23.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 23 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८५० वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३२

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 23 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८५० वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३२


परमात्मा हमें निर्देश दे रहा है कि हम अपनी क्षमताओं, सामर्थ्य, बुद्धि और अनुभव को अपनी नई पीढ़ी को सौंपें, ताकि वह भी इनका सदुपयोग करते हुए राष्ट्र और समाज को आगे ले जा सके।



हम संसार के कर्मों और अपने धर्म का यथाशक्ति, यथाबुद्धि निर्वाह करते हुए जीवन के पथ पर निरंतर अग्रसर हैं।


आचार्य जी प्रयास कर रहे हैं कि आचार्य जी केवल पढ़ाने वाले और  हम केवल पढ़ने वाले न होकर एक ही यात्रा के सहयात्री बनें । हम दोनों के बीच विश्वास, सहयोग, प्रेम और सद्भाव बना रहे अध्ययन तप, पुरुषार्थ और सामूहिक प्रयत्न से सार्थक हो l


संसार निरंतर गतिशील है। हमें भी समय और परिस्थितियों के अनुरूप विवेकपूर्वक आगे बढ़ते रहना चाहिए। यदि हमारी गति सम्यक् दिशा में और उचित रीति से होगी, तो हम निश्चित ही अपने लक्ष्य तक पहुँच जाएँगे और हमारा लक्ष्य है कि भारत वैभवसंपन्न बने क्योंकि भारत का वैभव केवल भारत की उन्नति नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का आधार है। और लक्ष्य प्राप्त करने के लिए हम विपरीत परिस्थितियों से विचलित न हों 

श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान श्रीराम जिनमें त्याग की पराकाष्ठा एक ओर थी तो दूसरी ओर शौर्य का चरमोत्कर्ष और जिनको तुलसीदास जी किसी का अवतार न मानते हुए स्वयं परमात्मा स्वरूप कहते हैं और इस प्रकार व्यक्त करते हैं 


अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने।

षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने॥

फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।

पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे॥5॥


वेद-शास्त्र जिस संसार को एक विशाल वृक्ष के रूप में देखते हैं, उसका मूल अव्यक्त प्रकृति में है और वह प्रवाह की दृष्टि से अनादि है। उसकी चार त्वचाएँ, छह तने, पच्चीस शाखाएँ तथा असंख्य पत्ते और पुष्प हैं। इस संसार-वृक्ष पर सुख और दुःख के प्रतीक दो प्रकार के फल—मीठे और कड़वे लगते हैं। उस वृक्ष पर एक ऐसी लता भी है, जो उसी के आश्रय से विकसित होती रहती है। इसमें नित्य नए पत्ते और पुष्प उत्पन्न होते रहते हैं। ऐसे निरंतर परिवर्तनशील, विविध रूपों में प्रकट इस संसार-वृक्षस्वरूप परम सत्ता को हम नमस्कार करते हैं 


के जीवन के माध्यम से हमें यही संदेश दिया है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही विपरीत क्यों न हों, धर्म,  मर्यादा और लोककल्याण के पथ से विचलित हुए बिना निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए। हमें ढोल मजीरा बजाते हुए बैठना नहीं है नाप जपें तो उसका प्रभाव भी हमारे ऊपर हो यही शौर्यप्रमंडित अध्यात्म है l

कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया भैया अशोक सिंह जी द्वारा गाए जाने वाले अवधी गीत का उल्लेख क्यों किया, भैया पंकज श्रीवास्तव जी की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें l

22.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 22 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४९ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३१

 जय राम रमारमनं समनं। भवताप भयाकुल पाहि जनं॥

अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो॥1॥


दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा॥

रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे॥2॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष दशमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 22 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४९ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३१

आत्म-साक्षात्कार इसलिए कठिन है कि मन, बुद्धि और अहंकार आदि की परतें हमारे वास्तविक स्वरूप को ढँके रहती हैं। जब तक इनसे तादात्म्य समाप्त नहीं होता, तब तक आत्मा का साक्षात्कार सहज नहीं हो पाता। मन, बुद्धि, अहंकार आदि से तादात्म्य समाप्त करने के लिए हमें ये सदाचार संप्रेषण सुनने चाहिए l

अपने राष्ट्र भारत के प्रति निष्ठावान बनें और उसे वैभव-संपन्न, शक्तिशाली एवं समृद्ध बनाने में अपना योगदान दें। भारत का उत्थान सम्पूर्ण विश्व का प्राण-तत्त्व  है।



जब हम श्रीरामचरितमानस के बाहरी कथानक तक सीमित न रहकर उसके भीतर अवगाहन करेंगे, उसके भावों और जीवन-सन्देशों को आत्मसात् करेंगे, तभी उसके वास्तविक आनन्द की अनुभूति कर सकेंगे।


भगवान श्रीराम की व्यथाओं की कथा हमें अश्रुपूरित कर देती है ; किंतु यदि वही व्यथाएँ हमारे जीवन में आ जाएँ, तो हम निश्चित रूप से भीतर से टूट जाएँगे । श्रीराम का जीवन हमें यही सिखाता है कि व्यथाओं से बचना ही जीवन नहीं, बल्कि धैर्य, मर्यादा, शौर्य, पराक्रम और धर्म के साथ उसका सामना करना ही जीवन की सच्ची साधना है।


अपनी व्यथाओं को स्वयं तक सीमित न रखकर उन्हें दूसरों के लिए प्रेरणादायी कथा बना देने के कारण ही  इस मर्त्यलोक में नर का अभिनय करते हुए प्रभु श्रीराम विशेष हो गए l


प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः।

मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मंजुलमंगलप्रदा॥2॥

कथा में आज आचार्य जी ने क्या बताया,परस्पर का भाव क्या है, हमारी आत्मीयता कैसे झलक सकती है जानने के लिए सुनें l

21.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 21 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४८ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३०

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 21 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४८ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३३०

जो महापुरुष हमें आकर्षित करे हम उसके पथ पर चल दें 

महाजनो येन गतः स पन्था।।



हमारे भीतर एक अद्भुत शक्ति विद्यमान है। आवश्यकता केवल उसे पहचानने और उस पर विश्वास करने की है। जिस क्षण हमें अपने भीतर निहित उस शक्ति का बोध हो जाता है, उसी क्षण हमारे भीतर आत्मविश्वास जाग उठता है। तब हम परिस्थितियों से भयभीत नहीं होते, बल्कि उनका सामना करने का सामर्थ्य अपने भीतर अनुभव करते हैं। ऐसा ही सामना करने का सामर्थ्य वीर हकीकत राय (१७१९–१७३४) ने दिखाया जो भारत के एक अप्रतिम निर्भीक धर्मनिष्ठ महापुरुष थे। उन्होंने हिन्दू धर्म के अपमान का दृढ़तापूर्वक प्रतिकार किया। उन पर इस्लाम स्वीकार करने के लिए दबाव डाला गया, किन्तु उन्होंने अपने धर्म और आस्था से विचलित होना स्वीकार नहीं किया। धर्म परिवर्तन के स्थान पर उन्होंने मृत्यु का सहर्ष वरण किया और अपने अदम्य शौर्य , आत्मसम्मान तथा धर्मनिष्ठा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।हम धर्म, अधर्म, विधर्म, कर्म, अकर्म और विकर्म का भेद जानें—कौन-सा आचरण धर्मसम्मत है, कौन अधर्म है, अपने कर्तव्य से विचलन क्या है, कर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है, कर्म में अकर्म की स्थिति क्या है तथा निषिद्ध एवं धर्मविरुद्ध कर्म को विकर्म क्यों कहा गया है—यह समझना आवश्यक है।

श्रीरामचरितमानस हमारे भीतर आत्मविश्वास जाग्रत करता है हमें आनन्दित करने का यह एक अद्भुत ग्रंथ है l हम भी इस संसार में जहां देवासुर संग्राम सतत चल रहा है अपने सनातनधर्मी राष्ट्रभक्त बन्धुओं में आत्मविश्वास जाग्रत करें 


साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,

सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय ll 


रावण-वध के पश्चात् भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे। अयोध्यावासियों के हृदय में वर्षों से संचित प्रतीक्षा अब पूर्ण होने वाली थी।भगवान श्रीराम के वनवास की अवधि समाप्त हो चुकी थी और उनके लौटने से सम्पूर्ण अयोध्या आनन्द से भर उठी।

भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की भव्य तैयारियाँ आरम्भ हुईं। गुरु वसिष्ठ सहित समस्त मुनि, ब्राह्मण और अयोध्या के श्रेष्ठ जन इस मंगल अवसर के लिए एकत्र हुए। राजमहल में उत्सव का वातावरण था और माता कौसल्या सहित सभी माताएँ अपने प्रिय राम को राजा के रूप में देखने के लिए अत्यन्त हर्षित थीं।

