प्रस्तुत है *आचार्य श्री ओम शङ्कर जी* का आज वैशाख शुक्ल पक्ष नवमी विक्रमी संवत् २०८३ तदनुसार 25 अप्रैल 2026 का सदाचार संप्रेषण
*१७३० वां* सार -संक्षेप
मुख्य विचारणीय विषय क्रम सं २१२
नयी पीढ़ी को भारत की वास्तविक शिक्षा से परिचित कराना आवश्यक है
हम अपने जीवन को केवल संघर्ष, पीड़ा और कठिनाइयों का बोझ मानकर न जिए, बल्कि परमात्मा द्वारा रचित इस सुंदर सृष्टि को अनुभव करते हुए उसमें आनंद खोजें । जीवन में अनेक प्रकार की बाधाएँ, कष्ट और चुनौतियाँ आती हैं, परंतु यदि हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक और ईश्वर-स्मरण से युक्त हो, तो वही कठिन यात्रा भी सुखद और अर्थपूर्ण बन सकती है। भारत की मनीषा का यह संदेश हमें सिखाता है कि जीवन की यात्रा चाहे कितनी ही कठिन क्यों न हो, यदि हमारी दृष्टि सम्यक् और हृदय प्रसन्न है, तो वही यात्रा सुखमय, सार्थक और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम बन जाती है। तो आइये इसी संदेश का स्मरण करते हुए प्रवेश करें आज की वेला में
इस समय हम किष्किन्धा कांड में प्रविष्ट हैं
सूर्यांश सुग्रीव बड़े भाई के व्यवहार से अत्यन्त व्याकुल हैं उनकी व्याकुलता को दूर करने का प्रयास चल रहा है
धनुष-भंग का प्रसंग, ताड़का-वध, मारीच और सुबाहु का संहार, तथा खर, दूषण और त्रिशिरा जैसे राक्षसों का वध—इन सभी पराक्रमपूर्ण घटनाओं को सुग्रीव ने अवश्य ही सुन रखा होगा। फिर भी उसका स्वभाव शंकालु था, क्योंकि वह अपने भाई बाली के भय से सदैव आशंकित और असुरक्षित रहता था।
अतः यद्यपि वह श्रीराम के पराक्रम से परिचित था, तथापि प्रत्यक्ष प्रमाण के बिना उसका संशय दूर नहीं हो पा रहा था। यही कारण है कि वह बार-बार भगवान् श्रीराम की शक्ति के प्रति आश्वस्त होने का प्रयास करता है।
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा॥ दुंदुभि अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए॥6॥
सुग्रीव पहले भगवान् श्रीराम को बालि की असाधारण शक्ति का परिचय कराते हैं, ताकि वे स्थिति की गंभीरता समझें। किन्तु भगवान् अपनी सहज लीला से ही यह सिद्ध कर देते हैं कि वे बालि से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं, जिससे सुग्रीव का विश्वास दृढ़ हो जाता है।
यह प्रसंग भगवान् के दिव्य सामर्थ्य और भक्त के मन में विश्वास उत्पन्न करने की लीला को दर्शाता है।
उपजा ज्ञान बचन तब बोला।
नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला।।
सुख सम्पति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई ll
जब सुग्रीव के हृदय में ज्ञान उत्पन्न हुआ, तब उसने विनम्र वाणी में कहा—
हे नाथ! आपकी कृपा से मुझे मन की शांति, सुख, संपत्ति, परिवार और प्रतिष्ठा—सब कुछ प्राप्त हो सकता है; किन्तु मैं इन सबका त्याग करके केवल आपकी सेवा ही करूँगा।
सुग्रीव यदि पूर्णतः विरक्त होकर केवल भजन में लग जाते, तो तत्काल दृष्टि से यह लगता है कि रावण के वध में कठिनाई आती क्योंकि वानर सेना का संगठन, सीता की खोज, और लंका तक पहुँचने का मार्ग मुख्यतः सुग्रीव के सहयोग से ही संभव हुआ। रावण-वध कठिन या विलंबित हो सकता था, क्योंकि सुग्रीव का संगठन और सहयोग अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। विद्या और अविद्या दोनों को जानना आवश्यक है क्योंकि संसार का कलुष भी दूर करना आवश्यक है यही वास्तविक शिक्षा है l यही शौर्यप्रमंडित अध्यात्म है l
इसके अतिरिक्त आचार्य जी ने लक्ष्मण गीता की चर्चा क्यों की,आचार्य जी आज कहां जा रहे हैं जानने के लिए सुनें