राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी॥ मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा॥
प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष सप्तमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 23 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७२८ वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१०
अपने हित की अपेक्षा मित्र के सुख-दुःख को अधिक महत्त्व दें
जे न मित्र दु:ख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥
निज दु:ख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दु:ख रज मेरु समाना॥1॥
ये पंक्तियां हैं किष्किन्धा कांड की
इनको विश्लेषित कर यदि हम चर्चा करें तो हमारा निश्चित रूप से ज्ञानवर्धन होगा
जो व्यक्ति अपने मित्र के दुःख को देखकर स्वयं दुःखी नहीं होता, ऐसे व्यक्ति को देखना भी पाप के समान कहा गया है। इसका आशय यह है कि जिसमें संवेदनशीलता और सहानुभूति का अभाव है, वह सच्चा मित्र नहीं हो सकता।
सच्चा मित्र अपने बड़े से बड़े दुःख को भी तुच्छ समझता है, अर्थात् उसे धूल के समान छोटा मान लेता है। इसके विपरीत, वह अपने मित्र के छोटे से छोटे दुःख को भी अत्यन्त बड़ा मानता है, जैसे वह सुमेरु पर्वत के समान भारी हो।
सच्ची मित्रता का आधार निस्वार्थता, त्याग, करुणा और आत्मीयता है। सच्चा मित्र वही है जो अपने हित की अपेक्षा मित्र के सुख-दुःख को अधिक महत्व देता है और उसके कष्ट को अपना कष्ट मानकर उसकी सहायता के लिए तत्पर रहता है।
जब मित्रता इस आदर्श पर आधारित होती है कि हम अपने दुःख को छोटा और साथी के दुःख को बड़ा मानें, तब संगठन केवल लोगों का समूह नहीं रह जाता, बल्कि वह संवेदनाओं और विश्वास से जुड़ा हुआ परिवार बन जाता है।
भावों का संप्रेषण शक्ति प्रदान करता है l
ऐसी मित्रता में प्रत्येक व्यक्ति दूसरे के सुख-दुःख का सहभागी बनता है। इससे परस्पर विश्वास दृढ़ होता है और मन में किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या या स्वार्थ की भावना स्थान नहीं पाती। जब हर सदस्य यह अनुभव करता है कि संकट के समय सभी उसके साथ खड़े हैं, तब उसके भीतर संगठन के प्रति निष्ठा और समर्पण स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।
इस प्रकार का वातावरण सहयोग, त्याग और आत्मीयता को जन्म देता है। निर्णय सामूहिक हित को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं और कार्यों में एकजुटता दिखाई देती है। परिणामस्वरूप संगठन की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है और वह बड़े से बड़े लक्ष्य को भी सहजता से प्राप्त कर सकता है।आचार्य जी परामर्श दे रहे हैं कि हमारा युगभारती संगठन भी ऐसा ही हो l
भैया राजीव शर्मा जी (मुम्बई ), भैया डा पंकज श्रीवास्तव जी, भैया डा अमित गुप्त जी, भैया शलभ जी(यू एस ए ), भैया वीरेन्द्र त्रिपाठी जी का उल्लेख क्यों हुआ, आचार्य जी ने किस प्रकार स्पष्ट किया कि भगवान् राम को भी इस संसार की पीड़ा सता गयी,कवि आत्मबोधोत्सव कैसे मनाता है जानने के लिए सुनें