18.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 18 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७२४ वां* सार -संक्षेप

 प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 18 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७२४ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०६

अध्यात्म का आनन्द लें और यह आनन्द अध्यात्म की अनुभूति में है 

अपने को भारत माता के सपूत समझकर अपने कर्तव्य को विस्मृत न करें हमारा कर्तव्य है राष्ट्र -निष्ठा 




यद्यपि संसार की माया अर्थात् मोह, आकर्षण, इच्छाएँ और भौतिक उलझनें हमें चारों ओर से घेर लेती हैं, फिर भी जीवन में कुछ ऐसे विशेष क्षण आते हैं जो हमें भीतर की ओर मुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। इन वेलाओं में हम बाहरी आडंबरों से हटकर अपने वास्तविक स्वरूप, आत्मा और परम सत्य के विषय में विचार करने की ओर उन्मुख हो सकते  हैं यही वह द्वार है, जहाँ से हम अध्यात्म की ओर प्रवेश कर सकते हैं

 तो आइये इसी प्रयास हेतु प्रवेश करें आज की वेला में


जब एक बलशाली व्यक्ति अहंकारवश दूसरे बलशाली से टकराता है, तो उसकी परिणति विनाशकारी होती है। सुग्रीव और बाली का संघर्ष इसका उदाहरण है, जहाँ परस्पर दंभ ने शक्ति को क्षीण कर दिया।

ऐसी ही स्थिति अकबर काल में भी दृष्टिगोचर होती है, जब भारत आंतरिक विभाजनों और संगठनहीनता के कारण दुर्बल हो गया था।

इसी संदर्भ में गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से  भारत के राष्ट्रभक्त समाज को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। उन्होंने यह संदेश दिया कि संगठन, समन्वय और परस्पर सहयोग ही समाज की वास्तविक शक्ति है।

 उनके इष्ट भगवान् श्रीराम ने भी विभिन्न स्थलों पर जाकर, विविध समुदायों को साथ लेकर यह सिद्ध किया कि संगठित शक्ति ही धर्म की स्थापना और अन्याय के विनाश का आधार बनती है। संगठन वही है जो समाज को शक्ति प्रदान करे और संगठन का आधार है प्रेम आत्मीयता 


जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।

की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार॥1॥


 हे प्रभु! आप ही इस संसार के कारण (सृष्टिकर्ता) हैं, आप ही जीवों को संसार-सागर से पार उतारने वाले हैं, और जन्म-मरण के बंधन को नष्ट करने वाले हैं। आपने पृथ्वी का भार दूर करने के लिए मनुष्य के रूप में अवतार लिया है। क्या आप वही समस्त लोकों के स्वामी परमेश्वर नहीं हैं, जिन्होंने मानव रूप धारण किया है?

प्रच्छन्न वेश में हनुमान जी पूछ रहे हैं 

प्रसंग है किष्किन्धा कांड का 

भगवान् राम उत्तर देते हैं 

इहाँ हरी निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही॥

आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई॥2॥

भगवान् राम का सारल्य हनुमान जी को भीतर तक बेध जाता है 

आचार्य जी ने इसके आगे के प्रसंग में क्या बताया सात्विक प्रेम क्या है जानने के लिए सुनें