कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछमिन राम चरित सब भाषा॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष पञ्चमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 21 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७२७ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २०९
आत्मस्थ होने का प्रयास करें अपने भीतर की शक्ति की अनुभूति कर आनन्दित रहने का अभ्यास करें
ध्यान, प्राणायाम, अध्ययन,स्वाध्याय, मनन भी करें
सांसारिकता के प्रभाव से हमारा चित्त बाह्य वस्तुओं, संबंधों और सुख-साधनों में उलझ जाता है। इसी उलझाव से हमारे भीतर लोभ,मोह, मद और मत्सर जैसे विकार उत्पन्न होते हैं। जब मन बार-बार बाह्य विषयों की ओर दौड़ता है, तब हम अपनी वास्तविक शांति और संतुलन खो देते हैं ।
परन्तु यदि हम आत्मस्थ हो जाएं , अर्थात् अपने भीतर स्थित आत्मस्वरूप में स्थित रहने का अभ्यास करें जिससे हमें अनुभव हो कि हमारा वास्तविक अस्तित्व केवल इस नश्वर शरीर तक सीमित नहीं है शरीर तो प्रकृति से बना एक साधन मात्र है, जो समय के साथ बदलता और नष्ट हो जाता है; परन्तु हमारे भीतर स्थित आत्मा शाश्वत, चेतन और अजर-अमर है तो ये विकार स्वतः क्षीण होने लगते हैं। जब हम अपने भीतर की इस शांति और संतोष को पहचान लेंगे , तब बाह्य वस्तुओं के प्रति हमारा आकर्षण स्वतः कम हो जाएगा l आत्मस्थ व्यक्ति परिस्थितियों से विचलित नहीं होता, बल्कि समत्वभाव से सबका सामना करता है। वह न तो अधिक प्राप्त होने पर अहंकार करता है और न ही अभाव में निराश होता है।
मनुष्य आत्मस्थ होकर भीतर की ओर मुड़ता है, तब वह प्रभु की कृपा का पात्र बनता है।
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥2॥
यह मानसकार अर्थात् गोस्वामी तुलसीदास जी के भीतर का भाव बोल रहा है l
आइये प्रवेश करें इसी मानसकार की अद्भुत कृति श्रीरामचरित मानस जो केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक अनुभूति है, जो मनुष्य को आत्मस्थता, भक्ति और परम शांति की ओर अग्रसर करती है, के किष्किंधा कांड में
सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि।।
एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई।।
जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा॥
जब सुग्रीव ने भगवान राम के दर्शन किए, तब उसने अपने जन्म को अत्यंत धन्य मान लिया। उसे लगा कि उसका जीवन सफल हो गया, क्योंकि उसे प्रभु का साक्षात् सान्निध्य प्राप्त हुआ।
इस कथा से हमें अनेक व्यावहारिक संदेश भी मिलते रहते हैं हम उन पर भी ध्यान दें
इस कथा के विस्तार में आचार्य जी ने क्या बताया,सशर्त प्रेम और शर्तविहीन प्रेम में क्या अन्तर है, भैया पुरुषोत्तम जी का उल्लेख क्यों हुआ जानने के लिए सुनें