इसी मंगलमय अवसर पर गुरु वसिष्ठ ने विधिपूर्वक श्रीराम का राज्याभिषेक आरम्भ किया—



प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा॥

सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी॥3॥

कथा में आगे आचार्य जी क्या कह रहे हैं,घुनाक्षर न्याय क्या है, ISKCON का नाम आचार्य जी ने क्यों लिया, Gen Z का उल्लेख क्यों हुआ, अंगद कहां बांधा जाता है जानने के लिए सुनें l

20.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 19 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४६ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२८

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 20 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४७ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२९

यदि हम प्रतिदिन कुछ समय अपने आत्म के लिए निकालें, तो हमारा आत्म परमात्मोन्मुख, ज्ञानोन्मुख और शौर्योन्मुख होगा। आत्मचिन्तन का यह समय हमें भीतर से जाग्रत करेगा, ज्ञान की ओर ले जाएगा और जीवन में शौर्य, पराक्रम , संकल्प, तप, त्याग, प्रेम, आत्मीयता तथा पुरुषार्थ का संचार करेगा।


हमारे भीतर ज्ञान का प्रकाश सदैव विद्यमान है, परन्तु कामना, आसक्ति और विषय-वासनाओं का आवरण उस प्रकाश को ढक देता है। 

इसी सत्य को भगवान श्रीकृष्ण निम्नांकित श्लोक में अत्यन्त सुन्दर उपमाओं के माध्यम से समझाते हैं।


धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च।


यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्।।3.38।।

जैसे धुएँ से अग्नि, धूल से दर्पण,गर्भाशय से गर्भ ढका रहता है, ऐसे ही काम के द्वारा यह आत्म ढका हुआ है  और इस कारण परमात्मा की खोज नहीं हो पाती l


यह काम (कामना ) इन्द्रियों , मन और बुद्धि के द्वारा ज्ञान को ढककर देहाभिमानी मनुष्य को मोहित करता है।

भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक आत्म के प्रकाश को प्रकट करने की प्रेरणा देता है।

रावण-वध हो चुका है, अधर्म पर धर्म की विजय हो चुकी है और अब अयोध्या में भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियाँ हो रही हैं।


भरत जी ने १४ वर्षों तक श्री राम के वियोग में एक तपस्वी की तरह जीवन जिया था और अपने बालों की जटाएं बना ली थीं। श्री राम ने उनके इस त्याग को देखकर उन्हें गले लगाया और खुद उनकी जटाएं खोलीं।

कथा में आचार्य जी ने आगे क्या बताया,छोटे से ग्रंथ उर्वशी की चर्चा क्यों हुई, आचार्य जी ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जिनका जन्म १९ अगस्त १९०७ को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के 'दूबे का छपरा' नामक गाँव में हुआ था की चर्चा क्यों की,तुलसी जयन्ती कब थी जानने के लिए सुनें l

19.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२७

 यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 19 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४६ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२८


हम अपने भीतर यह अनुभव करें कि हम समाज में अपने आचरण, ज्ञान, सेवा, प्रेम, आत्मीयता और कर्तव्यनिष्ठा के कारण इतने विश्वसनीय और सम्माननीय बन गये हैं कि लोग हमारे बड़प्पन को स्वीकार कर रहे हैं और मार्गदर्शन एवं परामर्श के लिए स्वयं हमारे पास आ रहे हैं ।



आज राष्ट्र की प्रगति के मार्ग में अनेक प्रकार के झंझावात दिखाई दे रहे हैं। कहीं राष्ट्र की एकता और अखण्डता को प्रभावित करने के प्रयास हो रहे हैं, तो कहीं सनातन धर्म के प्रति वितृष्णा उत्पन्न करने का वातावरण बनाया जा रहा है। ऐसे समय में हम राष्ट्रभक्त सनातनधर्मियों का दायित्व और भी बढ़ जाता है। 

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।

स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥


हमें अध्यात्म के कारण जगप्रपंच को त्यागना नहीं है l इसी कारण शौर्यप्रमंडित अध्यात्म महत्त्वपूर्ण है l हमें मनुष्यत्व की अनुभूति करते हुए पुरुषार्थ प्रदर्शित करना है l यदि हमारा उद्देश्य लोगों को सनातन धर्म के वैशिष्ट्य, उसकी उदात्त जीवन-दृष्टि,यज्ञमयी संस्कृति,शाश्वत मूल्यों और समृद्ध परम्परा से परिचित कराना है तथा समाज में राष्ट्रनिष्ठा और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य-बोध को जाग्रत करना है, तो केवल व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए हमें संगठित होकर कार्य करना होगा।

एक व्यक्ति की क्षमता सीमित हो सकती है, किन्तु जाग्रत, समर्पित और संस्कारित व्यक्तियों का संगठन व्यापक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है। इसलिए आज आवश्यकता केवल यह सोचने की नहीं कि “कोई कुछ करे”, बल्कि यह समझने की है कि “मुझे क्या करना है और मैं अपने साथ कितने लोगों को जोड़ सकता हूँ।”

 हमें अपने कर्तव्य का बोध करना ही होगा। हमें लोगों के भीतर जड़ जमाए पराधीनता के भाव को समाप्त कर स्वाभिमान, आत्मविश्वास और नेतृत्व का भाव जाग्रत करना है। हमें स्वयं जाग्रत होना होगा, दूसरों को जाग्रत करना होगा और ऐसे व्यक्तियों का संगठन खड़ा करना होगा जो राष्ट्र, समाज और सनातन संस्कृति के प्रति समर्पित भाव से कार्य कर सकें l राष्ट्र, समाज और सनातन संस्कृति को लाभ पहुंचा सकें जिस प्रकार का लाभ  गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस के माध्यम से  हमारे भीतर के सनातनत्व को हिन्दुत्व को जाग्रत कर पहुंचाया l


सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन॥

मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए॥3॥

आप सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिए, जिसमें श्री रामचंद्रजी सिंहासन पर विराजमान हों। वशिष्ठ मुनि के सुहावने वचन सुनते ही सब ब्राह्मणों को बहुत ही अच्छा लगा ॥3॥


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया आचार्य जी को एक महिला ने किस कारण फोन किया था,लाइजनिंग का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

18.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२७

 कर्म के सिद्धान्त जब व्यवहार बनकर दीखते हैं 

तब भविष्यत् के सभी अंकुर सहज ही सीखते हैं 

और जब सिद्धान्त केवल सूत्रवत् रटवाए जाते 

तभी प्रवचन मंत्र सारे व्यर्थ यों ही फड़फड़ाते l


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 18 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४५ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२७

यदि हमारा अन्तःसुख समाज-सेवा और भारतमाता की सेवा में समाहित हो जाए, तो इससे बढ़कर हमारे लिए आनन्द और सौभाग्य का विषय क्या हो सकता है!


हम पहले स्वयं सनातन धर्म की विशेषताओं से परिचित हों l भयों और भ्रमों में व्याकुल न हों l साथ ही नई पीढ़ी को भी सनातन धर्म के वैशिष्ट्य, उसकी उदात्त जीवन-दृष्टि, शाश्वत मूल्यों और समृद्ध परम्परा से परिचित कराना आज की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति अथवा धार्मिक अनुष्ठानों का नाम नहीं, बल्कि जीवन को सत्य, धर्म,पौरुष,शौर्य, पराक्रम,करुणा,शील,संयम, कर्तव्य, त्याग और लोकमंगल की भावना से जीने की व्यापक जीवन-पद्धति है।

हम वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता, मानस तथा अन्य ज्ञान-परम्पराओं में निहित जीवन-दर्शन से परिचित हों ताकि हम अपनी संस्कृति को केवल परम्परा के रूप में न जाने, बल्कि उसके पीछे निहित वैज्ञानिक, नैतिक, आध्यात्मिक और मानवीय दृष्टि को समझ सकें ।श्रीरामचरितमानस एक अद्भुत ग्रंथ है l यह पुण्य रूप, पापों का हरण करने वाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति को देने वाला, माया मोह और मल का नाश करने वाला, परम निर्मल प्रेम रूपी जल से परिपूर्ण तथा मंगलमय है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका अवगाहन करते हैं उन्हें सांसारिक व्यथाएं सताती नहीं हैं वे अपने विकारों को दूर करने का सामर्थ्य प्राप्त कर लेते हैं और ऊर्जस्वित, उत्साहित हो जाते हैं l

कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया,मधुमक्षिका वृत्ति क्या है,जुगल देवी विद्या मन्दिर और जय नारायण विद्या मन्दिर की चर्चा क्यों हुई, मानस रामायण किसके द्वारा रचित है जानने के लिए सुनें l




17.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष पञ्चमी (नाग पञ्चमी )विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 17 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४४ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२६

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष पञ्चमी (नाग पञ्चमी )विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 17 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४४ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२६

अपने तत्त्व को पहचानकर सत्कृत्यों को करने का संकल्प लें  भ्रमित भयभीत न हों आत्मबोधोत्सव मनाएं l


हमारी दैवीय परम्परा हमें केवल श्रद्धा करना नहीं सिखाती, वह हमें देना सिखाती है। देवता का स्वभाव ही ‘देना’ है। सूर्य बिना किसी भेदभाव के प्रकाश देता है, धरती सबको धारण करती है l हमारी संस्कृति ने इसी भाव को जीवन का आदर्श माना है।

अतः आगामी अधिवेशन, जहां आनन्दपूर्वक उत्साहपूर्वक एक साथ हम एकत्र हो रहे हैं,में  ‘दैवीय परम्परा’ का चिन्तन करते हुए स्वयं से यह प्रश्न करेंगे—मैं समाज को क्या दे रहा हूँ? राष्ट्र को क्या दे रहा हूँ?

 अधिवेशन का संकल्प बने—‘मैं समाज और राष्ट्र के लिए कुछ दूँगा।’

आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हमारे खाद्य, पेय,भाव विचार,शुद्ध हों , हम प्रेम और आत्मीयता का विस्तार करें, शक्ति, शौर्य, पराक्रम, संगठन का सदैव ध्यान रखें, हमारा धन परोपकार में प्रयुक्त हो इसका प्रयास करें, अपने भीतर ऐसी क्षमता विकसित करें कि दुष्ट शक्ति पर हम प्रहार कर सकें, हम स्वदेश -भाव सदैव बनाए रखें l हर दशा दिशा में राम -मन्त्र की महत्ता को समझें l रामात्मकता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है l भगवान राम का नाम बार बार लेने के लिए कहा जाता है उसका आशय यही है कि जब हम उनका नाम लेंगे तो उनका कार्य व्यवहार भी हमारे सम्मुख होगा l उन्होंने समाज के सारे कष्ट दूर कर दिए l उन्होंने बहुत कुछ किया l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने अयोध्या में होने जा रहे राजतिलक के वर्णन में क्या बताया 

दूसरा बैल चारा क्यों नहीं खाता था,भैया मनीष कृष्णा जी, भैया पंकज श्रीवास्तव जी, भैया संजय गर्ग जी और भाभी जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

16.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 16 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४३ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२५

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 16 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४३ वां* सार -संक्षेप 

स्थान : नई दिल्ली 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२५

हमें अपने भीतर निहित ऊर्जा, ऊष्मा, पौरुष, विक्रम, शौर्य, पराक्रम और तिग्मता आदि  जीवनदायी तत्त्वों के स्वरूप और सामर्थ्य को समझते हुए अपनी जीवनचर्या को इस प्रकार व्यवस्थित करना चाहिए कि हमारी जीवनशक्ति अनुशासन, साधना, पुरुषार्थ और सृजन के रूप में सार्थक दिशा प्राप्त करे।



हमें जीवन में विभिन्न भूमिकाएँ प्राप्त होती हैं। यही इस नाम-रूपात्मक जगत की विविधता और आनन्द है यही परमात्मा की लीला है lअतः हमें जो भी भूमिका प्राप्त हो, उसमें पूर्ण मनोयोग, निष्ठा और समर्पण के साथ रम जाना चाहिए। भगवान श्रीराम इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं वे अपनी प्रत्येक भूमिका में पूर्णतः रमे और इसी कारण जन-जन के हृदय में भी रम गए।

 राम-राज्य, जिसमें जनता शासक के साथ समरूप हो गयी की, चर्चा हम आज भी करते हैं, जबकि उनके पूर्वजों के राज्य भी उसी परम्परा में धर्म, न्याय, लोककल्याण और सुशासन के आदर्श रहे थे ।तथापि रामराज्य का स्मरण विशेष रूप से इसलिए होता है कि भगवान् राम ने राजसत्ता को केवल शासन का माध्यम नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और लोकमंगल की साधना बना दिया था।

भगवान राम धर्म का उपदेश देने वाले नहीं अपितु धर्म को अपने जीवन में साकार करने वाले हैं l वे अपने सामर्थ्य का श्रेय स्वयं को नहीं देते। वे जानते हैं कि मनुष्य कितना ही सामर्थ्यवान क्यों न हो, उसके जीवन में गुरु, संस्कार, शिक्षा और कृपा का महत्त्व अत्यन्त बड़ा है। तभी भगवान राम कहते हैं 


गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे॥3॥


गुरु वसिष्ठ/वशिष्ठ हमारे कुल के पूजनीय गुरु हैं। इन्हीं की कृपा से मैंने रणभूमि में दानवों का संहार किया l यही रामत्व है यही मनुष्यत्व है l मनुष्यत्व की अनुभूति करते हुए ही हमें शक्ति बुद्धि संयम स्वाध्याय और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत जनों का कुटुम्ब अर्थात् संगठन निर्मित करना है l

दीनदयाल शोध संस्थान की चर्चा क्यों हुई,आचार्य जी ने अपने महाविद्यालय का कौन सा प्रसंग बताया, अधिवेशन का हेतु क्या है, छोटी सी पिपहरी क्या है जानने के लिए सुनें l

15.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 15 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४२ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२४

 अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे,

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

(मनुष्यता : मैथिली शरण गुप्त )


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 15 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४२ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२४

हम सद्विचारों को ग्रहण करने का सदैव प्रयास करें, ताकि मन में विकार उत्पन्न हों भी, तो सद्विचारों के प्रकाश से उनका शीघ्र निरसन हो जाए।

हम अखण्ड हिन्दू राष्ट्र के उस गौरवशाली स्वरूप का चिन्तन करें , जिसकी प्राचीन धरा का अतीत तेजस्विता, पराक्रम, शौर्य और सांस्कृतिक वैभव से अनुप्राणित रहा है।




संसार की इस विराट् लीला का संचालन किसी अदृश्य शक्ति की विधि-व्यवस्था से हो रहा है। वह शक्ति स्वयं अदृश्य है, पर उसकी व्यवस्था के पदचिह्न सर्वत्र दिखाई देते हैं। हम उन्हीं दृश्य संकेतों के माध्यम से उस अदृश्य सत्ता को समझने और उसे देखने का प्रयास करते हैं। हम मनुष्य के रूप में जन्मे हैं इस कारण हमें मनुष्यत्व की अनुभूति होनी ही चाहिए l हम सौम्य, शिष्ट, सुसंस्कृत, शान्त, सुशील बनें अपनी तृष्णाओं को असीमित न रखें संतुष्ट रहने का प्रयास करें l हम अपने जीवन को सतत उद्यम, पुरुषार्थ और कर्मशीलता से सार्थक बनाएं जैसे भगवान राम ने अपने जीवन को सार्थक बनाया l

इस समय हम उन्हीं की कथा में प्रविष्ट हैं भगवान राम रावण को पराभूत कर अयोध्या पहुंच चुके हैं 


हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा॥

अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे॥4॥


माताएं बार-बार हृदय में विचारती हैं कि इन्होंने लंकापति रावण को कैसे मारा? मेरे ये दोनों बच्चे अर्थात् भगवान राम और लक्ष्मण बड़े ही सुकुमार हैं और राक्षस तो ब़ड़े भारी योद्धा और अत्यन्त बली थे

माताओं को अवर्णनीय आनन्द की अनुभूति हो रही है l अयोध्या में सभी लोग प्रसन्न हैं l

भगवान राम का व्यवहार देखिए 

पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए॥

गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे॥3॥

श्री रघुनाथजी ने सब सखाओं को बुलाया और सबको सिखाया कि मुनि के चरणों में लगो। ये गुरु वशिष्ठ जी हमारे कुलभर के पूज्य हैं। इन्हीं की कृपा से रण में राक्षस मारे गए हैं॥

यह है रामत्व 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया आज आचार्य जी कहां जा रहे हैं, भैया मनीष जी ने क्या योजना बनाई जानने के लिए सुनें l

14.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 14 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४१ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२३

 इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर॥

सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा॥1॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 14 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४१ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२३


जीवनपर्यन्त सीखते रहने की जिज्ञासा बनाए रखें, क्योंकि सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती। और सीखने के पश्चात् सिखाने का भाव भी सदैव बनाए रखें ताकि शिक्षकत्व की शक्ति मलिन न हो l अपने संगठन युगभारती में प्रेम और आत्मीयता का विस्तार करें l 





गोस्वामी तुलसीदास जी, जिन्हें ‘कविकुल-कमल-दिवाकर’ कहा गया है, श्रीरामचरितमानस के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि परिवार-भाव अत्यन्त अद्भुत और जीवनदायी होता है। यदि कभी मन में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न हो जाए, तो उसे द्वेष या वैमनस्य से नहीं, बल्कि सद्विचारों के द्वारा दूर करना चाहिए। परिवार और संगठन इसी भाव पर टिके रहते हैं।

रामकथा हमें यह संकेत भी देती है कि रामत्व क्या है और रावणत्व क्या है। रामत्व में अपने आत्म को परमात्मतत्त्व में समर्पित कर देना लक्ष्य है l रामत्व में विद्या ज्ञान के लिए धन दान के लिए और शक्ति रक्षा के लिए है रावणत्व में  विद्या वादविवाद के लिए, धन मद पैदा करने के लिए और शक्ति दूसरों को कष्ट देने के लिए है साथ ही रावणत्व में निजहित और अहङ्कार की प्रधानता है, जबकि रामत्व में समष्टि, समन्वय और संगठन का भाव है। रावण के पक्ष में स्वार्थ और विभाजन की प्रवृत्ति दिखाई देती है; इसके विपरीत  प्रभु श्रीराम बिखरे हुए समाज को एक सूत्र में पिरोते हैं। वनवासी आदि विभिन्न समुदायों को साथ लेकर वे एक संगठित शक्ति का निर्माण करते हैं और इसी सामूहिक शक्ति तथा संगठन-भाव के द्वारा रावण का पराभव करते हैं। अकबर के शासन के कारण उपजी विषम परिस्थितियों में तुलसीदास जी ने रामकथा के द्वारा यही संकेत दिया कि संगठन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है l 

कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया 

 आचार्य जी ने बलराज मधोक द्वारा लिखित *पाकिस्तान का आदि और अंत* पुस्तक की चर्चा क्यों की  युगपुरुष दीनदयाल जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

13.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 13 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८४० वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२२

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 13 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८४० वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२२


परब्रह्म का सृष्टि-निर्माण  किसी आवश्यकता या अभाव की पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि उसकी सहज लीला है। हम भी बिना स्वार्थ /प्रयोजन के कोई भी सत्कर्म सहज रूप से करें l

अध्यात्म में प्रवेश करें ताकि हम आत्मशक्ति को पहचान सकें l


केवल माला जपते रहना या अपने व्यक्तिगत मोक्ष की साधना में लगे रहना उचित नहीं है। यदि हमारे सामने दुष्ट सज्जनों को सताएँ, अन्याय और अत्याचार करते रहें और हम केवल यह सोचकर मौन रहें कि हम तो आध्यात्मिक साधना कर रहे हैं, तो यह पूर्ण अध्यात्म नहीं है। सच्चा अध्यात्म मनुष्य में इतना आत्मबल और धर्मबोध उत्पन्न करता है कि वह अन्याय के सामने निर्भीक होकर खड़ा हो, सज्जनों की रक्षा करे और अधर्म का प्रतिकार करने का सामर्थ्य रखे। अतः अध्यात्म के साथ शौर्य अनिवार्य है l गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस के माध्यम से इसे ही स्पष्ट कियाl हम श्रीरामचरितमानस के  माध्यम से स्वयं को पहचानने का प्रयास करें। यह आत्मपहचान प्राप्त करके हम अपनी मातृभूमि के ऋण से उऋण होने के लिए सन्नद्ध हों। यही प्रार्थना हम अपने इष्टदेव से करें और इस अन्तःअनुभूति को स्थायित्व प्रदान करने की याचना भी उन्हीं से करें। श्रीरामचरितमानस वास्तव में एक अद्भुत ग्रंथ है

रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी॥

हमारे लिए हमारी जन्मभूमि / मातृभूमि का स्थान अत्यन्त विशिष्ट है  मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम भी अपनी जन्मभूमि के प्रति गहरा अनुराग व्यक्त करते हुए कहते हैं 


 


जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना॥

अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ॥2॥

ऐसी है अवधपुरी अर्थात् अयोध्या 


अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका। पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः l



पद्मपुराण में वर्णित है 


अयोध्या च परब्रह्म सरयू सगुणः पुमान्, तन्निवासी जगन्नाथः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् l 

अयोध्या परब्रह्मस्वरूप है, सरयू सगुण पुरुषस्वरूप  अर्थात् सगुण ब्रह्म है और उसमें निवास करने वाले भगवान् जगन्नाथ हैं—मैं सत्य कहता हूँ।


इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने दर्शन को कैसे स्पष्ट किया, आज आचार्य जी ने मानस में क्या बताया, भगवान राम में श्रद्धा की पराकाष्ठा को आचार्य जी ने किस प्रसंग से स्पष्ट किया जानने के लिए सुनें l

12.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 12 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८३९ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२१

 देश-प्रेम का मूल्य प्राण है, देखें कौन चुकाता है?

देखें कौन सुमन शैया तज, कंटक पथ अपनाता है?

सकल मोह ममता को तजकर, माता जिसको प्यारी हो।

दुश्मन की छाती छेदन को, जिसकी तेज़ कटारी हो।



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 12 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८३९ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२१

अपनी मातृभूमि भारत के प्रति प्रेम, श्रद्धा और उत्तरदायित्व का भाव रखें इसी आधार पर हम आगामी अधिवेशन भी करने जा रहे हैं 



आचार्य जी  इन सदाचार वेलाओं द्वारा निरन्तर यह प्रयास कर रहे हैं कि हम भय और भ्रम से आक्रान्त न रहें। हम अपने प्रयासों में शैथिल्य न आने दें।

हे जगत्पिता हे जगदीश्वर संसार समन्दर पार करो 

है बीच भंवर में फंसी नाव हे उद्धर्ता उद्धार करो

 इसके लिए वे हमें चिन्तन, मनन, अध्ययन, स्वाध्याय,लेखन आदि के माध्यम से अपने भीतर स्पष्टता, आत्मविश्वास और विवेक जाग्रत करने के लिए प्रेरित करते हैं।


हम आज भी अनेक यशस्वी तपस्वी महापुरुषों को देखते हैं और उनके तप, त्याग, संयम तथा अन्य सद्गुणों से प्रभावित होते हैं। परन्तु यदि हम भगवान श्रीराम के जीवन का अध्ययन करें, तो पाएँगे कि उनमें ये सभी गुण अनन्तगुणित रूप में विद्यमान थे। भगवान श्रीराम का जीवन केवल आदर्शों को कहने का नहीं, बल्कि उन्हें अपने आचरण में उतारकर दिखाने का जीवन था। इसलिए श्रीराम के जीवन और चरित्र को समझना तथा उनके गुणों का अंशमात्र भी अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना ही हमारे जीवन को सार्थक दिशा दे सकता है l भगवान राम में शौर्य, पराक्रम,सत्यनिष्ठा, कर्तव्यनिष्ठा, मातृ-पितृभक्ति,तप,त्याग, धैर्य, संयम, करुणा, क्षमा, विनय, मर्यादा, परोपकार, सहिष्णुता, उदारता, आत्मसंयम, देशप्रेम आदि अनेक गुण विद्यमान थे l


देशप्रेम केवल एक भावना नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन को दिशा देने वाला एक महत्त्वपूर्ण विचार और जीवन-मूल्य है। जिस व्यक्ति के हृदय में अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम, श्रद्धा और उत्तरदायित्व का भाव होता है, उसके भीतर आत्मविश्वास, कर्तव्यबोध और त्याग की भावना विकसित होती है। इसके विपरीत, जिनके मन में देश के प्रति अपनत्व और निष्ठा का अभाव होता है, वे प्रायः भय, संशय, भ्रम और अस्थिरता से घिरे रहते हैं।

देशप्रेम हमें अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के विषय में सोचने की प्रेरणा देता है। यह भावना मनुष्य को अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक करती है और उसे राष्ट्र की उन्नति में अपना योगदान देने के लिए प्रेरित करती है।

भगवान राम का स्वदेश के प्रति प्रेम देखिये 


इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर॥

सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा॥1॥


यहाँ (विमान पर से) सूर्य कुल रूपी कमल को प्रफुल्लित करने वाले सूर्य श्री रामजी वानरों को मनोहर नगर दिखला रहे हैं। वे कहते हैं- हे सुग्रीव! हे अंगद! हे लंकापति विभीषण! सुनो। यह पुरी पवित्र है और यह देश सुंदर है॥1॥


जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना॥

अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ॥2॥


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भैया मुकेश जी के किस सद्प्रयास की आचार्य जी ने प्रशंसा की, शरीर साधन है इसे आचार्य जी ने किस प्रकार स्पष्ट किया जानने के लिए सुनें l

11.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष चतुर्दशी (सावन शिवरात्रि ) विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 11 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८३८ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२०

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष चतुर्दशी (सावन शिवरात्रि ) विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 11 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८३८ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३२०


 हम स्वयं को जानें , स्वयं को पहचानें और निरंतर अपने अंतर्मन का निरीक्षण करते रहें । स्वयं के गुणों को विकसित करने और दोषों को दूर करने का प्रयास करते रहें l 

एकांत में बैठकर जब हम अपने जीवन और अपने कार्य-व्यवहार का अवलोकन करें, तब हमारे मन में ग्लानि उत्पन्न न हो—यही सार्थक जीवन की पहचान है। फल की चिंता और आसक्ति से मुक्त होकर कर्म करें l जीवन ऐसा जिएँ कि हमारे जाने के पश्चात् भी हमारी चर्चा होती रहे और हमारा जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा बने l



यदि भगवान् राम और भगवान् कृष्ण के मनुष्य-जीवन के कार्य-व्यवहार का अंशांश भी हम अपने जीवन में उतार सकें, उनके आदर्शों का थोड़ा-सा भी परिपालन कर सकें, तो हमारा मनुष्य-जीवन भी शान्ति, संतोष और आत्मविश्वास के साथ व्यतीत हो सकता है। उनके जीवन से हमें यह सीखने को मिलता है कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, धर्म, कर्तव्य, संयम, विवेक, प्रेम,आत्मीयता, शौर्य और पराक्रम का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।

जन्मभूमि के प्रति प्रेम करना हमारा स्वाभाविक और पवित्र कर्तव्य है। इसे केवल अपने शब्दों तक सीमित न रखें, बल्कि अपने हृदय में धारण करें। जन्मभूमि के प्रति प्रेम, उसके प्रति आत्मीयता और उसके लिए कुछ करने का भाव ही रामात्मकता की अनुभूति है। रामात्मकता केवल मुख से ‘राम-राम’ कहने में नहीं, बल्कि प्रभु श्रीराम के आदर्शों को अपने आचरण और जीवन में उतारने में है। 

जब रावण को पराभूत करके प्रभु श्रीराम अयोध्या लौट आए, तब अयोध्या नगरी में हर्ष और उल्लास की लहर दौड़ गई। वर्षों के वनवास के पश्चात् प्रभु श्रीराम के आगमन से प्रजा का हृदय आनंद से भर उठा। धर्म की विजय और अधर्म के पराभव का यह अवसर समस्त अयोध्यावासियों के लिए अत्यंत गौरव और उत्सव का विषय था।

प्रभु श्रीराम कहते हैं 

जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना॥

अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ॥2॥



यद्यपि सबने वैकुण्ठ की महिमा का वर्णन किया है और यह वेद-पुराणों में प्रसिद्ध तथा समस्त जगत् को ज्ञात है, तथापि अवधपुरी के समान वह भी मुझे प्रिय नहीं है। इस भेद को कोई-कोई विरला ही जानता है॥

आगे आचार्य जी ने क्या बताया,माननीय मोहन भागवत जी के Gen Z के बीच में  जाने की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की, हनुमान प्रसाद जी का उल्लेख क्यों हुआ, गीता के चौथे अध्याय के किन छंदों को पढ़ने का परामर्श आचार्य जी ने दिया जानने के लिए सुनें

10.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष द्वादशी / त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 10 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८३७ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१९

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष द्वादशी / त्रयोदशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 10 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८३७ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१९

अपने संगठन युगभारती में बन्धुता, प्रेम और आत्मीयता का विस्तार करें l माता, पिता, दादा, दादी की उपेक्षा न करें l

रहे समक्ष हिम-शिखर,

तुम्हारा प्रण उठे निखर।

भले ही जाए जन बिखर,

रुको नहीं, झुको नहीं,

बढ़े चलो, बढ़े चलो।




हमें मार्गदर्शन देने वाली, हमें मनुष्यत्व की अनुभूति कराने वाली तथा बिना फल की इच्छा किए कर्म करने की प्रेरणा देने वाली भारतवर्ष की आर्ष परम्परा अद्भुत है। यह परम्परा केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग ही नहीं दिखाती, बल्कि हमारे जीवन में बन्धुता, प्रेम, आत्मीयता, आत्मविश्वास, देशभक्ति, देशसेवा और समाजसेवा जैसे श्रेष्ठ भावों का भी जागरण करती है। विकृत भावों से बचाती है l विकारों विचारों के संघर्ष में विकारों के निरसन और विचारों के संवर्धन का उत्साह प्रदान करती है l


यह परम्परा हमें यह बोध कराती है कि हम केवल श्रद्धा और उपासना तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, धैर्य, शौर्य, पराक्रम और कर्तव्यबोध से सम्पन्न होकर सत्य, धर्म और राष्ट्र की रक्षा हेतु अपना सर्वस्व समर्पित करने के लिए प्रेरित हों l

भारत की इस महान् आर्ष परम्परा ने मानव-जीवन के प्रत्येक पक्ष को स्पर्श करने वाला विपुल साहित्य उपलब्ध कराया है। वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण, दर्शन-ग्रन्थ तथा संत-साहित्य—इन सबमें जीवन को सही दिशा देने वाले, आदर्श व्यवहार आदर्श परिवार का बोध कराने वाले असंख्य सूत्र निहित हैं।  मार्गदर्शक त्यागी तपस्वी विद्वान् राष्ट्ररत्न गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस आदर्श व्यवहार और आदर्श परिवार का एक अद्भुत उदाहरण है 


बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात॥राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जलजात॥1ख॥

भरत जी कुश की आसनी पर बैठे हुए हैं। उनके सिर पर जटाओं का मुकुट है और राम-विरह में उनका शरीर अत्यन्त कृश हो गया है। वे निरन्तर “राम! राम! रघुपति!” का जप कर रहे हैं और उनके कमल-सदृश नेत्रों से आँसू बह रहे हैं।


श्रीराम शत्रु को युद्ध में पराजित करके विजय और यश प्राप्त कर रहे हैं, जिसका देवता भी गान कर रहे हैं। वे सीता जी और अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी सहित अयोध्या आ रहे हैं।


यह समाचार सुनते ही भरत जी के सारे दुःख दूर हो गए। उनकी स्थिति ऐसी हो गई जैसे कोई अत्यन्त प्यासा व्यक्ति अचानक अमृत पा जाए।


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,आचार्य जी ने भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी से क्या पूछने के लिए कहा, Gen Z, जिसमें १९९०के दशक के उत्तरार्ध से २०१० के दशक के आरम्भ तक जन्मे लोगों को रखा जाता है,का उल्लेख क्यों हुआ, भैया प्रभाकर जी की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें l

9.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष एकादशी/द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 9 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८३६ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१८

 अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष एकादशी/द्वादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 9 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८३६ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१८


हम लोग अपनी बैठकों में देशभक्ति के गीतों का गायन भी सम्मिलित करें। इससे बैठकों में उत्साह,उमंग और राष्ट्रभाव का वातावरण बनेगा। देशभक्ति के गीत हमारे भीतर मातृभूमि के प्रति प्रेम, समर्पण और कर्तव्यबोध को जाग्रत करने का सशक्त माध्यम हैं।

आगामी अधिवेशन के माध्यम से हम समाज को एक अच्छा संदेश दें l दीनदयाल शोध संस्थान से संपर्क करके नाना जी देशमुख जी की परिकल्पना फलीभूत हो यह प्रयास करें l



जिनके रोम-रोम में रामात्मकता समा जाती है, वे संसार में रहते हुए भी संसार के भयानक दृश्यों से मुक्त रहते हैं। उनके सामने परिस्थितियाँ कैसी भी हों, वे उनसे भयभीत या विचलित नहीं होते। उनमें आशा और विश्वास की कमी नहीं होती, क्योंकि उन्हें प्रत्येक परिस्थिति में भगवान राम के कार्य और भगवान राम का व्यवहार दिखाई देता है। वे मनुष्यत्व की सच्ची अनुभूति करते हैं।

भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाते हैं। उनका जीवन केवल मर्यादा का ही नहीं, अपितु अद्भुत संगठन-क्षमता और नेतृत्व का भी उदाहरण है। उनमें शौर्य, पराक्रम, तप, त्याग, करुणा, संयम, विवेक, भक्ति, भाव आदि अनेक गुण प्रकट हुए। उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से यह दिखाया कि महान नेतृत्व केवल सामर्थ्य से नहीं, बल्कि चरित्र, संवेदना, धैर्य और सबको साथ लेकर चलने की क्षमता से निर्मित होता है भगवान राम ने विभिन्न समुदायों को एक उद्देश्य के लिए संगठित किया। यह संगठन किसी भय या स्वार्थ पर आधारित नहीं था,उसके मूल में विश्वास, प्रेम, धर्म और उद्देश्य की एकता थी।

रामात्मकता का अर्थ केवल भगवान राम का नाम लेना नहीं है। रामात्मकता का अर्थ है—अपने भीतर भगवान राम के गुणों को धारण करना। 

आज समाज और राष्ट्र के सामने अनेक प्रकार की चुनौतियाँ हैं। ऐसे समय में केवल परिस्थितियों को देखकर भयभीत होना  भगवान राम का मार्ग नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रत्येक चुनौती में अपने कर्तव्य को पहचानें और अपने भीतर की शक्ति को जाग्रत करें। 

जब व्यक्ति के भीतर रामात्मकता आती है तो उसके आसपास के लोग उससे आश्वस्त होते हैं, उसमें विश्वास करते हैं और उसके साथ चलने के लिए प्रेरित होते हैं। इस प्रकार रामात्मकता व्यक्ति से परिवार तक, परिवार से समाज तक और समाज से राष्ट्र तक एक सकारात्मक शक्ति का निर्माण करती है।इसी रामात्मकता की अनुभूति के लिए प्रवेश कर जाएं राम कथा में 



राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।

बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत॥1क॥


श्रीराम के वनवास से लौटने में विलम्ब होने के कारण भरत का मन श्रीराम-वियोग के अथाह समुद्र में डूबा हुआ था। वे निरन्तर श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनका जीवन श्रीराम के बिना ऐसा हो गया था, मानो वे विरह-सागर में डूब रहे हों और उन्हें बाहर निकलने का कोई मार्ग दिखाई न देता हो।

उसी समय पवनपुत्र हनुमान जी ब्राह्मण का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे। तुलसीदास जी कहते हैं कि हनुमान जी का वहाँ आना ऐसा था जैसे डूबते हुए व्यक्ति के लिए कोई नौका आ जाए। उन्होंने श्रीराम, लक्ष्मण और मां सीता के सकुशल अयोध्या लौटने का समाचार देकर भरत के हृदय को आशा, आनन्द और उमंग से भर दिया।

कथा में आगे आचार्य जी ने क्या बताया, मातृभूमि का हमारा क्रीड़ा- स्थल कौन सा रहा है (६:१६ )जानने के लिए सुनें l

8.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष दशमी /एकादशी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 8 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८३५ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१७

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष दशमी /एकादशी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 8 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८३५ वां* सार -संक्षेप 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१७

ध्यान रखना चाहिए कि जब परिवार में दुःख की घड़ी आती है, तब उल्लास के कार्यक्रम स्वतः स्थगित कर दिए जाते हैं। वहाँ औपचारिकता नहीं, संवेदना प्रधान होती है, किसी एक सदस्य का दुःख पूरे परिवार का दुःख बन जाता है।

इसी प्रकार यदि हमें वास्तविक, सशक्त और चिरस्थायी संगठन खड़ा करना है, तो हमें परिवार-भाव विकसित करना होगा जहाँ किसी की प्रसन्नता में सब प्रसन्न हों और किसी के दुःख में सब उसके साथ खड़े हों।


भारतवर्ष की भूमि पर बहुत पहले से ही सत् और असत्, शिष्ट और दुष्ट, धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष चलता आया है। दुष्ट लोग शिष्ट पुरुषों को कष्ट देने के लिए सदैव तत्पर रहे हैं। यह भारत की भूमि की एक चिरन्तन विशेषता है और यही भारत की भूमिका भी है कि संघर्ष के बीच धर्म और सत्य की स्थापना होती रहे।

सत् और रज का यह संघर्ष चलता रहेगा। इसलिए हमें परिस्थितियों से व्याकुल नहीं होना है। बाहरी संसार में कितना ही द्वन्द्व क्यों न हो, हमारे भीतर शान्ति, धैर्य और धर्म की ज्योति बुझनी नहीं चाहिए।

इसके लिए आवश्यक है कि हमारे भीतर रामात्मकता की अनुभूति जागे। रामात्मकता का अर्थ केवल भगवान राम का नाम लेना नहीं, बल्कि अपने विचारों, वाणी, आचरण और कर्तव्य में भगवान राम के गुणों को उतारना है। 

*निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।*


जब भीतर राम का भाव जागता है, तब रावण जैसी प्रवृत्तियाँ हमें विचलित तो कर सकती हैं, पर पराजित नहीं कर सकतीं।

आज कल हम लोग भगवान राम की कथा सुन रहे हैं 


समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान।

बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान॥

रामकथा सुनना मात्र एक कथा सुनना नहीं है; यह अपने भीतर जमी हुई उन वृत्तियों पर निरन्तर प्रहार करना है जो मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर ले जाती हैं।


राम नाम गुन चरित सुहाए। जनम करम अगनित श्रुति गाए॥

जथा अनंत राम भगवाना। तथा कथा कीरति गुन नाना॥


कथा में आचार्य जी ने आज क्या बताया, श्री अभय महाजन जी और श्री सुरेश सोनी जी की चर्चा क्यों हुई, स्व भैया निखिल कुमार जी बैच २००१  निवासी चमियानी उन्नाव जो DRDO देहरादून में वैज्ञानिक थे के संदर्भ में आचार्य जी ने क्या बताया जानने के लिए सुनें l

7.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 7 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८३४ वां* सार -संक्षेप स्थान : महातीर्थ चित्रकूट मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१६

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 7 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८३४ वां* सार -संक्षेप

स्थान : महातीर्थ चित्रकूट 


मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१६


हमें ऐसी भक्ति प्राप्त हो जिसमें भोग, ऐश्वर्य अथवा किसी भी फल की आकांक्षा न हो।



आजकल हम लोग राम -कथा में प्रविष्ट हैं l

पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं।

मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्‌।

श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये

ते संसारपतंगघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः॥2॥


श्रीरामचरितमानस ऐसा दिव्य प्रेम-सरोवर है, जो पापों का नाश करता है, कल्याण प्रदान करता है, आत्मज्ञान और भक्ति देता है, माया-मोह को दूर करता है तथा संसार के दुःखों की दाह से मनुष्य की रक्षा करता है। जो श्रद्धापूर्वक इसमें अवगाहन करते हैं, उनका जीवन शान्त, पवित्र और परम मंगलमय हो जाता है।


समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान।

बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान॥121 क॥


जो विवेकशील, श्रद्धावान और समझदार व्यक्ति भगवान श्रीराम के समर-विजय के चरित्र को सुनते, पढ़ते और मनन करते हैं, उन पर भगवान की विशेष कृपा होती है। मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन ही एक प्रकार का समर है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे शत्रुओं से तथा बाहर अनेक प्रकार की विपरीत परिस्थितियों, अत्याचारों , प्रलोभनों और कठिनाइयों से निरन्तर संघर्ष करना पड़ता है। भगवान श्रीराम का जीवन सिखाता है कि इन सभी संघर्षों में धर्म, मर्यादा, धैर्य, सत्य, तप, त्याग, शौर्य,पराक्रम और संगठित शक्ति की आवश्यकता होती है l 

विवेक के द्वारा मनुष्य सत्य और असत्य, कर्तव्य और अकर्तव्य, धर्म और अधर्म, स्थायी और अस्थायी का उचित निर्णय कर पाता है। बिना विवेक के प्राप्त विजय भी अहंकार और पतन का कारण बन सकती है। इसलिए भगवान पहले मनुष्य के अन्तःकरण को प्रकाशित करते हैं।

विभूति का अर्थ केवल धन-सम्पत्ति नहीं है। यहाँ विभूति का आशय सद्गुणों, उत्तम चरित्र, यश, सम्मान, लोकमंगल की भावना, आध्यात्मिक उन्नति तथा ईश्वर-कृपा से प्राप्त समस्त दिव्य सम्पदा से है। जहाँ विवेक होता है, वहीं विभूति भी मंगलकारी बनती है जो व्यक्ति निरन्तर श्रीराम के चरित्र का श्रद्धापूर्वक श्रवण और मनन करता है, उसके जीवन में प्रतिदिन नए रूप में विजय, विवेक और विभूति का विकास होता रहता है।


पुष्पक विमान  लंका से चल दिया हैl

भगवान श्रीराम सीताजी को युद्धभूमि तथा लंका के प्रमुख स्थान दिखाते हैं।समुद्र और रामसेतु का दर्शन कराते हैं।मार्ग में विभिन्न ऋषियों के आश्रमों और पवित्र स्थलों का दर्शन कराया जाता है।श्रीराम हनुमानजी को नन्दिग्राम भेजते हैं ताकि वे भरत को आगमन का शुभ समाचार दें।

हनुमानजी भरत को संदेश देते हैं। भरत का विरह समाप्त होता है और वे अत्यन्त आनन्दित होते हैं।पुष्पक विमान नन्दिग्राम पहुँचता है।


बीतें अवधि जाउँ जौं जिअत न पावउँ बीर।

सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर॥116 ग॥


 चारों भाइयों का भावपूर्ण मिलन होता है।

और आचार्य जी ने क्या बताया, चित्रकूट की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें l

6.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 6 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८३३ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१५

 तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात।

भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात॥116 क॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष अष्टमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 6 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८३३ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१५

हम अपनी संस्था युगभारती में परिवारभाव को विशेष महत्त्व दें हम सदस्यों के बीच सामञ्जस्य अवश्य हो l हम कोई भी कार्यक्रम करें बैठक करें तो सूचनाओं में अस्पष्टता नहीं होनी चाहिए l


गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना ऐसे समय में की, जब देश की परिस्थितियाँ अकबर के शासन के कारण अत्यन्त विषम थीं। समाज विखंडित था, धर्म के प्रति श्रद्धा क्षीण हो रही थी, नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा था और जनमानस निराशा से घिरा हुआ था। ऐसे समय में तुलसीदास जी ने श्रीराम के आदर्श चरित्र के माध्यम से समाज में धर्म, मर्यादा, सदाचार, समरसता, आत्मविश्वास और लोकमंगल की चेतना का पुनर्जागरण किया l रामकथा केवल सुनते हुए आनन्द लेने मात्र का विषय नहीं है , अपितु आत्म-जागरण का दिव्य साधन है। उसका वास्तविक लाभ तभी प्राप्त होता है जब हमारे अंतःकरण में भाव-परिवर्तन हो l अहंकार, राग-द्वेष और स्वार्थ का क्षय होकर श्रीराम के गुण हमारे जीवन में प्रकट होने लगें। यही रामात्मकता की प्राप्ति है।

जब समस्त सृष्टि में प्रभु का दर्शन होने लगे, समाज और राष्ट्र भगवान् की विराट् देह प्रतीत होने लगें , जब हमारे विचार, वाणी और आचरण में मर्यादा, करुणा, सत्य, प्रेम, त्याग, शौर्य, पराक्रम का प्रकाश झलकने लगे, जब हमें मनुष्यत्व की अनुभूति होने लगे,तभी समझना चाहिए कि रामकथा ने हृदय में अपना दिव्य प्रभाव स्थापित कर दिया है। यही रामकथा का वास्तविक प्रसाद और परम फल है।


युद्ध समाप्त हो चुका है । रावण लगभग अपने सारे कुल सहित विनष्ट हो गया है । विभीषण का राज्याभिषेक हो चुका है । लंका का समस्त वैभव प्रभु श्रीराम के चरणों में समर्पित है । विनम्र भाव से विभीषण ने निवेदन किया—"प्रभो! यह सम्पूर्ण राज्य, यह ऐश्वर्य, यह संपत्ति—सब आपकी ही है।"

किन्तु श्रीराम का हृदय वैभव में नहीं, प्रेम में स्थित था। उन्होंने संकेत दिया कि उन्हें इन सबमें तनिक भी आकर्षण नहीं है। उनके मन में तो केवल भरत का स्मरण था। वे बार-बार कहते हैं कि भरत के वियोग में बीतता हुआ प्रत्येक निमिष उन्हें कल्प के समान दीर्घ प्रतीत हो रहा है। अब विलम्ब सहन नहीं होता; शीघ्र अयोध्या पहुँचकर अपने प्रिय भ्राता भरत से मिलना ही उनकी एकमात्र अभिलाषा है।

भगवान् राम विभीषण से कहते हैं 


"हे सखा! भरत तपस्वी का वेश धारण किए हुए हैं, मेरा निरंतर जप करते-करते उनका शरीर अत्यन्त कृश हो गया होगा। मैं उन्हें शीघ्र देखना चाहता हूँ। इसलिए ऐसा उपाय करो कि मैं तुरंत उनसे मिल सकूँ। मैं तुमसे विनयपूर्वक प्रार्थना करता हूँ।"


कथा में आगे आचार्य जी ने क्या बताया,भक्त का बल भगवान का बल किस प्रकार है, भैया मोहन जी का उल्लेख नागपुर के साथ क्यों हुआ, श्री अनिल जायसवाल जी कौन हैं, आज आचार्य जी कहां जा रहे हैं जानने के लिए सुनें l

5.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 5 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८३२ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१४

 कभी कभी दुनियादारी में संयम भी डिग  जाता है, 

उसको भी हल्केपन का कुछ चस्का सा लग जाता है, 

पर धीरज का संस्कार जिनको बचपन से होता है, 

उनका संस्कार फिर से ठोकर खाकर जग जाता है।

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 5 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८३२ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१४

अपना चिन्तन सदैव सकारात्मक रखें l संसार को संसार की दृष्टि से देखें स्वयं को स्वयं की दृष्टि से l शौर्यप्रमंडित अध्यात्म की अनुभूति करते रहें l 


भारतवर्ष का संसार अत्यन्त अद्भुत और दिव्य है, जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम, लीलापुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण, देवाधिदेव भगवान् शिव, अनगिनत संतों,ऋषियों , मुनियों , तपस्वियों , योगियों तथा असंख्य देशभक्त महापुरुषों ने जन्म लेकर अपने आदर्श जीवन से सम्पूर्ण मानवता का मार्ग आलोकित किया। यही वह पुण्यभूमि है जहाँ धर्म, ज्ञान, तप, त्याग, करुणा और लोकमंगल की महान परम्परा आज भी प्रवाहित हो रही है। हम सौभाग्यशाली हैं कि हमारा जन्म भारत में हुआ है और हमें दीनदयाल विद्यालय के माध्यम से संस्कारित किया गया l  हम यदि सदैव यह ध्यान में रखेंगे तो विपरीत विषम परिस्थितियां हमें विचलित नहीं होने देंगीl 

आजकल हम लोग रामकथा के माध्यम से सद्गुण ग्रहण कर रहे हैं l

रामकथा अत्यन्त कल्याणकारी है यह हमारी व्यथा दूर करती है l 

इस समय हम उस प्रसंग में प्रविष्ट हैं  जहां भगवान् श्रीराम जी द्वारा रावण का शरीर धराशायी किया जा चुका है l भगवान राम चाह रहे हैं कि माता सीता को पैदल लाया जाए ताकि प्रजा उनके दर्शन कर ले l  दर्शन हो जाते हैं l लोकमर्यादा की स्थापना के लिए सीता जी अग्नि में प्रवेश करती हैं; अग्निदेव उन्हें निष्कलंक सिद्ध कर श्रीराम को सौंपते हैं। श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण जी , विभीषण तथा वानरवीरों सहित पुष्पक विमान से अयोध्या के लिए प्रस्थान करते हैं।


इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,अनल में अपने को सुरक्षित रखने का योगमार्ग से क्या सम्बन्ध है,आज आचार्य जी उन्नाव और कानपुर की यात्रा पर क्यों हैं, भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी, भैया आशीष जोग जी का उल्लेख क्यों हुआ,जानने के लिए सुनें l</ p>

4.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 4 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८३१ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१३

 केवल मानव का शरीर पर कर्म सहज जीवों जैसे, 

जीवन भर न जान पाते हैं सचमुच रहना है कैसे,

करें जागरण ब्रह्मकाल में तन का प्रथम मार्जन हो, 

चलते -फिरते ध्यान धारणा संयम युक्त धनार्जन हो।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष षष्ठी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 4 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८३१ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१३


हमारा जन्म भारत में हुआ है, जो अत्यन्त पवित्र, दिव्य और पुण्यभूमि है। यह परमात्मा की महान कृपा है। अतः हमें जीवन में आरत (आर्त ) नहीं होना चाहिए; अपितु इस दिव्य जन्म का सदुपयोग धर्म, सदाचार, साधना और लोकमंगल के लिए करना चाहिए।





वन-पथ पर चलने वाले प्रभु राम का जब हम ध्यान करेंगे ,  साधना में रत होंगे , तब हमारे भीतर भी वही शक्ति, धैर्य, शौर्य, पराक्रम,धर्मनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति का उदय होगा। क्योंकि वनवास के प्रभु राम हमें सिखाते हैं कि विपरीत परिस्थितियाँ हमें तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि  महान और यशस्वी बनाने के लिए आती हैं। जो प्रभु राम वन में भी मर्यादा, करुणा और कर्तव्य से विचलित नहीं हुए


निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।

सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥


, उन्हीं का चिंतन हमारे जीवन में आत्मबल, संयम, सकारात्मक सोच और विजय का प्रकाश भर देता है।हमारे भीतर भी वही आत्मतत्त्व  है जो नर लीला कर रहे प्रभु राम में था l

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं

न मन्त्रो न तीर्थो न वेदो न यज्ञाः ।

अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता

चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ll

आजकल हम लोग लंका कांड में प्रविष्ट हैं 

रोचक तथ्य यही है कि रावण जिसे भगवान राम ने अभी अभी मार डाला है, के भीतर भी वही विद्यमान था यही संसार का स्वरूप है  l इस आत्मतत्त्व की उपस्थिति यह स्मरण कराती है कि दिव्यता सबमें समान रूप से विद्यमान है; अंतर केवल उसे पहचानने और उसके अनुरूप जीवन जीने में है।


सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥

लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा॥


डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥

धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई॥

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,आचार्य जी ने अपने अध्यापक श्री निशानाथ  जी दीक्षित की चर्चा क्यों की,चन्दबरदाई का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l

3.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 3 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८३० वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१२

 ज्योत से ज्योत जगाते चलो,

ज्योत से ज्योत जगाते चलो

प्रेम की गंगा बहाते चलो,

प्रेम की गंगा बहाते चलो

राह में आये जो दीन दुखी,

राह में आये जो दीन दुखी

सब को गले से लगाते चलो,

प्रेम की गंगा बहाते चलो l 


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 3 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८३० वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१२

