प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख कृष्ण पक्ष अमावस्या विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 17 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७२३ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०५
अपने इष्ट के प्रति भक्ति का भाव जाग्रत होने पर और उनसे शक्ति प्राप्त करने के उपरान्त जो परिणाम प्राप्त होता है वह अत्यन्त कल्याणकारी हो जाता है। इससे हमारे भीतर निराशा और हताशा का स्थान नहीं रहता, बल्कि आत्मविश्वास, धैर्य और उत्साह का संचार होता है। भक्ति हमारे भीतर स्थिरता, आशा और सकारात्मक दृष्टि उत्पन्न करती है, जिससे हम विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होते l
तुलसीदास जी ने अपने सम्पूर्ण जीवन और काव्य को श्रीराम की भक्ति में समर्पित कर दिया। उनकी प्रमुख कृति रामचरितमानस तो पूर्णरूपेण भगवान् श्रीराम के जीवन, आदर्श और मर्यादा का वर्णन करती है।
भक्ति का सबसे सरल मार्ग “श्रवण” और “कीर्तन” है। जब मन बार-बार भगवान के गुणों में रम जाता है, तो वह स्वतः शुद्ध होकर उनसे जुड़ जाता है।
रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग।
राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग॥
तुलसीदास जी कहना चाहते हैं कि जो व्यक्ति प्रेमपूर्वक भगवान् राम के गुण, चरित्र और लीलाओं का गान करता है या उन्हें सुनता है, उसके भीतर स्वतः ही भक्ति उत्पन्न हो जाती है। इसके लिए अलग से कठोर साधना—जैसे वैराग्य (विषयों का त्याग), जप (मंत्र साधना) या योग (ध्यान आदि)की अनिवार्यता नहीं रहती।
भगवान् राम के नाम का जब हम जप करते हैं तो उनके कार्य व्यवहार भी हमारे सम्मुख आ जाते हैं
उन्होंने यह दिखाया कि अध्यात्म का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहकर धर्मपूर्वक कर्म करना है।
मानस में किष्किन्धा कांड भी है जिसमें भगवान् राम, लक्ष्मण, शिव जी, काशी की वन्दनाओं के पश्चात्
चौपाई है
आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक पर्बत निअराया॥
तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा॥1॥
मानस में जो प्रसंग आये हैं वे भावों में इतना अधिक तैराने लगते हैं कि सांसारिकता विस्मृत हो जाती है
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने माता जी का उल्लेख क्यों किया,विप्र का क्या अर्थ है, भगवान् राम ने क्या अभिनय किया जानने के लिए सुनें