70।।


जैसे सम्पूर्ण नदियों का जल चारों ओर से जल द्वारा परिपूर्ण समुद्र में आकर मिलता है, पर समुद्र अपनी मर्यादा में अचल प्रतिष्ठित रहता है ऐसे ही सम्पूर्ण भोग-पदार्थ जिस संयमी मनुष्य को विकार उत्पन्न किये बिना ही उसको प्राप्त होते हैं, वही मनुष्य परमशान्ति को प्राप्त होता है, भोगों की कामना वाला नहीं।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वादशी /त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 8 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६६ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४८

हम केवल युगभारती सदस्य न रहें अपितु सजग, सक्रिय और भावनात्मक रूप से जुड़े हुए सहयात्री बनें। हमारा सहयोग ही संगठन की शक्ति है और संगठन की शक्ति ही हमारे सामूहिक संकल्प की शक्ति है।



प्रातःकाल कुछ क्षणों के लिए यदि मन समस्त विकल्पों और द्वन्द्वों से ऊपर उठकर इस भाव में स्थित हो जाए—

“अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो, विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।

सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः, चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥”

तो समझना चाहिए कि यह केवल हमारा प्रयास नहीं, हनुमान जी की कृपा का स्पर्श है।

परमात्मा श्रीराम ने कलियुग में हमारे बीच हनुमान जी को इसलिए छोड़ रखा है कि वे हमारी दुर्बलताओं में बल दें, संकटों में धैर्य दें, भ्रम में विवेक दें और जीवन की कठिनाइयों में हमारा मार्ग प्रशस्त करें। हनुमान जी यह कार्य करते भी हैं l

अतः प्रातःकाल के इन कुछ क्षणों को साधारण न समझें। यदि मन क्षणभर के लिए भी अहंकार, चिन्ता और द्वन्द्व से मुक्त होकर अपने चिदानन्द स्वरूप की ओर लौटता है, तो उसे पवनपुत्र हनुमान जी का करुणामय संकेत मानकर कृतज्ञ होना चाहिए। हनुमान जी हमें प्रभुराम की ओर उन्मुख कर देते हैं जिनका राज्य अत्यन्त प्रेरक है l


रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ।

अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ॥29॥


अयोध्या की वास्तविक संपदा स्वयं श्रीराम हैं। उनके रहते अयोध्या केवल एक नगरी नहीं रहती, बल्कि धर्म, मर्यादा, सुख, शान्ति और लोकमंगल की आदर्श भूमि—रामराज्य बन जाती है।


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, संसार अतृप्त कैसे रहता है,व्याकुल नदियां कहां विलीन होना चाहती हैं, संसार में विकार क्यों आवश्यक हैं, कैरव क्या है जानने के लिए सुनें l

7.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४७

 सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दु:ख गन॥

पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं। भूतल परे लकुट की नाईं॥1॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 7 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६५ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४७

भैया मनीष कृष्णा जी,बैच १९८८ की माताजी का हमारे बीच न रहने का समाचार अत्यन्त पीड़ादायक है। इस दुःखद घड़ी में हम सभी की गहरी संवेदनाएँ उनके एवं समस्त परिवार के साथ हैं।




माताजी का सरल, संयमित और संस्कारमय जीवन सदैव स्मरणीय रहेगा। उन्होंने अपने आचरण से  सिखाया कि व्यसनों से दूर रहकर सादगी और शुचिता का जीवन जीना चाहिए तथा किसी के धन का लालच कभी नहीं करना चाहिए। ऐसे जीवन-मूल्यों की उनकी सीख सदैव प्रेरणास्रोत रहेगी।

ईश्वर दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा सभी परिजनों को इस अपार दुःख को सहन करने की शक्ति और धैर्य प्रदान करें।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। 🙏


मनुष्य के जीवन का एक अद्भुत विधान परमात्मा ने बनाया है—दुःख बाँटने से दुःख कम होता है और सुख बाँटने से सुख बढ़ता है। जब किसी के दुःख में हम अधिक संख्या में सम्मिलित होते हैं, उसके साथ खड़े होते हैं, तो उसका दुःख हल्का हो जाता है। और जब हम किसी के सुख में सम्मिलित होते हैं, तो उसका सुख और अधिक वृद्धिंगत हो जाता है।

