प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया /चतुर्थी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 20 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७२६ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०८
सदैव यह ध्यान रखें कि हम उस संस्कृति में जन्मे हैं जिसने कहा वसुधैव कुटुम्बकम्
इस भाव और विचार को जो राष्ट्रभक्त अनुभव करता है भ्रमित और व्याकुल नहीं है उसे एक दूसरे के साथ संयुत रहना अच्छा लगता है l हम भी एक दूसरे के साथ संयुत रहने का प्रयास करें क्योंकि संगठन में अपार शक्ति निहित है l
प्राचीन भारत में शिक्षा केवल जानकारी देने का साधन नहीं थी, बल्कि जीवन के संपूर्ण विकास का मार्ग थी। उस समय के शिक्षक वास्तव में तत्त्वदर्शी (सत्य के ज्ञाता), आत्मदर्शी (स्वयं के भीतर स्थित परमात्मा को अनुभव करने वाले), पारदर्शी (निष्कपट और चरित्रवान् ) तथा सुयोग्य (समग्र रूप से सक्षम) होते थे।
ऋषि-मुनि जैसे आचार्य उदाहरणार्थ वशिष्ठ, विश्वामित्र, याज्ञवल्क्य केवल पाठ पढ़ाने वाले गुरु नहीं थे, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाले मार्गदर्शक थे। उनकी शिक्षा का उद्देश्य केवल बुद्धि का विकास नहीं, बल्कि मन, आचरण और आत्मा का परिष्कार था।
गुरुकुल प्रणाली में विद्यार्थी प्रकृति के बीच रहकर अनुशासन, संयम, सेवा, पराक्रम और सत्यनिष्ठा का अभ्यास करते थे। वहाँ शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण था, न कि केवल रोज़गार प्राप्ति। इसी कारण उस समय का ज्ञान विज्ञान, दर्शन, गणित, आयुर्वेद, खगोल आदि अनेक क्षेत्रों में भारत को अत्यंत ऊँचाई तक ले गया और भारत “विश्वगुरु” कहलाया।
इसके साथ ही, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि हर युग की अपनी परिस्थितियाँ और चुनौतियाँ होती हैं। आज भी यदि शिक्षक उसी तत्त्वदर्शिता, आत्मदर्शिता और चरित्र की दृढ़ता को अपनाएँ, तो शिक्षा पुनः उतनी ही प्रभावी और जीवनदायी बन सकती है।उस समय के शिक्षक विशिष्ट मार्गदर्शक होते थे और शिष्य समर्पण व सेवा भाव से ज्ञान ग्रहण करते थे l सेवक -सेव्य का भाव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है l भगवान् राम भी हनुमान जी से कहते हैं मुझे समदर्शी कहा जाता है अर्थात् न मुझको कोई प्रिय है और न ही अप्रिय किन्तु सेवक मुझे अत्यन्त प्रिय लगता है
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना॥
समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ॥4॥
यह प्रसंग है किष्किन्धा कांड का
हनुमान जी को समझ में आ गया कि भगवान् ने उन्हें सेवा का प्रतिसाद दे दिया
देखि पवनसुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला॥
नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई॥1॥
हनुमान जी कहते हैं—हे प्रभु! जब मैंने आपको (अपने स्वामी को) अपने अनुकूल और करुणामय देखा, तब मेरे हृदय में अत्यंत हर्ष हुआ और मेरे सभी दुःख दूर हो गए।
हे नाथ! उस पर्वत पर वानरों के राजा निवास करते हैं, वे सुग्रीव हैं और वे आपके ही दास (सेवक) हैं।
एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई॥
जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा॥3॥
भारतीय संस्कृति के तत्त्व को समझने के लिए मानस की एक एक चौपाई एक एक छंद महत्त्वपूर्ण है
मानस आज भी हमें शक्ति, युक्ति प्रदान करती है संकट में हमारा सहारा बनती है
इसके अतिरिक्त युगभारती की वेबसाइट की चर्चा क्यों हुई, सेवा -पुस्तिका का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें