देखि पवनसुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला॥
नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई॥1॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष द्वितीया विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 19 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७२५ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०७
परमात्मा की संपूर्ण लीला में मन न लगाकर उस लीला में अपनी भूमिका को पहचानकर उसका निर्वहन हम पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ करें अपनी शक्ति भक्ति बुद्धि कौशल विश्वास चैतन्य को देश और समाज के कल्याण में लगाएं
नई पीढ़ी को स्वाभिमानी राष्ट्रभक्त बनाएं
भारत एक अद्भुत देश है, जिसकी प्रकृति, संस्कृति और परम्पराएँ अत्यन्त समृद्ध और विलक्षण हैं। यहाँ की विविधता, सौन्दर्य और आध्यात्मिकता इसे विशेष बनाते हैं। किन्तु ऐसे महान् और पवित्र वातावरण में भी कुछ लोग विकृत मानसिकता के कारण अपने स्वार्थ, अज्ञान या दुर्भावना से देश और समाज को हानि पहुँचाने का प्रयास करते हैं।अतः आवश्यक है कि हम इन नकारात्मक प्रवृत्तियों को पहचानें, उनके प्रति सजग रहें और अपने आचरण, विचार तथा कर्तव्यनिष्ठा के माध्यम से देश की रक्षा और उन्नति में योगदान दें।हम अपने अभिनय को निष्ठापूर्वक निभाएं l सकारात्मक दृष्टिकोण, जागरूकता और नैतिकता के आधार पर ही हम इस अद्भुत देश की गरिमा को बनाए रख सकते हैं।
आचार्य जी नित्य प्रयास कर रहे हैं कि हमारे भीतर दृढ़ आत्मविश्वास जाग्रत हो। हमें यह अनुभूति बनी रहनी चाहिए कि भारत की यह पवित्र धरती असंख्य संकटों, आक्रमणों और विपत्तियों का सामना करने के पश्चात् भी अडिग, अजेय और चिरस्थायी रही है। इसका अस्तित्व क्षणभंगुर नहीं, बल्कि दीर्घकाल तक अक्षुण्ण रहने वाला है।
अतः हमें ऐसे निराशाजनक और हतोत्साहित करने वाले विचारों जैसे “हिन्दू समाज घट रहा है” या “हम दुर्बल हो गए हैं” को बार-बार दोहराना उचित नहीं है। इस प्रकार की धारणाएँ मनोबल को कमजोर करती हैं इसके स्थान पर आवश्यक है कि हम सजग, सक्रिय और आत्मविश्वासी बने रहें। हमें परिस्थितियों के प्रति जागरूक रहकर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि हमारे भीतर उत्साह, साहस और कर्तव्यबोध सुदृढ़ हो, न कि निराशा और हताशा।
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