यही मनुष्य-जीवन का सामाजिक और आध्यात्मिक सत्य है। परमात्मा ने मनुष्य को अकेला नहीं बनाया। मनुष्य मनुष्य से जुड़ता है, जीवात्माएँ संगठित होती हैं, तो उनमें परमात्म-भाव प्रकट होता है। संगठन केवल संख्या का नाम नहीं, बल्कि हृदयों के मिलन, परस्पर सहयोग और एक-दूसरे के दुःख-सुख में सहभागी होने का नाम है।

ईश्वर ने हमें इस संसार में मनुष्य बनाकर कर्म करने के लिए भेजा है। प्रत्येक व्यक्ति के कर्म अलग हैं, परिस्थितियाँ अलग हैं और उसके कर्तव्य भी अलग-अलग हैं। इसलिए हमें अपने कर्तव्य-पथ से विमुख नहीं होना चाहिए। संसार में रहते हुए अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति निर्धारित धर्म और कर्म का निर्वाह अवश्य करें,जीवन में अनेक व्यथाएँ आएँगी, अनेक कठिनाइयाँ आएँगी। हमें उन सबको सहते हुए, अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए आगे बढ़ना है। जीवन की कथा तब पूर्ण होती है, जब हम अपनी सारी व्यथाओं को पीकर भी अपने कर्तव्य-पथ से विचलित न हों।

भगवान श्रीकृष्ण का अमर संदेश हमें इसी ओर प्रेरित करता है—

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

रामकथा भी यही संदेश देती है उस कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया जानने के लिए सुनें

6.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६४ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४६

 जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा॥

पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका॥1॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 6 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६४ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४६

आगामी अधिवेशन के लिए सज्ज हो जाएं 


ये सदाचार वेलाएं अद्भुत हैं इन वेलाओं के श्रवण से हमें शान्ति प्राप्त होती है यह हमारे इष्ट हनुमान जी, जो इस कलिकाल में भी हर स्थान पर छाए हुए हैं,जो आज भी श्रीराम के कार्य और धर्म की रक्षा के लिए उपस्थित हैं,की कृपा है l जब हमारे साथ पवनपुत्र हनुमान जी का आश्रय है, तब हमें भय कैसा?

आगामी अधिवेशन की तैयारी अभी से प्रारम्भ कर दें।  ये अधिवेशन हम नहीं कर रहे हैं हमसे करवाया जा रहा है हम तो मात्र पात्र हैं जब हम यह विचार करेंगे तो व्याकुल,निराश और हताश नहीं होंगे । हमारे सामने जो समस्याएँ दिखाई दे रही हैं, वे हमें रोकने के लिए नहीं, बल्कि उनके समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने वाली हैं। हम मिलकर उनका समाधान खोजेंगे।

जब हम सभी वहाँ एकत्र होंगे, तो अपने-अपने प्रश्नों और जिज्ञासाओं को लेकर आएँगे और सामूहिक चिन्तन एवं मार्गदर्शन से अपने अनेक प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करेंगे। साथ बैठना, विचारों का आदान-प्रदान करना और एक-दूसरे से प्रेरणा लेना—यह सामूहिक आनन्द वास्तव में अवर्णनीय होगा।

और सबसे महत्त्वपूर्ण बात—जब हम अधिवेशन से वापस लौटेंगे, तो केवल स्मृतियाँ लेकर नहीं लौटेंगे, बल्कि एक सुस्पष्ट लक्ष्य, नई ऊर्जा, दृढ़ संकल्प और अपने कर्तव्य की स्पष्ट दिशा लेकर लौटेंगे।

अतः अभी से स्वयं को तैयार करें—मन से भी, विचार से भी और कर्म से भी आगामी अधिवेशन हमारे लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आगे की यात्रा के लिए दिशा-निर्धारण का अवसर है।

ऐसा ही सुस्पष्ट लक्ष्य भगवान राम के सामने था जो पूर्ण हो चुका है और वो राजा के रूप में विद्यमान हैं राम- राज्य चल रहा है 


बाज़ार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए।

जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए॥

बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते।

सब सुखी सब सच्चरि सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे॥

अयोध्या के बाजार इतने सुंदर और समृद्ध हैं कि उनका वर्णन करते नहीं बनता। वहाँ आवश्यक वस्तुएँ सहज ही उपलब्ध हो जाती हैं। जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति भगवान श्रीराम राजा के रूप में विराजमान हों, वहाँ की संपत्ति और समृद्धि का भला किस प्रकार वर्णन किया जा सकता है?

वहाँ बजाज अर्थात् वस्त्रों का व्यापार करने वाले, सराफ अर्थात् धन-आभूषण आदि का व्यवसाय करने वाले तथा अनेक प्रकार के वणिक (व्यापारी) बैठे हुए ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो वे अनेक कुबेर हों।


रामराज्य में अर्थव्यवस्था का उद्देश्य केवल धन का संचय नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज का सुख और सदाचार था। बालक से लेकर वृद्ध तक और स्त्री से लेकर पुरुष तक—प्रत्येक व्यक्ति उस व्यवस्था में अपने जीवन को सुरक्षित, सुखी और सार्थक अनुभव करता था।


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों की चर्चा क्यों हुई, भैया अरविन्द जी का उल्लेख क्यों हुआ, उन्नाव के बाजार का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

5.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष नवमी /दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६३ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४५

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष नवमी /दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६३ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४५

शिक्षा के स्वरूप में परिवर्तन आज की महती आवश्यकता है।

वर्तमान शिक्षा केवल ज्ञान और रोजगार तक सीमित न रह जाए, बल्कि वह मनुष्य के भीतर चरित्र, संस्कार, विवेक, आत्मविश्वास, कर्तव्यबोध और राष्ट्रबोध का निर्माण करे—इस दिशा में गम्भीर चिन्तन आवश्यक है।

इसी महत्वपूर्ण विषय पर आगामी अधिवेशन में व्यापक चर्चा और विचार-मंथन होने जा रहा है। यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के पुनर्निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर है।

अतः हम सभी उत्साह, उमंग और सकारात्मक मनोभाव के साथ अधिवेशन में भाग लेने के लिए सज्ज हो जाएँ।



सनातन जीवन-दृष्टि अत्यन्त संतुलित और संयमित जीवन का मार्ग दिखाती है। मनुष्य के भीतर भी समय-समय पर अनेक विकार उत्पन्न होते हैं। जब ये विकार धीरे-धीरे बढ़ते हुए एकत्रित और प्रबल हो जाते हैं, तब वही विकार रावणत्व का रूप धारण कर लेते हैं।

रावण के जीवन का मूल भाव भोग था और उसमें भी कामासक्ति का अत्यन्त विकृत रूप दिखाई देता है। कामना जब मर्यादा और संयम की सीमा को लाँघ जाती है, तब वह मनुष्य को इतना व्याकुल और विवेकहीन बना देती है कि उसका आचरण पशु से भी अधम हो सकता है। इसलिए मनुष्य के भीतर रावणत्व का जितना अधिक निराकरण होगा, समाज उतना ही अधिक स्वस्थ, सुरक्षित और व्यवस्थित रहेगा।

इसी संदर्भ में बहुविवाह की प्रवृत्ति पर भी विचार करने की आवश्यकता है। भारतीय जीवन-दृष्टि ने दाम्पत्य को केवल भोग का साधन नहीं माना, बल्कि उसे निष्ठा, उत्तरदायित्व, संयम और पारस्परिक समर्पण का सम्बन्ध माना है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में रामराज्य की व्यवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है—

सब उदार सब पर उपकारी।

बिप्र चरन सेवक नर नारी॥

*एकनारि ब्रत रत सब झारी।*

ते मन बच क्रम पति हितकारी॥

इसका भाव है कि रामराज्य में सभी नर-नारी उदार और परोपकारी हैं। पुरुष एक-पत्नी-व्रत का पालन करते हैं और स्त्रियाँ मन, वचन तथा कर्म से पति के हित में समर्पित रहती हैं। यहाँ दाम्पत्य जीवन में संयम, निष्ठा और कर्तव्य को सामाजिक व्यवस्था का आधार माना गया है। जब कि  कुछ अन्य पंथों में ऐसा नहीं हैं l 

रामराज्य केवल एक ऐतिहासिक या धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि जीवन और समाज की एक आदर्श व्यवस्था है। इसलिए रामराज्य पर गम्भीर चिन्तन, मनन, विचार, अध्ययन और स्वाध्याय की आवश्यकता है। इन सबमें यदि भावनाओं और जीवन-मूल्यों का समावेश नहीं होगा, तो हमारा अध्ययन केवल बौद्धिक अभ्यास बनकर रह जाएगा और हम अनेक प्रकार के भ्रमों में पड़ सकते हैं।

मनुष्य के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे विकार कुछ-न-कुछ मात्रा में रहते हैं। इनका होना ही मनुष्य को पतित नहीं बनाता; समस्या तब उत्पन्न होती है, जब इनमें से कोई एक विकार हमारे मन और व्यवहार पर प्रमुख रूप से अधिकार कर लेता है। तब व्यक्ति का विवेक कमजोर पड़ने लगता है और उसका जीवन संतुलन खो देता है।

मनुष्य होने का वास्तविक अर्थ ही यह है कि हम अपने भीतर उठने वाली प्रवृत्तियों के बीच संतुलन, संयम और विवेक बनाए रखें। भगवान श्रीराम के जीवन में यही अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। वे शक्ति रखते हुए भी संयमित हैं, अधिकार रखते हुए भी मर्यादित हैं, संकटों के बीच भी धैर्यवान हैं और विजय प्राप्त करने के बाद भी अहंकाररहित हैं।

इसी मर्यादा, संयम, निष्ठा, कर्तव्य और संतुलन ने हमारे जीवन-मूल्यों को सुरक्षित रखा है। इन्हीं जीवन-मूल्यों ने हमारी सनातन जीवन-दृष्टि को युगों की अनेक चुनौतियों के बीच जीवन्त बनाए रखा है।

आज आवश्यकता है कि हम रामराज्य को केवल एक आदर्श शासन-व्यवस्था के रूप में न देखें, बल्कि उसे अपने व्यक्तिगत जीवन, परिवार, समाज और राष्ट्र के आचरण का मार्गदर्शक बनाएँ। अपने भीतर के रावणत्व को पहचानें, उसे सीमित करें और अपने भीतर के रामत्व—विवेक, मर्यादा, संयम, करुणा, कर्तव्य और संतुलन—को निरन्तर विकसित करें। यही इन वेलाओं का उद्देश्य है कि हम अपना चैतन्य जाग्रत करें l 

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने भैया कृपा शंकर जी का नाम क्यों लिया,श्री ओमेन्द्र रत्नु की चर्चा  क्यों हुई, हल्दी घाटी, जौहर का उल्लेख क्यों हुआ, घरवापसी क्यों आवश्यक है जानने के लिए सुनें l

4.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६२ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४४

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६२ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४४


आगामी अधिवेशन को सफल बनाने हेतु अपने योगदान के लिए सज्ज हो जाएं l



आगामी अधिवेशन केवल एक कार्यक्रम न होकर व्यक्ति के मानस को दिशा देने वाला अनुभव बने—यह हमारा प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए। युगभारती के सदस्यों सहित जो भी लोग वहाँ आएँ, उन्हें ऐसा सात्त्विक, आत्मीय और प्रेरणादायी परिवेश मिले कि वे भीतर से उत्साहित होकर लौटें और अपने जीवन को स्वदेश, कर्तव्य तथा आत्मबोध के अनुकूल बनाने का संकल्प लेकर जाएँ।


हमारा प्रयास हो कि व्यक्ति जब अधिवेशन में प्रवेश करे तो उसे आनन्द और अपनापन मिले इसके लिए हमें अपने दंभ का निरसन भी करना होगा, सहज होना होगा , साथ ही चिन्तन और प्रेरणा मिले और लौटते समय उसके भीतर एक स्पष्ट भाव हो—

“मैं अपने स्वदेश के लिए उपयोगी बनूँगा, अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक निभाऊँगा और अपने आत्मस्वरूप के अनुरूप जीवन जीने का प्रयास करूँगा।”

अधिवेशन में संगोष्ठी का विषय है 

“विकसित भारत के लिए सुदृढ़ शिक्षा तंत्र”

 जिस प्रकार की शिक्षा की आवश्यकता है उसके आधार पर शिक्षित व्यक्ति अपने शरीर की सीमा को जानता है अपने जीवन को व्यवस्थित रूप से चलाता है  सदाचारमय जीवन व्यतीत करता है उसे आत्म का बोध रहता है चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् की अनुभूति रहती है l

शिक्षा का  लक्ष्य केवल अर्थोपार्जन नहीं, बल्कि मनुष्यत्व का विकास है।


(🪷 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक मंगलकामनाएँ 🪷

श्रीकृष्ण का अवतरण केवल एक दिव्य घटना नहीं, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना, अधर्म के विनाश और मानव-हृदय में परमात्म-चेतना के जागरण का संदेश है।

इस पावन जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना है कि हमारे भीतर का अज्ञान दूर हो, विवेक जाग्रत हो, मन निर्मल हो, कर्म निष्काम हों और जीवन धर्ममय बने।

हम श्रीकृष्ण के गीता-संदेश को अपने जीवन में उतारें—

कर्तव्य करते रहें, फल की आसक्ति त्यागें और प्रत्येक कर्म को परमात्मा को समर्पित करें।

भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से हमारे अंतःकरण में प्रेम, भक्ति, शुचिता, संयम और आत्मबोध का प्रकाश प्रज्वलित हो।

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत…”

🙏 जय श्रीकृष्ण! 🦚

हरे कृष्ण। )



युवा फिल्म निर्माता अनुप्रिया नागर की नीम करौली बाबा पर आधारित फिल्म 'हनुमान अंश' की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की, रामकथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया, समर्पित भक्ति क्या है,चिरं शृणोति क्या है जानने के लिए सुनें l

3.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६१ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४३

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६१ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४३


हम अपने भीतर स्थित दिव्य तत्त्व को पहचानें, अपने जीवन को व्यवस्थित एवं मर्यादित करें और अपने प्रत्येक कर्म को लोकमंगल की भावना से जोड़ें l संगठन में व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा न रखें l


श्रीरामचरितमानस में अवगाहन करते हुए हम अपने जीवन को अधिक व्यवस्थित, संयमित, शान्त और आनन्दमय बनाने का सतत प्रयास करें। मानस केवल पढ़ने का ग्रन्थ नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली अमूल्य साधना है। माया मनुष्य बनकर प्रभु राम ने जो सांसारिक लीला की उस पर हम विश्वास करें l  इस ग्रंथ के आदर्शों और शिक्षाओं को अपने आचरण में उतारकर हम अपने भीतर शान्ति, सद्भाव, संयम, शौर्य, पराक्रम, तप, त्याग और आनन्द का विकास कर सकते हैं।

हम सबके जीवन में इस साधना का भाव जाग्रत हो और हम मानस के माध्यम से अपने जीवन को सार्थक एवं मंगलमय बना सकें—इसी दिशा में आचार्य जी निरन्तर हमारा मार्गदर्शन और प्रयत्न कर रहे हैं।

बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।

मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥23॥


चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से पृथ्वी को उसी प्रकार परिपूर्ण करता है, जितना उसके लिए आवश्यक है और सूर्य भी उतना ही तपता है, जितना आवश्यक है। बादल भी जब जल की आवश्यकता होती है, तभी माँगने पर पर्याप्त वर्षा करते हैं।

अर्थात् श्रीरामचन्द्र जी के राज्य में प्रकृति भी मर्यादा और संतुलन के अनुरूप कार्य करती है। न अधिक गर्मी, न अनावश्यक वर्षा और न ही जल का अभाव—सब कुछ आवश्यकता और लोककल्याण के अनुरूप है।




आचार्य जी नित्य हमें आगामी अधिवेशन के लिए  भी प्रेरित कर रहे हैं। हमें दृढ़ विश्वास रखना चाहिए कि वहाँ हमें व्यवस्थित, अनुशासित, संयमित, चिन्तनशील एवं प्रेममय वातावरण प्राप्त होगा, जो हमारे मन और जीवन को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।

हम सभी अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में निरन्तर व्यस्त रहते हैं। दैनिक जीवन की भागदौड़ और एकरसता के कारण मन कभी-कभी ऊब और थकान का अनुभव करने लगता है। ऐसे समय में यह अधिवेशन हमारे लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आत्मीय मिलन, सामूहिक चिन्तन, आनन्द और आत्मशुद्धि का अवसर बनेगा।

वहाँ का अनुशासित वातावरण, आत्मीयता से भरे साथी , सार्थक संवाद और प्रेरणादायी चिन्तन निश्चित ही हमारे भीतर नई स्फूर्ति और उत्साह का संचार करेंगे। अतः हम पूर्ण उत्साह और सकारात्मक भाव के साथ इस अधिवेशन की प्रतीक्षा करें, अपना शुल्क प्रदान करें और वहाँ प्राप्त होने वाले आनन्द तथा प्रेरणा को अपने जीवन और कार्यक्षेत्र में भी साथ लेकर लौटें।


इसके अतिरिक्त ओशो की चर्चा क्यों हुई,भैया रवि जी, भैया संपूर्ण सिंह जी, भैया मोहन जी, भैया यज्ञदत्त जी के नाम क्यों आये, परिवार कैसे चलता है जानने के लिए सुनें l

2.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८६० वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४२

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 2 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८६० वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४२


आचार्य जी अध्यात्म के गहन ज्ञाता हैं। उनके अनुभव, चिंतन और मार्गदर्शन से हमें निरन्तर सीखने का अवसर मिलता है। अतः हमें उनके सान्निध्य और ज्ञान का अधिक-से-अधिक लाभ उठाना चाहिए। उनके द्वारा बताए गए तथ्यों, विषयों को केवल सुनना ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारना ही वास्तविक लाभ है। अतः हम संकल्पित हों कि हम अपने भीतर विद्यमान सत्त्व, श्रेष्ठ विचार, दृढ़ विश्वास और संयम जैसे जीवन-मूल्यों को साधना के माध्यम से जाग्रत और परिष्कृत करेंगे

और कामना करेंगे कि 

परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं, समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्।।



हमारी शिक्षा की समस्याएँ आज अत्यन्त गम्भीर हैं। इसका एक बड़ा कारण शिक्षा के मूल उद्देश्य में आई विकृति है। शिक्षा का लक्ष्य केवल पढ़ना-लिखना, परीक्षा उत्तीर्ण करना और रोजगार प्राप्त करना नहीं हो सकता। यदि वर्षों की शिक्षा के बाद भी व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित, बेरोजगार, तनावग्रस्त और जीवन के प्रति निराश अनुभव करे, तो हमें अपनी शिक्षा-पद्धति पर गंभीरता से विचार करना होगा।

आज शिक्षा मनुष्य को मनुष्यत्व से जोड़ने के बजाय अनेक बार उसे केवल धन और भौतिक सफलता की ओर दौड़ना सिखा रही है। परिणाम यह है कि ज्ञान बढ़ रहा है, लेकिन विवेक घट रहा है; साधन बढ़ रहे हैं, लेकिन संतोष कम हो रहा है; प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, लेकिन संवेदना और आत्मीयता घट रही है।

शिक्षा वही सार्थक है जो व्यक्ति को केवल कमाने योग्य नहीं, बल्कि जीने योग्य बनाए; उसे कुशल ही नहीं, चरित्रवान बनाए; उसे अधिकारों के साथ कर्तव्यों का बोध कराए और उसे अपने परिवार, समाज, राष्ट्र तथा समस्त मानवता के प्रति उत्तरदायी बनाए।

ऐसे ही कर्तव्य का बोध कराने का कार्य गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया l भगवान श्रीराम ने अपने जीवन में आने वाले अनेक संकटों और बाधाओं का धैर्य, शौर्य, संयम और धर्म के बल पर सामना किया। वनवास के समय उन्होंने ऋषियों-मुनियों को राक्षसों के अत्याचार से मुक्त करने का आश्वासन दिया और अपने संकल्प को कर्म में परिणत करते हुए कहा—

“निसिचर हीन करउँ महि, भुज उठाइ पन कीन्ह।”

उन्होंने अपने पराक्रम से राक्षसी शक्तियों का विनाश किया, ऋषियों को निर्भय किया और धर्म की रक्षा की। आगे चलकर लंकाधिपति रावण का वध कर अधर्म पर धर्म की विजय स्थापित की। वनवास की अवधि पूर्ण होने पर श्रीराम अयोध्या लौटे और उनका राज्याभिषेक हुआ।

अब अयोध्या में ऐसा रामराज्य स्थापित है कि 

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन॥

खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥1॥

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भैया शुभेन्दु जी का नाम क्यों लिया, रामदेश क्या है, अधिवेशन के विषय में आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l

1.9.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष चतुर्थी / पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८५९ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४१

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष चतुर्थी / पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८५९ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४१

मानस का अवगाहन करें निश्चित रूप से लाभ होगा l

इसके सिद्धान्तों की चर्चा करें l


शुचिता हमारे जीवन का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मूल्य है। इसे केवल स्वच्छ वस्त्र, स्वच्छ शरीर या स्वच्छ परिवेश तक सीमित नहीं किया जा सकता। वास्तविक शुचिता तब है, जब हमारे विचार पवित्र हों, वाणी मधुर और सत्य हो, व्यवहार निष्कपट हो तथा हमारे कर्म लोकहितकारी हों।

हमें शुचिता को केवल एक आदर्श के रूप में नहीं, बल्कि अपने स्वभाव का सहज अंग बनाना चाहिए। जिस प्रकार स्वच्छता के लिए हमें बार-बार प्रयास नहीं करना पड़ता, उसी प्रकार जीवन में ऐसी संस्कार-संपन्नता विकसित हो कि शुद्ध विचार और पवित्र आचरण हमारे स्वभाव से स्वतः प्रकट हों।

शुचितापूर्ण मन में ही सद्विचार जन्म लेते हैं और सद्विचारों से ही श्रेष्ठ कर्मों का निर्माण होता है। इसलिए यदि हम अपने जीवन को वास्तव में श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं, तो शुचिता को बाहर से अपनाने के स्थान पर भीतर से विकसित करना होगा। शरीर कोई हो परिस्थितियां कैसी भी हों इस शुचिता से हम भ्रमित, भयभीत नहीं रहते हैं अपितु आनन्दित रहते हैं जिस प्रकार विद्या अविद्या के ज्ञाता काकभुशुण्डि जी आनन्द का अनुभव करते हैं l मोहग्रस्त गरुड़ जी का काकभुशुण्डि जी से रामकथा सुनना एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग है 


राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।

काल कर्म सुभाव गुन कृत दु:ख काहुहि नाहिं॥

श्री राम के राज्य में जड़, चेतन सारे जगत् में काल, कर्म स्वभाव और गुणों से उत्पन्न हुए दुःख किसी को भी नहीं होते l

रामराज्य एक मन्त्र है l

हम इस कथा में भावों के साथ प्रवेश करें तो निश्चित रूप से हमें इससे शक्ति भी प्राप्त होगी l शिक्षा में ऐसी कथाओं का प्रवेश आवश्यक है वर्तमान शिक्षा बोझिल करती है हम पैकेज देखते हैं माता पिता के प्रति हमारे क्या कर्तव्य हैं इन्हें विस्मृत कर जाते हैं हमारा मातृभूमि के प्रति क्या धर्म है इसका भान नहीं रहता l



इसके अतिरिक्त विप्रत्व क्या है, राजा रन्तिदेव का उल्लेख क्यों हुआ, बहुविवाह के विषय में आचार्य जी ने क्या बताया, अधिवेशन के लिए अब हमें क्या करना है, इन्द्रप्रस्थ क्या है जानने के लिए सुनें l