24.4.26

प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष अष्टमी /नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 24 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण *१७२९ वां* सार -संक्षेप

 सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी॥

सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें॥5॥

मूर्ख सेवक, अविवेकी (अज्ञानी) राजा, कंजूस व्यक्ति, दुष्ट स्त्री और कपटी मित्र—ये चारों शूल (काँटे) के समान पीड़ादायक होते हैं।

इसलिए हे मित्र! तुम चिंता छोड़ दो और मेरे बल पर विश्वास रखो; मैं तुम्हारा कार्य हर प्रकार से सिद्ध कर दूँगा।


प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष अष्टमी /नवमी विक्रमी संवत् २०८३  तदनुसार 24 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण

  *१७२९ वां* सार -संक्षेप

मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २११


हमारा धर्म है कि हम अपने मित्र को बुरे मार्ग से हटाकर अच्छे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें । उसके गुण प्रकट करें और अवगुणों को छिपाएं l


आचार्य जी इन वेलाओं के माध्यम से नित्य हमें ऊर्जा  और उत्साह प्रदान करते हैं,सत्कर्मों के लिए प्रेरित करते हैं  राष्ट्रभक्ति के लिए संकल्प जगाते हैं यह हमारा सौभाग्य है 

हम भगवान् राम की कथा सुन रहे हैं, जिन्होंने मनुष्य रूप में अवतार लेकर हमें आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा दी। उनके जीवन का प्रत्येक प्रसंग धर्म, मर्यादा और करुणा का संदेश देता है। इस समय हम प्रविष्ट हैं किष्किन्धा कांड में 

इसी क्रम में , अतुलित बल के धाम, शक्ति के आगार, भक्ति के साकार स्वरूप, शिव और शक्ति के अद्भुत संगम हनुमान जी, भगवान् राम को सुग्रीव के पास ले जाते हैं।

सुग्रीव जिनका जन्म सूर्यदेव के अंश से हुआ था, जैसे उनके बड़े भाई बाली इन्द्र के अंश से उत्पन्न माने जाते हैं,अत्यन्त दुःखी और भयभीत हैं, क्योंकि उनके भाई बाली ने उन्हें पराजित कर न केवल उनका राज्य छीन लिया, बल्कि उनकी पत्नी को भी अपने अधिकार में कर लिया। इस पीड़ा को व्यक्त करते हुए वे कहते हैं 

“रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी।

हरि लीन्हसि सर्बसु अरु नारी॥

ताके भय रघुबीर कृपाला।

सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला॥”


बाली ने मुझे शत्रु के समान बहुत मारा-पीटा, मेरा सब कुछ छीन लिया। उसी के भय से, हे रघुवीर! मैं सम्पूर्ण जगत् में दुःखी होकर भटक रहा हूँ।


भगवान् राम उन्हें विश्वास दिलाते हुए कहते हैं हे सुग्रीव! सुनो, मैं एक ही बाण से बालि को मार डालूँगा। ब्रह्मा और रुद्र की शरण में जाने पर भी उसके प्राण न बचेंगे ऐसा शौर्य का विश्वास भगवान् राम ने प्रकट किया l

मानस के ये अद्भुत प्रसंग हैं हम इनमें अवगाहन करें अर्थात् शब्दों से आगे बढ़कर उनके भाव, संदेश और जीवन में प्रयोग को समझें l

इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने मित्र का अर्थ किस प्रकार स्पष्ट किया? आचार्य जी ने अपने किन शिक्षकों का उल्लेख किया जानने के लिए सुनें