दुर्भाग्यवश विकृत शिक्षा के प्रभाव से आज हमारे सनातनधर्मी समाज में अनेक स्थानों पर वृद्धजनों के प्रति सम्मान की भावना क्षीण होती जा रही है, जबकि वास्तव में उनका आदर किया जाना चाहिए। वृद्धजन जीवन के दीर्घ अनुभवों के धनी होते हैं। उनके पास अनेक प्रकार की परिस्थितियों से जूझने की सफलताओं और असफलताओं का संचित अनुभव तथा उनसे प्राप्त जीवनोपयोगी शिक्षाओं की अमूल्य निधि होती है अतः हमें श्रद्धापूर्वक उनकी बातों को सुनना चाहिए और उनके अनुभवों से सीख ग्रहण करनी चाहिए ताकि हमें उचित मार्गदर्शन और लाभ प्राप्त हो l 



हम सौभाग्यशाली हैं कि आचार्य जी से हमें मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है  हमें श्रद्धापूर्वक उनकी बातों को सुनकर लाभ उठाना चाहिए आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हम अपनी अपनी बुद्धियों, विचारों और भावों को मिलाते हुए संगठित रहने का प्रयास करें , परिवार और संगठन की उपेक्षा न करें,अपना कर्मचैतन्य सदैव जाग्रत रखें, उपासना के अभ्यासी बनें l

जीवन में समस्याओं से पलायन नहीं, अपितु उनके समाधान का  हमें प्रयास करना चाहिए। भगवान श्रीराम ने भी मनुष्य रूप में अवतार लेकर जीवन की अनेक कठिन परिस्थितियों का धैर्य, मर्यादा,संकल्प,पुरुषार्थ, शौर्य, पराक्रम और धर्म के आधार पर सामना किया तथा उनके आदर्श समाधान प्रस्तुत किए l हर परिस्थिति में उन्होंने अपने को गलाया और दूसरों को लाभ पहुंचाया l

आजकल हम लोग सद्गुणों को प्राप्त करने के लिए और दुर्गुणों के निरसन के लिए उन्हीं की कथा सुन रहे हैं और इस समय लंका कांड में प्रविष्ट हैं 

भीषण युद्ध चल रहा है


"हे उमा! जिनकी मात्र इच्छा से स्वयं काल (मृत्यु) भी नष्ट हो जाता है, वही सर्वशक्तिमान श्रीराम अपने सेवक विभीषण की प्रेम-निष्ठा की परीक्षा लेने जा रहे हैं।"


उमा काल मर जाकीं ईछा। सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा॥


तब विभीषण अत्यन्त विनम्र होकर निवेदन करते हैं—

"हे सर्वज्ञ! हे समस्त चराचर जगत् के स्वामी! हे शरणागतों के रक्षक! हे देवताओं और मुनियों को सुख देने वाले प्रभो! मेरी विनती सुनिए।"


सुनु सरबग्य चराचर नायक। प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक॥


इसके नाभिकुंड में अमृत का निवास है। हे नाथ! रावण उसी के बल पर जीता है। विभीषण के वचन सुनते ही कृपालु रघुनाथ ने हर्षित होकर हाथ में विकराल बाण लिए।

और इस प्रकार रावण का अन्त हो जाता है l

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, भालका तीर्थ की चर्चा क्यों हुई जानने के लिए सुनें l

2.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 2 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२९ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३११

 कर्मानुराग, विचार, चिंतन मानवोचित  संपदा है, 

सिर्फ भौतिक भावरतता ही जगत की आपदा है। 

जाग जाओ उठपड़ो विश्वास की पूँजी सहेजो, 

सुनो सबकी गुनो भी पर करो वह निज मन कहे जो ॥


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 2 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३११

हम अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए परिवार,कार्यक्षेत्र, समाज और राष्ट्र में सक्रिय रहें , किन्तु हमारा मन विषयासक्ति और मोह में न फँसे। इसकी प्राप्ति के लिए ही हमें पूजा,भजन,अध्ययन, स्वाध्याय, ध्यान, लेखन तथा सत्संग जैसे साधनों में प्रवृत्त होना चाहिए l ये साधन मन को निर्मल, स्थिर और ईश्वराभिमुख बनाते हैं, जिससे हम संसार में रहते हुए भी उससे अलिप्त रहने की कला सीखते रहते हैं।


श्रीरामचरितमानस जो तुलसीदास जी की ज्ञानमयी भक्ति का द्योतक है ऐसा दिव्य ग्रन्थ है, जिसके श्रद्धापूर्वक अध्ययन, श्रवण और मनन से मनुष्य के अन्तःकरण की मलिनता दूर होकर उसमें ज्ञान, भक्ति, प्रेम, धर्म, नीति, शौर्य, पराक्रम और लोककल्याण का उदय होता है।

आजकल हम लोग श्रीरामचरितमानस के लंका कांड का आनन्द ले रहे हैं l


लक्ष्मण जी को उठाकर हनुमान जी भगवान राम के पास ले आए।  भगवान ने लक्ष्मण जी से कहा - हे भाई! हृदय में समझो, तुम काल के भी भक्षक और देवताओं के रक्षक हो।


सुनत बचन उठि बैठ कृपाला। गई गगन सो सकति कराला॥

पुनि कोदंड बान गहि धाए। रिपु सन्मुख अति आतुर आए॥


यह वचन सुनते ही रामप्रिय कृपालु लक्ष्मण जी उठकर बैठ गए। वह भयंकर शक्ति आकाश में चली गई। तत्पश्चात् लक्ष्मण जी ने अपना धनुष-बाण हाथ में लिया और बड़े उत्साह तथा शीघ्रता के साथ शत्रु के सम्मुख युद्ध के लिए पहुँच गए।


तत्पश्चात् उन्होंने बड़ी ही शीघ्रता से रावण के रथ को चूर-चूर कर और सारथी को मारकर रावण को भ्रमित, भयभीत और व्याकुल कर दिया। सौ बाणों से उसका हृदय बेध दिया, जिससे रावण पृथ्वी पर गिर पड़ा। तब दूसरा सारथी उसे रथ में डालकर तुरंत ही लंका को ले गया।

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया,गांव भाग्य की विडम्बना क्यों झेल रहे हैं, औरास के विद्यालय की चर्चा आचार्य जी ने क्यों की जानने के लिए सुनें l

1.8.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 1 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण *१८२८ वां* सार -संक्षेप मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१०

 पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं।

मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्‌।

श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये

ते संसारपतंगघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः ll



प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज श्रावण कृष्ण पक्ष तृतीया विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 1 अगस्त 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१८२८ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं ३१०

भारत की भास्वरता धूमिल पश्चिम का अँधियार लदा, 

कुछ जुगुनू अब भी कोशिश रत जाने क्या है लिखा बदा ।

समय की पुकार है कि  सनातनधर्मी राष्ट्रभक्त समाज के जागरण, चरित्र-निर्माण और राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण में अपना योगदान देना ही हमारा कर्तव्य है इसी प्रकार का कार्य तुलसीदास जी ने भी किया था l




साहित्यावतार गोस्वामी तुलसीदास जी ऐसे विषम और संक्रमणकालीन समय में अवतरित हुए, जब भारतीय समाज अनेक प्रकार के संकटों से घिरा हुआ था। उन्होंने यह दृढ़ संकल्प किया कि सनातन धर्म के शाश्वत आदर्शों के आधार पर भारतीय समाज को पुनः जाग्रत , संगठित और आत्मविश्वास से परिपूर्ण करना है। इसी उद्देश्य से उन्होंने श्रीरामचरितमानस, जिसके श्रद्धापूर्वक अध्ययन, श्रवण और मनन करने से मनुष्य के अंतःकरण की मलिनता दूर होकर उसमें ज्ञान, भक्ति, प्रेम और कल्याण का उदय होता है,की रचना की l और इस प्रकार भगवान् श्रीराम के आदर्श चरित्र के माध्यम से धर्म, नीति, भक्ति,शौर्य, पराक्रम,मर्यादा, लोकमंगल का संदेश जन-जन तक पहुँचा l


आजकल हम लोग इसी मानस के लंका कांड में प्रविष्ट हैं 

लक्ष्मण जी के रावण से युद्ध के पश्चात्...

हनुमान जी ने रावण को एक घूँसा मारा। वह ऐसा गिर पड़ा जैसे वज्र की मार से पर्वत गिरा हो।मूर्च्छा भंग होने पर फिर वह जागा और हनुमान के बड़े भारी बल को सराहने लगा। इस बीच लक्ष्मण जी को उठाकर हनुमान जी रघुनाथ जी के पास ले आए। यह देखकर रावण को आश्चर्य हुआ। उसे शक्ति का आधार तो मिला है किन्तु भक्ति का विश्वास प्राप्त नहीं हुआ है l 

इसके आगे आचार्य जी ने क्या बताया, जिम आदि से क्यों सचेत रहें, आत्म -श्रवण क्या है, शुक्राचार्य का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें l