प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष चतुर्थी / पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 सितंबर 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१८५९ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३४१
मानस का अवगाहन करें निश्चित रूप से लाभ होगा l
इसके सिद्धान्तों की चर्चा करें l
शुचिता हमारे जीवन का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मूल्य है। इसे केवल स्वच्छ वस्त्र, स्वच्छ शरीर या स्वच्छ परिवेश तक सीमित नहीं किया जा सकता। वास्तविक शुचिता तब है, जब हमारे विचार पवित्र हों, वाणी मधुर और सत्य हो, व्यवहार निष्कपट हो तथा हमारे कर्म लोकहितकारी हों।
हमें शुचिता को केवल एक आदर्श के रूप में नहीं, बल्कि अपने स्वभाव का सहज अंग बनाना चाहिए। जिस प्रकार स्वच्छता के लिए हमें बार-बार प्रयास नहीं करना पड़ता, उसी प्रकार जीवन में ऐसी संस्कार-संपन्नता विकसित हो कि शुद्ध विचार और पवित्र आचरण हमारे स्वभाव से स्वतः प्रकट हों।
शुचितापूर्ण मन में ही सद्विचार जन्म लेते हैं और सद्विचारों से ही श्रेष्ठ कर्मों का निर्माण होता है। इसलिए यदि हम अपने जीवन को वास्तव में श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं, तो शुचिता को बाहर से अपनाने के स्थान पर भीतर से विकसित करना होगा। शरीर कोई हो परिस्थितियां कैसी भी हों इस शुचिता से हम भ्रमित, भयभीत नहीं रहते हैं अपितु आनन्दित रहते हैं जिस प्रकार विद्या अविद्या के ज्ञाता काकभुशुण्डि जी आनन्द का अनुभव करते हैं l मोहग्रस्त गरुड़ जी का काकभुशुण्डि जी से रामकथा सुनना एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग है
राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।
काल कर्म सुभाव गुन कृत दु:ख काहुहि नाहिं॥
श्री राम के राज्य में जड़, चेतन सारे जगत् में काल, कर्म स्वभाव और गुणों से उत्पन्न हुए दुःख किसी को भी नहीं होते l
रामराज्य एक मन्त्र है l
हम इस कथा में भावों के साथ प्रवेश करें तो निश्चित रूप से हमें इससे शक्ति भी प्राप्त होगी l शिक्षा में ऐसी कथाओं का प्रवेश आवश्यक है वर्तमान शिक्षा बोझिल करती है हम पैकेज देखते हैं माता पिता के प्रति हमारे क्या कर्तव्य हैं इन्हें विस्मृत कर जाते हैं हमारा मातृभूमि के प्रति क्या धर्म है इसका भान नहीं रहता l
इसके अतिरिक्त विप्रत्व क्या है, राजा रन्तिदेव का उल्लेख क्यों हुआ, बहुविवाह के विषय में आचार्य जी ने क्या बताया, अधिवेशन के लिए अब हमें क्या करना है, इन्द्रप्रस्थ क्या है जानने के लिए सुनें l